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Wednesday, December 31, 2025

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM
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December 31, 2025 at 11:13AM
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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।

Wednesday, December 24, 2025

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

 


उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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December 24, 2025 at 09:51AM
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December 24, 2025 at 11:13AM
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December 24, 2025 at 12:13PM

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

 


उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

 


उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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