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Wednesday, February 18, 2026

भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को
भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को
भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

 सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक खतरनाक कमेंट किया गया। खतरनाक  ऑनरेबल चीफ जस्टिस का अभी तक का यह सबसे खतरनाक स्टेटमेंट है। और उन्होंने पूरी न्याय व्यवस्था को पूरी न्याय व्यवस्था का मतलब पूरी न्याय व्यवस्था को देश की कड़घरे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने न्याय व्यवस्था के मामले में कहा कि हम विदेशी नहीं हैं। हम भारत हैं। भारत को ध्यान में रखते हुए जजमेंट होने चाहिए। भारत को ध्यान में रखते हुए ही कारवाई होनी चाहिए। हम विदेशियों की तरह सेक्सुअल ऑफेंसेस में यह निर्णय नहीं दे सकते। यह सेंसिटिविटी हमारे जजेस में होनी चाहिए। राष्ट्र दिमाग में होना चाहिए। देश दिमाग में होना चाहिए। देश की संप्रभुता, देश का सोशल स्ट्रक्चर, देश का इकोनॉमिक स्ट्रक्चर ये सारे दिमाग में होने चाहिए। जिस समय कोई जजमेंट दिया जाए। फिर उन्होंने कहा कि मैं आदेश देता हूं नेशनल जुडिशियल एकेडमी को और मैं उनसे कहता हूं जस्टिस अनिरुद्ध बोस जो कि इस समय नेशनल जुडिशियल एकेडमी के इस समय प्रेसिडेंट हैं। पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई और कहा कि फिर से रिवैल्यूएट करिए कि हमारे जजेस को क्या पढ़ाया जा रहा है।

हर राज्य में एक जुडिशियल कमेटी होती है। जुडिशियल एकेडमी होती है हर राज्य में छोटे जजेस को छोटे जजेस से मतलब है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तक के जजेस को वो एकेडमी पढ़ाती है।पर्टिकुलर सिलेबस तैयार कर दिया जाता है। उन सिलेबस में कुछ चुनिंदा केसेस डाल दिए जाते हैं। उनका एक ओवरव्यू डाल दिया जाता है। उसी ओवरव्यू के आधार पर नीचे की कोर्ट यानी कि डिस्ट्रिक्ट की कोर्ट डिसीजन देना शुरू करती है। खासतौर से लोअर कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट फर्स्ट ट्रायल कोर्ट है सबसे पहले वो उसी के आधार पर वो अपनी डायरी साथ में रखते हैं। जैसे ही उनके सामने कोई ऐसा पेचीदा मामला आता है डायरी खोलते हैं। डायरी में जो लिखा होता है कि इसको ऐसे करना चाहिए वैसे उसका डिसाइड कर देते हैं। फिर वो सोचते हैं कि जाने दो ऊपर जब कुछ गड़बड़ होएगी तो अपीली कोर्ट उसको डिसाइड कर देगी। इस प्रकार एकेडमी जब नया हाई कोर्ट के जजेस अपॉइंट होते हैं तो उनको भी एकेडमी भेजा जाता है।

नेशनल जुडिशियल एकेडमी भी होती है। उसमें भी वही किया जाता है। नेशनल जुडिशियल एकेडमी हमारे यहां भोपाल में है। वहां पर जो भी लॉर्डशिप का अपॉइंटमेंट होता है, लॉर्डशिप के अपॉइंटमेंट से पहले मतलब पहला जब एलिवेशन होता है तो एलिवेशन से पहले उनको सेंसिटिविटी दिखाई जाती है, पढ़ाई जाती है, सिखाई जाती है। और कैसे बिहेवियर होना चाहिए? क्या हमारे हमारे रिपरकेशंस हैं? क्या हमारी बाउंड्रीज हैं? क्या हम तय करें? यह सब कुछ पहले से तय किया जाता मतलब वहां पर पढ़ाया जाता है। उसके बाद लॉर्डशिप मतलब जब कोर्ट में जाते हैं तो प्रोवेशन पे एक दो साल रहते हैं। प्रोवेशन के बाद परमानेंट हो जाते हैं तो लॉर्डशिप हो जाती है। लॉर्डशिप हो जाती है तो फिर तो हम जानते ही हैं कि वो क्या करने लगते हैं। फिर उनको वो ना तो काबू में रह सकते हैं ना ही उनके ऊपर कोई दबाव हो सकता है। उनके ऊपर सिर्फ एक काम हो सकता है। वो है महाभियोग। इसलिए महाभियोग की प्रक्रिया हम सब जानते हैं। भारत में आज तक एक भी जज महाभियोग से नहीं हटाया गया। या तो उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया होगा या फिर पार्लियामेंट के अंदर बहुमत नहीं मिला होगा या फिर वहां सरकार गिर गई होगी। लेकिन एक भी जज का अभी तक वो नहीं हुआ। हम जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला इस समय देख ही रहे हैं। इतने नोटों की गड्डियां मिलने के बावजूद जब पार्लियामेंट ने या लोकसभा ने कमेटी बिठा दी कि इस पर जांच करो तो फिर सुप्रीम कोर्ट आते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट जाते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट कहता है अब इसको देख रहे हैं। अब उसको देख रहे हैं। वो मतलब किस तरह से उलझए हुए हैं।मुझे लगता है कि वो भी थोड़ा सा लंबा खींच जाएगा।

मैं आपको बता दूं कि ये जो मामला आया है बहुत सेंसिटिव है। आपको याद होगा एक नागपुर का मामला आया था। नागपुर हाई कोर्ट की एक महिला जज ने भी कुछ समय पहले ऐसा ही एक डिसीजन दिया था जिन्होंने कहा था कि कपड़े ऊपर से पहने हुए थी लड़की अगर तो फिर वो ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता। अब कपड़े ऊपर से पहने हुए थे। ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता क्योंकि बीच में कपड़े हैं उसके और व्यक्ति के बीच में कपड़े हैं। उन्होंने कपड़े पहन रखे हैं। तो ये अटेम्प्ट टू रेप नहीं हो सकता। ऐसा कुछ उन्होंने डिसीजन दिया था। लेकिन उन जैसा साहिबा की खास बात ये थी कि वो प्रोबेशन पर थी और प्रोबेशन पर होने की वजह से उनको परमानेंट नहीं किया गया था। अबकि उनको परमानेंट नहीं किया गया था तो वो वापस बैक टू पवेलियन चली गई होंगी या फिर प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया होगा जो भी हो।

ऐसा ही एक सेंसिटिव मामला पॉक्सो एक्ट का फिर से आया ऑनरेबल इलाहाबाद हाई कोर्ट का। ऑनरेबल इलाहाबाद हाईको ने जो डिसीजन दिया वो विदेशी धारणाओं के आधार पर था। जैसा कि विदेशों में होता है। कोर्ट ने कहा है च्यू फॉरेन मेथड्स। ये जो विदेशों के मेथड है ना सेक्सुअल ऑफेंसेस में बचाने की। किसी तरह से बचा लो। उनके बीच में कॉम्प्रोमाइज हो जाए। कॉम्प्रोमाइज होकर मामला निपट जाए। अपने-अपने घर जाए। क्या फर्क पड़ता है? वो उनके आपस के पर्सनल रिलेशंस लड़के लड़की के रहते हैं। जो ऑफेंडर है उसके या जो एक जो एक्यूज्ड है उसके और जो विक्टिम है उसके उनके आपस के रिलेशन है। अगर वो आपस में समझौता कर लेते हैं तो सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी खतरनाक टाइप के सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी वहां बचा दिया जाता है। कंपनसेशन लेके लड़की अपने घर चली जाती है। लड़का अपने घर चला जाता है। परिवार के बीच में या दोनों के बीच में समझौता हो जाता है।

लेकिन भारत ऐसा नहीं। भारत में हर एक ऑफेंस अगेंस्ट द स्टेट है। राज्य की अपनी एक धारणा है। राज्य का अपना एक स्टाइल है। राज्य का अपनी व्यवस्था है। राज्य का अपना एक संस्कार है। राज्य की अपनी एक संस्कृति

है और राज्य में रहने वाले लोगों की ये अपनी धारणा है। मैं इसको अगर दूसरे शब्दों में कहूं तो ये डेफिनेशन पहले भी सुप्रीम कोर्ट बता चुका है कि उत्तर में जिसके हिमालय हो दक्षिण में जिसके महासागर हो उस भूमि पर रहने वाले लोगों का जो स्वभाव है वे ऑफ लाइफ है उसको ही हिंदू कहते हैं। उसको ही हिंदूइज़्म कहते हैं। और कोई अलग से डेफिनेशन नहीं है। यहां की संस्कृति, यहां के संस्कार, यहां का पहनावा, उड़ावा और जो पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्य, पूर्वजों के शौर्य और पूर्वजों की मान्यता, पूर्वजों के द्वारा मूल्य निर्धारित किए गए मूल्यों की जो स्थापना है, वही भारत है।

ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हम सब जानते हैं कि ऑनरेबल जस्टिस सूर्यकांत जब बैठे थे उसी समय उन्होंने कहा था रोहिंग्या अंदर आ गए तो क्या इनको रेड कॉरपेट बिछाऊं? क्या इनको मैं एजुकेशन दूं? क्या इनके खाने पीने की व्यवस्था करूं? इनके लिए यहां स्थान नहीं है। जो बॉर्डर तोड़कर आया है, जो कानून तोड़कर आया है, उसको भारत में स्थान नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही कई मामलों में उन्होंने अब नई दोबारा से फाइलें खोलनी शुरू कर दी हैं। मैंने अभी बताया था शरूर मठ का मामला दोबारा खोल दिया गया है सबरीमाला के नाम से। लेकिन अब वहां जो सरकारी आधिपत्य है मंदिरों पर सरकार का उससे मुक्ति का समय आ गया है। नई जजेस की बेंच बिठाकर उस पर सुनवाई। मैंने उस पर एक पूरा लेक्चर रिकॉर्ड किया था। उसका कानूनी पहलू बताया था और कोर्ट की धारणा भी बताई थी और कैसे कोर्ट ने नए जजेस की बेंच बनाई वो अगर आपने ना देखा हो तो उसको देखना चाहिए। मैं समझता हूं कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा और मामला क्या था? एक नाबालिक लड़की पर किसी लड़के ने प्रहार किया। किसी आदमी ने प्रहार किया। प्रहार करते समय उसने उसकी छाती पर प्रहार किया और कपड़े खोल रहा था। इस स्थिति में दूसरे लोग वहां पर आ गए जिसकी वजह से वो लड़की बच गई। जब लड़की बच गई तो मुकदमा लिखवाया गया। मुकदमे में यह अटेमप्ट टू रेप का मुकदमा था। लेकिन जब हाई कोर्ट पहुंचा तो हाई कोर्ट ने कहा कि छाती पर हाथ मारना किसी भी तरह से अटेमप्ट टू रेप नहीं है। ऑनेरेबल सुप्रीम कोर्ट में जब उसकी अपील आई तो आज तीन जजेस की बेंच ने उसको सुना। अब तीन जजेस की बेंच जब उसको सुन रही थी। सुनते समय चीफ जस्टिस को ये कहना पड़ा कि ये कैसा न्याय हम कर रहे हैं? ये कैसा भारत हम बना रहे हैं? भारत में हम किस प्रकार की धारणा रखे हुए हैं? क्या हम विदेशियों के आधार पर यहां तय करने लगे लगना शुरू कर दिया है? क्या हमारी धारणाएं विदेशी धारणाएं हो गई है? क्या हम विदेशियों के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं।आपको एक बात बताऊं कि भारत में एक बड़ा अच्छा चलन चला था। चलन ये चला था कि अगर ऑक्सफोर्ड हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने आज ऑक्सफोर्ड का भी नाम लिया इसमें। हमारे यहां एक चलन चल गया था और चलन यह था कि जो कैमब्रिज, ऑक्सफोर्ड और तमाम तरह के इन विद्यालयों से पढ़कर आए, इन यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए वो बहुत काबिल होता है और वो काबिल होता था तो वो जज जब बनकर बैठता है तो वो क्या

करता है? वो कहता है सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में लड़की और लड़के को पूर्ण रूप से ऑटोनोमी है। वो कहता है कि गे मैरिज वैलिड है। जब वो वहां से पढ़कर आते हैं तो यहां पर वो धारणा रखते हैं कि गेज हैविंग द फंडामेंटल राइट टू गेट अ जज ऑफ द सुप्रीम कोर्ट। एक गे जो महिला गे हो वकालत करता है उसको सुप्रीम कोर्ट का जज होने का भी अधिकार है। उसको हाई कोर्ट का जज होने का अधिकार है। किस तरह का मैसेज हमारे जजेस दे देते रहे हैं। गे मैरिज के मामले में या सेम सेक्स मैरिज के मामले में या फिर तमाम ये जो एडल्टरी के मामले हैं उन मामलों में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के मामले में ये भारत की धारणा तो नहीं थी। लेकिन पिछले 5 साल में इस तरह के कई एक जजमेंट भारत में दिए गए। ये वो जजेस थे मोस्टली जिन्होंने ये जजमेंट दिए जो विदेशों में पढ़कर आए थे। विदेशों में पढ़ने के बाद वहां का माहौल, वहां का एटमॉस्फियर, वहां का वातावरण उसके आधार पर डिसीजन दे दिए उन्होंने और कहा कि नहीं नहीं वो सामन ने ऐसा लिखा था कि सेवनी ने ऐसा लिखा था कि वो ऑस्टिन ने ऐसा लिखा था। बड़े-बड़े भारीभरकम नाम बैकग्राउंड में देकर जरिसुडेंस के और अंग्रेजी जरिसुडेंस को यहां लिखकर जजमेंट देते रहे हैं और उन जजमेंटों में सरकार को पीछे छोड़ते रहे हैं। सरकार के ऊपर फंडामेंटल राइट के नाम से तमाम अत्याचार करते अत्याचार से मतलब है तमाम ऐसे जजमेंट देते रहे हैं जो भारत की सोवनिटी को चैलेंज करते थे। ऐसे तमाम जजमेंट होते रहे हैं जो भारत की बाउंड्री को प्रोटेक्ट नहीं करते। भारत के लोगों के फंडामेंटल राइटों को प्रोटेक्ट नहीं करते। विदेशियों को भारत में शरण देना, विदेशियों के फंडामेंटल राइट हमारे यहां होता रहा है। जजमेंट भी होते रहे कि भ अगर विदेशी है तो क्या हुआ? इसको पढ़ने का राइट है। इसको खाने का राइट है। इसको सोने का राइट है। इसको ये राइट है। इसको राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी है। हम नहीं छीन सकते। इसलिए इसके स्कूलों में एडमिशन करवा दिए जाए। इनको वो वजीफे दिए जाए। इनको इस तरह के जजमेंट भारत में होते रहे।

मैं साधुवाद कहूंगा ऑनरेबल चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जिन्होंने आज ये ये जो दर्द था उस दर्द को खुलकर कह दिया। भले ही केस किसी दूसरे प्रकार का था लेकिन उन्होंने खुलकर कहा और कहा कि विदेशी आधार पर विदेशी धारणा के आधार पर विदेशी बचाव के आधार पर भारत में अदालतें नहीं चलनी चाहिए। भारत के जजों को सेंसिटिव होना चाहिए।इंडियन इको सिस्टम से फेमिलियर होना चाहिए। भारत की सोशल स्ट्रक्चर को पता होना चाहिए। भारत में वो मैसेज कैसा जाएगा। क्योंकि पहले यह होता रहा है कि जब जजेस डिसीजन देते थे तो आंख पर पट्टी बांधकर अंधा कानून ऐसा दिखाया जाता था। यानी कि कानून के जो अप एंड डाउन्स हैं, कानून के जो डिसीजंस हैं उनको ही केवल फॉलो किया जाएगा। चाहे वो जज साहब को मालूम हो कि वो सही है, जज साहब को मालूम हो कि वो नहीं सही। कुछ भी हो। लेकिन जो फार्मूला बन गया है उसी फार्मूले पर चलने वाले हमारे यहां कोर्ट रहे।

चीफ जस्टिस ने कहा एक बात ध्यान रखिए भारत है। भारत में भारतीय प्रेसिडेंट भी है। भारतीय कल्चर भी है। भारत का अपना स्वभाव है। उसके अनुसार क्या मैसेज देना चाहते हैं? जजेस को चाहिए कि वो केवल लीगल ग्राउंड ना लगाएं। यह भी देखें कि उनके जजमेंट से देश पर प्रभाव क्या पड़ेगा? उनके जजमेंट से समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके ऑर्डर से देश में आने वाली पीढ़ी क्या सबक लेंगी? ये सारी बातें उन्होंने आज जो कही हैं मैं समझता हूं कि दिल खुश कर दिया मेरे जैसे व्यक्ति का जो लगातार ये कहता आया मैं हमेशा से कहता हूं हम हैं आप हैं कोई भी प्रोफेशन में है मैं जज हूं मैं वकील हूं मैं डॉक्टर हूं मैं इंजीनियर हूं मैं पत्रकार हूं भाई राष्ट्रित तो में हूं कहां है वो जजेस जो कि आजादी से पहले हुआ करते थे और कहां गए वो जजेस भारत में आक्रांताओं ने जब कब्जे किए तो उससे पहले न्यायाधीश बैठा करते थे वो कोई नहीं रहता। जब देश गुलाम होता है तो हर व्यक्ति गुलाम होता है। जब देश खतरे में होता है तो हर व्यक्ति खतरे में होता है। किसी का कोई फंडामेंटल राइट नहीं होता और कोई राइट ही नहीं होता। जब राष्ट्र है तो हम हैं। राष्ट्र प्रथम की भावना करके कोई भी काम किया जाए। पत्रकार लिखता है तो राष्ट्र प्रथम लिखे। इंजीनियर बिल्डिंग बनाता है तो राष्ट्र प्रथम बनाए। डॉक्टर दवाई देता है तो राष्ट्र प्रथम की बनाए। वकील वकालत करता है तो राष्ट्र प्रथम पे बनाए। करें और अगर जज जजमेंट देता है तो राष्ट्र प्रथम का जजमेंट क्यों ना दिया जाए।

आज का मैसेज जो उन्होंने दिया है जुडिशरी जैसा वो बता रहे हैं वैसी ही होनी चाहिए। मेरा मन तो यही कहता है कि जुडिशरी वैसी होनी चाहिए जैसा कि ऑनरेबल चीफ जस्टिस ने आज कहा। आप सोच कर देखिए। सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में भी आप ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज को फॉलो करते हैं। आप वो वातावरण को फॉलो करते हैं जो लोग कॉन्वेंट में बच्चों को पढ़ाया करते थे। कॉन्वेंट का मतलब ये होता था विदेशी भाषा में अगर देखोगे तो कॉन्वेंट का मतलब अनाथालय है। वो अनाथालय में पढ़ाया करते थे। क्यों? क्योंकि वो प्लूटो और सुकरात कहता था कि महिला और पुरुष का जो साथ होता है वो बच्चे पालने के लिए नहीं होता है। वो केवल एंजॉय करने के लिए होता है। अगर बच्चे पालने के लिए नहीं तो बच्चों का क्या होगा? तो फिर वो ऑर्फनेज में रखे जाते थे। ऑर्फनेज में जो स्कूल खोला जाता था जहां पर पढ़ाई भी होती थी उसको कॉन्वेंट कहा जाता था। यानी कि अब वो फ्री है। आज भी उनके यहां का वातावरण कुछ ऐसा ही है कि एक महिला अपने एक मैं किसी का उदाहरण सुन रहा था। एक महिला अपने पति की कब्र पर झूला झुला रही थी या पंखा डुला रही थी। कुछ लोग वहां गए तो हिंदुस्तान के रहने वाले थे। उनको लगा कि देखो ये ईसाइयत की धरती पर कितनी अच्छी महिला है। ये तो भारत के संस्कारों से भी बड़े संस्कार हैं। उस महिला से उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि हमने तो विदेशों के बारे में, ईसाइयों के बारे में जो वहां पर रहते हैं उनके विषय में बड़ा गलत सुना है कि वो तो इंटैक्ट होते नहीं है। वो तो कॉन्ट्रैक्ट में रहते हैं। तो वो महिला हंसने लगी और उसने कहा कि हम कब्र सूखने से पहले विवाह नहीं कर सकते। इसलिए मैं पंखे से कब्र सुखा रही हूं ताकि कब्र सूख जाए तो मैं विवाह कर लूं। दूसरा विवाह मेरा हो जाए। इतने रिस्ट्रिक्शन की कब्र सूखने तक का रिस्ट्रिक्शन है। यह भारत नहीं है। आप देखो जहां पर इस प्रकार की व्यवस्थाएं हो कि वो कॉन्ट्रैक्ट है। आज हमारा तो कल तुम्हारा जानवरों की तरह जिनका व्यवहार है। 

जानवरों की तरह जिनका चाल चलन है। जानवरों की तरह जिनकी रिहाइश

है। उनको कैसे फॉलो कर सकते हैं। भारत विश्व गुरु के पद पर इसलिए आसीन था क्योंकि भारत विश्व भर को मैसेज देने वाला देश है। भारत विश्व भर में बताने वाला देश है कि आखिर हम कैसी सभ्यता चाहते हैं? संसार कैसा होना चाहिए? मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ इसी प्रकार के एक्सपेरिमेंट होने चाहिए। क्योंकि हमारे यहां की जो संस्कृति संस्कार रहे हैं उन संस्कारों और संस्कृतियों में हम ये कहते रहे हैं कि हम समगोत्री विवाह नहीं करेंगे। समगोत्री का मतलब एक ही विद्यालय में पढ़ने वाला बेटा और बेटी मतलब महिला और लड़का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वो भाई बहन हो जाते हैं वो गुरु भाई बहन हो जाते हैं। लेकिन आज की फिल्म इंडस्ट्री स्कूल कॉलेज का मतलब यह दिखाती है कि किस तरह से वो आगे गठबंधन में चले जाएंगे। एजुकेशन कहीं नहीं आती। सिर्फ यह दिखाया जाता है कि विद्यालय में पढ़ने गए हैं या यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए हैं तो उनका चूच का मुरब्बा कैसे बनेगा। आप सोच के देखिए कि इस प्रकार की धारणा जिस देश में बनने लगी हो उस देश का क्या हो सकता है? ये ध्यान रखना चाहिए कि भारत में समगोत्री विवाह रोका गया था। भारत में सपिंडी विवाह रोका गया था। भारत में सात पीढ़ी पिता की और पांच पीढ़ी मां के तरफ का रिश्ता रोका गया था। इन सबको भाई-बहन कहा गया और गुरु बहन और गुरु भाई को भी गुरुओं के बच्चे को भी भाई-बहन कहा गया।

 ऐसा देश जहां इतने उच्च सिद्धांत हो उस देश में ऐसे जजमेंट चीफ जस्टिस मुझे लगता है कि उनको भी समझ में आ गया कि वाकई में हम किस तरह भारत को ले जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि मूल्यों के आधार पर नया सिलेबस बने। मूल्यों के आधार पर नया करिकुलम बने। जजेस को पढ़ाते समय संवेदनशीलता डाली जाए और भारत उनको पहले पढ़ाया जाए ताकि वो भारत के अनुरूप डिसीजन दे सकें। भारत की जुडिशरी भारत के अनुरूप चले।


भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट  चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जय हिंद जय भारत



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भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को
भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

 सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक खतरनाक कमेंट किया गया। खतरनाक  ऑनरेबल चीफ जस्टिस का अभी तक का यह सबसे खतरनाक स्टेटमेंट है। और उन्होंने पूरी न्याय व्यवस्था को पूरी न्याय व्यवस्था का मतलब पूरी न्याय व्यवस्था को देश की कड़घरे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने न्याय व्यवस्था के मामले में कहा कि हम विदेशी नहीं हैं। हम भारत हैं। भारत को ध्यान में रखते हुए जजमेंट होने चाहिए। भारत को ध्यान में रखते हुए ही कारवाई होनी चाहिए। हम विदेशियों की तरह सेक्सुअल ऑफेंसेस में यह निर्णय नहीं दे सकते। यह सेंसिटिविटी हमारे जजेस में होनी चाहिए। राष्ट्र दिमाग में होना चाहिए। देश दिमाग में होना चाहिए। देश की संप्रभुता, देश का सोशल स्ट्रक्चर, देश का इकोनॉमिक स्ट्रक्चर ये सारे दिमाग में होने चाहिए। जिस समय कोई जजमेंट दिया जाए। फिर उन्होंने कहा कि मैं आदेश देता हूं नेशनल जुडिशियल एकेडमी को और मैं उनसे कहता हूं जस्टिस अनिरुद्ध बोस जो कि इस समय नेशनल जुडिशियल एकेडमी के इस समय प्रेसिडेंट हैं। पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई और कहा कि फिर से रिवैल्यूएट करिए कि हमारे जजेस को क्या पढ़ाया जा रहा है।

हर राज्य में एक जुडिशियल कमेटी होती है। जुडिशियल एकेडमी होती है हर राज्य में छोटे जजेस को छोटे जजेस से मतलब है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तक के जजेस को वो एकेडमी पढ़ाती है।पर्टिकुलर सिलेबस तैयार कर दिया जाता है। उन सिलेबस में कुछ चुनिंदा केसेस डाल दिए जाते हैं। उनका एक ओवरव्यू डाल दिया जाता है। उसी ओवरव्यू के आधार पर नीचे की कोर्ट यानी कि डिस्ट्रिक्ट की कोर्ट डिसीजन देना शुरू करती है। खासतौर से लोअर कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट फर्स्ट ट्रायल कोर्ट है सबसे पहले वो उसी के आधार पर वो अपनी डायरी साथ में रखते हैं। जैसे ही उनके सामने कोई ऐसा पेचीदा मामला आता है डायरी खोलते हैं। डायरी में जो लिखा होता है कि इसको ऐसे करना चाहिए वैसे उसका डिसाइड कर देते हैं। फिर वो सोचते हैं कि जाने दो ऊपर जब कुछ गड़बड़ होएगी तो अपीली कोर्ट उसको डिसाइड कर देगी। इस प्रकार एकेडमी जब नया हाई कोर्ट के जजेस अपॉइंट होते हैं तो उनको भी एकेडमी भेजा जाता है।

नेशनल जुडिशियल एकेडमी भी होती है। उसमें भी वही किया जाता है। नेशनल जुडिशियल एकेडमी हमारे यहां भोपाल में है। वहां पर जो भी लॉर्डशिप का अपॉइंटमेंट होता है, लॉर्डशिप के अपॉइंटमेंट से पहले मतलब पहला जब एलिवेशन होता है तो एलिवेशन से पहले उनको सेंसिटिविटी दिखाई जाती है, पढ़ाई जाती है, सिखाई जाती है। और कैसे बिहेवियर होना चाहिए? क्या हमारे हमारे रिपरकेशंस हैं? क्या हमारी बाउंड्रीज हैं? क्या हम तय करें? यह सब कुछ पहले से तय किया जाता मतलब वहां पर पढ़ाया जाता है। उसके बाद लॉर्डशिप मतलब जब कोर्ट में जाते हैं तो प्रोवेशन पे एक दो साल रहते हैं। प्रोवेशन के बाद परमानेंट हो जाते हैं तो लॉर्डशिप हो जाती है। लॉर्डशिप हो जाती है तो फिर तो हम जानते ही हैं कि वो क्या करने लगते हैं। फिर उनको वो ना तो काबू में रह सकते हैं ना ही उनके ऊपर कोई दबाव हो सकता है। उनके ऊपर सिर्फ एक काम हो सकता है। वो है महाभियोग। इसलिए महाभियोग की प्रक्रिया हम सब जानते हैं। भारत में आज तक एक भी जज महाभियोग से नहीं हटाया गया। या तो उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया होगा या फिर पार्लियामेंट के अंदर बहुमत नहीं मिला होगा या फिर वहां सरकार गिर गई होगी। लेकिन एक भी जज का अभी तक वो नहीं हुआ। हम जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला इस समय देख ही रहे हैं। इतने नोटों की गड्डियां मिलने के बावजूद जब पार्लियामेंट ने या लोकसभा ने कमेटी बिठा दी कि इस पर जांच करो तो फिर सुप्रीम कोर्ट आते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट जाते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट कहता है अब इसको देख रहे हैं। अब उसको देख रहे हैं। वो मतलब किस तरह से उलझए हुए हैं।मुझे लगता है कि वो भी थोड़ा सा लंबा खींच जाएगा।

मैं आपको बता दूं कि ये जो मामला आया है बहुत सेंसिटिव है। आपको याद होगा एक नागपुर का मामला आया था। नागपुर हाई कोर्ट की एक महिला जज ने भी कुछ समय पहले ऐसा ही एक डिसीजन दिया था जिन्होंने कहा था कि कपड़े ऊपर से पहने हुए थी लड़की अगर तो फिर वो ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता। अब कपड़े ऊपर से पहने हुए थे। ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता क्योंकि बीच में कपड़े हैं उसके और व्यक्ति के बीच में कपड़े हैं। उन्होंने कपड़े पहन रखे हैं। तो ये अटेम्प्ट टू रेप नहीं हो सकता। ऐसा कुछ उन्होंने डिसीजन दिया था। लेकिन उन जैसा साहिबा की खास बात ये थी कि वो प्रोबेशन पर थी और प्रोबेशन पर होने की वजह से उनको परमानेंट नहीं किया गया था। अबकि उनको परमानेंट नहीं किया गया था तो वो वापस बैक टू पवेलियन चली गई होंगी या फिर प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया होगा जो भी हो।

ऐसा ही एक सेंसिटिव मामला पॉक्सो एक्ट का फिर से आया ऑनरेबल इलाहाबाद हाई कोर्ट का। ऑनरेबल इलाहाबाद हाईको ने जो डिसीजन दिया वो विदेशी धारणाओं के आधार पर था। जैसा कि विदेशों में होता है। कोर्ट ने कहा है च्यू फॉरेन मेथड्स। ये जो विदेशों के मेथड है ना सेक्सुअल ऑफेंसेस में बचाने की। किसी तरह से बचा लो। उनके बीच में कॉम्प्रोमाइज हो जाए। कॉम्प्रोमाइज होकर मामला निपट जाए। अपने-अपने घर जाए। क्या फर्क पड़ता है? वो उनके आपस के पर्सनल रिलेशंस लड़के लड़की के रहते हैं। जो ऑफेंडर है उसके या जो एक जो एक्यूज्ड है उसके और जो विक्टिम है उसके उनके आपस के रिलेशन है। अगर वो आपस में समझौता कर लेते हैं तो सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी खतरनाक टाइप के सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी वहां बचा दिया जाता है। कंपनसेशन लेके लड़की अपने घर चली जाती है। लड़का अपने घर चला जाता है। परिवार के बीच में या दोनों के बीच में समझौता हो जाता है।

लेकिन भारत ऐसा नहीं। भारत में हर एक ऑफेंस अगेंस्ट द स्टेट है। राज्य की अपनी एक धारणा है। राज्य का अपना एक स्टाइल है। राज्य का अपनी व्यवस्था है। राज्य का अपना एक संस्कार है। राज्य की अपनी एक संस्कृति

है और राज्य में रहने वाले लोगों की ये अपनी धारणा है। मैं इसको अगर दूसरे शब्दों में कहूं तो ये डेफिनेशन पहले भी सुप्रीम कोर्ट बता चुका है कि उत्तर में जिसके हिमालय हो दक्षिण में जिसके महासागर हो उस भूमि पर रहने वाले लोगों का जो स्वभाव है वे ऑफ लाइफ है उसको ही हिंदू कहते हैं। उसको ही हिंदूइज़्म कहते हैं। और कोई अलग से डेफिनेशन नहीं है। यहां की संस्कृति, यहां के संस्कार, यहां का पहनावा, उड़ावा और जो पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्य, पूर्वजों के शौर्य और पूर्वजों की मान्यता, पूर्वजों के द्वारा मूल्य निर्धारित किए गए मूल्यों की जो स्थापना है, वही भारत है।

ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हम सब जानते हैं कि ऑनरेबल जस्टिस सूर्यकांत जब बैठे थे उसी समय उन्होंने कहा था रोहिंग्या अंदर आ गए तो क्या इनको रेड कॉरपेट बिछाऊं? क्या इनको मैं एजुकेशन दूं? क्या इनके खाने पीने की व्यवस्था करूं? इनके लिए यहां स्थान नहीं है। जो बॉर्डर तोड़कर आया है, जो कानून तोड़कर आया है, उसको भारत में स्थान नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही कई मामलों में उन्होंने अब नई दोबारा से फाइलें खोलनी शुरू कर दी हैं। मैंने अभी बताया था शरूर मठ का मामला दोबारा खोल दिया गया है सबरीमाला के नाम से। लेकिन अब वहां जो सरकारी आधिपत्य है मंदिरों पर सरकार का उससे मुक्ति का समय आ गया है। नई जजेस की बेंच बिठाकर उस पर सुनवाई। मैंने उस पर एक पूरा लेक्चर रिकॉर्ड किया था। उसका कानूनी पहलू बताया था और कोर्ट की धारणा भी बताई थी और कैसे कोर्ट ने नए जजेस की बेंच बनाई वो अगर आपने ना देखा हो तो उसको देखना चाहिए। मैं समझता हूं कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा और मामला क्या था? एक नाबालिक लड़की पर किसी लड़के ने प्रहार किया। किसी आदमी ने प्रहार किया। प्रहार करते समय उसने उसकी छाती पर प्रहार किया और कपड़े खोल रहा था। इस स्थिति में दूसरे लोग वहां पर आ गए जिसकी वजह से वो लड़की बच गई। जब लड़की बच गई तो मुकदमा लिखवाया गया। मुकदमे में यह अटेमप्ट टू रेप का मुकदमा था। लेकिन जब हाई कोर्ट पहुंचा तो हाई कोर्ट ने कहा कि छाती पर हाथ मारना किसी भी तरह से अटेमप्ट टू रेप नहीं है। ऑनेरेबल सुप्रीम कोर्ट में जब उसकी अपील आई तो आज तीन जजेस की बेंच ने उसको सुना। अब तीन जजेस की बेंच जब उसको सुन रही थी। सुनते समय चीफ जस्टिस को ये कहना पड़ा कि ये कैसा न्याय हम कर रहे हैं? ये कैसा भारत हम बना रहे हैं? भारत में हम किस प्रकार की धारणा रखे हुए हैं? क्या हम विदेशियों के आधार पर यहां तय करने लगे लगना शुरू कर दिया है? क्या हमारी धारणाएं विदेशी धारणाएं हो गई है? क्या हम विदेशियों के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं।आपको एक बात बताऊं कि भारत में एक बड़ा अच्छा चलन चला था। चलन ये चला था कि अगर ऑक्सफोर्ड हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने आज ऑक्सफोर्ड का भी नाम लिया इसमें। हमारे यहां एक चलन चल गया था और चलन यह था कि जो कैमब्रिज, ऑक्सफोर्ड और तमाम तरह के इन विद्यालयों से पढ़कर आए, इन यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए वो बहुत काबिल होता है और वो काबिल होता था तो वो जज जब बनकर बैठता है तो वो क्या

करता है? वो कहता है सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में लड़की और लड़के को पूर्ण रूप से ऑटोनोमी है। वो कहता है कि गे मैरिज वैलिड है। जब वो वहां से पढ़कर आते हैं तो यहां पर वो धारणा रखते हैं कि गेज हैविंग द फंडामेंटल राइट टू गेट अ जज ऑफ द सुप्रीम कोर्ट। एक गे जो महिला गे हो वकालत करता है उसको सुप्रीम कोर्ट का जज होने का भी अधिकार है। उसको हाई कोर्ट का जज होने का अधिकार है। किस तरह का मैसेज हमारे जजेस दे देते रहे हैं। गे मैरिज के मामले में या सेम सेक्स मैरिज के मामले में या फिर तमाम ये जो एडल्टरी के मामले हैं उन मामलों में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के मामले में ये भारत की धारणा तो नहीं थी। लेकिन पिछले 5 साल में इस तरह के कई एक जजमेंट भारत में दिए गए। ये वो जजेस थे मोस्टली जिन्होंने ये जजमेंट दिए जो विदेशों में पढ़कर आए थे। विदेशों में पढ़ने के बाद वहां का माहौल, वहां का एटमॉस्फियर, वहां का वातावरण उसके आधार पर डिसीजन दे दिए उन्होंने और कहा कि नहीं नहीं वो सामन ने ऐसा लिखा था कि सेवनी ने ऐसा लिखा था कि वो ऑस्टिन ने ऐसा लिखा था। बड़े-बड़े भारीभरकम नाम बैकग्राउंड में देकर जरिसुडेंस के और अंग्रेजी जरिसुडेंस को यहां लिखकर जजमेंट देते रहे हैं और उन जजमेंटों में सरकार को पीछे छोड़ते रहे हैं। सरकार के ऊपर फंडामेंटल राइट के नाम से तमाम अत्याचार करते अत्याचार से मतलब है तमाम ऐसे जजमेंट देते रहे हैं जो भारत की सोवनिटी को चैलेंज करते थे। ऐसे तमाम जजमेंट होते रहे हैं जो भारत की बाउंड्री को प्रोटेक्ट नहीं करते। भारत के लोगों के फंडामेंटल राइटों को प्रोटेक्ट नहीं करते। विदेशियों को भारत में शरण देना, विदेशियों के फंडामेंटल राइट हमारे यहां होता रहा है। जजमेंट भी होते रहे कि भ अगर विदेशी है तो क्या हुआ? इसको पढ़ने का राइट है। इसको खाने का राइट है। इसको सोने का राइट है। इसको ये राइट है। इसको राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी है। हम नहीं छीन सकते। इसलिए इसके स्कूलों में एडमिशन करवा दिए जाए। इनको वो वजीफे दिए जाए। इनको इस तरह के जजमेंट भारत में होते रहे।

मैं साधुवाद कहूंगा ऑनरेबल चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जिन्होंने आज ये ये जो दर्द था उस दर्द को खुलकर कह दिया। भले ही केस किसी दूसरे प्रकार का था लेकिन उन्होंने खुलकर कहा और कहा कि विदेशी आधार पर विदेशी धारणा के आधार पर विदेशी बचाव के आधार पर भारत में अदालतें नहीं चलनी चाहिए। भारत के जजों को सेंसिटिव होना चाहिए।इंडियन इको सिस्टम से फेमिलियर होना चाहिए। भारत की सोशल स्ट्रक्चर को पता होना चाहिए। भारत में वो मैसेज कैसा जाएगा। क्योंकि पहले यह होता रहा है कि जब जजेस डिसीजन देते थे तो आंख पर पट्टी बांधकर अंधा कानून ऐसा दिखाया जाता था। यानी कि कानून के जो अप एंड डाउन्स हैं, कानून के जो डिसीजंस हैं उनको ही केवल फॉलो किया जाएगा। चाहे वो जज साहब को मालूम हो कि वो सही है, जज साहब को मालूम हो कि वो नहीं सही। कुछ भी हो। लेकिन जो फार्मूला बन गया है उसी फार्मूले पर चलने वाले हमारे यहां कोर्ट रहे।

चीफ जस्टिस ने कहा एक बात ध्यान रखिए भारत है। भारत में भारतीय प्रेसिडेंट भी है। भारतीय कल्चर भी है। भारत का अपना स्वभाव है। उसके अनुसार क्या मैसेज देना चाहते हैं? जजेस को चाहिए कि वो केवल लीगल ग्राउंड ना लगाएं। यह भी देखें कि उनके जजमेंट से देश पर प्रभाव क्या पड़ेगा? उनके जजमेंट से समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके ऑर्डर से देश में आने वाली पीढ़ी क्या सबक लेंगी? ये सारी बातें उन्होंने आज जो कही हैं मैं समझता हूं कि दिल खुश कर दिया मेरे जैसे व्यक्ति का जो लगातार ये कहता आया मैं हमेशा से कहता हूं हम हैं आप हैं कोई भी प्रोफेशन में है मैं जज हूं मैं वकील हूं मैं डॉक्टर हूं मैं इंजीनियर हूं मैं पत्रकार हूं भाई राष्ट्रित तो में हूं कहां है वो जजेस जो कि आजादी से पहले हुआ करते थे और कहां गए वो जजेस भारत में आक्रांताओं ने जब कब्जे किए तो उससे पहले न्यायाधीश बैठा करते थे वो कोई नहीं रहता। जब देश गुलाम होता है तो हर व्यक्ति गुलाम होता है। जब देश खतरे में होता है तो हर व्यक्ति खतरे में होता है। किसी का कोई फंडामेंटल राइट नहीं होता और कोई राइट ही नहीं होता। जब राष्ट्र है तो हम हैं। राष्ट्र प्रथम की भावना करके कोई भी काम किया जाए। पत्रकार लिखता है तो राष्ट्र प्रथम लिखे। इंजीनियर बिल्डिंग बनाता है तो राष्ट्र प्रथम बनाए। डॉक्टर दवाई देता है तो राष्ट्र प्रथम की बनाए। वकील वकालत करता है तो राष्ट्र प्रथम पे बनाए। करें और अगर जज जजमेंट देता है तो राष्ट्र प्रथम का जजमेंट क्यों ना दिया जाए।

आज का मैसेज जो उन्होंने दिया है जुडिशरी जैसा वो बता रहे हैं वैसी ही होनी चाहिए। मेरा मन तो यही कहता है कि जुडिशरी वैसी होनी चाहिए जैसा कि ऑनरेबल चीफ जस्टिस ने आज कहा। आप सोच कर देखिए। सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में भी आप ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज को फॉलो करते हैं। आप वो वातावरण को फॉलो करते हैं जो लोग कॉन्वेंट में बच्चों को पढ़ाया करते थे। कॉन्वेंट का मतलब ये होता था विदेशी भाषा में अगर देखोगे तो कॉन्वेंट का मतलब अनाथालय है। वो अनाथालय में पढ़ाया करते थे। क्यों? क्योंकि वो प्लूटो और सुकरात कहता था कि महिला और पुरुष का जो साथ होता है वो बच्चे पालने के लिए नहीं होता है। वो केवल एंजॉय करने के लिए होता है। अगर बच्चे पालने के लिए नहीं तो बच्चों का क्या होगा? तो फिर वो ऑर्फनेज में रखे जाते थे। ऑर्फनेज में जो स्कूल खोला जाता था जहां पर पढ़ाई भी होती थी उसको कॉन्वेंट कहा जाता था। यानी कि अब वो फ्री है। आज भी उनके यहां का वातावरण कुछ ऐसा ही है कि एक महिला अपने एक मैं किसी का उदाहरण सुन रहा था। एक महिला अपने पति की कब्र पर झूला झुला रही थी या पंखा डुला रही थी। कुछ लोग वहां गए तो हिंदुस्तान के रहने वाले थे। उनको लगा कि देखो ये ईसाइयत की धरती पर कितनी अच्छी महिला है। ये तो भारत के संस्कारों से भी बड़े संस्कार हैं। उस महिला से उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि हमने तो विदेशों के बारे में, ईसाइयों के बारे में जो वहां पर रहते हैं उनके विषय में बड़ा गलत सुना है कि वो तो इंटैक्ट होते नहीं है। वो तो कॉन्ट्रैक्ट में रहते हैं। तो वो महिला हंसने लगी और उसने कहा कि हम कब्र सूखने से पहले विवाह नहीं कर सकते। इसलिए मैं पंखे से कब्र सुखा रही हूं ताकि कब्र सूख जाए तो मैं विवाह कर लूं। दूसरा विवाह मेरा हो जाए। इतने रिस्ट्रिक्शन की कब्र सूखने तक का रिस्ट्रिक्शन है। यह भारत नहीं है। आप देखो जहां पर इस प्रकार की व्यवस्थाएं हो कि वो कॉन्ट्रैक्ट है। आज हमारा तो कल तुम्हारा जानवरों की तरह जिनका व्यवहार है। 

जानवरों की तरह जिनका चाल चलन है। जानवरों की तरह जिनकी रिहाइश

है। उनको कैसे फॉलो कर सकते हैं। भारत विश्व गुरु के पद पर इसलिए आसीन था क्योंकि भारत विश्व भर को मैसेज देने वाला देश है। भारत विश्व भर में बताने वाला देश है कि आखिर हम कैसी सभ्यता चाहते हैं? संसार कैसा होना चाहिए? मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ इसी प्रकार के एक्सपेरिमेंट होने चाहिए। क्योंकि हमारे यहां की जो संस्कृति संस्कार रहे हैं उन संस्कारों और संस्कृतियों में हम ये कहते रहे हैं कि हम समगोत्री विवाह नहीं करेंगे। समगोत्री का मतलब एक ही विद्यालय में पढ़ने वाला बेटा और बेटी मतलब महिला और लड़का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वो भाई बहन हो जाते हैं वो गुरु भाई बहन हो जाते हैं। लेकिन आज की फिल्म इंडस्ट्री स्कूल कॉलेज का मतलब यह दिखाती है कि किस तरह से वो आगे गठबंधन में चले जाएंगे। एजुकेशन कहीं नहीं आती। सिर्फ यह दिखाया जाता है कि विद्यालय में पढ़ने गए हैं या यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए हैं तो उनका चूच का मुरब्बा कैसे बनेगा। आप सोच के देखिए कि इस प्रकार की धारणा जिस देश में बनने लगी हो उस देश का क्या हो सकता है? ये ध्यान रखना चाहिए कि भारत में समगोत्री विवाह रोका गया था। भारत में सपिंडी विवाह रोका गया था। भारत में सात पीढ़ी पिता की और पांच पीढ़ी मां के तरफ का रिश्ता रोका गया था। इन सबको भाई-बहन कहा गया और गुरु बहन और गुरु भाई को भी गुरुओं के बच्चे को भी भाई-बहन कहा गया।

 ऐसा देश जहां इतने उच्च सिद्धांत हो उस देश में ऐसे जजमेंट चीफ जस्टिस मुझे लगता है कि उनको भी समझ में आ गया कि वाकई में हम किस तरह भारत को ले जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि मूल्यों के आधार पर नया सिलेबस बने। मूल्यों के आधार पर नया करिकुलम बने। जजेस को पढ़ाते समय संवेदनशीलता डाली जाए और भारत उनको पहले पढ़ाया जाए ताकि वो भारत के अनुरूप डिसीजन दे सकें। भारत की जुडिशरी भारत के अनुरूप चले।


भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट  चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जय हिंद जय भारत



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February 18, 2026 at 08:16PM
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February 18, 2026 at 09:13PM

भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

 सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक खतरनाक कमेंट किया गया। खतरनाक  ऑनरेबल चीफ जस्टिस का अभी तक का यह सबसे खतरनाक स्टेटमेंट है। और उन्होंने पूरी न्याय व्यवस्था को पूरी न्याय व्यवस्था का मतलब पूरी न्याय व्यवस्था को देश की कड़घरे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने न्याय व्यवस्था के मामले में कहा कि हम विदेशी नहीं हैं। हम भारत हैं। भारत को ध्यान में रखते हुए जजमेंट होने चाहिए। भारत को ध्यान में रखते हुए ही कारवाई होनी चाहिए। हम विदेशियों की तरह सेक्सुअल ऑफेंसेस में यह निर्णय नहीं दे सकते। यह सेंसिटिविटी हमारे जजेस में होनी चाहिए। राष्ट्र दिमाग में होना चाहिए। देश दिमाग में होना चाहिए। देश की संप्रभुता, देश का सोशल स्ट्रक्चर, देश का इकोनॉमिक स्ट्रक्चर ये सारे दिमाग में होने चाहिए। जिस समय कोई जजमेंट दिया जाए। फिर उन्होंने कहा कि मैं आदेश देता हूं नेशनल जुडिशियल एकेडमी को और मैं उनसे कहता हूं जस्टिस अनिरुद्ध बोस जो कि इस समय नेशनल जुडिशियल एकेडमी के इस समय प्रेसिडेंट हैं। पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई और कहा कि फिर से रिवैल्यूएट करिए कि हमारे जजेस को क्या पढ़ाया जा रहा है।

हर राज्य में एक जुडिशियल कमेटी होती है। जुडिशियल एकेडमी होती है हर राज्य में छोटे जजेस को छोटे जजेस से मतलब है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तक के जजेस को वो एकेडमी पढ़ाती है।पर्टिकुलर सिलेबस तैयार कर दिया जाता है। उन सिलेबस में कुछ चुनिंदा केसेस डाल दिए जाते हैं। उनका एक ओवरव्यू डाल दिया जाता है। उसी ओवरव्यू के आधार पर नीचे की कोर्ट यानी कि डिस्ट्रिक्ट की कोर्ट डिसीजन देना शुरू करती है। खासतौर से लोअर कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट फर्स्ट ट्रायल कोर्ट है सबसे पहले वो उसी के आधार पर वो अपनी डायरी साथ में रखते हैं। जैसे ही उनके सामने कोई ऐसा पेचीदा मामला आता है डायरी खोलते हैं। डायरी में जो लिखा होता है कि इसको ऐसे करना चाहिए वैसे उसका डिसाइड कर देते हैं। फिर वो सोचते हैं कि जाने दो ऊपर जब कुछ गड़बड़ होएगी तो अपीली कोर्ट उसको डिसाइड कर देगी। इस प्रकार एकेडमी जब नया हाई कोर्ट के जजेस अपॉइंट होते हैं तो उनको भी एकेडमी भेजा जाता है।

नेशनल जुडिशियल एकेडमी भी होती है। उसमें भी वही किया जाता है। नेशनल जुडिशियल एकेडमी हमारे यहां भोपाल में है। वहां पर जो भी लॉर्डशिप का अपॉइंटमेंट होता है, लॉर्डशिप के अपॉइंटमेंट से पहले मतलब पहला जब एलिवेशन होता है तो एलिवेशन से पहले उनको सेंसिटिविटी दिखाई जाती है, पढ़ाई जाती है, सिखाई जाती है। और कैसे बिहेवियर होना चाहिए? क्या हमारे हमारे रिपरकेशंस हैं? क्या हमारी बाउंड्रीज हैं? क्या हम तय करें? यह सब कुछ पहले से तय किया जाता मतलब वहां पर पढ़ाया जाता है। उसके बाद लॉर्डशिप मतलब जब कोर्ट में जाते हैं तो प्रोवेशन पे एक दो साल रहते हैं। प्रोवेशन के बाद परमानेंट हो जाते हैं तो लॉर्डशिप हो जाती है। लॉर्डशिप हो जाती है तो फिर तो हम जानते ही हैं कि वो क्या करने लगते हैं। फिर उनको वो ना तो काबू में रह सकते हैं ना ही उनके ऊपर कोई दबाव हो सकता है। उनके ऊपर सिर्फ एक काम हो सकता है। वो है महाभियोग। इसलिए महाभियोग की प्रक्रिया हम सब जानते हैं। भारत में आज तक एक भी जज महाभियोग से नहीं हटाया गया। या तो उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया होगा या फिर पार्लियामेंट के अंदर बहुमत नहीं मिला होगा या फिर वहां सरकार गिर गई होगी। लेकिन एक भी जज का अभी तक वो नहीं हुआ। हम जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला इस समय देख ही रहे हैं। इतने नोटों की गड्डियां मिलने के बावजूद जब पार्लियामेंट ने या लोकसभा ने कमेटी बिठा दी कि इस पर जांच करो तो फिर सुप्रीम कोर्ट आते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट जाते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट कहता है अब इसको देख रहे हैं। अब उसको देख रहे हैं। वो मतलब किस तरह से उलझए हुए हैं।मुझे लगता है कि वो भी थोड़ा सा लंबा खींच जाएगा।

मैं आपको बता दूं कि ये जो मामला आया है बहुत सेंसिटिव है। आपको याद होगा एक नागपुर का मामला आया था। नागपुर हाई कोर्ट की एक महिला जज ने भी कुछ समय पहले ऐसा ही एक डिसीजन दिया था जिन्होंने कहा था कि कपड़े ऊपर से पहने हुए थी लड़की अगर तो फिर वो ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता। अब कपड़े ऊपर से पहने हुए थे। ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता क्योंकि बीच में कपड़े हैं उसके और व्यक्ति के बीच में कपड़े हैं। उन्होंने कपड़े पहन रखे हैं। तो ये अटेम्प्ट टू रेप नहीं हो सकता। ऐसा कुछ उन्होंने डिसीजन दिया था। लेकिन उन जैसा साहिबा की खास बात ये थी कि वो प्रोबेशन पर थी और प्रोबेशन पर होने की वजह से उनको परमानेंट नहीं किया गया था। अबकि उनको परमानेंट नहीं किया गया था तो वो वापस बैक टू पवेलियन चली गई होंगी या फिर प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया होगा जो भी हो।

ऐसा ही एक सेंसिटिव मामला पॉक्सो एक्ट का फिर से आया ऑनरेबल इलाहाबाद हाई कोर्ट का। ऑनरेबल इलाहाबाद हाईको ने जो डिसीजन दिया वो विदेशी धारणाओं के आधार पर था। जैसा कि विदेशों में होता है। कोर्ट ने कहा है च्यू फॉरेन मेथड्स। ये जो विदेशों के मेथड है ना सेक्सुअल ऑफेंसेस में बचाने की। किसी तरह से बचा लो। उनके बीच में कॉम्प्रोमाइज हो जाए। कॉम्प्रोमाइज होकर मामला निपट जाए। अपने-अपने घर जाए। क्या फर्क पड़ता है? वो उनके आपस के पर्सनल रिलेशंस लड़के लड़की के रहते हैं। जो ऑफेंडर है उसके या जो एक जो एक्यूज्ड है उसके और जो विक्टिम है उसके उनके आपस के रिलेशन है। अगर वो आपस में समझौता कर लेते हैं तो सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी खतरनाक टाइप के सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी वहां बचा दिया जाता है। कंपनसेशन लेके लड़की अपने घर चली जाती है। लड़का अपने घर चला जाता है। परिवार के बीच में या दोनों के बीच में समझौता हो जाता है।

लेकिन भारत ऐसा नहीं। भारत में हर एक ऑफेंस अगेंस्ट द स्टेट है। राज्य की अपनी एक धारणा है। राज्य का अपना एक स्टाइल है। राज्य का अपनी व्यवस्था है। राज्य का अपना एक संस्कार है। राज्य की अपनी एक संस्कृति

है और राज्य में रहने वाले लोगों की ये अपनी धारणा है। मैं इसको अगर दूसरे शब्दों में कहूं तो ये डेफिनेशन पहले भी सुप्रीम कोर्ट बता चुका है कि उत्तर में जिसके हिमालय हो दक्षिण में जिसके महासागर हो उस भूमि पर रहने वाले लोगों का जो स्वभाव है वे ऑफ लाइफ है उसको ही हिंदू कहते हैं। उसको ही हिंदूइज़्म कहते हैं। और कोई अलग से डेफिनेशन नहीं है। यहां की संस्कृति, यहां के संस्कार, यहां का पहनावा, उड़ावा और जो पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्य, पूर्वजों के शौर्य और पूर्वजों की मान्यता, पूर्वजों के द्वारा मूल्य निर्धारित किए गए मूल्यों की जो स्थापना है, वही भारत है।

ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हम सब जानते हैं कि ऑनरेबल जस्टिस सूर्यकांत जब बैठे थे उसी समय उन्होंने कहा था रोहिंग्या अंदर आ गए तो क्या इनको रेड कॉरपेट बिछाऊं? क्या इनको मैं एजुकेशन दूं? क्या इनके खाने पीने की व्यवस्था करूं? इनके लिए यहां स्थान नहीं है। जो बॉर्डर तोड़कर आया है, जो कानून तोड़कर आया है, उसको भारत में स्थान नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही कई मामलों में उन्होंने अब नई दोबारा से फाइलें खोलनी शुरू कर दी हैं। मैंने अभी बताया था शरूर मठ का मामला दोबारा खोल दिया गया है सबरीमाला के नाम से। लेकिन अब वहां जो सरकारी आधिपत्य है मंदिरों पर सरकार का उससे मुक्ति का समय आ गया है। नई जजेस की बेंच बिठाकर उस पर सुनवाई। मैंने उस पर एक पूरा लेक्चर रिकॉर्ड किया था। उसका कानूनी पहलू बताया था और कोर्ट की धारणा भी बताई थी और कैसे कोर्ट ने नए जजेस की बेंच बनाई वो अगर आपने ना देखा हो तो उसको देखना चाहिए। मैं समझता हूं कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा और मामला क्या था? एक नाबालिक लड़की पर किसी लड़के ने प्रहार किया। किसी आदमी ने प्रहार किया। प्रहार करते समय उसने उसकी छाती पर प्रहार किया और कपड़े खोल रहा था। इस स्थिति में दूसरे लोग वहां पर आ गए जिसकी वजह से वो लड़की बच गई। जब लड़की बच गई तो मुकदमा लिखवाया गया। मुकदमे में यह अटेमप्ट टू रेप का मुकदमा था। लेकिन जब हाई कोर्ट पहुंचा तो हाई कोर्ट ने कहा कि छाती पर हाथ मारना किसी भी तरह से अटेमप्ट टू रेप नहीं है। ऑनेरेबल सुप्रीम कोर्ट में जब उसकी अपील आई तो आज तीन जजेस की बेंच ने उसको सुना। अब तीन जजेस की बेंच जब उसको सुन रही थी। सुनते समय चीफ जस्टिस को ये कहना पड़ा कि ये कैसा न्याय हम कर रहे हैं? ये कैसा भारत हम बना रहे हैं? भारत में हम किस प्रकार की धारणा रखे हुए हैं? क्या हम विदेशियों के आधार पर यहां तय करने लगे लगना शुरू कर दिया है? क्या हमारी धारणाएं विदेशी धारणाएं हो गई है? क्या हम विदेशियों के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं।आपको एक बात बताऊं कि भारत में एक बड़ा अच्छा चलन चला था। चलन ये चला था कि अगर ऑक्सफोर्ड हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने आज ऑक्सफोर्ड का भी नाम लिया इसमें। हमारे यहां एक चलन चल गया था और चलन यह था कि जो कैमब्रिज, ऑक्सफोर्ड और तमाम तरह के इन विद्यालयों से पढ़कर आए, इन यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए वो बहुत काबिल होता है और वो काबिल होता था तो वो जज जब बनकर बैठता है तो वो क्या

करता है? वो कहता है सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में लड़की और लड़के को पूर्ण रूप से ऑटोनोमी है। वो कहता है कि गे मैरिज वैलिड है। जब वो वहां से पढ़कर आते हैं तो यहां पर वो धारणा रखते हैं कि गेज हैविंग द फंडामेंटल राइट टू गेट अ जज ऑफ द सुप्रीम कोर्ट। एक गे जो महिला गे हो वकालत करता है उसको सुप्रीम कोर्ट का जज होने का भी अधिकार है। उसको हाई कोर्ट का जज होने का अधिकार है। किस तरह का मैसेज हमारे जजेस दे देते रहे हैं। गे मैरिज के मामले में या सेम सेक्स मैरिज के मामले में या फिर तमाम ये जो एडल्टरी के मामले हैं उन मामलों में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के मामले में ये भारत की धारणा तो नहीं थी। लेकिन पिछले 5 साल में इस तरह के कई एक जजमेंट भारत में दिए गए। ये वो जजेस थे मोस्टली जिन्होंने ये जजमेंट दिए जो विदेशों में पढ़कर आए थे। विदेशों में पढ़ने के बाद वहां का माहौल, वहां का एटमॉस्फियर, वहां का वातावरण उसके आधार पर डिसीजन दे दिए उन्होंने और कहा कि नहीं नहीं वो सामन ने ऐसा लिखा था कि सेवनी ने ऐसा लिखा था कि वो ऑस्टिन ने ऐसा लिखा था। बड़े-बड़े भारीभरकम नाम बैकग्राउंड में देकर जरिसुडेंस के और अंग्रेजी जरिसुडेंस को यहां लिखकर जजमेंट देते रहे हैं और उन जजमेंटों में सरकार को पीछे छोड़ते रहे हैं। सरकार के ऊपर फंडामेंटल राइट के नाम से तमाम अत्याचार करते अत्याचार से मतलब है तमाम ऐसे जजमेंट देते रहे हैं जो भारत की सोवनिटी को चैलेंज करते थे। ऐसे तमाम जजमेंट होते रहे हैं जो भारत की बाउंड्री को प्रोटेक्ट नहीं करते। भारत के लोगों के फंडामेंटल राइटों को प्रोटेक्ट नहीं करते। विदेशियों को भारत में शरण देना, विदेशियों के फंडामेंटल राइट हमारे यहां होता रहा है। जजमेंट भी होते रहे कि भ अगर विदेशी है तो क्या हुआ? इसको पढ़ने का राइट है। इसको खाने का राइट है। इसको सोने का राइट है। इसको ये राइट है। इसको राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी है। हम नहीं छीन सकते। इसलिए इसके स्कूलों में एडमिशन करवा दिए जाए। इनको वो वजीफे दिए जाए। इनको इस तरह के जजमेंट भारत में होते रहे।

मैं साधुवाद कहूंगा ऑनरेबल चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जिन्होंने आज ये ये जो दर्द था उस दर्द को खुलकर कह दिया। भले ही केस किसी दूसरे प्रकार का था लेकिन उन्होंने खुलकर कहा और कहा कि विदेशी आधार पर विदेशी धारणा के आधार पर विदेशी बचाव के आधार पर भारत में अदालतें नहीं चलनी चाहिए। भारत के जजों को सेंसिटिव होना चाहिए।इंडियन इको सिस्टम से फेमिलियर होना चाहिए। भारत की सोशल स्ट्रक्चर को पता होना चाहिए। भारत में वो मैसेज कैसा जाएगा। क्योंकि पहले यह होता रहा है कि जब जजेस डिसीजन देते थे तो आंख पर पट्टी बांधकर अंधा कानून ऐसा दिखाया जाता था। यानी कि कानून के जो अप एंड डाउन्स हैं, कानून के जो डिसीजंस हैं उनको ही केवल फॉलो किया जाएगा। चाहे वो जज साहब को मालूम हो कि वो सही है, जज साहब को मालूम हो कि वो नहीं सही। कुछ भी हो। लेकिन जो फार्मूला बन गया है उसी फार्मूले पर चलने वाले हमारे यहां कोर्ट रहे।

चीफ जस्टिस ने कहा एक बात ध्यान रखिए भारत है। भारत में भारतीय प्रेसिडेंट भी है। भारतीय कल्चर भी है। भारत का अपना स्वभाव है। उसके अनुसार क्या मैसेज देना चाहते हैं? जजेस को चाहिए कि वो केवल लीगल ग्राउंड ना लगाएं। यह भी देखें कि उनके जजमेंट से देश पर प्रभाव क्या पड़ेगा? उनके जजमेंट से समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके ऑर्डर से देश में आने वाली पीढ़ी क्या सबक लेंगी? ये सारी बातें उन्होंने आज जो कही हैं मैं समझता हूं कि दिल खुश कर दिया मेरे जैसे व्यक्ति का जो लगातार ये कहता आया मैं हमेशा से कहता हूं हम हैं आप हैं कोई भी प्रोफेशन में है मैं जज हूं मैं वकील हूं मैं डॉक्टर हूं मैं इंजीनियर हूं मैं पत्रकार हूं भाई राष्ट्रित तो में हूं कहां है वो जजेस जो कि आजादी से पहले हुआ करते थे और कहां गए वो जजेस भारत में आक्रांताओं ने जब कब्जे किए तो उससे पहले न्यायाधीश बैठा करते थे वो कोई नहीं रहता। जब देश गुलाम होता है तो हर व्यक्ति गुलाम होता है। जब देश खतरे में होता है तो हर व्यक्ति खतरे में होता है। किसी का कोई फंडामेंटल राइट नहीं होता और कोई राइट ही नहीं होता। जब राष्ट्र है तो हम हैं। राष्ट्र प्रथम की भावना करके कोई भी काम किया जाए। पत्रकार लिखता है तो राष्ट्र प्रथम लिखे। इंजीनियर बिल्डिंग बनाता है तो राष्ट्र प्रथम बनाए। डॉक्टर दवाई देता है तो राष्ट्र प्रथम की बनाए। वकील वकालत करता है तो राष्ट्र प्रथम पे बनाए। करें और अगर जज जजमेंट देता है तो राष्ट्र प्रथम का जजमेंट क्यों ना दिया जाए।

आज का मैसेज जो उन्होंने दिया है जुडिशरी जैसा वो बता रहे हैं वैसी ही होनी चाहिए। मेरा मन तो यही कहता है कि जुडिशरी वैसी होनी चाहिए जैसा कि ऑनरेबल चीफ जस्टिस ने आज कहा। आप सोच कर देखिए। सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में भी आप ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज को फॉलो करते हैं। आप वो वातावरण को फॉलो करते हैं जो लोग कॉन्वेंट में बच्चों को पढ़ाया करते थे। कॉन्वेंट का मतलब ये होता था विदेशी भाषा में अगर देखोगे तो कॉन्वेंट का मतलब अनाथालय है। वो अनाथालय में पढ़ाया करते थे। क्यों? क्योंकि वो प्लूटो और सुकरात कहता था कि महिला और पुरुष का जो साथ होता है वो बच्चे पालने के लिए नहीं होता है। वो केवल एंजॉय करने के लिए होता है। अगर बच्चे पालने के लिए नहीं तो बच्चों का क्या होगा? तो फिर वो ऑर्फनेज में रखे जाते थे। ऑर्फनेज में जो स्कूल खोला जाता था जहां पर पढ़ाई भी होती थी उसको कॉन्वेंट कहा जाता था। यानी कि अब वो फ्री है। आज भी उनके यहां का वातावरण कुछ ऐसा ही है कि एक महिला अपने एक मैं किसी का उदाहरण सुन रहा था। एक महिला अपने पति की कब्र पर झूला झुला रही थी या पंखा डुला रही थी। कुछ लोग वहां गए तो हिंदुस्तान के रहने वाले थे। उनको लगा कि देखो ये ईसाइयत की धरती पर कितनी अच्छी महिला है। ये तो भारत के संस्कारों से भी बड़े संस्कार हैं। उस महिला से उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि हमने तो विदेशों के बारे में, ईसाइयों के बारे में जो वहां पर रहते हैं उनके विषय में बड़ा गलत सुना है कि वो तो इंटैक्ट होते नहीं है। वो तो कॉन्ट्रैक्ट में रहते हैं। तो वो महिला हंसने लगी और उसने कहा कि हम कब्र सूखने से पहले विवाह नहीं कर सकते। इसलिए मैं पंखे से कब्र सुखा रही हूं ताकि कब्र सूख जाए तो मैं विवाह कर लूं। दूसरा विवाह मेरा हो जाए। इतने रिस्ट्रिक्शन की कब्र सूखने तक का रिस्ट्रिक्शन है। यह भारत नहीं है। आप देखो जहां पर इस प्रकार की व्यवस्थाएं हो कि वो कॉन्ट्रैक्ट है। आज हमारा तो कल तुम्हारा जानवरों की तरह जिनका व्यवहार है। 

जानवरों की तरह जिनका चाल चलन है। जानवरों की तरह जिनकी रिहाइश

है। उनको कैसे फॉलो कर सकते हैं। भारत विश्व गुरु के पद पर इसलिए आसीन था क्योंकि भारत विश्व भर को मैसेज देने वाला देश है। भारत विश्व भर में बताने वाला देश है कि आखिर हम कैसी सभ्यता चाहते हैं? संसार कैसा होना चाहिए? मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ इसी प्रकार के एक्सपेरिमेंट होने चाहिए। क्योंकि हमारे यहां की जो संस्कृति संस्कार रहे हैं उन संस्कारों और संस्कृतियों में हम ये कहते रहे हैं कि हम समगोत्री विवाह नहीं करेंगे। समगोत्री का मतलब एक ही विद्यालय में पढ़ने वाला बेटा और बेटी मतलब महिला और लड़का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वो भाई बहन हो जाते हैं वो गुरु भाई बहन हो जाते हैं। लेकिन आज की फिल्म इंडस्ट्री स्कूल कॉलेज का मतलब यह दिखाती है कि किस तरह से वो आगे गठबंधन में चले जाएंगे। एजुकेशन कहीं नहीं आती। सिर्फ यह दिखाया जाता है कि विद्यालय में पढ़ने गए हैं या यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए हैं तो उनका चूच का मुरब्बा कैसे बनेगा। आप सोच के देखिए कि इस प्रकार की धारणा जिस देश में बनने लगी हो उस देश का क्या हो सकता है? ये ध्यान रखना चाहिए कि भारत में समगोत्री विवाह रोका गया था। भारत में सपिंडी विवाह रोका गया था। भारत में सात पीढ़ी पिता की और पांच पीढ़ी मां के तरफ का रिश्ता रोका गया था। इन सबको भाई-बहन कहा गया और गुरु बहन और गुरु भाई को भी गुरुओं के बच्चे को भी भाई-बहन कहा गया।

 ऐसा देश जहां इतने उच्च सिद्धांत हो उस देश में ऐसे जजमेंट चीफ जस्टिस मुझे लगता है कि उनको भी समझ में आ गया कि वाकई में हम किस तरह भारत को ले जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि मूल्यों के आधार पर नया सिलेबस बने। मूल्यों के आधार पर नया करिकुलम बने। जजेस को पढ़ाते समय संवेदनशीलता डाली जाए और भारत उनको पहले पढ़ाया जाए ताकि वो भारत के अनुरूप डिसीजन दे सकें। भारत की जुडिशरी भारत के अनुरूप चले।


भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट  चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जय हिंद जय भारत



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February 18, 2026 at 08:16PM

Supreme Court’s Landmark Statement on Indian Judicial Sensitivity and Sovereignty

  Supreme Court’s Landmark Statement on Indian Judicial Sensitivity and Sovereignty

  A recent statement made by the Honorable Chief Justice of India, described as one of the most significant and impactful remarks regarding the Indian judiciary. The Chief Justice emphasized that India’s judicial decisions, especially in sensitive matters such as sexual offenses, should be rooted in Indian socio-cultural realities and sovereignty rather than foreign legal frameworks. He stressed the necessity for judges to internalize the nation’s social structure, economic conditions, and sovereignty while passing judgments, highlighting that Indian courts cannot blindly follow foreign precedents in sexual offense cases due to differing societal contexts.

 Judicial Academies and Training of Judges in India
The Chief Justice ordered the National Judicial Academy, led by Justice Aniruddha Bose, to reevaluate the curriculum and training imparted to judges across the country.Each state in India has a Judicial Academy that trains judges, particularly at the district court level, using a syllabus that includes selected case overviews. Lower courts rely heavily on these case summaries to make decisions, often consulting written guides during complex cases and trusting that appellate courts will correct any errors. The National Judicial Academy in Bhopal similarly trains newly elevated High Court judges, focusing on judicial sensitivity, behavior, and understanding repercussions before they become permanent judges.

 Judicial Independence and Accountability in India
The judges are accountable only through impeachment (Mahabhiyog), a process that has historically never resulted in the removal of a judge in India. Instead, judges facing controversies tend to resign or remain in office until retirement. The ongoing case of Justice Yashwant Verma is mentioned as an example where multiple investigations and parliamentary committees have been involved but the process remains protracted and unresolved.

Controversial Judicial Decisions on Sexual Offenses and Cultural Sensitivity
 I  recall a controversial decision by a female judge of the Nagpur High Court who ruled that an attempted rape charge could not be sustained if the victim was wearing clothes, reasoning that physical barriers made the charge invalid. This judge was on probation and was not made permanent, reflecting the judiciary’s sensitivity to such judgments. Similarly, a recent Allahabad High Court ruling followed foreign methods that promote compromise in sexual offenses, suggesting reconciliation between victim and accused through compensation and out-of-court settlements—an approach deemed inappropriate for India.

Indian Socio-Cultural Context Vs. Foreign Jurisprudence
India treats every offense as an offense against the State, emphasizing the Indian government’s unique social, cultural, and legal framework. A reference is the Supreme Court’s prior definition of Hindu identity based on geography and indigenous cultural values, underscoring that India’s legal judgments must reflect India’s cultural heritage, social norms, and ancestral values rather than imported foreign legal concepts. The Chief Justice has been firm on this point, including in other cases such as the Rohingya refugee issue and temple governance, showing a pattern of reasserting Indian sovereignty in judicial matters.

 Case Illustration—Attempted Rape and Judicial Reaction
A specific case involving a minor girl who was attacked and had her clothes removed during the assault is discussed. The High Court initially ruled that the act did not amount to attempted rape because the assault was limited to slapping the chest and partially removing clothes. This decision was appealed to a three-judge Supreme Court bench, where the Chief Justice expressed deep concern about the direction of Indian justice, questioning if India was adopting foreign sensibilities unsuited to Indian realities.

Impact of Foreign-Educated Judges on Indian Jurisprudence
The influence of judges educated abroad, particularly from institutions like Oxford and Cambridge, who brought progressive foreign ideas into Indian jurisprudence, notably in sexual offenses, gay marriage, and adultery cases. These foreign-educated judges often cited prominent Western legal theorists and jurisprudence, sometimes contradicting traditional Indian values and sovereignty. The speaker argues that these judgments often undermined government authority and the Indian socio-legal fabric by promoting individual autonomy and fundamental rights in ways that challenged Indian cultural norms.

AspectForeign-Educated Judges’ ApproachIndian Sovereignty Perspective
Sexual OffensesEmphasis on individual autonomy and compromiseOffense viewed as against State; no compromise
Same-sex MarriageRecognized as valid under fundamental rightsNot aligned with traditional Indian values
Adultery and Extra-marital AffairsLiberal approach based on foreign jurisprudenceConsidered contrary to Indian social ethics
Refugee and Fundamental RightsGranting broad rights to foreignersEmphasis on protecting Indian sovereignty

Call for Indian-Centric Judicial Education and Sensitivity
The Chief Justice’s directive to develop a revised syllabus for judicial training is highlighted as a crucial step toward inculcating Indian values, sensitivity, and socio-cultural awareness in judges. This move aims to ensure that judicial decisions align with the Indian context rather than foreign doctrines. The Chief Justice urged judges to consider not just legal grounds but also the societal impact and message their judgments convey to future generations, emphasizing “India is India” and the judiciary must reflect that identity.

Emphasis on Nationalism and the Role of Every Profession in Nation-Building
The Chief Justice’s nationalist message, asserting that every profession—journalism, engineering, medicine, law—should prioritize the nation first in their work. He laments the disappearance of the pre-independence judicial ethos, where judges served the nation’s sovereignty. The current era demands a return to Rashtra Pratham” (Nation First) philosophy in judicial decision-making and professional conduct across sectors.

Indian Matrimonial Customs and Judicial Recognition

The traditional Indian marriage restrictions such as bans on same-gotra marriages, sapindi (close kin) restrictions up to seven generations on the paternal side and five on the maternal side, and the recognition of guru-bhai and guru-bahan relationships as siblings, underscoring the high ethical standards embedded in Indian society. He believes the Chief Justice has recognized the necessity of aligning judicial education and rulings with these high cultural and ethical standards.

Conclusion and Salute to the Chief Justice’s Vision
I prais the Chief Justice’s call for a value-based judicial curriculum that instills sensitivity toward Indian realities. It highlights the imperative that India’s judiciary should operate based on Indian values and conditions, not foreign influences. I salutes this stance as a vital step for restoring judicial integrity and national identity, closing with patriotic affirmations: “Jai Hind, Jai Bharat”



भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

 सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक खतरनाक कमेंट किया गया। खतरनाक  ऑनरेबल चीफ जस्टिस का अभी तक का यह सबसे खतरनाक स्टेटमेंट है। और उन्होंने पूरी न्याय व्यवस्था को पूरी न्याय व्यवस्था का मतलब पूरी न्याय व्यवस्था को देश की कड़घरे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने न्याय व्यवस्था के मामले में कहा कि हम विदेशी नहीं हैं। हम भारत हैं। भारत को ध्यान में रखते हुए जजमेंट होने चाहिए। भारत को ध्यान में रखते हुए ही कारवाई होनी चाहिए। हम विदेशियों की तरह सेक्सुअल ऑफेंसेस में यह निर्णय नहीं दे सकते। यह सेंसिटिविटी हमारे जजेस में होनी चाहिए। राष्ट्र दिमाग में होना चाहिए। देश दिमाग में होना चाहिए। देश की संप्रभुता, देश का सोशल स्ट्रक्चर, देश का इकोनॉमिक स्ट्रक्चर ये सारे दिमाग में होने चाहिए। जिस समय कोई जजमेंट दिया जाए। फिर उन्होंने कहा कि मैं आदेश देता हूं नेशनल जुडिशियल एकेडमी को और मैं उनसे कहता हूं जस्टिस अनिरुद्ध बोस जो कि इस समय नेशनल जुडिशियल एकेडमी के इस समय प्रेसिडेंट हैं। पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई और कहा कि फिर से रिवैल्यूएट करिए कि हमारे जजेस को क्या पढ़ाया जा रहा है।

हर राज्य में एक जुडिशियल कमेटी होती है। जुडिशियल एकेडमी होती है हर राज्य में छोटे जजेस को छोटे जजेस से मतलब है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तक के जजेस को वो एकेडमी पढ़ाती है।पर्टिकुलर सिलेबस तैयार कर दिया जाता है। उन सिलेबस में कुछ चुनिंदा केसेस डाल दिए जाते हैं। उनका एक ओवरव्यू डाल दिया जाता है। उसी ओवरव्यू के आधार पर नीचे की कोर्ट यानी कि डिस्ट्रिक्ट की कोर्ट डिसीजन देना शुरू करती है। खासतौर से लोअर कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट फर्स्ट ट्रायल कोर्ट है सबसे पहले वो उसी के आधार पर वो अपनी डायरी साथ में रखते हैं। जैसे ही उनके सामने कोई ऐसा पेचीदा मामला आता है डायरी खोलते हैं। डायरी में जो लिखा होता है कि इसको ऐसे करना चाहिए वैसे उसका डिसाइड कर देते हैं। फिर वो सोचते हैं कि जाने दो ऊपर जब कुछ गड़बड़ होएगी तो अपीली कोर्ट उसको डिसाइड कर देगी। इस प्रकार एकेडमी जब नया हाई कोर्ट के जजेस अपॉइंट होते हैं तो उनको भी एकेडमी भेजा जाता है।

नेशनल जुडिशियल एकेडमी भी होती है। उसमें भी वही किया जाता है। नेशनल जुडिशियल एकेडमी हमारे यहां भोपाल में है। वहां पर जो भी लॉर्डशिप का अपॉइंटमेंट होता है, लॉर्डशिप के अपॉइंटमेंट से पहले मतलब पहला जब एलिवेशन होता है तो एलिवेशन से पहले उनको सेंसिटिविटी दिखाई जाती है, पढ़ाई जाती है, सिखाई जाती है। और कैसे बिहेवियर होना चाहिए? क्या हमारे हमारे रिपरकेशंस हैं? क्या हमारी बाउंड्रीज हैं? क्या हम तय करें? यह सब कुछ पहले से तय किया जाता मतलब वहां पर पढ़ाया जाता है। उसके बाद लॉर्डशिप मतलब जब कोर्ट में जाते हैं तो प्रोवेशन पे एक दो साल रहते हैं। प्रोवेशन के बाद परमानेंट हो जाते हैं तो लॉर्डशिप हो जाती है। लॉर्डशिप हो जाती है तो फिर तो हम जानते ही हैं कि वो क्या करने लगते हैं। फिर उनको वो ना तो काबू में रह सकते हैं ना ही उनके ऊपर कोई दबाव हो सकता है। उनके ऊपर सिर्फ एक काम हो सकता है। वो है महाभियोग। इसलिए महाभियोग की प्रक्रिया हम सब जानते हैं। भारत में आज तक एक भी जज महाभियोग से नहीं हटाया गया। या तो उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया होगा या फिर पार्लियामेंट के अंदर बहुमत नहीं मिला होगा या फिर वहां सरकार गिर गई होगी। लेकिन एक भी जज का अभी तक वो नहीं हुआ। हम जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला इस समय देख ही रहे हैं। इतने नोटों की गड्डियां मिलने के बावजूद जब पार्लियामेंट ने या लोकसभा ने कमेटी बिठा दी कि इस पर जांच करो तो फिर सुप्रीम कोर्ट आते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट जाते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट कहता है अब इसको देख रहे हैं। अब उसको देख रहे हैं। वो मतलब किस तरह से उलझए हुए हैं।मुझे लगता है कि वो भी थोड़ा सा लंबा खींच जाएगा।

मैं आपको बता दूं कि ये जो मामला आया है बहुत सेंसिटिव है। आपको याद होगा एक नागपुर का मामला आया था। नागपुर हाई कोर्ट की एक महिला जज ने भी कुछ समय पहले ऐसा ही एक डिसीजन दिया था जिन्होंने कहा था कि कपड़े ऊपर से पहने हुए थी लड़की अगर तो फिर वो ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता। अब कपड़े ऊपर से पहने हुए थे। ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता क्योंकि बीच में कपड़े हैं उसके और व्यक्ति के बीच में कपड़े हैं। उन्होंने कपड़े पहन रखे हैं। तो ये अटेम्प्ट टू रेप नहीं हो सकता। ऐसा कुछ उन्होंने डिसीजन दिया था। लेकिन उन जैसा साहिबा की खास बात ये थी कि वो प्रोबेशन पर थी और प्रोबेशन पर होने की वजह से उनको परमानेंट नहीं किया गया था। अबकि उनको परमानेंट नहीं किया गया था तो वो वापस बैक टू पवेलियन चली गई होंगी या फिर प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया होगा जो भी हो।

ऐसा ही एक सेंसिटिव मामला पॉक्सो एक्ट का फिर से आया ऑनरेबल इलाहाबाद हाई कोर्ट का। ऑनरेबल इलाहाबाद हाईको ने जो डिसीजन दिया वो विदेशी धारणाओं के आधार पर था। जैसा कि विदेशों में होता है। कोर्ट ने कहा है च्यू फॉरेन मेथड्स। ये जो विदेशों के मेथड है ना सेक्सुअल ऑफेंसेस में बचाने की। किसी तरह से बचा लो। उनके बीच में कॉम्प्रोमाइज हो जाए। कॉम्प्रोमाइज होकर मामला निपट जाए। अपने-अपने घर जाए। क्या फर्क पड़ता है? वो उनके आपस के पर्सनल रिलेशंस लड़के लड़की के रहते हैं। जो ऑफेंडर है उसके या जो एक जो एक्यूज्ड है उसके और जो विक्टिम है उसके उनके आपस के रिलेशन है। अगर वो आपस में समझौता कर लेते हैं तो सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी खतरनाक टाइप के सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी वहां बचा दिया जाता है। कंपनसेशन लेके लड़की अपने घर चली जाती है। लड़का अपने घर चला जाता है। परिवार के बीच में या दोनों के बीच में समझौता हो जाता है।

लेकिन भारत ऐसा नहीं। भारत में हर एक ऑफेंस अगेंस्ट द स्टेट है। राज्य की अपनी एक धारणा है। राज्य का अपना एक स्टाइल है। राज्य का अपनी व्यवस्था है। राज्य का अपना एक संस्कार है। राज्य की अपनी एक संस्कृति

है और राज्य में रहने वाले लोगों की ये अपनी धारणा है। मैं इसको अगर दूसरे शब्दों में कहूं तो ये डेफिनेशन पहले भी सुप्रीम कोर्ट बता चुका है कि उत्तर में जिसके हिमालय हो दक्षिण में जिसके महासागर हो उस भूमि पर रहने वाले लोगों का जो स्वभाव है वे ऑफ लाइफ है उसको ही हिंदू कहते हैं। उसको ही हिंदूइज़्म कहते हैं। और कोई अलग से डेफिनेशन नहीं है। यहां की संस्कृति, यहां के संस्कार, यहां का पहनावा, उड़ावा और जो पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्य, पूर्वजों के शौर्य और पूर्वजों की मान्यता, पूर्वजों के द्वारा मूल्य निर्धारित किए गए मूल्यों की जो स्थापना है, वही भारत है।

ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हम सब जानते हैं कि ऑनरेबल जस्टिस सूर्यकांत जब बैठे थे उसी समय उन्होंने कहा था रोहिंग्या अंदर आ गए तो क्या इनको रेड कॉरपेट बिछाऊं? क्या इनको मैं एजुकेशन दूं? क्या इनके खाने पीने की व्यवस्था करूं? इनके लिए यहां स्थान नहीं है। जो बॉर्डर तोड़कर आया है, जो कानून तोड़कर आया है, उसको भारत में स्थान नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही कई मामलों में उन्होंने अब नई दोबारा से फाइलें खोलनी शुरू कर दी हैं। मैंने अभी बताया था शरूर मठ का मामला दोबारा खोल दिया गया है सबरीमाला के नाम से। लेकिन अब वहां जो सरकारी आधिपत्य है मंदिरों पर सरकार का उससे मुक्ति का समय आ गया है। नई जजेस की बेंच बिठाकर उस पर सुनवाई। मैंने उस पर एक पूरा लेक्चर रिकॉर्ड किया था। उसका कानूनी पहलू बताया था और कोर्ट की धारणा भी बताई थी और कैसे कोर्ट ने नए जजेस की बेंच बनाई वो अगर आपने ना देखा हो तो उसको देखना चाहिए। मैं समझता हूं कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा और मामला क्या था? एक नाबालिक लड़की पर किसी लड़के ने प्रहार किया। किसी आदमी ने प्रहार किया। प्रहार करते समय उसने उसकी छाती पर प्रहार किया और कपड़े खोल रहा था। इस स्थिति में दूसरे लोग वहां पर आ गए जिसकी वजह से वो लड़की बच गई। जब लड़की बच गई तो मुकदमा लिखवाया गया। मुकदमे में यह अटेमप्ट टू रेप का मुकदमा था। लेकिन जब हाई कोर्ट पहुंचा तो हाई कोर्ट ने कहा कि छाती पर हाथ मारना किसी भी तरह से अटेमप्ट टू रेप नहीं है। ऑनेरेबल सुप्रीम कोर्ट में जब उसकी अपील आई तो आज तीन जजेस की बेंच ने उसको सुना। अब तीन जजेस की बेंच जब उसको सुन रही थी। सुनते समय चीफ जस्टिस को ये कहना पड़ा कि ये कैसा न्याय हम कर रहे हैं? ये कैसा भारत हम बना रहे हैं? भारत में हम किस प्रकार की धारणा रखे हुए हैं? क्या हम विदेशियों के आधार पर यहां तय करने लगे लगना शुरू कर दिया है? क्या हमारी धारणाएं विदेशी धारणाएं हो गई है? क्या हम विदेशियों के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं।आपको एक बात बताऊं कि भारत में एक बड़ा अच्छा चलन चला था। चलन ये चला था कि अगर ऑक्सफोर्ड हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने आज ऑक्सफोर्ड का भी नाम लिया इसमें। हमारे यहां एक चलन चल गया था और चलन यह था कि जो कैमब्रिज, ऑक्सफोर्ड और तमाम तरह के इन विद्यालयों से पढ़कर आए, इन यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए वो बहुत काबिल होता है और वो काबिल होता था तो वो जज जब बनकर बैठता है तो वो क्या

करता है? वो कहता है सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में लड़की और लड़के को पूर्ण रूप से ऑटोनोमी है। वो कहता है कि गे मैरिज वैलिड है। जब वो वहां से पढ़कर आते हैं तो यहां पर वो धारणा रखते हैं कि गेज हैविंग द फंडामेंटल राइट टू गेट अ जज ऑफ द सुप्रीम कोर्ट। एक गे जो महिला गे हो वकालत करता है उसको सुप्रीम कोर्ट का जज होने का भी अधिकार है। उसको हाई कोर्ट का जज होने का अधिकार है। किस तरह का मैसेज हमारे जजेस दे देते रहे हैं। गे मैरिज के मामले में या सेम सेक्स मैरिज के मामले में या फिर तमाम ये जो एडल्टरी के मामले हैं उन मामलों में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के मामले में ये भारत की धारणा तो नहीं थी। लेकिन पिछले 5 साल में इस तरह के कई एक जजमेंट भारत में दिए गए। ये वो जजेस थे मोस्टली जिन्होंने ये जजमेंट दिए जो विदेशों में पढ़कर आए थे। विदेशों में पढ़ने के बाद वहां का माहौल, वहां का एटमॉस्फियर, वहां का वातावरण उसके आधार पर डिसीजन दे दिए उन्होंने और कहा कि नहीं नहीं वो सामन ने ऐसा लिखा था कि सेवनी ने ऐसा लिखा था कि वो ऑस्टिन ने ऐसा लिखा था। बड़े-बड़े भारीभरकम नाम बैकग्राउंड में देकर जरिसुडेंस के और अंग्रेजी जरिसुडेंस को यहां लिखकर जजमेंट देते रहे हैं और उन जजमेंटों में सरकार को पीछे छोड़ते रहे हैं। सरकार के ऊपर फंडामेंटल राइट के नाम से तमाम अत्याचार करते अत्याचार से मतलब है तमाम ऐसे जजमेंट देते रहे हैं जो भारत की सोवनिटी को चैलेंज करते थे। ऐसे तमाम जजमेंट होते रहे हैं जो भारत की बाउंड्री को प्रोटेक्ट नहीं करते। भारत के लोगों के फंडामेंटल राइटों को प्रोटेक्ट नहीं करते। विदेशियों को भारत में शरण देना, विदेशियों के फंडामेंटल राइट हमारे यहां होता रहा है। जजमेंट भी होते रहे कि भ अगर विदेशी है तो क्या हुआ? इसको पढ़ने का राइट है। इसको खाने का राइट है। इसको सोने का राइट है। इसको ये राइट है। इसको राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी है। हम नहीं छीन सकते। इसलिए इसके स्कूलों में एडमिशन करवा दिए जाए। इनको वो वजीफे दिए जाए। इनको इस तरह के जजमेंट भारत में होते रहे।

मैं साधुवाद कहूंगा ऑनरेबल चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जिन्होंने आज ये ये जो दर्द था उस दर्द को खुलकर कह दिया। भले ही केस किसी दूसरे प्रकार का था लेकिन उन्होंने खुलकर कहा और कहा कि विदेशी आधार पर विदेशी धारणा के आधार पर विदेशी बचाव के आधार पर भारत में अदालतें नहीं चलनी चाहिए। भारत के जजों को सेंसिटिव होना चाहिए।इंडियन इको सिस्टम से फेमिलियर होना चाहिए। भारत की सोशल स्ट्रक्चर को पता होना चाहिए। भारत में वो मैसेज कैसा जाएगा। क्योंकि पहले यह होता रहा है कि जब जजेस डिसीजन देते थे तो आंख पर पट्टी बांधकर अंधा कानून ऐसा दिखाया जाता था। यानी कि कानून के जो अप एंड डाउन्स हैं, कानून के जो डिसीजंस हैं उनको ही केवल फॉलो किया जाएगा। चाहे वो जज साहब को मालूम हो कि वो सही है, जज साहब को मालूम हो कि वो नहीं सही। कुछ भी हो। लेकिन जो फार्मूला बन गया है उसी फार्मूले पर चलने वाले हमारे यहां कोर्ट रहे।

चीफ जस्टिस ने कहा एक बात ध्यान रखिए भारत है। भारत में भारतीय प्रेसिडेंट भी है। भारतीय कल्चर भी है। भारत का अपना स्वभाव है। उसके अनुसार क्या मैसेज देना चाहते हैं? जजेस को चाहिए कि वो केवल लीगल ग्राउंड ना लगाएं। यह भी देखें कि उनके जजमेंट से देश पर प्रभाव क्या पड़ेगा? उनके जजमेंट से समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके ऑर्डर से देश में आने वाली पीढ़ी क्या सबक लेंगी? ये सारी बातें उन्होंने आज जो कही हैं मैं समझता हूं कि दिल खुश कर दिया मेरे जैसे व्यक्ति का जो लगातार ये कहता आया मैं हमेशा से कहता हूं हम हैं आप हैं कोई भी प्रोफेशन में है मैं जज हूं मैं वकील हूं मैं डॉक्टर हूं मैं इंजीनियर हूं मैं पत्रकार हूं भाई राष्ट्रित तो में हूं कहां है वो जजेस जो कि आजादी से पहले हुआ करते थे और कहां गए वो जजेस भारत में आक्रांताओं ने जब कब्जे किए तो उससे पहले न्यायाधीश बैठा करते थे वो कोई नहीं रहता। जब देश गुलाम होता है तो हर व्यक्ति गुलाम होता है। जब देश खतरे में होता है तो हर व्यक्ति खतरे में होता है। किसी का कोई फंडामेंटल राइट नहीं होता और कोई राइट ही नहीं होता। जब राष्ट्र है तो हम हैं। राष्ट्र प्रथम की भावना करके कोई भी काम किया जाए। पत्रकार लिखता है तो राष्ट्र प्रथम लिखे। इंजीनियर बिल्डिंग बनाता है तो राष्ट्र प्रथम बनाए। डॉक्टर दवाई देता है तो राष्ट्र प्रथम की बनाए। वकील वकालत करता है तो राष्ट्र प्रथम पे बनाए। करें और अगर जज जजमेंट देता है तो राष्ट्र प्रथम का जजमेंट क्यों ना दिया जाए।

आज का मैसेज जो उन्होंने दिया है जुडिशरी जैसा वो बता रहे हैं वैसी ही होनी चाहिए। मेरा मन तो यही कहता है कि जुडिशरी वैसी होनी चाहिए जैसा कि ऑनरेबल चीफ जस्टिस ने आज कहा। आप सोच कर देखिए। सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में भी आप ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज को फॉलो करते हैं। आप वो वातावरण को फॉलो करते हैं जो लोग कॉन्वेंट में बच्चों को पढ़ाया करते थे। कॉन्वेंट का मतलब ये होता था विदेशी भाषा में अगर देखोगे तो कॉन्वेंट का मतलब अनाथालय है। वो अनाथालय में पढ़ाया करते थे। क्यों? क्योंकि वो प्लूटो और सुकरात कहता था कि महिला और पुरुष का जो साथ होता है वो बच्चे पालने के लिए नहीं होता है। वो केवल एंजॉय करने के लिए होता है। अगर बच्चे पालने के लिए नहीं तो बच्चों का क्या होगा? तो फिर वो ऑर्फनेज में रखे जाते थे। ऑर्फनेज में जो स्कूल खोला जाता था जहां पर पढ़ाई भी होती थी उसको कॉन्वेंट कहा जाता था। यानी कि अब वो फ्री है। आज भी उनके यहां का वातावरण कुछ ऐसा ही है कि एक महिला अपने एक मैं किसी का उदाहरण सुन रहा था। एक महिला अपने पति की कब्र पर झूला झुला रही थी या पंखा डुला रही थी। कुछ लोग वहां गए तो हिंदुस्तान के रहने वाले थे। उनको लगा कि देखो ये ईसाइयत की धरती पर कितनी अच्छी महिला है। ये तो भारत के संस्कारों से भी बड़े संस्कार हैं। उस महिला से उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि हमने तो विदेशों के बारे में, ईसाइयों के बारे में जो वहां पर रहते हैं उनके विषय में बड़ा गलत सुना है कि वो तो इंटैक्ट होते नहीं है। वो तो कॉन्ट्रैक्ट में रहते हैं। तो वो महिला हंसने लगी और उसने कहा कि हम कब्र सूखने से पहले विवाह नहीं कर सकते। इसलिए मैं पंखे से कब्र सुखा रही हूं ताकि कब्र सूख जाए तो मैं विवाह कर लूं। दूसरा विवाह मेरा हो जाए। इतने रिस्ट्रिक्शन की कब्र सूखने तक का रिस्ट्रिक्शन है। यह भारत नहीं है। आप देखो जहां पर इस प्रकार की व्यवस्थाएं हो कि वो कॉन्ट्रैक्ट है। आज हमारा तो कल तुम्हारा जानवरों की तरह जिनका व्यवहार है। 

जानवरों की तरह जिनका चाल चलन है। जानवरों की तरह जिनकी रिहाइश

है। उनको कैसे फॉलो कर सकते हैं। भारत विश्व गुरु के पद पर इसलिए आसीन था क्योंकि भारत विश्व भर को मैसेज देने वाला देश है। भारत विश्व भर में बताने वाला देश है कि आखिर हम कैसी सभ्यता चाहते हैं? संसार कैसा होना चाहिए? मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ इसी प्रकार के एक्सपेरिमेंट होने चाहिए। क्योंकि हमारे यहां की जो संस्कृति संस्कार रहे हैं उन संस्कारों और संस्कृतियों में हम ये कहते रहे हैं कि हम समगोत्री विवाह नहीं करेंगे। समगोत्री का मतलब एक ही विद्यालय में पढ़ने वाला बेटा और बेटी मतलब महिला और लड़का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वो भाई बहन हो जाते हैं वो गुरु भाई बहन हो जाते हैं। लेकिन आज की फिल्म इंडस्ट्री स्कूल कॉलेज का मतलब यह दिखाती है कि किस तरह से वो आगे गठबंधन में चले जाएंगे। एजुकेशन कहीं नहीं आती। सिर्फ यह दिखाया जाता है कि विद्यालय में पढ़ने गए हैं या यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए हैं तो उनका चूच का मुरब्बा कैसे बनेगा। आप सोच के देखिए कि इस प्रकार की धारणा जिस देश में बनने लगी हो उस देश का क्या हो सकता है? ये ध्यान रखना चाहिए कि भारत में समगोत्री विवाह रोका गया था। भारत में सपिंडी विवाह रोका गया था। भारत में सात पीढ़ी पिता की और पांच पीढ़ी मां के तरफ का रिश्ता रोका गया था। इन सबको भाई-बहन कहा गया और गुरु बहन और गुरु भाई को भी गुरुओं के बच्चे को भी भाई-बहन कहा गया।

 ऐसा देश जहां इतने उच्च सिद्धांत हो उस देश में ऐसे जजमेंट चीफ जस्टिस मुझे लगता है कि उनको भी समझ में आ गया कि वाकई में हम किस तरह भारत को ले जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि मूल्यों के आधार पर नया सिलेबस बने। मूल्यों के आधार पर नया करिकुलम बने। जजेस को पढ़ाते समय संवेदनशीलता डाली जाए और भारत उनको पहले पढ़ाया जाए ताकि वो भारत के अनुरूप डिसीजन दे सकें। भारत की जुडिशरी भारत के अनुरूप चले।


भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट  चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जय हिंद जय भारत


Friday, February 13, 2026

राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे --निशिकांत दुबे ने की यह मांग

राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे --निशिकांत दुबे ने की यह मांग
राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे --निशिकांत दुबे ने की यह मांग
राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे --निशिकांत दुबे ने की यह मांग
राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे --निशिकांत दुबे ने की यह मांग
राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे --निशिकांत दुबे ने की यह मांग

 भारतीय जनता पार्टी के वरिष्ठ सांसद निशिकांत दुबे ने अब राहुल गांधी के खिलाफ संसद में जो प्रस्ताव रखा है वो प्रस्ताव राहुल गांधी की न केवल संसद की सदस्यता बल्कि एलओपी के पद को भी खत्म कर देगा। यानी इस प्रस्ताव के संसद से पास होने के बाद राहुल गांधी ना सांसद रहेंगे ना एलओपी रहेंगे और इस प्रस्ताव में निशिकांत दुबे ने यह मांग भी की है कि इस व्यक्ति को चुनाव लड़ने से भी रोका जाए और इसे पास होने के लिए सिर्फ बहुमत की जरूरत है जो भारतीय जनता पार्टी के पास है। इसको पास करने के लिए संसद का एक साधारण बहुमत चाहिए और जब सदन में इसकी वोटिंग हो तो उपस्थित जो सदस्य हैं उनका दो तिह बहुमत होना चाहिए। यानी यहां राहुल गांधी पूरी तरीके से इस केस को हारते हुए नजर आ रहे हैं। और बड़ी बात तो इसमें यह है कि अब उन्हें बचाने के लिए ना तो सिबल और सिंघवी जैसे कुतर्क की वकीलों को कोई उन्हें मदद मिल सकती है ना ही गवई जैसे जजों का कोई आशीर्वाद उन्हें मिल सकता है। यह जो प्रस्ताव रखा गया है उसके पहले जो निशिकांत दुबे ने कहा और जिस भाषा में कहा उससे पूरी कांग्रेस हिल गई है। कांग्रेस को पता चल गया है कि अब भारतीय जनता पार्टी या मोदी सरकार राहुल गांधी पर किसी भी तरीके का रहम करने के मूड में नहीं है। क्योंकि  दुबे ने राहुल को राहुल कहा और साफ शब्दों में कहा कि यह व्यक्ति देश विरोधी ताकतों के साथ मिलकर यानी जॉर्ज सोरोस के साथ मिलकर फोर्ट फाउंडेशन के साथ मिलकर यूएसए जैसी जो देश को तोड़ने की साजिश करने वाली विदेशी ताकतें हैं उनके साथ मिलकर देश के खिलाफ साजिश में शामिल है। यह व्यक्ति वियतनाम, कंबोडिया, थाईलैंड जैसे देशों में विदेशी ताकतों, विदेशी लोगों के साथ मिलता है और देश के खिलाफ साजिश करने का काम करता है। यह देश को बदनाम करता है। देश की सेना पर सवाल उठाता है। तमाम संसदीय पदों पर बैठे हुए व्यक्तियों पर झूठे आरोप लगाता है। इसलिए इस व्यक्ति की सदस्यता रद्द की जाए और इसको चुनाव लड़ने से भी रोका जाए।


अब आप समझ लीजिए कि निशिकांत दुबे जो प्रस्ताव लेकर आए हैं, वह केवल निशिकांत दुबे का एक प्राइवेट मेंबर के तौर पर प्रस्ताव नहीं है बल्कि यह भारत सरकार का प्रस्ताव है क्योंकि इसे संसद से पास होने के लिए बहुमत की जरूरत है और बहुमत पार्टी के पास है। यहां एक और बड़ी बात है कि राहुल गांधी अब इस मामले में इसलिए भी कुछ नहीं कर पाएंगे क्योंकि उन्हें अपने बचाव में जो कुछ कहना है, वो राहुल को ही कहना पड़ेगा, सबूत रखने पड़ेंगे और उन सारे आरोपों का खंडन करना पड़ेगा, जिनको के ऋषिकांत दुबे संसद में बड़ी आसानी से साबित कर सकते हैं। जॉर्ज सोरोज़ की संस्था से राहुल के क्या संबंध है यह सबको पता है। फ़ोर्ट फाउंडेशन से उनका जो एनजीओ है उनका और उनकी माता का वह पैसा लेता है यह सबको पता है। चीन की कम्युनिस्ट पार्टी के साथ कांग्रेस ने क्या एमओयू साइन किया था सबको पता है।  राहुल विदेश जाकर किन लोगों से मिलते हैं ये भी सबको पता है। और इसको लेकर भारत की तमाम अदालतों में पहले केस भी चल चुके हैं। लेकिन हमारे देश की जो जुडिशरी है वह गांधी खानदान की इतनी ज्यादा एहसानमंद है कि कभी भी राहुल पर कोई आंच नहीं आ पाती है। दसियों साल केस चलते रहते हैं। मामलों को लटकाया जाता है। सुनवाई पे सुनवाई होती रहती है। तारीख पे तारीख और फिर जमानत पे जमानत। राहुल गांधी, सोनिया गांधी, राहुल का जीजा, रावट बटरा यह सब जमानत पर चल रहे हैं और यह जमानत अनंत काल तक चलती रहती है।

लेकिन संसद में जो सब्सटेंटिव मोशन है इसका मतलब यह है कि ये अब मामला लंबा नहीं चलेगा और भारतीय जनता पार्टी ने यह सब इसलिए किया क्योंकि अब जो पानी है वो सर से ऊपर गुजर गया है। राहुल गांधी अब तक बाहर थे तो उसमें मोदी जी की नरम दिली थी या उससे पहले जो बीजेपी के प्रधानमंत्री रहे थे अटल बिहारी वाजपेयी जी उन्होंने राहुल को बच्चा समझ के बचाने का काम किया था। लेकिन एक कहावत है ना कि जब हद से ज्यादा कुछ चीज होती है आचार्य चाणक्य ने कहा था कि अति सर्वत्र वयत यानी किसी चीज की अति हो जाती है तो फिर विध्वंस होता है। उनका एक पुराना उस चाणक्य नाटक का एक डायलॉग था कि राजसत्ता  का या सत्ता का दुरुपयोग होने पर साधु सन्यासी भी क्रुद्ध हो जाते हैं। यानी वो लोग भी जो उदासीन है जिन्हें कुछ मतलब नहीं है उनको भी गुस्सा आने लगता है और राहुल के केस में यही होता हुआ दिखाई दे रहा है। अभी पिछले दिनों बिगनेस सिसर के केस को जिस तरीके से जज ने खारिज कर दिया कह दिया ये हमारी ताकत नहीं है। जबकि वो उसको आठ दिन तक सुनते रहे थे। उससे पहले गवई ने जो ड्रामा किया था कि सूरत की एक कोर्ट ने राहुल को सजा दी। हाई कोर्ट ने उसको बरकरार रखा और भारत के सुप्रीम कोर्ट के जज ने कह दिया कि नहीं राहुल गांधी को अगर सजा दे दी तो इनके इलाके का प्रतिनिधित्व कौन करेगा? यानी जो बात कानून में नहीं है, जो बात संविधान में नहीं है उन चीजों को लाकर भी यह लोग अब तक राहुल गांधी को बचाते रहे हैं। राहुल गांधी को अदालतों से सजा नहीं मिलती है। या तो जमानत मिलती है या थोड़ी बहुत डांटपट हो जाती है।


लेकिन अब क्योंकि संसद का मामला है और सबस्टेंटिव जो प्रस्ताव है इसके माध्यम से अब तक कई दर्जन सांसदों को बर्खास्त किया जा चुका है। तो इसका मतलब यह नहीं है कि इस प्रस्ताव से कुछ होगा नहीं। यह एक तरीके का अविश्वास प्रस्ताव है। लेकिन


अविश्वास प्रस्ताव जो संविधान में वर्णित पद है उन्हीं के खिलाफ लाया जाता है। जब कोई व्यक्ति अविश्वास प्रस्ताव के दायरे में नहीं होता है या सांसद होता है तो फिर इस तरीके से मूल प्रस्ताव यानी कि सब्सटेंटिव मोशन रखा जाता है। यहां एक और बड़ी बड़ा खेल कर दिया बीजेपी ने। पहले यह अफवाह उड़ाई गई कि राहुल के खिलाफ प्रिविलेज मोशन यानी कि विशेषाधिकार हनन का प्रस्ताव आ रहा है और इसका मतलब यह था कि राहुल ने जो कुछ संसद में कहा था उसको ऑथेंटिकेट करना पड़ेगा अन्यथा कार्यवाही होगी। इसमें राहुल की सदस्यता नहीं जा सकती थी। यानी इसे अगर मिलिट्री की भाषा में कहें तो मिलिट्री साइंस में एक टैक्टिक्स सिखाई जाती है। वो है डोजिंग की टैिक्स। डोज देना। यानी आप अपने शत्रु को दिखा कुछ रहे हैं और कच कुछ और अलग कर देते हैं। जैसे कि क्रिकेट में भी होता है कि अगर लेग स्पिनर ऑफ स्पिन फेंक दे तो भी बल्लेबाज आउट हो जाता है। चकमा खा जाता है और ऑफ स्पिनर अगर लेग स्पिनर फेंक देता है तो भी चकमा खा के बल्लेबाज आउट हो जाता है। यहां बीजेपी ने या फिर कहें कि बीजेपी ने निशिकांत दुबे के माध्यम से राहुल गांधी और पूरी कांग्रेस को डोज दे दी है,

चकमा दे दिया है। अगर वह प्रिविलेज मोशन लाते तो राहुल गांधी के खिलाफ बातें तो होती पर हटाए जाने की कोई संभावना नहीं थी। लेकिन यहांकि यह मूल प्रस्ताव है। सब्सटेंटिव मोशन है। इसलिए अब निशिकांत दुबे और राहुल गांधी के बीच वन टू वन मुकाबला होना है। चर्चा होगी सदन में। तमाम पार्टियों को बोलने का मौका मिलेगा। कुछ लोग राहुल के पक्ष में बोलेंगे, कुछ विपक्ष में बोलेंगे। लेकिन आरोप लगाना और उनका खंडन करने का जो काम है वो केवल और केवल राहुल गांधी ही कर सकते हैं। उससे आप समझ सकते हैं कि यह व्यक्ति अपनी बात को कैसे बचा  पाएगा। क्योंकि राहुल गांधी अब तक जितने आरोप लगाए हैं वह सब के सब झूठे साबित हुए हैं। और निशिकांत दुबे जो आरोप लगा रहे हैं वो पूरी तरीके से तथ्यों पर आधारित है। राहुल गांधी से प्रतदा के साथ क्या संबंध है? राहुल गांधी जब यूएस जाते हैं तो जॉर्ज सोरोस की कंपनी या उसके एनजीओ से जुड़े हुए लोगों से मिलते हैं। ये बकायदा फोटो और वीडियो से साबित है। राहुल गांधी जब भारत यात्रा करते हैं तब भी वो जॉर्ज सोरस के जो लोग हैं उनके साथ मिलते जुलते बातचीत करते हुए दिखाई देते हैं। राहुल गांधी जब कंबोडिया, वियतनाम, थाईलैंड जैसे देशों में जाते हैं तो वो किन लोगों से मिलते हैं? ये भी वीडियो सबके सामने है। यानी निशिकांत दुबे को साबित करने के लिए बहुत सारे सबूत हैं और जब वो अपने इस आरोप को साबित कर देंगे तो फिर लोकसभा के जो अध्यक्ष हैं या तो ओम बिरला जी या कोई उनकी जगह और बैठा होगा तो उसे इस प्रस्ताव को स्वीकार करना ही होगा। उसके बाद सदन में इस पर वोटिंग हो सकती है, चर्चा हो सकती है। लेकिन उसका परिणाम भी पहले से सबको पता है। भारतीय जनता पार्टी एनडीए इस समय बहुमत में है और बहुमत की सरकार जो प्रस्ताव पास कराना चाहती है वो प्रस्ताव पास होता ही है। अगर


यह प्रस्ताव गिरेगा यानी सरकार ही गिर जाएगी। यानी इस प्रस्ताव के पास होने की 100% संभावना है। उसके बाद जांच कमेटी बनेगी। कमेटी इन आरोपों की जांच करेगी औरकि इनमें कोई भी आरोप झूठा नहीं है। सब कुछ शीशे की तरह साफ है। ओपन एंड सक्स केस है तो कुछ दिनों के बाद जब वो जांच कमेटी अपनी रिपोर्ट पेश करेगी। उसके बाद संसद में इस पर फिर से वोटिंग होगी। और वोटिंग होने के बाद यह प्रस्ताव अगर स्वीकार कर लिया जाता है जिसकी पूरी संभावना है उसके बाद राहुल गांधी की संसद की सदस्यता भी जाएगी। एलओपी का पद भी जाएगा और उसके बाद उन्हें कोई


सुप्रीम कोर्ट का जज बचा भी नहीं पाएगा। यह सबसे बड़ा दर्द अब कांग्रेस को सता रहा है। क्योंकि किसी कोर्ट में जब मामला जाता है तो कांग्रेसी और गांधी परिवार इसलिए निश्चिंत हो जाता है कि जुडिशरी में उनके एहसानों तले दबे हुए तमाम जज हैं जो उनके ऊपर आंच नहीं आने देंगे। और अब तक इसी वजह से गांधी परिवार तमाम घोटालों में फंसने के बावजूद बचा हुआ और बड़े मौज के तरीके से जिंदगी जीता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन संसद से पास हुए किसी भी प्रस्ताव को सुप्रीम कोर्ट पलट नहीं सकता है। यह भारत का संविधान कहता है। और अब तक जितने भी सब्सटेंटिव मोशन के द्वारा सांसदों को हटाया गया है, उन सबको सुप्रीम कोर्ट से कोई राहत कभी नहीं मिली है। यह भी इतिहास है। यानी आप कह सकते हैं कि राहुल गांधी के खिलाफ जो कोर्ट की अब तक की एक भावना रही थी, उसको देखते हुए भारतीय जनता पार्टी ने बड़ा ही कैलकुलेटेड जाल बिछाया है। इस व्यक्ति को फंसाने के लिए, इसकी सांसदी खत्म करने के लिए और इसकी उददंडता पर लगाम लगाने के लिए।

राहुल गांधी ऐसा व्यक्ति है जो ना केवल देश के अंदर बल्कि विदेशों में जाकर भी भारत की जो संवैधानिक संस्थाएं हैं, प्रधानमंत्री है, सरकार है, राष्ट्रपति है  ये सबका अपमान करता है। इसने कोई सीमा नहीं छोड़ी है। और ये केवल भारत में होता है कि कोई व्यक्ति अगर देश के खिलाफ बोलता है तब भी लोग उसके जिंदाबाद के नारे लगाने उसके पीछे खड़े हो जाते हैं। नहीं तो दुनिया के छोटे से छोटे और बड़े से बड़े देश में देश के खिलाफ बोलने वालों को स्वीकार नहीं किया जाता है। उनको या तो जेल में डाला जाता है या फिर उनके ऊपर और भी बड़ी कार्यवाही की जाती है। लेकिन हमारे देश में हमारे देश की जुडिशरी की वजह से जो लोग देश के खिलाफ बोलते हैं, देश को तोड़ने की बात करते हैं, देश के खिलाफ विद्रोह करते हैं। उनको भी रूल ऑफ लॉ के नाम पर संरक्षण देने का काम किया जाता है। उनकी खातिरदारी की जाती है। उनको बचाने का प्रयास किया जाता है और यह कहा जाता है कि संदेह से परे सबूत होने चाहिए। लेकिन संसद में संदेह से परे सबूतों की जरूरत नहीं है। वहां अगर फोटोग्राफ है, वीडियोग्राफी है और दूसरे सबूत है तो व्यक्ति बच नहीं पाएगा। यही चिंता अब सिबल सिंह भी और तमाम वकीलों को भी है कि अब वह राहुल बाबा को कैसे बचाएं क्योंकि निशिकांत दुबे इस बार राहुल की जिस तरीके से फजीहत करने वाले हैं उसका नमूना तो उन्होंने अपने जब प्रस्ताव रखा तभी दे दिया है।


संसद की प्रक्रिया है। एक दिन में यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाएगा। उसके बाद निशिकांत दुबे विस्तार से राहुल गांधी की पूरी कुंडली संसद के सामने खोलेंगे। यह भी निश्चित है। उसकी भी लाइव टेलीकास्ट होगी। राहुल गांधी को बड़ा शौक है ना कैमरों के सामने देश के प्रधानमंत्री पर, चुनाव आयोग पर, दूसरी संवैधानिक संस्थाओं पर झूठे आरोप लगाने का। अब उन्हें सच्चे आरोप सबूतों के सह जो आरोप लगाए जाएंगे उनका प्रसारण होते हुए भी देखना पड़ेगा। कांग्रेस इस पर हो हल्ला मचा सकती है। हंगामा कर सकती है। विपक्षी पार्टियां उसका साथ दे सकती हैं। लेकिन किसी भी हालत


में अब इस प्रस्ताव से सब्सटेंटिव मोशन की जो आने वाले जो उसके प्रभाव है उनसे राहुल गांधी को नहीं बचा सकते हैं। यह बात लगभग निश्चित हो गई है। आप इस पूरे मामले पर क्या सोचते हैं? आपकी क्या राय है? लोगों की भी बहुत दिनों से यही इच्छा थी कि इस व्यक्ति के ऊपर कार्यवाई होनी ही चाहिए। हम भी बार-बार कहते रहे थे कि कारवाई होगी कैसे? जब कोर्ट इसको बचाने के लिए बैठे हैं तो इसका भी तोड़ अब भारतीय जनता पार्टी की सरकार ने ढूंढ लिया है। एनडीए ने ढूंढ लिया है। और यह मामला इस पूरी समस्या का समाधान करके ही हटेगा। क्योंकि  संसद में जब यह प्रस्ताव स्वीकार हो जाएगा उस पर वोटिंग होनी भी निश्चित है और उस वोटिंग में एनडीए का बहुमत काम आएगा यानी विपक्ष के नेता हल्ला मचाकर चीख कर चिल्लाकर हंगामा कर कर कुछ भी करके राहुल गांधी को बचा नहीं पाएंगे।टिव मोशन का एक शब्द आया है लोगों की समझ में नहीं आ रहा कि ये है क्या? तो हमने आपको विस्तार से बता दिया है। आप भी समझकर लोगों को समझाइए कि इसका मतलब क्या है और इसके परिणाम क्या होंगे।


जय हिंद जय भारत।



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भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को

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