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Monday, February 23, 2026

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?
आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?
आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?
आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

 आज तक हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ क्या कि किसी ने ट्राई किया हो कि चलो तख्ता पलट करके तो देखते हैं। हमारे इसमें बुनियादी रूप तो है लेकिन आजादी के बाद  ऐसा क्या तरीका अपनाया जिससे कि भारत में तख्ता पलट नहीं हुआ और पाकिस्तान हुआ 

नेहरू की शतिर चाल ये ही की नेहरू फौज से हमेशा डरता था। कैसे ? आइए उस पर लेकर मैं आपको चलता हूं। फौज को अलग अलग कर दिया तो अंग्रेजों के समय एक C in C के तहत मैं काम करती थी बातें बताने के लिए बहुत सारी हैं। असल में इन पॉइंट्स का कहीं एक जगह विश्लेषण नहीं मिलता है। आप जब पूरा-पूरा इतिहास उठाकर पढ़ते हैं तब जाकर ये इवॉल्व होकर आती हैं।हमने आपको तख्ता पलट की बातें बताई और मैंने आपको ये भी बताया कि किस प्रकार से भारत में आज जब मैं ये बात बोलता हूं आपसे कि भारत में 1857 में अंग्रेजों ने जो क्रांति देखी,आपको जानकर आश्चर्य होगा आज देश के अंदर 27 रेजीमेंट्स काम कर रही हैं। 27 रेजीमेंट्स में चाहे वो जाट हो, चाहे क्षेत्र के आधार पर हो, आसाम रेजीमेंट हो, पंजाब सिख रेजीमेंट हो, बिहार रेजीमेंट हो, कुमाऊं रेजीमेंट हो, नागा रेजीमेंट हो, गोर्खा रेजीमेंट हो, राजपूत राइफल्स हो सबकी अपनी-अपनी पहचान बनाकर उनके अंदर अपना भाव पैदा कर दिया है। यही कारण है कि इन रेजीमेंट्स के बीच में अभी पिछले कुछ साल पहले भी अहीर रेजीमेंट की मांग उठी थी कि अहीर रेजीमेंट भी होने चाहिए। चमार रेजीमेंट भी भारत के अंदर हुआ करती थी। 1943 से लेकर 46 के बीच में भारत में चमार रेजीमेंट के नाम से भी रेजीमेंट रही है। ये भी एक इतिहास है। जातियों के आधार पर रेजीमेंट्स भारत में गठित की गई थी अंग्रेजों के द्वारा। क्षेत्रीयता के आधार पर उनके अपने प्राइड के आधार पर भारत में रेजीमेंट्स गठित की गई थी। ताकि कभी इनको कोई भड़काने का काम करे तो फिर ये सब लोग एक बिंदु पर ना आ पाए।भारत में सात कमांड हैं। सात कमांड के अलग-अलग कमांडर्स हैं और उनको एक साथ आदेश देने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं रखी गई हैं।अंग्रेजों के जाते ही  उनकी व्यवस्था को जब अपने यहां अपनाया क्योंकि आजादी के बाद वो हमें अपनी सेना तो सौंप गए। लेकिन अब उस सेना को बनाने में हमने क्या तरीका अपनाया 

देश आजाद हुआ पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। फील्ड मार्शल करियप्पा कमांडर इन चीफ हुआ करते थे ब्रिटिशर्स के समय पे।किचनर के टाइम पे तो फील्ड मार्शल करियप्पा बनाए गए। कमांडर इन चीफ बनाए गए। भारत में आज तक दो ही व्यक्ति फाइव स्टार जनरल तक पहुंचे हैं। इनमें से एक करियप्पा साहब हैं और एक  मानकशा साहब हैं। केवल दो ही व्यक्ति फील्ड मार्शल की रैंक तक गए हैं। ये पहले व्यक्ति थे करियप्पा।

इनको यह बात क्यों मतलब ये उपाधि भी क्यों मिली थी? क्योंकि इन्होंने डायरेक्ट एक्शन लिया था पाकिस्तान के ऊपर जब 1948 का पाकिस्तान का संघर्ष पढ़ते हैं। अंग्रेज गए तो भारत को देश की सत्ता सौंप गए। सौंप गए तो सेना सौंप गए। सेना सौंप गए तो हम अपनी सेना को किनसे चलवाएं? सेना को चलवाने के लिए करीप्पा साहब आप सेना चलाएं। करियप्पा साहब और करियप्पा साहब के बाद में जो इनके बाद में दूसरे जो व्यक्ति बने वो थिमैया। थिमैया कौन थे? थल सेना अध्यक्ष थे जो करियप्पा के बाद में आए। अब हुआ क्या? हुआ ये कि जो करियप्पा साहब थे ये कमांडर इन चीफ थे।

नेहरू  ने सबसे पहले जो काम किया कमांडर इन चीफ का पद ही खत्म कर दिया। नेहरू जी की चालाकी देखिए।जो कमांडर इन चीफ का घर होता था। नेहरू जी ने खुद का अपना घर बना लिया।क्योंकि देश में लोकतंत्र आ गया  सेना के शासन की जरूरत क्या है?अंग्रेज तो सेना के माध्यम से और पुलिस के माध्यम से शासन करते थे। क्योंकि लोकतंत्र आ गया है तो कमांडर इन चीफ का जो त्रिमूर्ति भवन है यह मुझे दे दीजिए। पहचाने आजादी के समय क्या तिगड़म बिठाई नेहरू जी ने। हटो भैया आप हटो यहां से। आप अपने हो। देश की आजादी में विश्वास है। आपकी जगह हम रहेंगे साहब इस जगह। बोले ऐसा क्यों? बोले देखिए तीन सेना के तीनों अध्यक्ष होंगे और तीन अध्यक्ष रह कर के उन तीनों अध्यक्ष के ऊपर एक लोकतांत्रिक रूप से चुना हुआ व्यक्ति रक्षा मंत्री होगा। कमांडर इन चीफ की जरूरत क्या है? कमांडर इन चीफ का पद ही नहीं रखा जो अंग्रेजों ने रखा हुआ था। पाकिस्तान वाले यहीं मार खा जाते हैं।  नेहरू ने कदम उठाया तीनों सेनाओं पर राज करने के लिए कोई एक सैनिक का व्यक्ति नहीं चुना। अब आप में से कुछ लोग कहेंगे सर अभी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, चीफ ऑफ नेवी स्टाफ, चीफ ऑफ एयरफील्ड स्टाफ होता है। ये क्या है? आज भी थल सेना अध्यक्ष नौसेना अध्यक्ष होते हैं। लेकिन इन सब में से भी चार तीनों के ऊपर बैठने का जो व्यक्ति बनाया है। जैसे सीडीएस बनाया था अपन ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। कमांडर इन चीफ नहीं। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाया। लेकिन उसकी रैंकिंग उन्हीं जनरल्स के बराबर रखी। वो भी वही फोर स्टार जनरल रखे गए। उनसे यह कहा गया कि आपका काम कोऑर्डिनेशन का है। आप इनके ऊपर नहीं हो। सीडीएस विपिन रावत ने जो उनका पद सजित किया था कमांडर इन चीफ नहीं था वो। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ था। आप सबके ऊपर हैं। आप इनका ऊपर का मतलब कोऑर्डिनेट करेंगे। जनरल रैंक बराबर है। फाइव स्टार तो दो ही थे हमारे यहां पे। सेम मानकशा,करियप्पा। करियप्पा से कमांडर इन चीफ का पद ले लिया और उनको कहा सर आप थल सेना संभालें। आपके अनुभव का लाभ लें और हमें यह पद दें। एक और घटनाक्रम बताता हूं। मतलब कैसे धीरे-धीरे इवॉल्व हुई? नेहरू जी के द्वारा जो कार्य किए गए उनमें से एक 57 का कार्य बड़ा इंटरेस्टिंग है और वो क्या है? एक बार की बात है कि जनरल थिमैया जो हैं वो भारत के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। थैल सेना अध्यक्ष हुआ करते थे। नेहरू जी उनका कार्यालय विजिट करने गए। जब कार्यालय विजिट करने गए तो थिमैया साहब के ऑफिस में पीछे की तरफ एक कैबिनेट लगी हुई। जैसे अपने अलमारी लगी होती है। ऐसे एक स्टील की अलमारी रखी थी बड़ी सिल्वर की सी खूबसूरत सी। उसमें साहब नेहरू जी ने पूछा कि इसमें क्या-क्या रखा है? तो उन्होंने कहा साहब पहली रो में तो रखा हुआ है डिफेंस प्लांस। बोले अच्छा और दूसरी में बोले देश के अंदर क्या स्ट्रेटजी होनी चाहिए वो रखी हुई है? मतलब ये तो आज युद्ध हो जाए तो क्या प्लान है? भविष्य में क्या होने चाहिए? और बोले तीसरा बोले कभी आपके खिलाफ अगर सेना को शासन करना पड़े तो उस समय क्या तरीका अपनाया जाए? आप विचार कीजिए प्रधानमंत्री थिमैया जी के ऑफिस में हैं और थिमैया जी के पीछे जो अलमारी रखी है उसमें इस बात का भी रोड मैप बना हुआ है कि कल को अगर कु करना पड़े सैन्य विद्रोह करना पड़े तो तरीका क्या अपनाया जाए भाई साहब नेहरू जी इस बात को सुन तो लिए एक हल्की सी स्माइल पास करके चले आए ये बड़ा इंटरेस्टिंग वाक्य है और ये रियल स्टोरी है 1957 की द टॉप ड्रायर कंटेन द नेशंस डिफेंस प्लान सेकंड ड्रायर के अंदर रखा है कॉन्फिडेंशियल फाइल्स ऑफ नेशंस टॉप जनरल्स की इनकी कॉन्फिडेंशियल चीजें रखी हैं और थर्ड में रखा हुआ है कि इसमें इस ड्रॉअर

में सीक्रेट प्लान रखा है कि कल को अगर मिलिट्री कू आपके खिलाफ करना पड़े तो कैसे करें।

नेहरू जी ने कहा अच्छा भाई साहब देश में इतना संघर्ष करके लोकतंत्र लाए और सेना को हम शासन दे दें। सेना जो खुद नहीं चाहती वो ये चाहती है कि देश में लोकतंत्र आपको इंटरेस्टिंग बात मैं आपको बताता हूं। जिन-जिन देशों में लोकतंत्र बरकरार है। विशेष रूप से पश्चिमी देशों को आप देखें। वहां पर आज तक सैन्य शासन नहीं आया। भारत इसीलिए दुनिया में सबसे अलग है क्योंकि यहां पर लोकतंत्र मजबूत है

कई ब्रिटिशर्स ये मानना शुरू कर चुके थे कि नेहरू जी चकि उस समय के व्यक्ति हैं जिस समय राष्ट्रीय आंदोलन था तो उन्हें तो पता है देश कैसे चलाना है। लाल बहादुर शास्त्री जी भी जो हैं वो भी नेहरू जी की टीम के थे। तो उन्हें भी पता है। लेकिन जब ये दोनों लोग नहीं रहेंगे तो फिर इंदिरा गांधी जी देश नहीं चला पाएंगी। और इंदिरा गांधी जी देश क्यों नहीं चला पाएंगी? क्योंकि उस समय पर सैम मानक शा जो कि फाइव स्टार जनरल बने, फील्ड मार्शल बने। इनके बारे में ये कहा जाना लग चुका था कि ये सत्ता हटा के इंदिरा जी की और सैन्य तख्ता पलट करेंगे। एक दो जगह पर ऐसे डायलॉग भी मिलते हैं जिस समय पर मिसेज गांधी पूछती हैं। उन्हें बुलाती हैं मानिक शा को और उनसे पूछती हैं कि मैं बड़ी चिंतित हूं और पूछती हूं कि व्हेन आर यू टेकिंग ओवर? मानिक शा से पूछती हैं कि आप कब इस सत्ता को लेने वाले हैं? मानिक शा कहते हैं कि मैडम डरने की जरूरत नहीं है। इस पर एक फिल्म भी बनी हुई है। मतलब यह हद बीच में आई थी क्योंकि ब्रिटिशर्स ने बहुत सारे अंग्रेजों ने कहा कि नेहरू जी के पास तो अनुभव है लंबा चौड़ा औरों को क्या पता कैसे होगा। अच्छा और ये वास्तविकता भी है। क्योंकि 1967 में जब इलेक्शन हुए तो किसी को यह विश्वास नहीं था कि इंदिरा जी चुनाव जीत जाएंगी। और इस विश्वास की कमी के चलते ही प्रेडिक्ट होने लग गया था कि 67 उधर 58 में पाकिस्तान के अंदर सैन्य शासन आ गया और इनके यहां पर अब 67 में सैन्य शासन आ जाएगा। इंदिरा गांधी 44% मत लेकर के विजय घोषित हुई थी। 520 सीटों पर कांग्रेस जीती 283 सीट लेकर आई थी और ये विदेशी लोग देखते रह गए थे। भारत ने इतनी बड़ी पॉलिटिकल सूझबूझ दिखाई थी और ऐसी स्थिति  में हालांकि कांग्रेस बहुत से राज्यों में पिछड़ी जरूर थी लेकिन उसके बावजूद भी सरकार कंटिन्यू रही। अच्छा फिर एक वाक्या और हुआ। सैन्य मामलों में कहा गया कि 1984 में जब इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई थी उससे जस्ट पहले जब स्वर्ण मंदिर पर कारवाई हुई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था तो कहते हैं कुछ सिख सैनिक नाराज हो गए थे सुख सिख सैनिक नाराज हुए क्योंकि भई अल्टीमेटली जो बॉडीगार्ड थे इंदिरा गांधी जी के वो भी सिख धर्मावलंबी थे जिन्होंने उनको गोली मारी थी और दूसरा उससे पहले भी क्योंकि स्वर्ण मंदिर काफी प्रतिष्ठित और


पूजनीय स्थान है उसमें सेना कैसे एंट्री कर गई इससे बहुत सारे सिख नाराज थे लेकिन भारत में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी थी सेना के अंदर कि यह बात आईडिया में भले ही आई हो एग्जीक्यूट नहीं हो पाई। मैंने आपसे क्या कहा? 1857 से ही अंग्रेज सबक लेकर के भारत में जाट रेजीमेंट, राजपूत राइफल्स, राजपूत बटालियन, असम राइफल, असम बटालियंस है ना गोर्खा रेजीमेंट इतनी तरह की रेजीमेंट बना गए। बिहार रेजीमेंट, झारखंड रेजीमेंट, बंगाल रेजीमेंट इतनी रेजीमेंट बनाकर चले गए कि सबकी अपनी-अपनी पहचान और अपनी-अपनी प्राण प्रतिष्ठा थी कि नहीं


साहब हम तो अपने लिए हैं। इसलिए भारत में ऐसा नहीं हो पाया। 84 का मामला भी निकल गया। 2012 के अंदर जब नेमा मनमोहन सिंह जी की सरकार थी उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी और लिखा कि जनवरी की एक रात को भारत में तख्तापलट होने वाला था। और जनरल वीके सिंह उस समय वो हुआ करते थे। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। बोले इनके नेतृत्व में भारत के अंदर तख्तापलट होने की तैयारी हो रही थी। ये 2012 का लेटेस्ट मामला है जिस समय सबसे ज्यादा ये मामला उठा था कि साहब ऐसा कुछ हुआ था। द संजय गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने


कथित तख्ता पलट की खबरों पर कारवाई करने के लिए। मतलब ये घटना कुछ इस तरह से हुई थी। मैं पहले आपको घटना बताता हूं। हुआ कुछ यूं था कि ये पॉडकास्ट में वी के सिंह ने साहब ने ये बात बोली भी है कि कैसे-कैसे हुआ था ये काम। कहते हैं मैं लिख कर के लाया था। आगरा से जो सेना है ना वो चला दी गई थी। बिना पुलिस को बताए हुए कि साहब हम लोग मूव बिना सरकार को बताए हुए हां 2012 की बात है जनवरी 2012 की 33वीं आर्मड डिवीजन की एक टुकड़ी जो हिसार में तैनात थी वो दिल्ली की तरफ चल पड़ी। मैकेनाइज्ड इनफेंट्री की एक पूरी यूनिट मोबिलाइज की गई जो अपने साथ 40 से ज्यादा टैंक ट्रांसपोर्टर लेकर चल रही थी। इसके तुरंत बाद आगरा में तैनात 50वीं पैरा ब्रिगेड की एक यूनिट भी दिल्ली की तरफ भेज दी गई। कहते हैं कि इन दोनों मूवमेंट का भारत सरकार को आईडिया नहीं था। और मनमोहन सिंह जी ने अपने आईबी के अधिकारियों को बुलाकर आईबी जो खुफिया जांच करती है उनको बुलाकर पूछा था कि क्या इस बात में सच्चाई है कि सेना तख्ता पलट करने आ रही है? तो उन्होंने कहा नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल एक रमर उड़ाया गया है। कुछ खुफिया लोगों ने इस तरह की बातें अखबार में छपवा दी हैं। इसका कोई तर्क नहीं है। इस बारे में जब पॉडकास्ट के अंदर स्मिता प्रकाश जी के पॉडकास्ट में पूछा गया था वी के सिंह साहब से तो इन्होंने कहा कि भारत में यह संभव ही नहीं है। क्योंकि भारत के अंदर सात कमान हैं और सात कमान एक जनरल के साथ एक साथ आदेश मानने के लिए पूरी प्रक्रिया है कि वो कब किस आदेश को मानेंगे। कहने का मतलब ये हुआ कि लेटेस्ट उदाहरण 2012 का कोट किया जाता है कि ऐसा हुआ होगा। तो उम्मीद है कि अब आपको भारत के इतिहास के निर्माण से लेकर आज तक के अंदर जो भी गतिविधियां हुई और भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ वो सारी बातों का एक लमसम आईडिया लग गया होगा। पाकिस्तान में ऐसा क्यों हुआ उसका भी आईडिया लग गया होगा। वस्तुतः आप तक यह कंक्लूड करने में कामयाब हो गए होंगे कि भारत के राजनीतिक पार्टियां सेना से ज्यादा पुरानी और मैच्योर हैं। साथ ही साथ भारत के अंदर सेना में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी है कि वो सब अपनी-अपनी अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करती है। साथ ही साथ वो नेशनल प्राइड को पूरा करती है। वहीं पाकिस्तान जो कि आजादी के बाद अपने आप को एक मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया।मुस्लिम राष्ट्र घोषित करके उनकी एक ही धार्मिक आइडेंटिटी रह गई और उस धार्मिक आइडेंटिटी के साथ एक ही क्षेत्र के अंदर चूंकि एक क्षेत्र की सेना ही सीमित थी। पंजाब रेजीमेंट के मैक्सिमम लोग उनके साथ चले गए थे और चूंकि पाकिस्तान की मांग ज्यादा पुरानी नहीं थी और दुर्भाग्यवश जब पाकिस्तान बना तो उनके जो अब्बा थे जिन्होंने पाकिस्तान बनवाया जिन्ना वो आजादी के कुछ ही समय बाद मर गए। तो ऐसे में पाकिस्तानी जो हैं वो दिशाहीन हो गए। उन्हें पता ही नहीं था कि हमने देश क्यों बनाया और बनाकर अब इसका क्या करेंगे। इसलिए सेना ने आसानी से उसकी सत्ता को

संभाल लिया। चूंकि पाकिस्तान से ही बांग्लादेश निकला था तो यही हाल बांग्लादेश में होने ही थे। इनकी कोई भी कोई पॉलिटिकल आईडियोलॉजी नहीं थी। वहीं भारत लोकतांत्रिक मांगों के लिए ही बना देश था। भारत में मानव अधिकारों के लिए मूल अधिकारों के लिए संघर्ष हुए थे। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशनंस के लिए संघर्ष हुए थे। इसलिए कभी भी सेना की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने मदद नहीं ली और इसी वजह से आज तक भारत के अंदर सैन्य तख्ता पलट जैसी घटनाएं ना तो सुनी गई हैं और जितना भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत देने वाली संस्थाएं

बनी रहेंगी उतने सालों तक भारत में सेना का शासन नहीं ।



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आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?
आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?
आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

 आज तक हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ क्या कि किसी ने ट्राई किया हो कि चलो तख्ता पलट करके तो देखते हैं। हमारे इसमें बुनियादी रूप तो है लेकिन आजादी के बाद  ऐसा क्या तरीका अपनाया जिससे कि भारत में तख्ता पलट नहीं हुआ और पाकिस्तान हुआ 

नेहरू की शतिर चाल ये ही की नेहरू फौज से हमेशा डरता था। कैसे ? आइए उस पर लेकर मैं आपको चलता हूं। फौज को अलग अलग कर दिया तो अंग्रेजों के समय एक C in C के तहत मैं काम करती थी बातें बताने के लिए बहुत सारी हैं। असल में इन पॉइंट्स का कहीं एक जगह विश्लेषण नहीं मिलता है। आप जब पूरा-पूरा इतिहास उठाकर पढ़ते हैं तब जाकर ये इवॉल्व होकर आती हैं।हमने आपको तख्ता पलट की बातें बताई और मैंने आपको ये भी बताया कि किस प्रकार से भारत में आज जब मैं ये बात बोलता हूं आपसे कि भारत में 1857 में अंग्रेजों ने जो क्रांति देखी,आपको जानकर आश्चर्य होगा आज देश के अंदर 27 रेजीमेंट्स काम कर रही हैं। 27 रेजीमेंट्स में चाहे वो जाट हो, चाहे क्षेत्र के आधार पर हो, आसाम रेजीमेंट हो, पंजाब सिख रेजीमेंट हो, बिहार रेजीमेंट हो, कुमाऊं रेजीमेंट हो, नागा रेजीमेंट हो, गोर्खा रेजीमेंट हो, राजपूत राइफल्स हो सबकी अपनी-अपनी पहचान बनाकर उनके अंदर अपना भाव पैदा कर दिया है। यही कारण है कि इन रेजीमेंट्स के बीच में अभी पिछले कुछ साल पहले भी अहीर रेजीमेंट की मांग उठी थी कि अहीर रेजीमेंट भी होने चाहिए। चमार रेजीमेंट भी भारत के अंदर हुआ करती थी। 1943 से लेकर 46 के बीच में भारत में चमार रेजीमेंट के नाम से भी रेजीमेंट रही है। ये भी एक इतिहास है। जातियों के आधार पर रेजीमेंट्स भारत में गठित की गई थी अंग्रेजों के द्वारा। क्षेत्रीयता के आधार पर उनके अपने प्राइड के आधार पर भारत में रेजीमेंट्स गठित की गई थी। ताकि कभी इनको कोई भड़काने का काम करे तो फिर ये सब लोग एक बिंदु पर ना आ पाए।भारत में सात कमांड हैं। सात कमांड के अलग-अलग कमांडर्स हैं और उनको एक साथ आदेश देने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं रखी गई हैं।अंग्रेजों के जाते ही  उनकी व्यवस्था को जब अपने यहां अपनाया क्योंकि आजादी के बाद वो हमें अपनी सेना तो सौंप गए। लेकिन अब उस सेना को बनाने में हमने क्या तरीका अपनाया 

देश आजाद हुआ पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। फील्ड मार्शल करियप्पा कमांडर इन चीफ हुआ करते थे ब्रिटिशर्स के समय पे।किचनर के टाइम पे तो फील्ड मार्शल करियप्पा बनाए गए। कमांडर इन चीफ बनाए गए। भारत में आज तक दो ही व्यक्ति फाइव स्टार जनरल तक पहुंचे हैं। इनमें से एक करियप्पा साहब हैं और एक  मानकशा साहब हैं। केवल दो ही व्यक्ति फील्ड मार्शल की रैंक तक गए हैं। ये पहले व्यक्ति थे करियप्पा।

इनको यह बात क्यों मतलब ये उपाधि भी क्यों मिली थी? क्योंकि इन्होंने डायरेक्ट एक्शन लिया था पाकिस्तान के ऊपर जब 1948 का पाकिस्तान का संघर्ष पढ़ते हैं। अंग्रेज गए तो भारत को देश की सत्ता सौंप गए। सौंप गए तो सेना सौंप गए। सेना सौंप गए तो हम अपनी सेना को किनसे चलवाएं? सेना को चलवाने के लिए करीप्पा साहब आप सेना चलाएं। करियप्पा साहब और करियप्पा साहब के बाद में जो इनके बाद में दूसरे जो व्यक्ति बने वो थिमैया। थिमैया कौन थे? थल सेना अध्यक्ष थे जो करियप्पा के बाद में आए। अब हुआ क्या? हुआ ये कि जो करियप्पा साहब थे ये कमांडर इन चीफ थे।

नेहरू  ने सबसे पहले जो काम किया कमांडर इन चीफ का पद ही खत्म कर दिया। नेहरू जी की चालाकी देखिए।जो कमांडर इन चीफ का घर होता था। नेहरू जी ने खुद का अपना घर बना लिया।क्योंकि देश में लोकतंत्र आ गया  सेना के शासन की जरूरत क्या है?अंग्रेज तो सेना के माध्यम से और पुलिस के माध्यम से शासन करते थे। क्योंकि लोकतंत्र आ गया है तो कमांडर इन चीफ का जो त्रिमूर्ति भवन है यह मुझे दे दीजिए। पहचाने आजादी के समय क्या तिगड़म बिठाई नेहरू जी ने। हटो भैया आप हटो यहां से। आप अपने हो। देश की आजादी में विश्वास है। आपकी जगह हम रहेंगे साहब इस जगह। बोले ऐसा क्यों? बोले देखिए तीन सेना के तीनों अध्यक्ष होंगे और तीन अध्यक्ष रह कर के उन तीनों अध्यक्ष के ऊपर एक लोकतांत्रिक रूप से चुना हुआ व्यक्ति रक्षा मंत्री होगा। कमांडर इन चीफ की जरूरत क्या है? कमांडर इन चीफ का पद ही नहीं रखा जो अंग्रेजों ने रखा हुआ था। पाकिस्तान वाले यहीं मार खा जाते हैं।  नेहरू ने कदम उठाया तीनों सेनाओं पर राज करने के लिए कोई एक सैनिक का व्यक्ति नहीं चुना। अब आप में से कुछ लोग कहेंगे सर अभी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, चीफ ऑफ नेवी स्टाफ, चीफ ऑफ एयरफील्ड स्टाफ होता है। ये क्या है? आज भी थल सेना अध्यक्ष नौसेना अध्यक्ष होते हैं। लेकिन इन सब में से भी चार तीनों के ऊपर बैठने का जो व्यक्ति बनाया है। जैसे सीडीएस बनाया था अपन ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। कमांडर इन चीफ नहीं। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाया। लेकिन उसकी रैंकिंग उन्हीं जनरल्स के बराबर रखी। वो भी वही फोर स्टार जनरल रखे गए। उनसे यह कहा गया कि आपका काम कोऑर्डिनेशन का है। आप इनके ऊपर नहीं हो। सीडीएस विपिन रावत ने जो उनका पद सजित किया था कमांडर इन चीफ नहीं था वो। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ था। आप सबके ऊपर हैं। आप इनका ऊपर का मतलब कोऑर्डिनेट करेंगे। जनरल रैंक बराबर है। फाइव स्टार तो दो ही थे हमारे यहां पे। सेम मानकशा,करियप्पा। करियप्पा से कमांडर इन चीफ का पद ले लिया और उनको कहा सर आप थल सेना संभालें। आपके अनुभव का लाभ लें और हमें यह पद दें। एक और घटनाक्रम बताता हूं। मतलब कैसे धीरे-धीरे इवॉल्व हुई? नेहरू जी के द्वारा जो कार्य किए गए उनमें से एक 57 का कार्य बड़ा इंटरेस्टिंग है और वो क्या है? एक बार की बात है कि जनरल थिमैया जो हैं वो भारत के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। थैल सेना अध्यक्ष हुआ करते थे। नेहरू जी उनका कार्यालय विजिट करने गए। जब कार्यालय विजिट करने गए तो थिमैया साहब के ऑफिस में पीछे की तरफ एक कैबिनेट लगी हुई। जैसे अपने अलमारी लगी होती है। ऐसे एक स्टील की अलमारी रखी थी बड़ी सिल्वर की सी खूबसूरत सी। उसमें साहब नेहरू जी ने पूछा कि इसमें क्या-क्या रखा है? तो उन्होंने कहा साहब पहली रो में तो रखा हुआ है डिफेंस प्लांस। बोले अच्छा और दूसरी में बोले देश के अंदर क्या स्ट्रेटजी होनी चाहिए वो रखी हुई है? मतलब ये तो आज युद्ध हो जाए तो क्या प्लान है? भविष्य में क्या होने चाहिए? और बोले तीसरा बोले कभी आपके खिलाफ अगर सेना को शासन करना पड़े तो उस समय क्या तरीका अपनाया जाए? आप विचार कीजिए प्रधानमंत्री थिमैया जी के ऑफिस में हैं और थिमैया जी के पीछे जो अलमारी रखी है उसमें इस बात का भी रोड मैप बना हुआ है कि कल को अगर कु करना पड़े सैन्य विद्रोह करना पड़े तो तरीका क्या अपनाया जाए भाई साहब नेहरू जी इस बात को सुन तो लिए एक हल्की सी स्माइल पास करके चले आए ये बड़ा इंटरेस्टिंग वाक्य है और ये रियल स्टोरी है 1957 की द टॉप ड्रायर कंटेन द नेशंस डिफेंस प्लान सेकंड ड्रायर के अंदर रखा है कॉन्फिडेंशियल फाइल्स ऑफ नेशंस टॉप जनरल्स की इनकी कॉन्फिडेंशियल चीजें रखी हैं और थर्ड में रखा हुआ है कि इसमें इस ड्रॉअर

में सीक्रेट प्लान रखा है कि कल को अगर मिलिट्री कू आपके खिलाफ करना पड़े तो कैसे करें।

नेहरू जी ने कहा अच्छा भाई साहब देश में इतना संघर्ष करके लोकतंत्र लाए और सेना को हम शासन दे दें। सेना जो खुद नहीं चाहती वो ये चाहती है कि देश में लोकतंत्र आपको इंटरेस्टिंग बात मैं आपको बताता हूं। जिन-जिन देशों में लोकतंत्र बरकरार है। विशेष रूप से पश्चिमी देशों को आप देखें। वहां पर आज तक सैन्य शासन नहीं आया। भारत इसीलिए दुनिया में सबसे अलग है क्योंकि यहां पर लोकतंत्र मजबूत है

कई ब्रिटिशर्स ये मानना शुरू कर चुके थे कि नेहरू जी चकि उस समय के व्यक्ति हैं जिस समय राष्ट्रीय आंदोलन था तो उन्हें तो पता है देश कैसे चलाना है। लाल बहादुर शास्त्री जी भी जो हैं वो भी नेहरू जी की टीम के थे। तो उन्हें भी पता है। लेकिन जब ये दोनों लोग नहीं रहेंगे तो फिर इंदिरा गांधी जी देश नहीं चला पाएंगी। और इंदिरा गांधी जी देश क्यों नहीं चला पाएंगी? क्योंकि उस समय पर सैम मानक शा जो कि फाइव स्टार जनरल बने, फील्ड मार्शल बने। इनके बारे में ये कहा जाना लग चुका था कि ये सत्ता हटा के इंदिरा जी की और सैन्य तख्ता पलट करेंगे। एक दो जगह पर ऐसे डायलॉग भी मिलते हैं जिस समय पर मिसेज गांधी पूछती हैं। उन्हें बुलाती हैं मानिक शा को और उनसे पूछती हैं कि मैं बड़ी चिंतित हूं और पूछती हूं कि व्हेन आर यू टेकिंग ओवर? मानिक शा से पूछती हैं कि आप कब इस सत्ता को लेने वाले हैं? मानिक शा कहते हैं कि मैडम डरने की जरूरत नहीं है। इस पर एक फिल्म भी बनी हुई है। मतलब यह हद बीच में आई थी क्योंकि ब्रिटिशर्स ने बहुत सारे अंग्रेजों ने कहा कि नेहरू जी के पास तो अनुभव है लंबा चौड़ा औरों को क्या पता कैसे होगा। अच्छा और ये वास्तविकता भी है। क्योंकि 1967 में जब इलेक्शन हुए तो किसी को यह विश्वास नहीं था कि इंदिरा जी चुनाव जीत जाएंगी। और इस विश्वास की कमी के चलते ही प्रेडिक्ट होने लग गया था कि 67 उधर 58 में पाकिस्तान के अंदर सैन्य शासन आ गया और इनके यहां पर अब 67 में सैन्य शासन आ जाएगा। इंदिरा गांधी 44% मत लेकर के विजय घोषित हुई थी। 520 सीटों पर कांग्रेस जीती 283 सीट लेकर आई थी और ये विदेशी लोग देखते रह गए थे। भारत ने इतनी बड़ी पॉलिटिकल सूझबूझ दिखाई थी और ऐसी स्थिति  में हालांकि कांग्रेस बहुत से राज्यों में पिछड़ी जरूर थी लेकिन उसके बावजूद भी सरकार कंटिन्यू रही। अच्छा फिर एक वाक्या और हुआ। सैन्य मामलों में कहा गया कि 1984 में जब इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई थी उससे जस्ट पहले जब स्वर्ण मंदिर पर कारवाई हुई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था तो कहते हैं कुछ सिख सैनिक नाराज हो गए थे सुख सिख सैनिक नाराज हुए क्योंकि भई अल्टीमेटली जो बॉडीगार्ड थे इंदिरा गांधी जी के वो भी सिख धर्मावलंबी थे जिन्होंने उनको गोली मारी थी और दूसरा उससे पहले भी क्योंकि स्वर्ण मंदिर काफी प्रतिष्ठित और


पूजनीय स्थान है उसमें सेना कैसे एंट्री कर गई इससे बहुत सारे सिख नाराज थे लेकिन भारत में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी थी सेना के अंदर कि यह बात आईडिया में भले ही आई हो एग्जीक्यूट नहीं हो पाई। मैंने आपसे क्या कहा? 1857 से ही अंग्रेज सबक लेकर के भारत में जाट रेजीमेंट, राजपूत राइफल्स, राजपूत बटालियन, असम राइफल, असम बटालियंस है ना गोर्खा रेजीमेंट इतनी तरह की रेजीमेंट बना गए। बिहार रेजीमेंट, झारखंड रेजीमेंट, बंगाल रेजीमेंट इतनी रेजीमेंट बनाकर चले गए कि सबकी अपनी-अपनी पहचान और अपनी-अपनी प्राण प्रतिष्ठा थी कि नहीं


साहब हम तो अपने लिए हैं। इसलिए भारत में ऐसा नहीं हो पाया। 84 का मामला भी निकल गया। 2012 के अंदर जब नेमा मनमोहन सिंह जी की सरकार थी उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी और लिखा कि जनवरी की एक रात को भारत में तख्तापलट होने वाला था। और जनरल वीके सिंह उस समय वो हुआ करते थे। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। बोले इनके नेतृत्व में भारत के अंदर तख्तापलट होने की तैयारी हो रही थी। ये 2012 का लेटेस्ट मामला है जिस समय सबसे ज्यादा ये मामला उठा था कि साहब ऐसा कुछ हुआ था। द संजय गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने


कथित तख्ता पलट की खबरों पर कारवाई करने के लिए। मतलब ये घटना कुछ इस तरह से हुई थी। मैं पहले आपको घटना बताता हूं। हुआ कुछ यूं था कि ये पॉडकास्ट में वी के सिंह ने साहब ने ये बात बोली भी है कि कैसे-कैसे हुआ था ये काम। कहते हैं मैं लिख कर के लाया था। आगरा से जो सेना है ना वो चला दी गई थी। बिना पुलिस को बताए हुए कि साहब हम लोग मूव बिना सरकार को बताए हुए हां 2012 की बात है जनवरी 2012 की 33वीं आर्मड डिवीजन की एक टुकड़ी जो हिसार में तैनात थी वो दिल्ली की तरफ चल पड़ी। मैकेनाइज्ड इनफेंट्री की एक पूरी यूनिट मोबिलाइज की गई जो अपने साथ 40 से ज्यादा टैंक ट्रांसपोर्टर लेकर चल रही थी। इसके तुरंत बाद आगरा में तैनात 50वीं पैरा ब्रिगेड की एक यूनिट भी दिल्ली की तरफ भेज दी गई। कहते हैं कि इन दोनों मूवमेंट का भारत सरकार को आईडिया नहीं था। और मनमोहन सिंह जी ने अपने आईबी के अधिकारियों को बुलाकर आईबी जो खुफिया जांच करती है उनको बुलाकर पूछा था कि क्या इस बात में सच्चाई है कि सेना तख्ता पलट करने आ रही है? तो उन्होंने कहा नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल एक रमर उड़ाया गया है। कुछ खुफिया लोगों ने इस तरह की बातें अखबार में छपवा दी हैं। इसका कोई तर्क नहीं है। इस बारे में जब पॉडकास्ट के अंदर स्मिता प्रकाश जी के पॉडकास्ट में पूछा गया था वी के सिंह साहब से तो इन्होंने कहा कि भारत में यह संभव ही नहीं है। क्योंकि भारत के अंदर सात कमान हैं और सात कमान एक जनरल के साथ एक साथ आदेश मानने के लिए पूरी प्रक्रिया है कि वो कब किस आदेश को मानेंगे। कहने का मतलब ये हुआ कि लेटेस्ट उदाहरण 2012 का कोट किया जाता है कि ऐसा हुआ होगा। तो उम्मीद है कि अब आपको भारत के इतिहास के निर्माण से लेकर आज तक के अंदर जो भी गतिविधियां हुई और भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ वो सारी बातों का एक लमसम आईडिया लग गया होगा। पाकिस्तान में ऐसा क्यों हुआ उसका भी आईडिया लग गया होगा। वस्तुतः आप तक यह कंक्लूड करने में कामयाब हो गए होंगे कि भारत के राजनीतिक पार्टियां सेना से ज्यादा पुरानी और मैच्योर हैं। साथ ही साथ भारत के अंदर सेना में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी है कि वो सब अपनी-अपनी अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करती है। साथ ही साथ वो नेशनल प्राइड को पूरा करती है। वहीं पाकिस्तान जो कि आजादी के बाद अपने आप को एक मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया।मुस्लिम राष्ट्र घोषित करके उनकी एक ही धार्मिक आइडेंटिटी रह गई और उस धार्मिक आइडेंटिटी के साथ एक ही क्षेत्र के अंदर चूंकि एक क्षेत्र की सेना ही सीमित थी। पंजाब रेजीमेंट के मैक्सिमम लोग उनके साथ चले गए थे और चूंकि पाकिस्तान की मांग ज्यादा पुरानी नहीं थी और दुर्भाग्यवश जब पाकिस्तान बना तो उनके जो अब्बा थे जिन्होंने पाकिस्तान बनवाया जिन्ना वो आजादी के कुछ ही समय बाद मर गए। तो ऐसे में पाकिस्तानी जो हैं वो दिशाहीन हो गए। उन्हें पता ही नहीं था कि हमने देश क्यों बनाया और बनाकर अब इसका क्या करेंगे। इसलिए सेना ने आसानी से उसकी सत्ता को

संभाल लिया। चूंकि पाकिस्तान से ही बांग्लादेश निकला था तो यही हाल बांग्लादेश में होने ही थे। इनकी कोई भी कोई पॉलिटिकल आईडियोलॉजी नहीं थी। वहीं भारत लोकतांत्रिक मांगों के लिए ही बना देश था। भारत में मानव अधिकारों के लिए मूल अधिकारों के लिए संघर्ष हुए थे। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशनंस के लिए संघर्ष हुए थे। इसलिए कभी भी सेना की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने मदद नहीं ली और इसी वजह से आज तक भारत के अंदर सैन्य तख्ता पलट जैसी घटनाएं ना तो सुनी गई हैं और जितना भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत देने वाली संस्थाएं

बनी रहेंगी उतने सालों तक भारत में सेना का शासन नहीं ।



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आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?
आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

 आज तक हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ क्या कि किसी ने ट्राई किया हो कि चलो तख्ता पलट करके तो देखते हैं। हमारे इसमें बुनियादी रूप तो है लेकिन आजादी के बाद  ऐसा क्या तरीका अपनाया जिससे कि भारत में तख्ता पलट नहीं हुआ और पाकिस्तान हुआ 

नेहरू की शतिर चाल ये ही की नेहरू फौज से हमेशा डरता था। कैसे ? आइए उस पर लेकर मैं आपको चलता हूं। फौज को अलग अलग कर दिया तो अंग्रेजों के समय एक C in C के तहत मैं काम करती थी बातें बताने के लिए बहुत सारी हैं। असल में इन पॉइंट्स का कहीं एक जगह विश्लेषण नहीं मिलता है। आप जब पूरा-पूरा इतिहास उठाकर पढ़ते हैं तब जाकर ये इवॉल्व होकर आती हैं।हमने आपको तख्ता पलट की बातें बताई और मैंने आपको ये भी बताया कि किस प्रकार से भारत में आज जब मैं ये बात बोलता हूं आपसे कि भारत में 1857 में अंग्रेजों ने जो क्रांति देखी,आपको जानकर आश्चर्य होगा आज देश के अंदर 27 रेजीमेंट्स काम कर रही हैं। 27 रेजीमेंट्स में चाहे वो जाट हो, चाहे क्षेत्र के आधार पर हो, आसाम रेजीमेंट हो, पंजाब सिख रेजीमेंट हो, बिहार रेजीमेंट हो, कुमाऊं रेजीमेंट हो, नागा रेजीमेंट हो, गोर्खा रेजीमेंट हो, राजपूत राइफल्स हो सबकी अपनी-अपनी पहचान बनाकर उनके अंदर अपना भाव पैदा कर दिया है। यही कारण है कि इन रेजीमेंट्स के बीच में अभी पिछले कुछ साल पहले भी अहीर रेजीमेंट की मांग उठी थी कि अहीर रेजीमेंट भी होने चाहिए। चमार रेजीमेंट भी भारत के अंदर हुआ करती थी। 1943 से लेकर 46 के बीच में भारत में चमार रेजीमेंट के नाम से भी रेजीमेंट रही है। ये भी एक इतिहास है। जातियों के आधार पर रेजीमेंट्स भारत में गठित की गई थी अंग्रेजों के द्वारा। क्षेत्रीयता के आधार पर उनके अपने प्राइड के आधार पर भारत में रेजीमेंट्स गठित की गई थी। ताकि कभी इनको कोई भड़काने का काम करे तो फिर ये सब लोग एक बिंदु पर ना आ पाए।भारत में सात कमांड हैं। सात कमांड के अलग-अलग कमांडर्स हैं और उनको एक साथ आदेश देने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं रखी गई हैं।अंग्रेजों के जाते ही  उनकी व्यवस्था को जब अपने यहां अपनाया क्योंकि आजादी के बाद वो हमें अपनी सेना तो सौंप गए। लेकिन अब उस सेना को बनाने में हमने क्या तरीका अपनाया 

देश आजाद हुआ पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। फील्ड मार्शल करियप्पा कमांडर इन चीफ हुआ करते थे ब्रिटिशर्स के समय पे।किचनर के टाइम पे तो फील्ड मार्शल करियप्पा बनाए गए। कमांडर इन चीफ बनाए गए। भारत में आज तक दो ही व्यक्ति फाइव स्टार जनरल तक पहुंचे हैं। इनमें से एक करियप्पा साहब हैं और एक  मानकशा साहब हैं। केवल दो ही व्यक्ति फील्ड मार्शल की रैंक तक गए हैं। ये पहले व्यक्ति थे करियप्पा।

इनको यह बात क्यों मतलब ये उपाधि भी क्यों मिली थी? क्योंकि इन्होंने डायरेक्ट एक्शन लिया था पाकिस्तान के ऊपर जब 1948 का पाकिस्तान का संघर्ष पढ़ते हैं। अंग्रेज गए तो भारत को देश की सत्ता सौंप गए। सौंप गए तो सेना सौंप गए। सेना सौंप गए तो हम अपनी सेना को किनसे चलवाएं? सेना को चलवाने के लिए करीप्पा साहब आप सेना चलाएं। करियप्पा साहब और करियप्पा साहब के बाद में जो इनके बाद में दूसरे जो व्यक्ति बने वो थिमैया। थिमैया कौन थे? थल सेना अध्यक्ष थे जो करियप्पा के बाद में आए। अब हुआ क्या? हुआ ये कि जो करियप्पा साहब थे ये कमांडर इन चीफ थे।

नेहरू  ने सबसे पहले जो काम किया कमांडर इन चीफ का पद ही खत्म कर दिया। नेहरू जी की चालाकी देखिए।जो कमांडर इन चीफ का घर होता था। नेहरू जी ने खुद का अपना घर बना लिया।क्योंकि देश में लोकतंत्र आ गया  सेना के शासन की जरूरत क्या है?अंग्रेज तो सेना के माध्यम से और पुलिस के माध्यम से शासन करते थे। क्योंकि लोकतंत्र आ गया है तो कमांडर इन चीफ का जो त्रिमूर्ति भवन है यह मुझे दे दीजिए। पहचाने आजादी के समय क्या तिगड़म बिठाई नेहरू जी ने। हटो भैया आप हटो यहां से। आप अपने हो। देश की आजादी में विश्वास है। आपकी जगह हम रहेंगे साहब इस जगह। बोले ऐसा क्यों? बोले देखिए तीन सेना के तीनों अध्यक्ष होंगे और तीन अध्यक्ष रह कर के उन तीनों अध्यक्ष के ऊपर एक लोकतांत्रिक रूप से चुना हुआ व्यक्ति रक्षा मंत्री होगा। कमांडर इन चीफ की जरूरत क्या है? कमांडर इन चीफ का पद ही नहीं रखा जो अंग्रेजों ने रखा हुआ था। पाकिस्तान वाले यहीं मार खा जाते हैं।  नेहरू ने कदम उठाया तीनों सेनाओं पर राज करने के लिए कोई एक सैनिक का व्यक्ति नहीं चुना। अब आप में से कुछ लोग कहेंगे सर अभी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, चीफ ऑफ नेवी स्टाफ, चीफ ऑफ एयरफील्ड स्टाफ होता है। ये क्या है? आज भी थल सेना अध्यक्ष नौसेना अध्यक्ष होते हैं। लेकिन इन सब में से भी चार तीनों के ऊपर बैठने का जो व्यक्ति बनाया है। जैसे सीडीएस बनाया था अपन ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। कमांडर इन चीफ नहीं। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाया। लेकिन उसकी रैंकिंग उन्हीं जनरल्स के बराबर रखी। वो भी वही फोर स्टार जनरल रखे गए। उनसे यह कहा गया कि आपका काम कोऑर्डिनेशन का है। आप इनके ऊपर नहीं हो। सीडीएस विपिन रावत ने जो उनका पद सजित किया था कमांडर इन चीफ नहीं था वो। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ था। आप सबके ऊपर हैं। आप इनका ऊपर का मतलब कोऑर्डिनेट करेंगे। जनरल रैंक बराबर है। फाइव स्टार तो दो ही थे हमारे यहां पे। सेम मानकशा,करियप्पा। करियप्पा से कमांडर इन चीफ का पद ले लिया और उनको कहा सर आप थल सेना संभालें। आपके अनुभव का लाभ लें और हमें यह पद दें। एक और घटनाक्रम बताता हूं। मतलब कैसे धीरे-धीरे इवॉल्व हुई? नेहरू जी के द्वारा जो कार्य किए गए उनमें से एक 57 का कार्य बड़ा इंटरेस्टिंग है और वो क्या है? एक बार की बात है कि जनरल थिमैया जो हैं वो भारत के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। थैल सेना अध्यक्ष हुआ करते थे। नेहरू जी उनका कार्यालय विजिट करने गए। जब कार्यालय विजिट करने गए तो थिमैया साहब के ऑफिस में पीछे की तरफ एक कैबिनेट लगी हुई। जैसे अपने अलमारी लगी होती है। ऐसे एक स्टील की अलमारी रखी थी बड़ी सिल्वर की सी खूबसूरत सी। उसमें साहब नेहरू जी ने पूछा कि इसमें क्या-क्या रखा है? तो उन्होंने कहा साहब पहली रो में तो रखा हुआ है डिफेंस प्लांस। बोले अच्छा और दूसरी में बोले देश के अंदर क्या स्ट्रेटजी होनी चाहिए वो रखी हुई है? मतलब ये तो आज युद्ध हो जाए तो क्या प्लान है? भविष्य में क्या होने चाहिए? और बोले तीसरा बोले कभी आपके खिलाफ अगर सेना को शासन करना पड़े तो उस समय क्या तरीका अपनाया जाए? आप विचार कीजिए प्रधानमंत्री थिमैया जी के ऑफिस में हैं और थिमैया जी के पीछे जो अलमारी रखी है उसमें इस बात का भी रोड मैप बना हुआ है कि कल को अगर कु करना पड़े सैन्य विद्रोह करना पड़े तो तरीका क्या अपनाया जाए भाई साहब नेहरू जी इस बात को सुन तो लिए एक हल्की सी स्माइल पास करके चले आए ये बड़ा इंटरेस्टिंग वाक्य है और ये रियल स्टोरी है 1957 की द टॉप ड्रायर कंटेन द नेशंस डिफेंस प्लान सेकंड ड्रायर के अंदर रखा है कॉन्फिडेंशियल फाइल्स ऑफ नेशंस टॉप जनरल्स की इनकी कॉन्फिडेंशियल चीजें रखी हैं और थर्ड में रखा हुआ है कि इसमें इस ड्रॉअर

में सीक्रेट प्लान रखा है कि कल को अगर मिलिट्री कू आपके खिलाफ करना पड़े तो कैसे करें।

नेहरू जी ने कहा अच्छा भाई साहब देश में इतना संघर्ष करके लोकतंत्र लाए और सेना को हम शासन दे दें। सेना जो खुद नहीं चाहती वो ये चाहती है कि देश में लोकतंत्र आपको इंटरेस्टिंग बात मैं आपको बताता हूं। जिन-जिन देशों में लोकतंत्र बरकरार है। विशेष रूप से पश्चिमी देशों को आप देखें। वहां पर आज तक सैन्य शासन नहीं आया। भारत इसीलिए दुनिया में सबसे अलग है क्योंकि यहां पर लोकतंत्र मजबूत है

कई ब्रिटिशर्स ये मानना शुरू कर चुके थे कि नेहरू जी चकि उस समय के व्यक्ति हैं जिस समय राष्ट्रीय आंदोलन था तो उन्हें तो पता है देश कैसे चलाना है। लाल बहादुर शास्त्री जी भी जो हैं वो भी नेहरू जी की टीम के थे। तो उन्हें भी पता है। लेकिन जब ये दोनों लोग नहीं रहेंगे तो फिर इंदिरा गांधी जी देश नहीं चला पाएंगी। और इंदिरा गांधी जी देश क्यों नहीं चला पाएंगी? क्योंकि उस समय पर सैम मानक शा जो कि फाइव स्टार जनरल बने, फील्ड मार्शल बने। इनके बारे में ये कहा जाना लग चुका था कि ये सत्ता हटा के इंदिरा जी की और सैन्य तख्ता पलट करेंगे। एक दो जगह पर ऐसे डायलॉग भी मिलते हैं जिस समय पर मिसेज गांधी पूछती हैं। उन्हें बुलाती हैं मानिक शा को और उनसे पूछती हैं कि मैं बड़ी चिंतित हूं और पूछती हूं कि व्हेन आर यू टेकिंग ओवर? मानिक शा से पूछती हैं कि आप कब इस सत्ता को लेने वाले हैं? मानिक शा कहते हैं कि मैडम डरने की जरूरत नहीं है। इस पर एक फिल्म भी बनी हुई है। मतलब यह हद बीच में आई थी क्योंकि ब्रिटिशर्स ने बहुत सारे अंग्रेजों ने कहा कि नेहरू जी के पास तो अनुभव है लंबा चौड़ा औरों को क्या पता कैसे होगा। अच्छा और ये वास्तविकता भी है। क्योंकि 1967 में जब इलेक्शन हुए तो किसी को यह विश्वास नहीं था कि इंदिरा जी चुनाव जीत जाएंगी। और इस विश्वास की कमी के चलते ही प्रेडिक्ट होने लग गया था कि 67 उधर 58 में पाकिस्तान के अंदर सैन्य शासन आ गया और इनके यहां पर अब 67 में सैन्य शासन आ जाएगा। इंदिरा गांधी 44% मत लेकर के विजय घोषित हुई थी। 520 सीटों पर कांग्रेस जीती 283 सीट लेकर आई थी और ये विदेशी लोग देखते रह गए थे। भारत ने इतनी बड़ी पॉलिटिकल सूझबूझ दिखाई थी और ऐसी स्थिति  में हालांकि कांग्रेस बहुत से राज्यों में पिछड़ी जरूर थी लेकिन उसके बावजूद भी सरकार कंटिन्यू रही। अच्छा फिर एक वाक्या और हुआ। सैन्य मामलों में कहा गया कि 1984 में जब इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई थी उससे जस्ट पहले जब स्वर्ण मंदिर पर कारवाई हुई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था तो कहते हैं कुछ सिख सैनिक नाराज हो गए थे सुख सिख सैनिक नाराज हुए क्योंकि भई अल्टीमेटली जो बॉडीगार्ड थे इंदिरा गांधी जी के वो भी सिख धर्मावलंबी थे जिन्होंने उनको गोली मारी थी और दूसरा उससे पहले भी क्योंकि स्वर्ण मंदिर काफी प्रतिष्ठित और


पूजनीय स्थान है उसमें सेना कैसे एंट्री कर गई इससे बहुत सारे सिख नाराज थे लेकिन भारत में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी थी सेना के अंदर कि यह बात आईडिया में भले ही आई हो एग्जीक्यूट नहीं हो पाई। मैंने आपसे क्या कहा? 1857 से ही अंग्रेज सबक लेकर के भारत में जाट रेजीमेंट, राजपूत राइफल्स, राजपूत बटालियन, असम राइफल, असम बटालियंस है ना गोर्खा रेजीमेंट इतनी तरह की रेजीमेंट बना गए। बिहार रेजीमेंट, झारखंड रेजीमेंट, बंगाल रेजीमेंट इतनी रेजीमेंट बनाकर चले गए कि सबकी अपनी-अपनी पहचान और अपनी-अपनी प्राण प्रतिष्ठा थी कि नहीं


साहब हम तो अपने लिए हैं। इसलिए भारत में ऐसा नहीं हो पाया। 84 का मामला भी निकल गया। 2012 के अंदर जब नेमा मनमोहन सिंह जी की सरकार थी उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी और लिखा कि जनवरी की एक रात को भारत में तख्तापलट होने वाला था। और जनरल वीके सिंह उस समय वो हुआ करते थे। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। बोले इनके नेतृत्व में भारत के अंदर तख्तापलट होने की तैयारी हो रही थी। ये 2012 का लेटेस्ट मामला है जिस समय सबसे ज्यादा ये मामला उठा था कि साहब ऐसा कुछ हुआ था। द संजय गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने


कथित तख्ता पलट की खबरों पर कारवाई करने के लिए। मतलब ये घटना कुछ इस तरह से हुई थी। मैं पहले आपको घटना बताता हूं। हुआ कुछ यूं था कि ये पॉडकास्ट में वी के सिंह ने साहब ने ये बात बोली भी है कि कैसे-कैसे हुआ था ये काम। कहते हैं मैं लिख कर के लाया था। आगरा से जो सेना है ना वो चला दी गई थी। बिना पुलिस को बताए हुए कि साहब हम लोग मूव बिना सरकार को बताए हुए हां 2012 की बात है जनवरी 2012 की 33वीं आर्मड डिवीजन की एक टुकड़ी जो हिसार में तैनात थी वो दिल्ली की तरफ चल पड़ी। मैकेनाइज्ड इनफेंट्री की एक पूरी यूनिट मोबिलाइज की गई जो अपने साथ 40 से ज्यादा टैंक ट्रांसपोर्टर लेकर चल रही थी। इसके तुरंत बाद आगरा में तैनात 50वीं पैरा ब्रिगेड की एक यूनिट भी दिल्ली की तरफ भेज दी गई। कहते हैं कि इन दोनों मूवमेंट का भारत सरकार को आईडिया नहीं था। और मनमोहन सिंह जी ने अपने आईबी के अधिकारियों को बुलाकर आईबी जो खुफिया जांच करती है उनको बुलाकर पूछा था कि क्या इस बात में सच्चाई है कि सेना तख्ता पलट करने आ रही है? तो उन्होंने कहा नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल एक रमर उड़ाया गया है। कुछ खुफिया लोगों ने इस तरह की बातें अखबार में छपवा दी हैं। इसका कोई तर्क नहीं है। इस बारे में जब पॉडकास्ट के अंदर स्मिता प्रकाश जी के पॉडकास्ट में पूछा गया था वी के सिंह साहब से तो इन्होंने कहा कि भारत में यह संभव ही नहीं है। क्योंकि भारत के अंदर सात कमान हैं और सात कमान एक जनरल के साथ एक साथ आदेश मानने के लिए पूरी प्रक्रिया है कि वो कब किस आदेश को मानेंगे। कहने का मतलब ये हुआ कि लेटेस्ट उदाहरण 2012 का कोट किया जाता है कि ऐसा हुआ होगा। तो उम्मीद है कि अब आपको भारत के इतिहास के निर्माण से लेकर आज तक के अंदर जो भी गतिविधियां हुई और भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ वो सारी बातों का एक लमसम आईडिया लग गया होगा। पाकिस्तान में ऐसा क्यों हुआ उसका भी आईडिया लग गया होगा। वस्तुतः आप तक यह कंक्लूड करने में कामयाब हो गए होंगे कि भारत के राजनीतिक पार्टियां सेना से ज्यादा पुरानी और मैच्योर हैं। साथ ही साथ भारत के अंदर सेना में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी है कि वो सब अपनी-अपनी अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करती है। साथ ही साथ वो नेशनल प्राइड को पूरा करती है। वहीं पाकिस्तान जो कि आजादी के बाद अपने आप को एक मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया।मुस्लिम राष्ट्र घोषित करके उनकी एक ही धार्मिक आइडेंटिटी रह गई और उस धार्मिक आइडेंटिटी के साथ एक ही क्षेत्र के अंदर चूंकि एक क्षेत्र की सेना ही सीमित थी। पंजाब रेजीमेंट के मैक्सिमम लोग उनके साथ चले गए थे और चूंकि पाकिस्तान की मांग ज्यादा पुरानी नहीं थी और दुर्भाग्यवश जब पाकिस्तान बना तो उनके जो अब्बा थे जिन्होंने पाकिस्तान बनवाया जिन्ना वो आजादी के कुछ ही समय बाद मर गए। तो ऐसे में पाकिस्तानी जो हैं वो दिशाहीन हो गए। उन्हें पता ही नहीं था कि हमने देश क्यों बनाया और बनाकर अब इसका क्या करेंगे। इसलिए सेना ने आसानी से उसकी सत्ता को

संभाल लिया। चूंकि पाकिस्तान से ही बांग्लादेश निकला था तो यही हाल बांग्लादेश में होने ही थे। इनकी कोई भी कोई पॉलिटिकल आईडियोलॉजी नहीं थी। वहीं भारत लोकतांत्रिक मांगों के लिए ही बना देश था। भारत में मानव अधिकारों के लिए मूल अधिकारों के लिए संघर्ष हुए थे। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशनंस के लिए संघर्ष हुए थे। इसलिए कभी भी सेना की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने मदद नहीं ली और इसी वजह से आज तक भारत के अंदर सैन्य तख्ता पलट जैसी घटनाएं ना तो सुनी गई हैं और जितना भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत देने वाली संस्थाएं

बनी रहेंगी उतने सालों तक भारत में सेना का शासन नहीं ।



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आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

 आज तक हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ क्या कि किसी ने ट्राई किया हो कि चलो तख्ता पलट करके तो देखते हैं। हमारे इसमें बुनियादी रूप तो है लेकिन आजादी के बाद  ऐसा क्या तरीका अपनाया जिससे कि भारत में तख्ता पलट नहीं हुआ और पाकिस्तान हुआ 

नेहरू की शतिर चाल ये ही की नेहरू फौज से हमेशा डरता था। कैसे ? आइए उस पर लेकर मैं आपको चलता हूं। फौज को अलग अलग कर दिया तो अंग्रेजों के समय एक C in C के तहत मैं काम करती थी बातें बताने के लिए बहुत सारी हैं। असल में इन पॉइंट्स का कहीं एक जगह विश्लेषण नहीं मिलता है। आप जब पूरा-पूरा इतिहास उठाकर पढ़ते हैं तब जाकर ये इवॉल्व होकर आती हैं।हमने आपको तख्ता पलट की बातें बताई और मैंने आपको ये भी बताया कि किस प्रकार से भारत में आज जब मैं ये बात बोलता हूं आपसे कि भारत में 1857 में अंग्रेजों ने जो क्रांति देखी,आपको जानकर आश्चर्य होगा आज देश के अंदर 27 रेजीमेंट्स काम कर रही हैं। 27 रेजीमेंट्स में चाहे वो जाट हो, चाहे क्षेत्र के आधार पर हो, आसाम रेजीमेंट हो, पंजाब सिख रेजीमेंट हो, बिहार रेजीमेंट हो, कुमाऊं रेजीमेंट हो, नागा रेजीमेंट हो, गोर्खा रेजीमेंट हो, राजपूत राइफल्स हो सबकी अपनी-अपनी पहचान बनाकर उनके अंदर अपना भाव पैदा कर दिया है। यही कारण है कि इन रेजीमेंट्स के बीच में अभी पिछले कुछ साल पहले भी अहीर रेजीमेंट की मांग उठी थी कि अहीर रेजीमेंट भी होने चाहिए। चमार रेजीमेंट भी भारत के अंदर हुआ करती थी। 1943 से लेकर 46 के बीच में भारत में चमार रेजीमेंट के नाम से भी रेजीमेंट रही है। ये भी एक इतिहास है। जातियों के आधार पर रेजीमेंट्स भारत में गठित की गई थी अंग्रेजों के द्वारा। क्षेत्रीयता के आधार पर उनके अपने प्राइड के आधार पर भारत में रेजीमेंट्स गठित की गई थी। ताकि कभी इनको कोई भड़काने का काम करे तो फिर ये सब लोग एक बिंदु पर ना आ पाए।भारत में सात कमांड हैं। सात कमांड के अलग-अलग कमांडर्स हैं और उनको एक साथ आदेश देने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं रखी गई हैं।अंग्रेजों के जाते ही  उनकी व्यवस्था को जब अपने यहां अपनाया क्योंकि आजादी के बाद वो हमें अपनी सेना तो सौंप गए। लेकिन अब उस सेना को बनाने में हमने क्या तरीका अपनाया 

देश आजाद हुआ पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। फील्ड मार्शल करियप्पा कमांडर इन चीफ हुआ करते थे ब्रिटिशर्स के समय पे।किचनर के टाइम पे तो फील्ड मार्शल करियप्पा बनाए गए। कमांडर इन चीफ बनाए गए। भारत में आज तक दो ही व्यक्ति फाइव स्टार जनरल तक पहुंचे हैं। इनमें से एक करियप्पा साहब हैं और एक  मानकशा साहब हैं। केवल दो ही व्यक्ति फील्ड मार्शल की रैंक तक गए हैं। ये पहले व्यक्ति थे करियप्पा।

इनको यह बात क्यों मतलब ये उपाधि भी क्यों मिली थी? क्योंकि इन्होंने डायरेक्ट एक्शन लिया था पाकिस्तान के ऊपर जब 1948 का पाकिस्तान का संघर्ष पढ़ते हैं। अंग्रेज गए तो भारत को देश की सत्ता सौंप गए। सौंप गए तो सेना सौंप गए। सेना सौंप गए तो हम अपनी सेना को किनसे चलवाएं? सेना को चलवाने के लिए करीप्पा साहब आप सेना चलाएं। करियप्पा साहब और करियप्पा साहब के बाद में जो इनके बाद में दूसरे जो व्यक्ति बने वो थिमैया। थिमैया कौन थे? थल सेना अध्यक्ष थे जो करियप्पा के बाद में आए। अब हुआ क्या? हुआ ये कि जो करियप्पा साहब थे ये कमांडर इन चीफ थे।

नेहरू  ने सबसे पहले जो काम किया कमांडर इन चीफ का पद ही खत्म कर दिया। नेहरू जी की चालाकी देखिए।जो कमांडर इन चीफ का घर होता था। नेहरू जी ने खुद का अपना घर बना लिया।क्योंकि देश में लोकतंत्र आ गया  सेना के शासन की जरूरत क्या है?अंग्रेज तो सेना के माध्यम से और पुलिस के माध्यम से शासन करते थे। क्योंकि लोकतंत्र आ गया है तो कमांडर इन चीफ का जो त्रिमूर्ति भवन है यह मुझे दे दीजिए। पहचाने आजादी के समय क्या तिगड़म बिठाई नेहरू जी ने। हटो भैया आप हटो यहां से। आप अपने हो। देश की आजादी में विश्वास है। आपकी जगह हम रहेंगे साहब इस जगह। बोले ऐसा क्यों? बोले देखिए तीन सेना के तीनों अध्यक्ष होंगे और तीन अध्यक्ष रह कर के उन तीनों अध्यक्ष के ऊपर एक लोकतांत्रिक रूप से चुना हुआ व्यक्ति रक्षा मंत्री होगा। कमांडर इन चीफ की जरूरत क्या है? कमांडर इन चीफ का पद ही नहीं रखा जो अंग्रेजों ने रखा हुआ था। पाकिस्तान वाले यहीं मार खा जाते हैं।  नेहरू ने कदम उठाया तीनों सेनाओं पर राज करने के लिए कोई एक सैनिक का व्यक्ति नहीं चुना। अब आप में से कुछ लोग कहेंगे सर अभी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, चीफ ऑफ नेवी स्टाफ, चीफ ऑफ एयरफील्ड स्टाफ होता है। ये क्या है? आज भी थल सेना अध्यक्ष नौसेना अध्यक्ष होते हैं। लेकिन इन सब में से भी चार तीनों के ऊपर बैठने का जो व्यक्ति बनाया है। जैसे सीडीएस बनाया था अपन ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। कमांडर इन चीफ नहीं। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाया। लेकिन उसकी रैंकिंग उन्हीं जनरल्स के बराबर रखी। वो भी वही फोर स्टार जनरल रखे गए। उनसे यह कहा गया कि आपका काम कोऑर्डिनेशन का है। आप इनके ऊपर नहीं हो। सीडीएस विपिन रावत ने जो उनका पद सजित किया था कमांडर इन चीफ नहीं था वो। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ था। आप सबके ऊपर हैं। आप इनका ऊपर का मतलब कोऑर्डिनेट करेंगे। जनरल रैंक बराबर है। फाइव स्टार तो दो ही थे हमारे यहां पे। सेम मानकशा,करियप्पा। करियप्पा से कमांडर इन चीफ का पद ले लिया और उनको कहा सर आप थल सेना संभालें। आपके अनुभव का लाभ लें और हमें यह पद दें। एक और घटनाक्रम बताता हूं। मतलब कैसे धीरे-धीरे इवॉल्व हुई? नेहरू जी के द्वारा जो कार्य किए गए उनमें से एक 57 का कार्य बड़ा इंटरेस्टिंग है और वो क्या है? एक बार की बात है कि जनरल थिमैया जो हैं वो भारत के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। थैल सेना अध्यक्ष हुआ करते थे। नेहरू जी उनका कार्यालय विजिट करने गए। जब कार्यालय विजिट करने गए तो थिमैया साहब के ऑफिस में पीछे की तरफ एक कैबिनेट लगी हुई। जैसे अपने अलमारी लगी होती है। ऐसे एक स्टील की अलमारी रखी थी बड़ी सिल्वर की सी खूबसूरत सी। उसमें साहब नेहरू जी ने पूछा कि इसमें क्या-क्या रखा है? तो उन्होंने कहा साहब पहली रो में तो रखा हुआ है डिफेंस प्लांस। बोले अच्छा और दूसरी में बोले देश के अंदर क्या स्ट्रेटजी होनी चाहिए वो रखी हुई है? मतलब ये तो आज युद्ध हो जाए तो क्या प्लान है? भविष्य में क्या होने चाहिए? और बोले तीसरा बोले कभी आपके खिलाफ अगर सेना को शासन करना पड़े तो उस समय क्या तरीका अपनाया जाए? आप विचार कीजिए प्रधानमंत्री थिमैया जी के ऑफिस में हैं और थिमैया जी के पीछे जो अलमारी रखी है उसमें इस बात का भी रोड मैप बना हुआ है कि कल को अगर कु करना पड़े सैन्य विद्रोह करना पड़े तो तरीका क्या अपनाया जाए भाई साहब नेहरू जी इस बात को सुन तो लिए एक हल्की सी स्माइल पास करके चले आए ये बड़ा इंटरेस्टिंग वाक्य है और ये रियल स्टोरी है 1957 की द टॉप ड्रायर कंटेन द नेशंस डिफेंस प्लान सेकंड ड्रायर के अंदर रखा है कॉन्फिडेंशियल फाइल्स ऑफ नेशंस टॉप जनरल्स की इनकी कॉन्फिडेंशियल चीजें रखी हैं और थर्ड में रखा हुआ है कि इसमें इस ड्रॉअर

में सीक्रेट प्लान रखा है कि कल को अगर मिलिट्री कू आपके खिलाफ करना पड़े तो कैसे करें।

नेहरू जी ने कहा अच्छा भाई साहब देश में इतना संघर्ष करके लोकतंत्र लाए और सेना को हम शासन दे दें। सेना जो खुद नहीं चाहती वो ये चाहती है कि देश में लोकतंत्र आपको इंटरेस्टिंग बात मैं आपको बताता हूं। जिन-जिन देशों में लोकतंत्र बरकरार है। विशेष रूप से पश्चिमी देशों को आप देखें। वहां पर आज तक सैन्य शासन नहीं आया। भारत इसीलिए दुनिया में सबसे अलग है क्योंकि यहां पर लोकतंत्र मजबूत है

कई ब्रिटिशर्स ये मानना शुरू कर चुके थे कि नेहरू जी चकि उस समय के व्यक्ति हैं जिस समय राष्ट्रीय आंदोलन था तो उन्हें तो पता है देश कैसे चलाना है। लाल बहादुर शास्त्री जी भी जो हैं वो भी नेहरू जी की टीम के थे। तो उन्हें भी पता है। लेकिन जब ये दोनों लोग नहीं रहेंगे तो फिर इंदिरा गांधी जी देश नहीं चला पाएंगी। और इंदिरा गांधी जी देश क्यों नहीं चला पाएंगी? क्योंकि उस समय पर सैम मानक शा जो कि फाइव स्टार जनरल बने, फील्ड मार्शल बने। इनके बारे में ये कहा जाना लग चुका था कि ये सत्ता हटा के इंदिरा जी की और सैन्य तख्ता पलट करेंगे। एक दो जगह पर ऐसे डायलॉग भी मिलते हैं जिस समय पर मिसेज गांधी पूछती हैं। उन्हें बुलाती हैं मानिक शा को और उनसे पूछती हैं कि मैं बड़ी चिंतित हूं और पूछती हूं कि व्हेन आर यू टेकिंग ओवर? मानिक शा से पूछती हैं कि आप कब इस सत्ता को लेने वाले हैं? मानिक शा कहते हैं कि मैडम डरने की जरूरत नहीं है। इस पर एक फिल्म भी बनी हुई है। मतलब यह हद बीच में आई थी क्योंकि ब्रिटिशर्स ने बहुत सारे अंग्रेजों ने कहा कि नेहरू जी के पास तो अनुभव है लंबा चौड़ा औरों को क्या पता कैसे होगा। अच्छा और ये वास्तविकता भी है। क्योंकि 1967 में जब इलेक्शन हुए तो किसी को यह विश्वास नहीं था कि इंदिरा जी चुनाव जीत जाएंगी। और इस विश्वास की कमी के चलते ही प्रेडिक्ट होने लग गया था कि 67 उधर 58 में पाकिस्तान के अंदर सैन्य शासन आ गया और इनके यहां पर अब 67 में सैन्य शासन आ जाएगा। इंदिरा गांधी 44% मत लेकर के विजय घोषित हुई थी। 520 सीटों पर कांग्रेस जीती 283 सीट लेकर आई थी और ये विदेशी लोग देखते रह गए थे। भारत ने इतनी बड़ी पॉलिटिकल सूझबूझ दिखाई थी और ऐसी स्थिति  में हालांकि कांग्रेस बहुत से राज्यों में पिछड़ी जरूर थी लेकिन उसके बावजूद भी सरकार कंटिन्यू रही। अच्छा फिर एक वाक्या और हुआ। सैन्य मामलों में कहा गया कि 1984 में जब इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई थी उससे जस्ट पहले जब स्वर्ण मंदिर पर कारवाई हुई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था तो कहते हैं कुछ सिख सैनिक नाराज हो गए थे सुख सिख सैनिक नाराज हुए क्योंकि भई अल्टीमेटली जो बॉडीगार्ड थे इंदिरा गांधी जी के वो भी सिख धर्मावलंबी थे जिन्होंने उनको गोली मारी थी और दूसरा उससे पहले भी क्योंकि स्वर्ण मंदिर काफी प्रतिष्ठित और


पूजनीय स्थान है उसमें सेना कैसे एंट्री कर गई इससे बहुत सारे सिख नाराज थे लेकिन भारत में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी थी सेना के अंदर कि यह बात आईडिया में भले ही आई हो एग्जीक्यूट नहीं हो पाई। मैंने आपसे क्या कहा? 1857 से ही अंग्रेज सबक लेकर के भारत में जाट रेजीमेंट, राजपूत राइफल्स, राजपूत बटालियन, असम राइफल, असम बटालियंस है ना गोर्खा रेजीमेंट इतनी तरह की रेजीमेंट बना गए। बिहार रेजीमेंट, झारखंड रेजीमेंट, बंगाल रेजीमेंट इतनी रेजीमेंट बनाकर चले गए कि सबकी अपनी-अपनी पहचान और अपनी-अपनी प्राण प्रतिष्ठा थी कि नहीं


साहब हम तो अपने लिए हैं। इसलिए भारत में ऐसा नहीं हो पाया। 84 का मामला भी निकल गया। 2012 के अंदर जब नेमा मनमोहन सिंह जी की सरकार थी उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी और लिखा कि जनवरी की एक रात को भारत में तख्तापलट होने वाला था। और जनरल वीके सिंह उस समय वो हुआ करते थे। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। बोले इनके नेतृत्व में भारत के अंदर तख्तापलट होने की तैयारी हो रही थी। ये 2012 का लेटेस्ट मामला है जिस समय सबसे ज्यादा ये मामला उठा था कि साहब ऐसा कुछ हुआ था। द संजय गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने


कथित तख्ता पलट की खबरों पर कारवाई करने के लिए। मतलब ये घटना कुछ इस तरह से हुई थी। मैं पहले आपको घटना बताता हूं। हुआ कुछ यूं था कि ये पॉडकास्ट में वी के सिंह ने साहब ने ये बात बोली भी है कि कैसे-कैसे हुआ था ये काम। कहते हैं मैं लिख कर के लाया था। आगरा से जो सेना है ना वो चला दी गई थी। बिना पुलिस को बताए हुए कि साहब हम लोग मूव बिना सरकार को बताए हुए हां 2012 की बात है जनवरी 2012 की 33वीं आर्मड डिवीजन की एक टुकड़ी जो हिसार में तैनात थी वो दिल्ली की तरफ चल पड़ी। मैकेनाइज्ड इनफेंट्री की एक पूरी यूनिट मोबिलाइज की गई जो अपने साथ 40 से ज्यादा टैंक ट्रांसपोर्टर लेकर चल रही थी। इसके तुरंत बाद आगरा में तैनात 50वीं पैरा ब्रिगेड की एक यूनिट भी दिल्ली की तरफ भेज दी गई। कहते हैं कि इन दोनों मूवमेंट का भारत सरकार को आईडिया नहीं था। और मनमोहन सिंह जी ने अपने आईबी के अधिकारियों को बुलाकर आईबी जो खुफिया जांच करती है उनको बुलाकर पूछा था कि क्या इस बात में सच्चाई है कि सेना तख्ता पलट करने आ रही है? तो उन्होंने कहा नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल एक रमर उड़ाया गया है। कुछ खुफिया लोगों ने इस तरह की बातें अखबार में छपवा दी हैं। इसका कोई तर्क नहीं है। इस बारे में जब पॉडकास्ट के अंदर स्मिता प्रकाश जी के पॉडकास्ट में पूछा गया था वी के सिंह साहब से तो इन्होंने कहा कि भारत में यह संभव ही नहीं है। क्योंकि भारत के अंदर सात कमान हैं और सात कमान एक जनरल के साथ एक साथ आदेश मानने के लिए पूरी प्रक्रिया है कि वो कब किस आदेश को मानेंगे। कहने का मतलब ये हुआ कि लेटेस्ट उदाहरण 2012 का कोट किया जाता है कि ऐसा हुआ होगा। तो उम्मीद है कि अब आपको भारत के इतिहास के निर्माण से लेकर आज तक के अंदर जो भी गतिविधियां हुई और भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ वो सारी बातों का एक लमसम आईडिया लग गया होगा। पाकिस्तान में ऐसा क्यों हुआ उसका भी आईडिया लग गया होगा। वस्तुतः आप तक यह कंक्लूड करने में कामयाब हो गए होंगे कि भारत के राजनीतिक पार्टियां सेना से ज्यादा पुरानी और मैच्योर हैं। साथ ही साथ भारत के अंदर सेना में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी है कि वो सब अपनी-अपनी अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करती है। साथ ही साथ वो नेशनल प्राइड को पूरा करती है। वहीं पाकिस्तान जो कि आजादी के बाद अपने आप को एक मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया।मुस्लिम राष्ट्र घोषित करके उनकी एक ही धार्मिक आइडेंटिटी रह गई और उस धार्मिक आइडेंटिटी के साथ एक ही क्षेत्र के अंदर चूंकि एक क्षेत्र की सेना ही सीमित थी। पंजाब रेजीमेंट के मैक्सिमम लोग उनके साथ चले गए थे और चूंकि पाकिस्तान की मांग ज्यादा पुरानी नहीं थी और दुर्भाग्यवश जब पाकिस्तान बना तो उनके जो अब्बा थे जिन्होंने पाकिस्तान बनवाया जिन्ना वो आजादी के कुछ ही समय बाद मर गए। तो ऐसे में पाकिस्तानी जो हैं वो दिशाहीन हो गए। उन्हें पता ही नहीं था कि हमने देश क्यों बनाया और बनाकर अब इसका क्या करेंगे। इसलिए सेना ने आसानी से उसकी सत्ता को

संभाल लिया। चूंकि पाकिस्तान से ही बांग्लादेश निकला था तो यही हाल बांग्लादेश में होने ही थे। इनकी कोई भी कोई पॉलिटिकल आईडियोलॉजी नहीं थी। वहीं भारत लोकतांत्रिक मांगों के लिए ही बना देश था। भारत में मानव अधिकारों के लिए मूल अधिकारों के लिए संघर्ष हुए थे। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशनंस के लिए संघर्ष हुए थे। इसलिए कभी भी सेना की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने मदद नहीं ली और इसी वजह से आज तक भारत के अंदर सैन्य तख्ता पलट जैसी घटनाएं ना तो सुनी गई हैं और जितना भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत देने वाली संस्थाएं

बनी रहेंगी उतने सालों तक भारत में सेना का शासन नहीं ।



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February 23, 2026 at 09:49AM

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

 आज तक हमारे देश में ऐसा नहीं हुआ क्या कि किसी ने ट्राई किया हो कि चलो तख्ता पलट करके तो देखते हैं। हमारे इसमें बुनियादी रूप तो है लेकिन आजादी के बाद  ऐसा क्या तरीका अपनाया जिससे कि भारत में तख्ता पलट नहीं हुआ और पाकिस्तान हुआ 

नेहरू की शतिर चाल ये ही की नेहरू फौज से हमेशा डरता था। कैसे ? आइए उस पर लेकर मैं आपको चलता हूं। फौज को अलग अलग कर दिया तो अंग्रेजों के समय एक C in C के तहत मैं काम करती थी बातें बताने के लिए बहुत सारी हैं। असल में इन पॉइंट्स का कहीं एक जगह विश्लेषण नहीं मिलता है। आप जब पूरा-पूरा इतिहास उठाकर पढ़ते हैं तब जाकर ये इवॉल्व होकर आती हैं।हमने आपको तख्ता पलट की बातें बताई और मैंने आपको ये भी बताया कि किस प्रकार से भारत में आज जब मैं ये बात बोलता हूं आपसे कि भारत में 1857 में अंग्रेजों ने जो क्रांति देखी,आपको जानकर आश्चर्य होगा आज देश के अंदर 27 रेजीमेंट्स काम कर रही हैं। 27 रेजीमेंट्स में चाहे वो जाट हो, चाहे क्षेत्र के आधार पर हो, आसाम रेजीमेंट हो, पंजाब सिख रेजीमेंट हो, बिहार रेजीमेंट हो, कुमाऊं रेजीमेंट हो, नागा रेजीमेंट हो, गोर्खा रेजीमेंट हो, राजपूत राइफल्स हो सबकी अपनी-अपनी पहचान बनाकर उनके अंदर अपना भाव पैदा कर दिया है। यही कारण है कि इन रेजीमेंट्स के बीच में अभी पिछले कुछ साल पहले भी अहीर रेजीमेंट की मांग उठी थी कि अहीर रेजीमेंट भी होने चाहिए। चमार रेजीमेंट भी भारत के अंदर हुआ करती थी। 1943 से लेकर 46 के बीच में भारत में चमार रेजीमेंट के नाम से भी रेजीमेंट रही है। ये भी एक इतिहास है। जातियों के आधार पर रेजीमेंट्स भारत में गठित की गई थी अंग्रेजों के द्वारा। क्षेत्रीयता के आधार पर उनके अपने प्राइड के आधार पर भारत में रेजीमेंट्स गठित की गई थी। ताकि कभी इनको कोई भड़काने का काम करे तो फिर ये सब लोग एक बिंदु पर ना आ पाए।भारत में सात कमांड हैं। सात कमांड के अलग-अलग कमांडर्स हैं और उनको एक साथ आदेश देने के लिए अलग-अलग व्यवस्थाएं रखी गई हैं।अंग्रेजों के जाते ही  उनकी व्यवस्था को जब अपने यहां अपनाया क्योंकि आजादी के बाद वो हमें अपनी सेना तो सौंप गए। लेकिन अब उस सेना को बनाने में हमने क्या तरीका अपनाया 

देश आजाद हुआ पंडित जवाहरलाल नेहरू प्रधानमंत्री बने। फील्ड मार्शल करियप्पा कमांडर इन चीफ हुआ करते थे ब्रिटिशर्स के समय पे।किचनर के टाइम पे तो फील्ड मार्शल करियप्पा बनाए गए। कमांडर इन चीफ बनाए गए। भारत में आज तक दो ही व्यक्ति फाइव स्टार जनरल तक पहुंचे हैं। इनमें से एक करियप्पा साहब हैं और एक  मानकशा साहब हैं। केवल दो ही व्यक्ति फील्ड मार्शल की रैंक तक गए हैं। ये पहले व्यक्ति थे करियप्पा।

इनको यह बात क्यों मतलब ये उपाधि भी क्यों मिली थी? क्योंकि इन्होंने डायरेक्ट एक्शन लिया था पाकिस्तान के ऊपर जब 1948 का पाकिस्तान का संघर्ष पढ़ते हैं। अंग्रेज गए तो भारत को देश की सत्ता सौंप गए। सौंप गए तो सेना सौंप गए। सेना सौंप गए तो हम अपनी सेना को किनसे चलवाएं? सेना को चलवाने के लिए करीप्पा साहब आप सेना चलाएं। करियप्पा साहब और करियप्पा साहब के बाद में जो इनके बाद में दूसरे जो व्यक्ति बने वो थिमैया। थिमैया कौन थे? थल सेना अध्यक्ष थे जो करियप्पा के बाद में आए। अब हुआ क्या? हुआ ये कि जो करियप्पा साहब थे ये कमांडर इन चीफ थे।

नेहरू  ने सबसे पहले जो काम किया कमांडर इन चीफ का पद ही खत्म कर दिया। नेहरू जी की चालाकी देखिए।जो कमांडर इन चीफ का घर होता था। नेहरू जी ने खुद का अपना घर बना लिया।क्योंकि देश में लोकतंत्र आ गया  सेना के शासन की जरूरत क्या है?अंग्रेज तो सेना के माध्यम से और पुलिस के माध्यम से शासन करते थे। क्योंकि लोकतंत्र आ गया है तो कमांडर इन चीफ का जो त्रिमूर्ति भवन है यह मुझे दे दीजिए। पहचाने आजादी के समय क्या तिगड़म बिठाई नेहरू जी ने। हटो भैया आप हटो यहां से। आप अपने हो। देश की आजादी में विश्वास है। आपकी जगह हम रहेंगे साहब इस जगह। बोले ऐसा क्यों? बोले देखिए तीन सेना के तीनों अध्यक्ष होंगे और तीन अध्यक्ष रह कर के उन तीनों अध्यक्ष के ऊपर एक लोकतांत्रिक रूप से चुना हुआ व्यक्ति रक्षा मंत्री होगा। कमांडर इन चीफ की जरूरत क्या है? कमांडर इन चीफ का पद ही नहीं रखा जो अंग्रेजों ने रखा हुआ था। पाकिस्तान वाले यहीं मार खा जाते हैं।  नेहरू ने कदम उठाया तीनों सेनाओं पर राज करने के लिए कोई एक सैनिक का व्यक्ति नहीं चुना। अब आप में से कुछ लोग कहेंगे सर अभी चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ, चीफ ऑफ नेवी स्टाफ, चीफ ऑफ एयरफील्ड स्टाफ होता है। ये क्या है? आज भी थल सेना अध्यक्ष नौसेना अध्यक्ष होते हैं। लेकिन इन सब में से भी चार तीनों के ऊपर बैठने का जो व्यक्ति बनाया है। जैसे सीडीएस बनाया था अपन ने चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ। कमांडर इन चीफ नहीं। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ बनाया। लेकिन उसकी रैंकिंग उन्हीं जनरल्स के बराबर रखी। वो भी वही फोर स्टार जनरल रखे गए। उनसे यह कहा गया कि आपका काम कोऑर्डिनेशन का है। आप इनके ऊपर नहीं हो। सीडीएस विपिन रावत ने जो उनका पद सजित किया था कमांडर इन चीफ नहीं था वो। चीफ ऑफ डिफेंस स्टाफ था। आप सबके ऊपर हैं। आप इनका ऊपर का मतलब कोऑर्डिनेट करेंगे। जनरल रैंक बराबर है। फाइव स्टार तो दो ही थे हमारे यहां पे। सेम मानकशा,करियप्पा। करियप्पा से कमांडर इन चीफ का पद ले लिया और उनको कहा सर आप थल सेना संभालें। आपके अनुभव का लाभ लें और हमें यह पद दें। एक और घटनाक्रम बताता हूं। मतलब कैसे धीरे-धीरे इवॉल्व हुई? नेहरू जी के द्वारा जो कार्य किए गए उनमें से एक 57 का कार्य बड़ा इंटरेस्टिंग है और वो क्या है? एक बार की बात है कि जनरल थिमैया जो हैं वो भारत के चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। थैल सेना अध्यक्ष हुआ करते थे। नेहरू जी उनका कार्यालय विजिट करने गए। जब कार्यालय विजिट करने गए तो थिमैया साहब के ऑफिस में पीछे की तरफ एक कैबिनेट लगी हुई। जैसे अपने अलमारी लगी होती है। ऐसे एक स्टील की अलमारी रखी थी बड़ी सिल्वर की सी खूबसूरत सी। उसमें साहब नेहरू जी ने पूछा कि इसमें क्या-क्या रखा है? तो उन्होंने कहा साहब पहली रो में तो रखा हुआ है डिफेंस प्लांस। बोले अच्छा और दूसरी में बोले देश के अंदर क्या स्ट्रेटजी होनी चाहिए वो रखी हुई है? मतलब ये तो आज युद्ध हो जाए तो क्या प्लान है? भविष्य में क्या होने चाहिए? और बोले तीसरा बोले कभी आपके खिलाफ अगर सेना को शासन करना पड़े तो उस समय क्या तरीका अपनाया जाए? आप विचार कीजिए प्रधानमंत्री थिमैया जी के ऑफिस में हैं और थिमैया जी के पीछे जो अलमारी रखी है उसमें इस बात का भी रोड मैप बना हुआ है कि कल को अगर कु करना पड़े सैन्य विद्रोह करना पड़े तो तरीका क्या अपनाया जाए भाई साहब नेहरू जी इस बात को सुन तो लिए एक हल्की सी स्माइल पास करके चले आए ये बड़ा इंटरेस्टिंग वाक्य है और ये रियल स्टोरी है 1957 की द टॉप ड्रायर कंटेन द नेशंस डिफेंस प्लान सेकंड ड्रायर के अंदर रखा है कॉन्फिडेंशियल फाइल्स ऑफ नेशंस टॉप जनरल्स की इनकी कॉन्फिडेंशियल चीजें रखी हैं और थर्ड में रखा हुआ है कि इसमें इस ड्रॉअर

में सीक्रेट प्लान रखा है कि कल को अगर मिलिट्री कू आपके खिलाफ करना पड़े तो कैसे करें।

नेहरू जी ने कहा अच्छा भाई साहब देश में इतना संघर्ष करके लोकतंत्र लाए और सेना को हम शासन दे दें। सेना जो खुद नहीं चाहती वो ये चाहती है कि देश में लोकतंत्र आपको इंटरेस्टिंग बात मैं आपको बताता हूं। जिन-जिन देशों में लोकतंत्र बरकरार है। विशेष रूप से पश्चिमी देशों को आप देखें। वहां पर आज तक सैन्य शासन नहीं आया। भारत इसीलिए दुनिया में सबसे अलग है क्योंकि यहां पर लोकतंत्र मजबूत है

कई ब्रिटिशर्स ये मानना शुरू कर चुके थे कि नेहरू जी चकि उस समय के व्यक्ति हैं जिस समय राष्ट्रीय आंदोलन था तो उन्हें तो पता है देश कैसे चलाना है। लाल बहादुर शास्त्री जी भी जो हैं वो भी नेहरू जी की टीम के थे। तो उन्हें भी पता है। लेकिन जब ये दोनों लोग नहीं रहेंगे तो फिर इंदिरा गांधी जी देश नहीं चला पाएंगी। और इंदिरा गांधी जी देश क्यों नहीं चला पाएंगी? क्योंकि उस समय पर सैम मानक शा जो कि फाइव स्टार जनरल बने, फील्ड मार्शल बने। इनके बारे में ये कहा जाना लग चुका था कि ये सत्ता हटा के इंदिरा जी की और सैन्य तख्ता पलट करेंगे। एक दो जगह पर ऐसे डायलॉग भी मिलते हैं जिस समय पर मिसेज गांधी पूछती हैं। उन्हें बुलाती हैं मानिक शा को और उनसे पूछती हैं कि मैं बड़ी चिंतित हूं और पूछती हूं कि व्हेन आर यू टेकिंग ओवर? मानिक शा से पूछती हैं कि आप कब इस सत्ता को लेने वाले हैं? मानिक शा कहते हैं कि मैडम डरने की जरूरत नहीं है। इस पर एक फिल्म भी बनी हुई है। मतलब यह हद बीच में आई थी क्योंकि ब्रिटिशर्स ने बहुत सारे अंग्रेजों ने कहा कि नेहरू जी के पास तो अनुभव है लंबा चौड़ा औरों को क्या पता कैसे होगा। अच्छा और ये वास्तविकता भी है। क्योंकि 1967 में जब इलेक्शन हुए तो किसी को यह विश्वास नहीं था कि इंदिरा जी चुनाव जीत जाएंगी। और इस विश्वास की कमी के चलते ही प्रेडिक्ट होने लग गया था कि 67 उधर 58 में पाकिस्तान के अंदर सैन्य शासन आ गया और इनके यहां पर अब 67 में सैन्य शासन आ जाएगा। इंदिरा गांधी 44% मत लेकर के विजय घोषित हुई थी। 520 सीटों पर कांग्रेस जीती 283 सीट लेकर आई थी और ये विदेशी लोग देखते रह गए थे। भारत ने इतनी बड़ी पॉलिटिकल सूझबूझ दिखाई थी और ऐसी स्थिति  में हालांकि कांग्रेस बहुत से राज्यों में पिछड़ी जरूर थी लेकिन उसके बावजूद भी सरकार कंटिन्यू रही। अच्छा फिर एक वाक्या और हुआ। सैन्य मामलों में कहा गया कि 1984 में जब इंदिरा गांधी जी की हत्या हुई थी उससे जस्ट पहले जब स्वर्ण मंदिर पर कारवाई हुई थी ऑपरेशन ब्लू स्टार चलाया गया था तो कहते हैं कुछ सिख सैनिक नाराज हो गए थे सुख सिख सैनिक नाराज हुए क्योंकि भई अल्टीमेटली जो बॉडीगार्ड थे इंदिरा गांधी जी के वो भी सिख धर्मावलंबी थे जिन्होंने उनको गोली मारी थी और दूसरा उससे पहले भी क्योंकि स्वर्ण मंदिर काफी प्रतिष्ठित और


पूजनीय स्थान है उसमें सेना कैसे एंट्री कर गई इससे बहुत सारे सिख नाराज थे लेकिन भारत में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी थी सेना के अंदर कि यह बात आईडिया में भले ही आई हो एग्जीक्यूट नहीं हो पाई। मैंने आपसे क्या कहा? 1857 से ही अंग्रेज सबक लेकर के भारत में जाट रेजीमेंट, राजपूत राइफल्स, राजपूत बटालियन, असम राइफल, असम बटालियंस है ना गोर्खा रेजीमेंट इतनी तरह की रेजीमेंट बना गए। बिहार रेजीमेंट, झारखंड रेजीमेंट, बंगाल रेजीमेंट इतनी रेजीमेंट बनाकर चले गए कि सबकी अपनी-अपनी पहचान और अपनी-अपनी प्राण प्रतिष्ठा थी कि नहीं


साहब हम तो अपने लिए हैं। इसलिए भारत में ऐसा नहीं हो पाया। 84 का मामला भी निकल गया। 2012 के अंदर जब नेमा मनमोहन सिंह जी की सरकार थी उस समय इंडियन एक्सप्रेस ने खबर छापी और लिखा कि जनवरी की एक रात को भारत में तख्तापलट होने वाला था। और जनरल वीके सिंह उस समय वो हुआ करते थे। चीफ ऑफ आर्मी स्टाफ हुआ करते थे। बोले इनके नेतृत्व में भारत के अंदर तख्तापलट होने की तैयारी हो रही थी। ये 2012 का लेटेस्ट मामला है जिस समय सबसे ज्यादा ये मामला उठा था कि साहब ऐसा कुछ हुआ था। द संजय गार्डियन की रिपोर्ट के अनुसार सेना ने


कथित तख्ता पलट की खबरों पर कारवाई करने के लिए। मतलब ये घटना कुछ इस तरह से हुई थी। मैं पहले आपको घटना बताता हूं। हुआ कुछ यूं था कि ये पॉडकास्ट में वी के सिंह ने साहब ने ये बात बोली भी है कि कैसे-कैसे हुआ था ये काम। कहते हैं मैं लिख कर के लाया था। आगरा से जो सेना है ना वो चला दी गई थी। बिना पुलिस को बताए हुए कि साहब हम लोग मूव बिना सरकार को बताए हुए हां 2012 की बात है जनवरी 2012 की 33वीं आर्मड डिवीजन की एक टुकड़ी जो हिसार में तैनात थी वो दिल्ली की तरफ चल पड़ी। मैकेनाइज्ड इनफेंट्री की एक पूरी यूनिट मोबिलाइज की गई जो अपने साथ 40 से ज्यादा टैंक ट्रांसपोर्टर लेकर चल रही थी। इसके तुरंत बाद आगरा में तैनात 50वीं पैरा ब्रिगेड की एक यूनिट भी दिल्ली की तरफ भेज दी गई। कहते हैं कि इन दोनों मूवमेंट का भारत सरकार को आईडिया नहीं था। और मनमोहन सिंह जी ने अपने आईबी के अधिकारियों को बुलाकर आईबी जो खुफिया जांच करती है उनको बुलाकर पूछा था कि क्या इस बात में सच्चाई है कि सेना तख्ता पलट करने आ रही है? तो उन्होंने कहा नहीं सर ऐसा कुछ भी नहीं है। यह केवल एक रमर उड़ाया गया है। कुछ खुफिया लोगों ने इस तरह की बातें अखबार में छपवा दी हैं। इसका कोई तर्क नहीं है। इस बारे में जब पॉडकास्ट के अंदर स्मिता प्रकाश जी के पॉडकास्ट में पूछा गया था वी के सिंह साहब से तो इन्होंने कहा कि भारत में यह संभव ही नहीं है। क्योंकि भारत के अंदर सात कमान हैं और सात कमान एक जनरल के साथ एक साथ आदेश मानने के लिए पूरी प्रक्रिया है कि वो कब किस आदेश को मानेंगे। कहने का मतलब ये हुआ कि लेटेस्ट उदाहरण 2012 का कोट किया जाता है कि ऐसा हुआ होगा। तो उम्मीद है कि अब आपको भारत के इतिहास के निर्माण से लेकर आज तक के अंदर जो भी गतिविधियां हुई और भारत में ऐसा क्यों नहीं हुआ वो सारी बातों का एक लमसम आईडिया लग गया होगा। पाकिस्तान में ऐसा क्यों हुआ उसका भी आईडिया लग गया होगा। वस्तुतः आप तक यह कंक्लूड करने में कामयाब हो गए होंगे कि भारत के राजनीतिक पार्टियां सेना से ज्यादा पुरानी और मैच्योर हैं। साथ ही साथ भारत के अंदर सेना में इतनी कल्चरल डायवर्सिटी है कि वो सब अपनी-अपनी अस्मिता और पहचान के लिए संघर्ष करती है। साथ ही साथ वो नेशनल प्राइड को पूरा करती है। वहीं पाकिस्तान जो कि आजादी के बाद अपने आप को एक मुस्लिम राष्ट्र घोषित किया।मुस्लिम राष्ट्र घोषित करके उनकी एक ही धार्मिक आइडेंटिटी रह गई और उस धार्मिक आइडेंटिटी के साथ एक ही क्षेत्र के अंदर चूंकि एक क्षेत्र की सेना ही सीमित थी। पंजाब रेजीमेंट के मैक्सिमम लोग उनके साथ चले गए थे और चूंकि पाकिस्तान की मांग ज्यादा पुरानी नहीं थी और दुर्भाग्यवश जब पाकिस्तान बना तो उनके जो अब्बा थे जिन्होंने पाकिस्तान बनवाया जिन्ना वो आजादी के कुछ ही समय बाद मर गए। तो ऐसे में पाकिस्तानी जो हैं वो दिशाहीन हो गए। उन्हें पता ही नहीं था कि हमने देश क्यों बनाया और बनाकर अब इसका क्या करेंगे। इसलिए सेना ने आसानी से उसकी सत्ता को

संभाल लिया। चूंकि पाकिस्तान से ही बांग्लादेश निकला था तो यही हाल बांग्लादेश में होने ही थे। इनकी कोई भी कोई पॉलिटिकल आईडियोलॉजी नहीं थी। वहीं भारत लोकतांत्रिक मांगों के लिए ही बना देश था। भारत में मानव अधिकारों के लिए मूल अधिकारों के लिए संघर्ष हुए थे। फ्रीडम ऑफ स्पीच एंड एक्सप्रेशनंस के लिए संघर्ष हुए थे। इसलिए कभी भी सेना की किसी भी राजनीतिक पार्टी ने मदद नहीं ली और इसी वजह से आज तक भारत के अंदर सैन्य तख्ता पलट जैसी घटनाएं ना तो सुनी गई हैं और जितना भारत में लोकतंत्र और लोकतांत्रिक व्यवस्थाओं को मजबूत देने वाली संस्थाएं

बनी रहेंगी उतने सालों तक भारत में सेना का शासन नहीं ।


Friday, February 20, 2026

Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union

Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union
Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union
Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union
Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union

 

Here’s a policy-style framework that the Supreme Court of India could adopt to curb the misuse of taxpayer money through election-time freebies:


Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union


1. Definition and Scope

SC must order No Freebies even to Poorest of Poor be decalered in the last year of mandatory term of 5 years of any State Govt or Central Govt.
  • Clearly define freebies as non-essential, non-targeted benefits announced or distributed prior to elections.
  • Distinguish between welfare measures (targeted, need-based, long-term schemes) and electoral inducements (short-term, populist giveaways).

2. Mandatory Fiscal Impact Assessment

  • Require every new scheme announced to undergo a Fiscal Responsibility Audit.
  • Audit must disclose:
    • Estimated cost to the exchequer.
    • Source of funding.
    • Long-term sustainability.

3. Election Commission Oversight

 SC must order No Freebies even to Poorest of Poor be decalered in the last year of mandatory term of 5 years of any State Govt or Central Govt.
  • Direct the Election Commission of India (ECI) to establish a Freebie Review Committee.
  • Committee empowered to:
    • Vet schemes for legality and fiscal prudence.
    • Suspend or prohibit schemes deemed electoral inducements.

4. Transparency and Public Disclosure

  • Mandate governments to publish:
    • Scheme details in official gazettes.
    • Fiscal impact reports accessible to citizens.
  • Require disclosure in election manifestos of how promises will be funded.

5. Independent Monitoring Authority

6. Judicial Review Mechanism

  • Empower citizens, NGOs, or opposition parties to file Public Interest Litigations (PILs) challenging freebies.
  • Fast-track benches to decide such cases within 30 days to ensure timely intervention before elections.

7. Penal Consequences

  • If a scheme is found to be an electoral inducement:
    • Disqualification of responsible ministers or candidates.
    • Freezing of funds allocated to the scheme.
    • Possible contempt proceedings for repeated violations.

8. Long-Term Structural Reforms


Conclusion

This framework balances social justice with fiscal responsibility. By empowering the Election Commission, mandating transparency, and enabling judicial review, the Supreme Court can ensure that welfare remains genuine and sustainable, rather than a cynical tool for electoral gain. And No social justice scheme can be decared or adopted after completion of 4 yars term by any Govt either State or Central Govt.


Col Rajendra Shukla

New Delhi

Jai Hind Jai Bharat


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Here’s a policy-style framework that the Supreme Court of India could adopt to curb the misuse of taxpayer money through election-time freebies:


Suggsted Policy Framework to Regulate Freebies in Indian Union


1. Definition and Scope

SC must order No Freebies even to Poorest of Poor be decalered in the last year of mandatory term of 5 years of any State Govt or Central Govt.
  • Clearly define freebies as non-essential, non-targeted benefits announced or distributed prior to elections.
  • Distinguish between welfare measures (targeted, need-based, long-term schemes) and electoral inducements (short-term, populist giveaways).

2. Mandatory Fiscal Impact Assessment

  • Require every new scheme announced to undergo a Fiscal Responsibility Audit.
  • Audit must disclose:
    • Estimated cost to the exchequer.
    • Source of funding.
    • Long-term sustainability.

3. Election Commission Oversight

 SC must order No Freebies even to Poorest of Poor be decalered in the last year of mandatory term of 5 years of any State Govt or Central Govt.
  • Direct the Election Commission of India (ECI) to establish a Freebie Review Committee.
  • Committee empowered to:
    • Vet schemes for legality and fiscal prudence.
    • Suspend or prohibit schemes deemed electoral inducements.

4. Transparency and Public Disclosure

  • Mandate governments to publish:
    • Scheme details in official gazettes.
    • Fiscal impact reports accessible to citizens.
  • Require disclosure in election manifestos of how promises will be funded.

5. Independent Monitoring Authority

6. Judicial Review Mechanism

  • Empower citizens, NGOs, or opposition parties to file Public Interest Litigations (PILs) challenging freebies.
  • Fast-track benches to decide such cases within 30 days to ensure timely intervention before elections.

7. Penal Consequences

  • If a scheme is found to be an electoral inducement:
    • Disqualification of responsible ministers or candidates.
    • Freezing of funds allocated to the scheme.
    • Possible contempt proceedings for repeated violations.

8. Long-Term Structural Reforms


Conclusion

This framework balances social justice with fiscal responsibility. By empowering the Election Commission, mandating transparency, and enabling judicial review, the Supreme Court can ensure that welfare remains genuine and sustainable, rather than a cynical tool for electoral gain. And No social justice scheme can be decared or adopted after completion of 4 yars term by any Govt either State or Central Govt.


Col Rajendra Shukla

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आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ?

आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ? आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ सैन्य तख्ता पलट ? आज तक हमारे देश में क्योंनहीं हुआ ...