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Wednesday, July 15, 2026

तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़
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तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़
तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

 दोस्तों, उत्तराखंड के धारचुला में भारतीय व्यापारी पूरी तरह से तैयार थे। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से ट्रेड परमिट हाथों के अंदर था। कस्टम क्लीयरेंस हो चुकी थी और जिला प्रशासन ने अपनी सारी तैयारियां मुकम्मल कर ली थी। सदियों से खच्चरों की पीठ पर लद कर के जाने वाला सामान इस बार ट्रकों के अंदर भरा हुआ था। लेकिन बॉर्डर पार करने से ठीक 24 घंटे पहले यानी कि 7 जुलाई को धारचला के एसडीएम आशीष जोशी की डेस्क पर एक सीमा पार से एक ईमेल फ्लैश होता है। यह ईमेल चाइनीस ऑफिशियल्स का था। संदेश छोटा लेकिन बेहद चौंकाने वाला था। अभी रुक जाइए। भारतीय व्यापारियों को सीमा पार मत भेजिए। बहाना यह बनाया गया कि तिब्बत के तकलाकोट के अंदर एक नया मार्केट प्लेस और वेयर हाउसेस यानी कि गोदाम बन रहा है और जब तक यह कंस्ट्रक्शन पूरा नहीं हो जाता ट्रेड शुरू नहीं हो सकता है। लेकिन दोस्तों जरा सोचिए जिस व्यापार का सीजन आधिकारिक तौर पर 1 जून से स्टार्ट हो चुका था उसके लिए चाइना 7 जुलाई को अचानक कंस्ट्रक्शन का बहाना क्यों बना रहा था? क्या यह वाकई सिर्फ एक ईंट पत्थर का गोदाम है? या फिर चाइना 6 साल से बंद पड़े इस रूट की आड़ में कोई नया मिलिट्री या फिर फॉरवर्ड लॉजिस्टिक बेस तैयार कर रहा है जिसे वह अभी भारतीयों की नजरों से छिपाना चाहता है। और सबसे बड़ा सवाल ठीक इसी वक्त यानी जुलाई के इसी महीने में हजारों किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश के पेंगसाऊ दर्रे पर म्यांमार के साथ भी 6 साल बाद बॉर्डर ट्रेड अचानक से क्यों खुल रहा है? क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है या फिर नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठी भारत सरकार ने कोई ऐसा मास्टर स्ट्रोक चला है जिसने एक ही वक्त के अंदर भारत के दो सबसे बड़े कॉम्प्लेक्स बॉर्डर्स के ऊपर एक नया जिओपॉलिटिकल गेम सेट कर दिया है। दोस्तों आज हम सिर्फ एक व्यापार की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं भारत की उस अग्रेसिव बॉर्डर स्ट्रेटजी की जिसने खच्चरों के युग को खत्म करके ट्रकों की एंट्री करवा दी है और चाइना को उसके ही बिछाए जाल में सोचने पर मजबूर कर दिया है। दोस्तों इस पूरी कहानी को समझने के लिए आपको 2020 के उस दौर में जाना होगा जब कोविड-19 महामारी के कारण भारत चाइना और भारत म्यांमार दोनों सीमाओं पर ट्रेड लिंक पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। पिछले छ सालों के अंदर दुनिया बदल गई जो पॉलिटिकल समीकरण बदल गए और सबसे अहम बात भारत का बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से ट्रांसफॉर्म हो गया है। लिपुलेख दर्रे से होने वाला भारत तिब्बत सीमा व्यापार कोई आम व्यापार नहीं है। यह ऐतिहासिक रूट सदियों से उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों की इकॉनमी की रीड रहा है। लेकिन साल 2020 के बाद से यहां सन्नाटा पसर गया था। अब दोस्तों 6 सालों के लंबे अंतराल के बाद में जब इसे दोबारा से शुरू करने का वक्त आया तो भारत ने एक ऐसा दांव चला जिसकी उम्मीद चाइना ने शायद कभी नहीं की थी। दोस्तों इस साल सीबा व्यापार में एक ऐतिहासिक बदलाव किया गया है। साल 2020 से पहले भारतीय व्यापारियों को अपने सामान तिब्बत तक पहुंचाने के लिए हफ्तों तक खच्चरों और पैदल रास्तों के ऊपर सहारा लेते हुए आगे बढ़ना पड़ता था। लेकिन इन छ सालों के अंदर भारत के बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन यानी कि बीआरओ ने पहाड़ों का सीना चीर करके धारचुला लिपुलेख सड़क का निर्माण पूरा कर दिया है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं है। यह भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी का सबसे बड़ा सबूत है। अब दोस्तों, पहली बार भारतीय व्यापारी अपने सामान को सीधे ट्रकों और गाड़ियों के जरिए भारत, तिब्बत सीमा पर स्थित इंडो तिब्बतियन ट्रेड पॉइंट तक पहुंचा सकेंगी।


ट्रकों की इस एंट्री ने चाइना की रातों की नींद हराम कर दी है। क्योंकि चाइना बहुत अच्छे तरीके से जानता है कि जो सड़क आज व्यापारियों के ट्रकों को बॉर्डर तक ला रही है वही सड़क जरूरत पड़ने पर इंडियन आर्मी के ट्रकों, आर्टलरी और लॉजिस्टिक्स को भी कुछ ही घंटों के अंदर लिपुलेखक के टॉप तक पहुंचा सकती है। दोस्तों, लिपुलेख कोई आम जगह नहीं है। यह भारत, नेपाल और चाइना का एक बेहद सेंसिटिव ट्राईजक्शन है। ऐसे में दोस्तों भारत का यह रैपिड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चाइना के लिए एक सीधा मैसेज है कि 1962 का भारत अब इतिहास बन चुका है। लेकिन दोस्तों कहानी में असली ट्विस्ट अब आता है। सड़क बन गई, गाड़ियां बॉर्डर तक पहुंच गई लेकिन फिर भी एक पेंच फंसा हुआ है। ट्रकों से सामान उतारने के बाद में भारतीय व्यापारियों को आज भी चाइना के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए लगभग 2 कि.मी. पैदल चलना पड़ेगा। आखिर क्यों? तो दोस्तों, यह वो नौ मैनस लैंड और चाइनीस टेरिटरी का वो बफर जोन है जहां ड्रैगन अपना साइकोलॉजिकल गेम खेल रहा है। वो 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता सिर्फ एक भौगोलिक दूरी नहीं है बल्कि यह चाइना की उस सोची समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वो भारतीय पहुंच को एक लिमिट तक रिस्ट्रिक्ट करना चाहता है और इसी 2 कि.मी. के उस पार तिब्बत के तकलाकोट के अंदर वह रहस्यमई वेयर हाउस बन रहा है। अब दोस्तों जरा चाइना के उस ईमेल को डिकोड करते हैं जो 7 जुलाई को आया। चाइना यह कह रहा है कि वो मार्केट प्लेस बना रहा है। लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स और जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट इस बात को बखूबी समझते हैं कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी कि पीएलए की डिक्शनरी के अंदर सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की कोई जगह नहीं होती है। चाइना तिब्बत के बॉर्डर एरियाज के अंदर जो भी बनाता है वो ड्यूल यूज़ का होता है। यानी कि शांति के वक्त वो गोदाम या फिर गांव हो सकता है। लेकिन युद्ध या तनाव के वक्त वो सीधा मिलिट्री बेस बन जाता है।


 दोस्तों इस बात की पूरी संभावना है कि टकलाकोट में रातोंरात जो कंस्ट्रक्शन चल रहा है वो पीएलए के लिए विंटर लॉजिस्टिक राशन कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स या फिर सर्लांस सिस्टम स्टोर करने का एक फॉरवर्ड बेस हो। दोस्तों, चाइना नहीं चाहता है कि भारतीय व्यापारी अभी वहां आए और अपनी आंखों से उस बड़े कंस्ट्रक्शन का स्केल देखें। क्योंकि व्यापारी जब सीमा पार जाते हैं तो वह सिर्फ सामान नहीं ले जाते हैं। वो वहां की टेपोग्राफी, मिलिट्री मूवमेंट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की जानकारी का एक बड़ा सोर्स भी होते हैं। चाइना इसी ह्यूमन इंटेलिजेंस को ब्लॉक करने के लिए 7 जुलाई का वो ईमेल भेज के टाइम पास कर रहा है। लेकिन भारत भी अब चुप बैठने वाला नहीं है। नई दिल्ली की स्ट्रेटेजिक थिंकिंग अब डिफेंसिव से ऑफेंसिव हो चुकी है और इसका सबसे बड़ा सबूत आपको भारत के पूर्वी छोर पर मिलेगा। दोस्तों एक तरफ चाइना लिपुलेख में चालबाजी कर रहा है और ठीक उसी वक्त भारत ने अरुणाचल प्रदेश के चांगला जिले के अंदर भारत म्यांमार सीमा पर पेंग साऊ दर्रे से व्यापार को फिर से खोलने का ऐलान कर दिया है। यह टाइमिंग कोई संयोग नहीं है। 3 फरवरी 2020 को बंद हुआ यह ट्रेड लिंक 20 जुलाई से दोबारा शुरू होने जा रहा है। दोस्तों 9 जुलाई को अरुणाचल के चांगलांग के अंदर भारतीय व्यापार प्रतिनिधियों और म्यांमार के उनके समकक्षों के बीच में एक बेहद अहम मीटिंग हुई है और इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया है। म्यांमार इस वक्त एक भयानक गृह युद्ध से जूझ रहा है। वहां की मिलिट्री जुमटा और विद्रोही गुटों के बीच में खूनी संघर्ष चल रहा है। दोस्तों ऐसे मुश्किल वक्त में भी भारत का वहां बॉर्डर ट्रेड शुरू करना एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और सुरक्षा दांव है। यहां भारत सरकार ने एक बहुत ही शार्प पॉलिसी का इस्तेमाल किया है जिसे फ्री मूवमेंट रिजीम यानी कि एफएमआर कहा जाता है। वैसे तो दोस्तों एफएमआर को लेकर के देश में काफी बहस चल रही है और सुरक्षा कारणों से इसे कई जगह सस्पेंड भी कर दिया गया है। लेकिन चांगलांग के अंदर इसे बहुत ही कैलकुलेटेड तरीके से लागू किया जा रहा है। इसके तहत सीमा के दोनों ओर 10 कि.मी. के दायरे में रहने वाले लोगों को स्थानीय व्यापार और लेनदेन की छूट मिलेगी। लेकिन जरा दोस्तों सुरक्षा एजेंसियों के दिमाग को दाद दीजिए। यह बॉर्डर हार्ट हर दिन नहीं लगेगी।

 इसके लिए महीने की केवल 10, 20 और 30 तारीख ही चुनी गई है। आखिर ये तीन डेट ही क्यों चुनी गई है? क्योंकि 10, 20 और 30 तारीख का यह फार्मूला हमारी सुरक्षा एजेंसियों, असम राइफल्स और इंटेलिजेंस ग्रिड को बॉर्डर मैनेजमेंट के अंदर एक स्ट्रक्चरल कंट्रोल देता है। अगर बॉर्डर हर दिन खुला रहेगा तो इंसजेंसी वेपनरी की तस्करी और इललीगल माइग्रेशन का खतरा बढ़ जाएगा। लेकिन दोस्तों महीने के अंदर सिर्फ तीन दिन तक ही एक फिक्स डेट के ऊपर ही हार्ट लगने से फोर्सेस को पता होगा कि भीड़ कब आएगी, मॉनिटरिंग कैसे करनी है और ट्रेड को सुरक्षित कैसे रखना है। यह सिक्योरिटी और इकॉनमी का एक परफेक्ट बैलेंस है। अब दोस्तों जरा इस लोकल बॉर्डर इकॉनमी के स्केल को समझिए। सुनने में आपको शायद अजीब लगे कि आज के हाईटेक जमाने में भारतीय व्यापारी लिपुलेखक से गुड़, मिश्री, माचिस और बर्तन जैसी मामूली चीजें लेकर के तिब्बत जा रहे हैं। लेकिन असली खेल इन चीजों का नहीं है। असली खेल उस डिपेंडेंसी का है। तिब्बत के उस दुर्गम इलाके के अंदर रहने वाले लोगों के लिए भारत से जाने वाला यह सामान किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है। वहां ऑक्सीजन कम है, सर्वाइवल मुश्किल है और चाइना की सप्लाई चेन हमेशा रिलायबल

नहीं होती है। तिब्बती लोग सदियों से भारतीय गुड़ और माचिस के ऊपर जिंदा है। बदले में वहां से जो ऊन, चरू, पशमीना, कीमती पत्थर और कंबल भारत आते हैं। उनकी डिमांड भारतीय बाजारों के अंदर बहुत ज्यादा होती है। इस करोड़ों रुपए के ट्रेड से सीधा फायदा व्यास दर्मा और चौदास घाटी के अंदर रहने वाले हमारे भारतीय नागरिकों को होता है और यहीं पर एंट्री होती है मोदी सरकार की उस सबसे बड़ी पॉलिसी की जिसने चाइना की नींद उड़ा रखी है वो है वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम। दोस्तों दशकों तक भारत की नीति यह थी कि बॉर्डर को खाली रखो। सड़कें मत बनाओ ताकि दुश्मन अंदर ना

आ सके। इस डरपोक नीति का नतीजा यह हुआ कि हमारे बॉर्डर के गांव खाली हो गए। लोग पलायन कर गए और चाइना ने खाली जगह देख के वहां पर अतिक्रमण स्टार्ट कर दिया। लेकिन अब स्ट्रेटजी पूरी तरह से पलट चुकी है। दोस्तों भारत सरकार जानती है कि बॉर्डर को सुरक्षित रखने का मजबूत तरीका वहां फौज खड़ी करना नहीं है बल्कि वहां के गांव को आबाद करना है। जब बॉर्डर ट्रेड शुरू होता है तो ट्रांसपोर्ट का बिजनेस बढ़ता है। होटल्स खुलते हैं, ढाबे चलते हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है। व्यापार संघ के सचिव दौलत सिंह रायपा और स्थानीय विधायक लेसम सिमाई जैसे लोग जब इस ट्रेड के खुलने पर खुशी जताते हैं तो वह सिर्फ चंद रुपयों का मामला नहीं होता है। वह उस पूरे सीमांत इलाके की डेमोग्राफी को मजबूत करने का एक टूल होता है। जब तक सीमा पर हमारे नागरिक मौजूद हैं, व्यापार कर रहे हैं, तब तक चाइना का कोई भी इस्लामी स्लाइसिंग का मंसूबा कामयाब नहीं हो सकता है। दोस्तों, चाइना की बौखलाहट का एक और बड़ा कारण यह है कि भारत अब तक दो फ्रंट्स पर प्रोएक्टिव हो गया है। एक तरफ अरुणाचल प्रदेश के अंदर जिसे चाइना अपना हिस्सा बताने का झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है, वहां भारत पग साऊ पास पर म्यांमार के साथ में ट्रेड शुरू करके अपनी एडमिनिस्ट्रेटिव और सोवन पावर को ज्यादा एक्सपेंड कर रहा है।

दूसरी तरफ उत्तराखंड के लिपुलेख में भारत अपनी शर्तों पर ट्रकों से सामान लाद करके चाइना पर दबाव बना रहा है कि वह ट्रेड एग्रीमेंट का सम्मान करें। चाइना अगर व्यापार को ज्यादा दिन तक रोकता है तो तकलाकोट के स्थानीय तिब्बती लोगों के अंदर चाइना की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क जाएगा और अगर चाइना व्यापार खोलता है तो भारतीय व्यापारियों की आवाजाही से चाइना की उस दीवार के अंदर सुराख होगा जिसके पीछे वो अपनी मिलिट्री एक्टिविटी छुपाना चाहता है। दोस्तों ये भारत की तरफ से बिछाई गई एक ऐसी शतरंजी चाल है जिसमें ड्रैगन दोनों तरफ से मात खा रहा है। इस पूरे डेवलपमेंट का ग्लोबल एंगल भी दोस्तों समझना बेहद जरूरी है। आज दुनिया भारत को एक राइजिंग पावर के रूप में देख रही है। म्यांमार के अंदरूनी हालात बहुत ज्यादा खराब हैं। वेस्टर्न देश और अमेरिका म्यांमार के ऊपर सेंशंस लगा के बैठे हैं। दोस्तों, चाइना म्यांमार के विद्रोही गुटों को हथियार देकर के वहां अपना कंट्रोल बढ़ाना चाहता है। लेकिन भारत ने वहां की मिलिट्री या पॉलिटिक्स के अंदर सीधे उलझने की बजाय अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग के अंदर स्थानीय स्तर पर बॉर्डर ट्रेड खोल कर के म्यांमार की आम जनता और लोकल अथॉरिटीज के साथ में एक सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल किया है। भारतीय पक्ष के स्थानीय व्यापार संगठन के अध्यक्ष जोंगम मोरांग का यह कहना है कि इससे महामारी के दौरान हुई आजीविका वापस आएगी। यह दर्शाता है कि भारत म्यांमार के लोगों के लिए एक स्टेबलाइजर का काम कर रहा है। जब म्यांमार के लोग भारत से होने वाले इस ट्रेड के ऊपर डिपेंडेंट होंगे तो वहां चाइना का इन्फ्लुएंस अपने आप कमजोर पड़ने लगेगा। अब दोस्तों जरा सोचिए कि इस पूरे गेम में असल बात क्या है जो आम खबरों से मिस हो रही है। तो बात सिर्फ कुछ 100 ट्रकों या फिर महीने के अंदर तीन दिन लगने वाले हार्ट की नहीं है। बात है नेशनल कॉन्फिडेंस की। आज भारत की लीडरशिप ने यह तय कर लिया है कि हमारी सीमाएं हमारे लिए एंड पॉइंट नहीं है बल्कि हमारी ताकत का स्टार्टिंग पॉइंट है। लिपुलेख में ट्रकों की गर्जना और पेंगसाऊ में लगने वाला बाजार दोनों इस बात का ऐलान है कि भारत अपनी टेरिटोरियल इंटीग्रिटी के साथ-साथ अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। दोस्तों, विदेश मंत्रालय का समय पर ट्रेड परमिट जारी करना, कस्टम्स का तैयार रहना और बीआरओ का सड़कों को मोटरेबल बनाना यह दिखाता है कि भारत का सरकारी सिस्टम अब साइलोस के अंदर काम नहीं कर रहा है। डिफेंस, इकॉनमी और डिप्लोमेसी तीनों एक ही डायरेक्शन के अंदर सिंक होकर के काम कर रहे हैं। भविष्य के अंदर इसके बहुत गहरे परिणाम देखने को मिलेंगे। जैसे-जैसे लिपुलेख रूट के ऊपर ट्रकों की आवाजाही नॉर्मल होगी, यह रास्ता इंडो तिब्बत ट्रेड का सबसे बड़ा हब बन जाएगा। चाइना का तकलाकोट वेयर हाउस चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो, उसे भारतीय इकॉनमी की सप्लाई चेन से जुड़ना ही पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर म्यांमार बॉर्डर के ऊपर शुरू हो रहा ट्रेड पूर्वोत्तर भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को एक नया जीवन देगा। दोस्तों, यह सब दिखाता है कि 21वीं सदी का भारत अब केवल रेस्पोंड नहीं करता है बल्कि वो नैरेटिव सेट करता है और दुश्मन को अपने बनाए हुए मैदान पर खेलने के लिए मजबूर करता है। 



अब दोस्तों आपको क्या लगता है? चाइना ने जो तकलाकोट में नया वेयर हाउस बनाने का बहाना दिया है। क्या वो सिर्फ एक व्यापारिक सुविधा है 

या फिर पीएलए द्वारा गुपचुप तरीके से कोई बड़ा मिलिट्री बेस तैयार किया जा रहा है जिसे वो दुनिया की नजरों से छिपाना चाहता है? और क्या भारत का एक ही वक्त के अंदर नेपाल बॉर्डर, चाइना बॉर्डर और म्यांमार बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेड को एग्रेसिव तरीके से पुश करना चाइना को काउंटर करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। अपनी राय जरूर लिखें। नमस्कार दोस्तों।



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तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़
तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़
तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

 दोस्तों, उत्तराखंड के धारचुला में भारतीय व्यापारी पूरी तरह से तैयार थे। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से ट्रेड परमिट हाथों के अंदर था। कस्टम क्लीयरेंस हो चुकी थी और जिला प्रशासन ने अपनी सारी तैयारियां मुकम्मल कर ली थी। सदियों से खच्चरों की पीठ पर लद कर के जाने वाला सामान इस बार ट्रकों के अंदर भरा हुआ था। लेकिन बॉर्डर पार करने से ठीक 24 घंटे पहले यानी कि 7 जुलाई को धारचला के एसडीएम आशीष जोशी की डेस्क पर एक सीमा पार से एक ईमेल फ्लैश होता है। यह ईमेल चाइनीस ऑफिशियल्स का था। संदेश छोटा लेकिन बेहद चौंकाने वाला था। अभी रुक जाइए। भारतीय व्यापारियों को सीमा पार मत भेजिए। बहाना यह बनाया गया कि तिब्बत के तकलाकोट के अंदर एक नया मार्केट प्लेस और वेयर हाउसेस यानी कि गोदाम बन रहा है और जब तक यह कंस्ट्रक्शन पूरा नहीं हो जाता ट्रेड शुरू नहीं हो सकता है। लेकिन दोस्तों जरा सोचिए जिस व्यापार का सीजन आधिकारिक तौर पर 1 जून से स्टार्ट हो चुका था उसके लिए चाइना 7 जुलाई को अचानक कंस्ट्रक्शन का बहाना क्यों बना रहा था? क्या यह वाकई सिर्फ एक ईंट पत्थर का गोदाम है? या फिर चाइना 6 साल से बंद पड़े इस रूट की आड़ में कोई नया मिलिट्री या फिर फॉरवर्ड लॉजिस्टिक बेस तैयार कर रहा है जिसे वह अभी भारतीयों की नजरों से छिपाना चाहता है। और सबसे बड़ा सवाल ठीक इसी वक्त यानी जुलाई के इसी महीने में हजारों किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश के पेंगसाऊ दर्रे पर म्यांमार के साथ भी 6 साल बाद बॉर्डर ट्रेड अचानक से क्यों खुल रहा है? क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है या फिर नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठी भारत सरकार ने कोई ऐसा मास्टर स्ट्रोक चला है जिसने एक ही वक्त के अंदर भारत के दो सबसे बड़े कॉम्प्लेक्स बॉर्डर्स के ऊपर एक नया जिओपॉलिटिकल गेम सेट कर दिया है। दोस्तों आज हम सिर्फ एक व्यापार की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं भारत की उस अग्रेसिव बॉर्डर स्ट्रेटजी की जिसने खच्चरों के युग को खत्म करके ट्रकों की एंट्री करवा दी है और चाइना को उसके ही बिछाए जाल में सोचने पर मजबूर कर दिया है। दोस्तों इस पूरी कहानी को समझने के लिए आपको 2020 के उस दौर में जाना होगा जब कोविड-19 महामारी के कारण भारत चाइना और भारत म्यांमार दोनों सीमाओं पर ट्रेड लिंक पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। पिछले छ सालों के अंदर दुनिया बदल गई जो पॉलिटिकल समीकरण बदल गए और सबसे अहम बात भारत का बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से ट्रांसफॉर्म हो गया है। लिपुलेख दर्रे से होने वाला भारत तिब्बत सीमा व्यापार कोई आम व्यापार नहीं है। यह ऐतिहासिक रूट सदियों से उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों की इकॉनमी की रीड रहा है। लेकिन साल 2020 के बाद से यहां सन्नाटा पसर गया था। अब दोस्तों 6 सालों के लंबे अंतराल के बाद में जब इसे दोबारा से शुरू करने का वक्त आया तो भारत ने एक ऐसा दांव चला जिसकी उम्मीद चाइना ने शायद कभी नहीं की थी। दोस्तों इस साल सीबा व्यापार में एक ऐतिहासिक बदलाव किया गया है। साल 2020 से पहले भारतीय व्यापारियों को अपने सामान तिब्बत तक पहुंचाने के लिए हफ्तों तक खच्चरों और पैदल रास्तों के ऊपर सहारा लेते हुए आगे बढ़ना पड़ता था। लेकिन इन छ सालों के अंदर भारत के बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन यानी कि बीआरओ ने पहाड़ों का सीना चीर करके धारचुला लिपुलेख सड़क का निर्माण पूरा कर दिया है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं है। यह भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी का सबसे बड़ा सबूत है। अब दोस्तों, पहली बार भारतीय व्यापारी अपने सामान को सीधे ट्रकों और गाड़ियों के जरिए भारत, तिब्बत सीमा पर स्थित इंडो तिब्बतियन ट्रेड पॉइंट तक पहुंचा सकेंगी।


ट्रकों की इस एंट्री ने चाइना की रातों की नींद हराम कर दी है। क्योंकि चाइना बहुत अच्छे तरीके से जानता है कि जो सड़क आज व्यापारियों के ट्रकों को बॉर्डर तक ला रही है वही सड़क जरूरत पड़ने पर इंडियन आर्मी के ट्रकों, आर्टलरी और लॉजिस्टिक्स को भी कुछ ही घंटों के अंदर लिपुलेखक के टॉप तक पहुंचा सकती है। दोस्तों, लिपुलेख कोई आम जगह नहीं है। यह भारत, नेपाल और चाइना का एक बेहद सेंसिटिव ट्राईजक्शन है। ऐसे में दोस्तों भारत का यह रैपिड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चाइना के लिए एक सीधा मैसेज है कि 1962 का भारत अब इतिहास बन चुका है। लेकिन दोस्तों कहानी में असली ट्विस्ट अब आता है। सड़क बन गई, गाड़ियां बॉर्डर तक पहुंच गई लेकिन फिर भी एक पेंच फंसा हुआ है। ट्रकों से सामान उतारने के बाद में भारतीय व्यापारियों को आज भी चाइना के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए लगभग 2 कि.मी. पैदल चलना पड़ेगा। आखिर क्यों? तो दोस्तों, यह वो नौ मैनस लैंड और चाइनीस टेरिटरी का वो बफर जोन है जहां ड्रैगन अपना साइकोलॉजिकल गेम खेल रहा है। वो 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता सिर्फ एक भौगोलिक दूरी नहीं है बल्कि यह चाइना की उस सोची समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वो भारतीय पहुंच को एक लिमिट तक रिस्ट्रिक्ट करना चाहता है और इसी 2 कि.मी. के उस पार तिब्बत के तकलाकोट के अंदर वह रहस्यमई वेयर हाउस बन रहा है। अब दोस्तों जरा चाइना के उस ईमेल को डिकोड करते हैं जो 7 जुलाई को आया। चाइना यह कह रहा है कि वो मार्केट प्लेस बना रहा है। लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स और जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट इस बात को बखूबी समझते हैं कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी कि पीएलए की डिक्शनरी के अंदर सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की कोई जगह नहीं होती है। चाइना तिब्बत के बॉर्डर एरियाज के अंदर जो भी बनाता है वो ड्यूल यूज़ का होता है। यानी कि शांति के वक्त वो गोदाम या फिर गांव हो सकता है। लेकिन युद्ध या तनाव के वक्त वो सीधा मिलिट्री बेस बन जाता है।


 दोस्तों इस बात की पूरी संभावना है कि टकलाकोट में रातोंरात जो कंस्ट्रक्शन चल रहा है वो पीएलए के लिए विंटर लॉजिस्टिक राशन कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स या फिर सर्लांस सिस्टम स्टोर करने का एक फॉरवर्ड बेस हो। दोस्तों, चाइना नहीं चाहता है कि भारतीय व्यापारी अभी वहां आए और अपनी आंखों से उस बड़े कंस्ट्रक्शन का स्केल देखें। क्योंकि व्यापारी जब सीमा पार जाते हैं तो वह सिर्फ सामान नहीं ले जाते हैं। वो वहां की टेपोग्राफी, मिलिट्री मूवमेंट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की जानकारी का एक बड़ा सोर्स भी होते हैं। चाइना इसी ह्यूमन इंटेलिजेंस को ब्लॉक करने के लिए 7 जुलाई का वो ईमेल भेज के टाइम पास कर रहा है। लेकिन भारत भी अब चुप बैठने वाला नहीं है। नई दिल्ली की स्ट्रेटेजिक थिंकिंग अब डिफेंसिव से ऑफेंसिव हो चुकी है और इसका सबसे बड़ा सबूत आपको भारत के पूर्वी छोर पर मिलेगा। दोस्तों एक तरफ चाइना लिपुलेख में चालबाजी कर रहा है और ठीक उसी वक्त भारत ने अरुणाचल प्रदेश के चांगला जिले के अंदर भारत म्यांमार सीमा पर पेंग साऊ दर्रे से व्यापार को फिर से खोलने का ऐलान कर दिया है। यह टाइमिंग कोई संयोग नहीं है। 3 फरवरी 2020 को बंद हुआ यह ट्रेड लिंक 20 जुलाई से दोबारा शुरू होने जा रहा है। दोस्तों 9 जुलाई को अरुणाचल के चांगलांग के अंदर भारतीय व्यापार प्रतिनिधियों और म्यांमार के उनके समकक्षों के बीच में एक बेहद अहम मीटिंग हुई है और इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया है। म्यांमार इस वक्त एक भयानक गृह युद्ध से जूझ रहा है। वहां की मिलिट्री जुमटा और विद्रोही गुटों के बीच में खूनी संघर्ष चल रहा है। दोस्तों ऐसे मुश्किल वक्त में भी भारत का वहां बॉर्डर ट्रेड शुरू करना एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और सुरक्षा दांव है। यहां भारत सरकार ने एक बहुत ही शार्प पॉलिसी का इस्तेमाल किया है जिसे फ्री मूवमेंट रिजीम यानी कि एफएमआर कहा जाता है। वैसे तो दोस्तों एफएमआर को लेकर के देश में काफी बहस चल रही है और सुरक्षा कारणों से इसे कई जगह सस्पेंड भी कर दिया गया है। लेकिन चांगलांग के अंदर इसे बहुत ही कैलकुलेटेड तरीके से लागू किया जा रहा है। इसके तहत सीमा के दोनों ओर 10 कि.मी. के दायरे में रहने वाले लोगों को स्थानीय व्यापार और लेनदेन की छूट मिलेगी। लेकिन जरा दोस्तों सुरक्षा एजेंसियों के दिमाग को दाद दीजिए। यह बॉर्डर हार्ट हर दिन नहीं लगेगी।

 इसके लिए महीने की केवल 10, 20 और 30 तारीख ही चुनी गई है। आखिर ये तीन डेट ही क्यों चुनी गई है? क्योंकि 10, 20 और 30 तारीख का यह फार्मूला हमारी सुरक्षा एजेंसियों, असम राइफल्स और इंटेलिजेंस ग्रिड को बॉर्डर मैनेजमेंट के अंदर एक स्ट्रक्चरल कंट्रोल देता है। अगर बॉर्डर हर दिन खुला रहेगा तो इंसजेंसी वेपनरी की तस्करी और इललीगल माइग्रेशन का खतरा बढ़ जाएगा। लेकिन दोस्तों महीने के अंदर सिर्फ तीन दिन तक ही एक फिक्स डेट के ऊपर ही हार्ट लगने से फोर्सेस को पता होगा कि भीड़ कब आएगी, मॉनिटरिंग कैसे करनी है और ट्रेड को सुरक्षित कैसे रखना है। यह सिक्योरिटी और इकॉनमी का एक परफेक्ट बैलेंस है। अब दोस्तों जरा इस लोकल बॉर्डर इकॉनमी के स्केल को समझिए। सुनने में आपको शायद अजीब लगे कि आज के हाईटेक जमाने में भारतीय व्यापारी लिपुलेखक से गुड़, मिश्री, माचिस और बर्तन जैसी मामूली चीजें लेकर के तिब्बत जा रहे हैं। लेकिन असली खेल इन चीजों का नहीं है। असली खेल उस डिपेंडेंसी का है। तिब्बत के उस दुर्गम इलाके के अंदर रहने वाले लोगों के लिए भारत से जाने वाला यह सामान किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है। वहां ऑक्सीजन कम है, सर्वाइवल मुश्किल है और चाइना की सप्लाई चेन हमेशा रिलायबल

नहीं होती है। तिब्बती लोग सदियों से भारतीय गुड़ और माचिस के ऊपर जिंदा है। बदले में वहां से जो ऊन, चरू, पशमीना, कीमती पत्थर और कंबल भारत आते हैं। उनकी डिमांड भारतीय बाजारों के अंदर बहुत ज्यादा होती है। इस करोड़ों रुपए के ट्रेड से सीधा फायदा व्यास दर्मा और चौदास घाटी के अंदर रहने वाले हमारे भारतीय नागरिकों को होता है और यहीं पर एंट्री होती है मोदी सरकार की उस सबसे बड़ी पॉलिसी की जिसने चाइना की नींद उड़ा रखी है वो है वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम। दोस्तों दशकों तक भारत की नीति यह थी कि बॉर्डर को खाली रखो। सड़कें मत बनाओ ताकि दुश्मन अंदर ना

आ सके। इस डरपोक नीति का नतीजा यह हुआ कि हमारे बॉर्डर के गांव खाली हो गए। लोग पलायन कर गए और चाइना ने खाली जगह देख के वहां पर अतिक्रमण स्टार्ट कर दिया। लेकिन अब स्ट्रेटजी पूरी तरह से पलट चुकी है। दोस्तों भारत सरकार जानती है कि बॉर्डर को सुरक्षित रखने का मजबूत तरीका वहां फौज खड़ी करना नहीं है बल्कि वहां के गांव को आबाद करना है। जब बॉर्डर ट्रेड शुरू होता है तो ट्रांसपोर्ट का बिजनेस बढ़ता है। होटल्स खुलते हैं, ढाबे चलते हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है। व्यापार संघ के सचिव दौलत सिंह रायपा और स्थानीय विधायक लेसम सिमाई जैसे लोग जब इस ट्रेड के खुलने पर खुशी जताते हैं तो वह सिर्फ चंद रुपयों का मामला नहीं होता है। वह उस पूरे सीमांत इलाके की डेमोग्राफी को मजबूत करने का एक टूल होता है। जब तक सीमा पर हमारे नागरिक मौजूद हैं, व्यापार कर रहे हैं, तब तक चाइना का कोई भी इस्लामी स्लाइसिंग का मंसूबा कामयाब नहीं हो सकता है। दोस्तों, चाइना की बौखलाहट का एक और बड़ा कारण यह है कि भारत अब तक दो फ्रंट्स पर प्रोएक्टिव हो गया है। एक तरफ अरुणाचल प्रदेश के अंदर जिसे चाइना अपना हिस्सा बताने का झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है, वहां भारत पग साऊ पास पर म्यांमार के साथ में ट्रेड शुरू करके अपनी एडमिनिस्ट्रेटिव और सोवन पावर को ज्यादा एक्सपेंड कर रहा है।

दूसरी तरफ उत्तराखंड के लिपुलेख में भारत अपनी शर्तों पर ट्रकों से सामान लाद करके चाइना पर दबाव बना रहा है कि वह ट्रेड एग्रीमेंट का सम्मान करें। चाइना अगर व्यापार को ज्यादा दिन तक रोकता है तो तकलाकोट के स्थानीय तिब्बती लोगों के अंदर चाइना की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क जाएगा और अगर चाइना व्यापार खोलता है तो भारतीय व्यापारियों की आवाजाही से चाइना की उस दीवार के अंदर सुराख होगा जिसके पीछे वो अपनी मिलिट्री एक्टिविटी छुपाना चाहता है। दोस्तों ये भारत की तरफ से बिछाई गई एक ऐसी शतरंजी चाल है जिसमें ड्रैगन दोनों तरफ से मात खा रहा है। इस पूरे डेवलपमेंट का ग्लोबल एंगल भी दोस्तों समझना बेहद जरूरी है। आज दुनिया भारत को एक राइजिंग पावर के रूप में देख रही है। म्यांमार के अंदरूनी हालात बहुत ज्यादा खराब हैं। वेस्टर्न देश और अमेरिका म्यांमार के ऊपर सेंशंस लगा के बैठे हैं। दोस्तों, चाइना म्यांमार के विद्रोही गुटों को हथियार देकर के वहां अपना कंट्रोल बढ़ाना चाहता है। लेकिन भारत ने वहां की मिलिट्री या पॉलिटिक्स के अंदर सीधे उलझने की बजाय अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग के अंदर स्थानीय स्तर पर बॉर्डर ट्रेड खोल कर के म्यांमार की आम जनता और लोकल अथॉरिटीज के साथ में एक सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल किया है। भारतीय पक्ष के स्थानीय व्यापार संगठन के अध्यक्ष जोंगम मोरांग का यह कहना है कि इससे महामारी के दौरान हुई आजीविका वापस आएगी। यह दर्शाता है कि भारत म्यांमार के लोगों के लिए एक स्टेबलाइजर का काम कर रहा है। जब म्यांमार के लोग भारत से होने वाले इस ट्रेड के ऊपर डिपेंडेंट होंगे तो वहां चाइना का इन्फ्लुएंस अपने आप कमजोर पड़ने लगेगा। अब दोस्तों जरा सोचिए कि इस पूरे गेम में असल बात क्या है जो आम खबरों से मिस हो रही है। तो बात सिर्फ कुछ 100 ट्रकों या फिर महीने के अंदर तीन दिन लगने वाले हार्ट की नहीं है। बात है नेशनल कॉन्फिडेंस की। आज भारत की लीडरशिप ने यह तय कर लिया है कि हमारी सीमाएं हमारे लिए एंड पॉइंट नहीं है बल्कि हमारी ताकत का स्टार्टिंग पॉइंट है। लिपुलेख में ट्रकों की गर्जना और पेंगसाऊ में लगने वाला बाजार दोनों इस बात का ऐलान है कि भारत अपनी टेरिटोरियल इंटीग्रिटी के साथ-साथ अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। दोस्तों, विदेश मंत्रालय का समय पर ट्रेड परमिट जारी करना, कस्टम्स का तैयार रहना और बीआरओ का सड़कों को मोटरेबल बनाना यह दिखाता है कि भारत का सरकारी सिस्टम अब साइलोस के अंदर काम नहीं कर रहा है। डिफेंस, इकॉनमी और डिप्लोमेसी तीनों एक ही डायरेक्शन के अंदर सिंक होकर के काम कर रहे हैं। भविष्य के अंदर इसके बहुत गहरे परिणाम देखने को मिलेंगे। जैसे-जैसे लिपुलेख रूट के ऊपर ट्रकों की आवाजाही नॉर्मल होगी, यह रास्ता इंडो तिब्बत ट्रेड का सबसे बड़ा हब बन जाएगा। चाइना का तकलाकोट वेयर हाउस चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो, उसे भारतीय इकॉनमी की सप्लाई चेन से जुड़ना ही पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर म्यांमार बॉर्डर के ऊपर शुरू हो रहा ट्रेड पूर्वोत्तर भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को एक नया जीवन देगा। दोस्तों, यह सब दिखाता है कि 21वीं सदी का भारत अब केवल रेस्पोंड नहीं करता है बल्कि वो नैरेटिव सेट करता है और दुश्मन को अपने बनाए हुए मैदान पर खेलने के लिए मजबूर करता है। 



अब दोस्तों आपको क्या लगता है? चाइना ने जो तकलाकोट में नया वेयर हाउस बनाने का बहाना दिया है। क्या वो सिर्फ एक व्यापारिक सुविधा है 

या फिर पीएलए द्वारा गुपचुप तरीके से कोई बड़ा मिलिट्री बेस तैयार किया जा रहा है जिसे वो दुनिया की नजरों से छिपाना चाहता है? और क्या भारत का एक ही वक्त के अंदर नेपाल बॉर्डर, चाइना बॉर्डर और म्यांमार बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेड को एग्रेसिव तरीके से पुश करना चाइना को काउंटर करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। अपनी राय जरूर लिखें। नमस्कार दोस्तों।



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तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़
तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

 दोस्तों, उत्तराखंड के धारचुला में भारतीय व्यापारी पूरी तरह से तैयार थे। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से ट्रेड परमिट हाथों के अंदर था। कस्टम क्लीयरेंस हो चुकी थी और जिला प्रशासन ने अपनी सारी तैयारियां मुकम्मल कर ली थी। सदियों से खच्चरों की पीठ पर लद कर के जाने वाला सामान इस बार ट्रकों के अंदर भरा हुआ था। लेकिन बॉर्डर पार करने से ठीक 24 घंटे पहले यानी कि 7 जुलाई को धारचला के एसडीएम आशीष जोशी की डेस्क पर एक सीमा पार से एक ईमेल फ्लैश होता है। यह ईमेल चाइनीस ऑफिशियल्स का था। संदेश छोटा लेकिन बेहद चौंकाने वाला था। अभी रुक जाइए। भारतीय व्यापारियों को सीमा पार मत भेजिए। बहाना यह बनाया गया कि तिब्बत के तकलाकोट के अंदर एक नया मार्केट प्लेस और वेयर हाउसेस यानी कि गोदाम बन रहा है और जब तक यह कंस्ट्रक्शन पूरा नहीं हो जाता ट्रेड शुरू नहीं हो सकता है। लेकिन दोस्तों जरा सोचिए जिस व्यापार का सीजन आधिकारिक तौर पर 1 जून से स्टार्ट हो चुका था उसके लिए चाइना 7 जुलाई को अचानक कंस्ट्रक्शन का बहाना क्यों बना रहा था? क्या यह वाकई सिर्फ एक ईंट पत्थर का गोदाम है? या फिर चाइना 6 साल से बंद पड़े इस रूट की आड़ में कोई नया मिलिट्री या फिर फॉरवर्ड लॉजिस्टिक बेस तैयार कर रहा है जिसे वह अभी भारतीयों की नजरों से छिपाना चाहता है। और सबसे बड़ा सवाल ठीक इसी वक्त यानी जुलाई के इसी महीने में हजारों किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश के पेंगसाऊ दर्रे पर म्यांमार के साथ भी 6 साल बाद बॉर्डर ट्रेड अचानक से क्यों खुल रहा है? क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है या फिर नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठी भारत सरकार ने कोई ऐसा मास्टर स्ट्रोक चला है जिसने एक ही वक्त के अंदर भारत के दो सबसे बड़े कॉम्प्लेक्स बॉर्डर्स के ऊपर एक नया जिओपॉलिटिकल गेम सेट कर दिया है। दोस्तों आज हम सिर्फ एक व्यापार की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं भारत की उस अग्रेसिव बॉर्डर स्ट्रेटजी की जिसने खच्चरों के युग को खत्म करके ट्रकों की एंट्री करवा दी है और चाइना को उसके ही बिछाए जाल में सोचने पर मजबूर कर दिया है। दोस्तों इस पूरी कहानी को समझने के लिए आपको 2020 के उस दौर में जाना होगा जब कोविड-19 महामारी के कारण भारत चाइना और भारत म्यांमार दोनों सीमाओं पर ट्रेड लिंक पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। पिछले छ सालों के अंदर दुनिया बदल गई जो पॉलिटिकल समीकरण बदल गए और सबसे अहम बात भारत का बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से ट्रांसफॉर्म हो गया है। लिपुलेख दर्रे से होने वाला भारत तिब्बत सीमा व्यापार कोई आम व्यापार नहीं है। यह ऐतिहासिक रूट सदियों से उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों की इकॉनमी की रीड रहा है। लेकिन साल 2020 के बाद से यहां सन्नाटा पसर गया था। अब दोस्तों 6 सालों के लंबे अंतराल के बाद में जब इसे दोबारा से शुरू करने का वक्त आया तो भारत ने एक ऐसा दांव चला जिसकी उम्मीद चाइना ने शायद कभी नहीं की थी। दोस्तों इस साल सीबा व्यापार में एक ऐतिहासिक बदलाव किया गया है। साल 2020 से पहले भारतीय व्यापारियों को अपने सामान तिब्बत तक पहुंचाने के लिए हफ्तों तक खच्चरों और पैदल रास्तों के ऊपर सहारा लेते हुए आगे बढ़ना पड़ता था। लेकिन इन छ सालों के अंदर भारत के बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन यानी कि बीआरओ ने पहाड़ों का सीना चीर करके धारचुला लिपुलेख सड़क का निर्माण पूरा कर दिया है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं है। यह भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी का सबसे बड़ा सबूत है। अब दोस्तों, पहली बार भारतीय व्यापारी अपने सामान को सीधे ट्रकों और गाड़ियों के जरिए भारत, तिब्बत सीमा पर स्थित इंडो तिब्बतियन ट्रेड पॉइंट तक पहुंचा सकेंगी।


ट्रकों की इस एंट्री ने चाइना की रातों की नींद हराम कर दी है। क्योंकि चाइना बहुत अच्छे तरीके से जानता है कि जो सड़क आज व्यापारियों के ट्रकों को बॉर्डर तक ला रही है वही सड़क जरूरत पड़ने पर इंडियन आर्मी के ट्रकों, आर्टलरी और लॉजिस्टिक्स को भी कुछ ही घंटों के अंदर लिपुलेखक के टॉप तक पहुंचा सकती है। दोस्तों, लिपुलेख कोई आम जगह नहीं है। यह भारत, नेपाल और चाइना का एक बेहद सेंसिटिव ट्राईजक्शन है। ऐसे में दोस्तों भारत का यह रैपिड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चाइना के लिए एक सीधा मैसेज है कि 1962 का भारत अब इतिहास बन चुका है। लेकिन दोस्तों कहानी में असली ट्विस्ट अब आता है। सड़क बन गई, गाड़ियां बॉर्डर तक पहुंच गई लेकिन फिर भी एक पेंच फंसा हुआ है। ट्रकों से सामान उतारने के बाद में भारतीय व्यापारियों को आज भी चाइना के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए लगभग 2 कि.मी. पैदल चलना पड़ेगा। आखिर क्यों? तो दोस्तों, यह वो नौ मैनस लैंड और चाइनीस टेरिटरी का वो बफर जोन है जहां ड्रैगन अपना साइकोलॉजिकल गेम खेल रहा है। वो 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता सिर्फ एक भौगोलिक दूरी नहीं है बल्कि यह चाइना की उस सोची समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वो भारतीय पहुंच को एक लिमिट तक रिस्ट्रिक्ट करना चाहता है और इसी 2 कि.मी. के उस पार तिब्बत के तकलाकोट के अंदर वह रहस्यमई वेयर हाउस बन रहा है। अब दोस्तों जरा चाइना के उस ईमेल को डिकोड करते हैं जो 7 जुलाई को आया। चाइना यह कह रहा है कि वो मार्केट प्लेस बना रहा है। लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स और जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट इस बात को बखूबी समझते हैं कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी कि पीएलए की डिक्शनरी के अंदर सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की कोई जगह नहीं होती है। चाइना तिब्बत के बॉर्डर एरियाज के अंदर जो भी बनाता है वो ड्यूल यूज़ का होता है। यानी कि शांति के वक्त वो गोदाम या फिर गांव हो सकता है। लेकिन युद्ध या तनाव के वक्त वो सीधा मिलिट्री बेस बन जाता है।


 दोस्तों इस बात की पूरी संभावना है कि टकलाकोट में रातोंरात जो कंस्ट्रक्शन चल रहा है वो पीएलए के लिए विंटर लॉजिस्टिक राशन कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स या फिर सर्लांस सिस्टम स्टोर करने का एक फॉरवर्ड बेस हो। दोस्तों, चाइना नहीं चाहता है कि भारतीय व्यापारी अभी वहां आए और अपनी आंखों से उस बड़े कंस्ट्रक्शन का स्केल देखें। क्योंकि व्यापारी जब सीमा पार जाते हैं तो वह सिर्फ सामान नहीं ले जाते हैं। वो वहां की टेपोग्राफी, मिलिट्री मूवमेंट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की जानकारी का एक बड़ा सोर्स भी होते हैं। चाइना इसी ह्यूमन इंटेलिजेंस को ब्लॉक करने के लिए 7 जुलाई का वो ईमेल भेज के टाइम पास कर रहा है। लेकिन भारत भी अब चुप बैठने वाला नहीं है। नई दिल्ली की स्ट्रेटेजिक थिंकिंग अब डिफेंसिव से ऑफेंसिव हो चुकी है और इसका सबसे बड़ा सबूत आपको भारत के पूर्वी छोर पर मिलेगा। दोस्तों एक तरफ चाइना लिपुलेख में चालबाजी कर रहा है और ठीक उसी वक्त भारत ने अरुणाचल प्रदेश के चांगला जिले के अंदर भारत म्यांमार सीमा पर पेंग साऊ दर्रे से व्यापार को फिर से खोलने का ऐलान कर दिया है। यह टाइमिंग कोई संयोग नहीं है। 3 फरवरी 2020 को बंद हुआ यह ट्रेड लिंक 20 जुलाई से दोबारा शुरू होने जा रहा है। दोस्तों 9 जुलाई को अरुणाचल के चांगलांग के अंदर भारतीय व्यापार प्रतिनिधियों और म्यांमार के उनके समकक्षों के बीच में एक बेहद अहम मीटिंग हुई है और इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया है। म्यांमार इस वक्त एक भयानक गृह युद्ध से जूझ रहा है। वहां की मिलिट्री जुमटा और विद्रोही गुटों के बीच में खूनी संघर्ष चल रहा है। दोस्तों ऐसे मुश्किल वक्त में भी भारत का वहां बॉर्डर ट्रेड शुरू करना एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और सुरक्षा दांव है। यहां भारत सरकार ने एक बहुत ही शार्प पॉलिसी का इस्तेमाल किया है जिसे फ्री मूवमेंट रिजीम यानी कि एफएमआर कहा जाता है। वैसे तो दोस्तों एफएमआर को लेकर के देश में काफी बहस चल रही है और सुरक्षा कारणों से इसे कई जगह सस्पेंड भी कर दिया गया है। लेकिन चांगलांग के अंदर इसे बहुत ही कैलकुलेटेड तरीके से लागू किया जा रहा है। इसके तहत सीमा के दोनों ओर 10 कि.मी. के दायरे में रहने वाले लोगों को स्थानीय व्यापार और लेनदेन की छूट मिलेगी। लेकिन जरा दोस्तों सुरक्षा एजेंसियों के दिमाग को दाद दीजिए। यह बॉर्डर हार्ट हर दिन नहीं लगेगी।

 इसके लिए महीने की केवल 10, 20 और 30 तारीख ही चुनी गई है। आखिर ये तीन डेट ही क्यों चुनी गई है? क्योंकि 10, 20 और 30 तारीख का यह फार्मूला हमारी सुरक्षा एजेंसियों, असम राइफल्स और इंटेलिजेंस ग्रिड को बॉर्डर मैनेजमेंट के अंदर एक स्ट्रक्चरल कंट्रोल देता है। अगर बॉर्डर हर दिन खुला रहेगा तो इंसजेंसी वेपनरी की तस्करी और इललीगल माइग्रेशन का खतरा बढ़ जाएगा। लेकिन दोस्तों महीने के अंदर सिर्फ तीन दिन तक ही एक फिक्स डेट के ऊपर ही हार्ट लगने से फोर्सेस को पता होगा कि भीड़ कब आएगी, मॉनिटरिंग कैसे करनी है और ट्रेड को सुरक्षित कैसे रखना है। यह सिक्योरिटी और इकॉनमी का एक परफेक्ट बैलेंस है। अब दोस्तों जरा इस लोकल बॉर्डर इकॉनमी के स्केल को समझिए। सुनने में आपको शायद अजीब लगे कि आज के हाईटेक जमाने में भारतीय व्यापारी लिपुलेखक से गुड़, मिश्री, माचिस और बर्तन जैसी मामूली चीजें लेकर के तिब्बत जा रहे हैं। लेकिन असली खेल इन चीजों का नहीं है। असली खेल उस डिपेंडेंसी का है। तिब्बत के उस दुर्गम इलाके के अंदर रहने वाले लोगों के लिए भारत से जाने वाला यह सामान किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है। वहां ऑक्सीजन कम है, सर्वाइवल मुश्किल है और चाइना की सप्लाई चेन हमेशा रिलायबल

नहीं होती है। तिब्बती लोग सदियों से भारतीय गुड़ और माचिस के ऊपर जिंदा है। बदले में वहां से जो ऊन, चरू, पशमीना, कीमती पत्थर और कंबल भारत आते हैं। उनकी डिमांड भारतीय बाजारों के अंदर बहुत ज्यादा होती है। इस करोड़ों रुपए के ट्रेड से सीधा फायदा व्यास दर्मा और चौदास घाटी के अंदर रहने वाले हमारे भारतीय नागरिकों को होता है और यहीं पर एंट्री होती है मोदी सरकार की उस सबसे बड़ी पॉलिसी की जिसने चाइना की नींद उड़ा रखी है वो है वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम। दोस्तों दशकों तक भारत की नीति यह थी कि बॉर्डर को खाली रखो। सड़कें मत बनाओ ताकि दुश्मन अंदर ना

आ सके। इस डरपोक नीति का नतीजा यह हुआ कि हमारे बॉर्डर के गांव खाली हो गए। लोग पलायन कर गए और चाइना ने खाली जगह देख के वहां पर अतिक्रमण स्टार्ट कर दिया। लेकिन अब स्ट्रेटजी पूरी तरह से पलट चुकी है। दोस्तों भारत सरकार जानती है कि बॉर्डर को सुरक्षित रखने का मजबूत तरीका वहां फौज खड़ी करना नहीं है बल्कि वहां के गांव को आबाद करना है। जब बॉर्डर ट्रेड शुरू होता है तो ट्रांसपोर्ट का बिजनेस बढ़ता है। होटल्स खुलते हैं, ढाबे चलते हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है। व्यापार संघ के सचिव दौलत सिंह रायपा और स्थानीय विधायक लेसम सिमाई जैसे लोग जब इस ट्रेड के खुलने पर खुशी जताते हैं तो वह सिर्फ चंद रुपयों का मामला नहीं होता है। वह उस पूरे सीमांत इलाके की डेमोग्राफी को मजबूत करने का एक टूल होता है। जब तक सीमा पर हमारे नागरिक मौजूद हैं, व्यापार कर रहे हैं, तब तक चाइना का कोई भी इस्लामी स्लाइसिंग का मंसूबा कामयाब नहीं हो सकता है। दोस्तों, चाइना की बौखलाहट का एक और बड़ा कारण यह है कि भारत अब तक दो फ्रंट्स पर प्रोएक्टिव हो गया है। एक तरफ अरुणाचल प्रदेश के अंदर जिसे चाइना अपना हिस्सा बताने का झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है, वहां भारत पग साऊ पास पर म्यांमार के साथ में ट्रेड शुरू करके अपनी एडमिनिस्ट्रेटिव और सोवन पावर को ज्यादा एक्सपेंड कर रहा है।

दूसरी तरफ उत्तराखंड के लिपुलेख में भारत अपनी शर्तों पर ट्रकों से सामान लाद करके चाइना पर दबाव बना रहा है कि वह ट्रेड एग्रीमेंट का सम्मान करें। चाइना अगर व्यापार को ज्यादा दिन तक रोकता है तो तकलाकोट के स्थानीय तिब्बती लोगों के अंदर चाइना की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क जाएगा और अगर चाइना व्यापार खोलता है तो भारतीय व्यापारियों की आवाजाही से चाइना की उस दीवार के अंदर सुराख होगा जिसके पीछे वो अपनी मिलिट्री एक्टिविटी छुपाना चाहता है। दोस्तों ये भारत की तरफ से बिछाई गई एक ऐसी शतरंजी चाल है जिसमें ड्रैगन दोनों तरफ से मात खा रहा है। इस पूरे डेवलपमेंट का ग्लोबल एंगल भी दोस्तों समझना बेहद जरूरी है। आज दुनिया भारत को एक राइजिंग पावर के रूप में देख रही है। म्यांमार के अंदरूनी हालात बहुत ज्यादा खराब हैं। वेस्टर्न देश और अमेरिका म्यांमार के ऊपर सेंशंस लगा के बैठे हैं। दोस्तों, चाइना म्यांमार के विद्रोही गुटों को हथियार देकर के वहां अपना कंट्रोल बढ़ाना चाहता है। लेकिन भारत ने वहां की मिलिट्री या पॉलिटिक्स के अंदर सीधे उलझने की बजाय अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग के अंदर स्थानीय स्तर पर बॉर्डर ट्रेड खोल कर के म्यांमार की आम जनता और लोकल अथॉरिटीज के साथ में एक सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल किया है। भारतीय पक्ष के स्थानीय व्यापार संगठन के अध्यक्ष जोंगम मोरांग का यह कहना है कि इससे महामारी के दौरान हुई आजीविका वापस आएगी। यह दर्शाता है कि भारत म्यांमार के लोगों के लिए एक स्टेबलाइजर का काम कर रहा है। जब म्यांमार के लोग भारत से होने वाले इस ट्रेड के ऊपर डिपेंडेंट होंगे तो वहां चाइना का इन्फ्लुएंस अपने आप कमजोर पड़ने लगेगा। अब दोस्तों जरा सोचिए कि इस पूरे गेम में असल बात क्या है जो आम खबरों से मिस हो रही है। तो बात सिर्फ कुछ 100 ट्रकों या फिर महीने के अंदर तीन दिन लगने वाले हार्ट की नहीं है। बात है नेशनल कॉन्फिडेंस की। आज भारत की लीडरशिप ने यह तय कर लिया है कि हमारी सीमाएं हमारे लिए एंड पॉइंट नहीं है बल्कि हमारी ताकत का स्टार्टिंग पॉइंट है। लिपुलेख में ट्रकों की गर्जना और पेंगसाऊ में लगने वाला बाजार दोनों इस बात का ऐलान है कि भारत अपनी टेरिटोरियल इंटीग्रिटी के साथ-साथ अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। दोस्तों, विदेश मंत्रालय का समय पर ट्रेड परमिट जारी करना, कस्टम्स का तैयार रहना और बीआरओ का सड़कों को मोटरेबल बनाना यह दिखाता है कि भारत का सरकारी सिस्टम अब साइलोस के अंदर काम नहीं कर रहा है। डिफेंस, इकॉनमी और डिप्लोमेसी तीनों एक ही डायरेक्शन के अंदर सिंक होकर के काम कर रहे हैं। भविष्य के अंदर इसके बहुत गहरे परिणाम देखने को मिलेंगे। जैसे-जैसे लिपुलेख रूट के ऊपर ट्रकों की आवाजाही नॉर्मल होगी, यह रास्ता इंडो तिब्बत ट्रेड का सबसे बड़ा हब बन जाएगा। चाइना का तकलाकोट वेयर हाउस चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो, उसे भारतीय इकॉनमी की सप्लाई चेन से जुड़ना ही पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर म्यांमार बॉर्डर के ऊपर शुरू हो रहा ट्रेड पूर्वोत्तर भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को एक नया जीवन देगा। दोस्तों, यह सब दिखाता है कि 21वीं सदी का भारत अब केवल रेस्पोंड नहीं करता है बल्कि वो नैरेटिव सेट करता है और दुश्मन को अपने बनाए हुए मैदान पर खेलने के लिए मजबूर करता है। 



अब दोस्तों आपको क्या लगता है? चाइना ने जो तकलाकोट में नया वेयर हाउस बनाने का बहाना दिया है। क्या वो सिर्फ एक व्यापारिक सुविधा है 

या फिर पीएलए द्वारा गुपचुप तरीके से कोई बड़ा मिलिट्री बेस तैयार किया जा रहा है जिसे वो दुनिया की नजरों से छिपाना चाहता है? और क्या भारत का एक ही वक्त के अंदर नेपाल बॉर्डर, चाइना बॉर्डर और म्यांमार बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेड को एग्रेसिव तरीके से पुश करना चाइना को काउंटर करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। अपनी राय जरूर लिखें। नमस्कार दोस्तों।



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तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

तिब्बत बॉर्डर पर 6 साल बाद भारत के सैकड़ों भारी ट्रक! PLA में मची भयंकर भगदड़

 दोस्तों, उत्तराखंड के धारचुला में भारतीय व्यापारी पूरी तरह से तैयार थे। भारत सरकार के विदेश मंत्रालय से ट्रेड परमिट हाथों के अंदर था। कस्टम क्लीयरेंस हो चुकी थी और जिला प्रशासन ने अपनी सारी तैयारियां मुकम्मल कर ली थी। सदियों से खच्चरों की पीठ पर लद कर के जाने वाला सामान इस बार ट्रकों के अंदर भरा हुआ था। लेकिन बॉर्डर पार करने से ठीक 24 घंटे पहले यानी कि 7 जुलाई को धारचला के एसडीएम आशीष जोशी की डेस्क पर एक सीमा पार से एक ईमेल फ्लैश होता है। यह ईमेल चाइनीस ऑफिशियल्स का था। संदेश छोटा लेकिन बेहद चौंकाने वाला था। अभी रुक जाइए। भारतीय व्यापारियों को सीमा पार मत भेजिए। बहाना यह बनाया गया कि तिब्बत के तकलाकोट के अंदर एक नया मार्केट प्लेस और वेयर हाउसेस यानी कि गोदाम बन रहा है और जब तक यह कंस्ट्रक्शन पूरा नहीं हो जाता ट्रेड शुरू नहीं हो सकता है। लेकिन दोस्तों जरा सोचिए जिस व्यापार का सीजन आधिकारिक तौर पर 1 जून से स्टार्ट हो चुका था उसके लिए चाइना 7 जुलाई को अचानक कंस्ट्रक्शन का बहाना क्यों बना रहा था? क्या यह वाकई सिर्फ एक ईंट पत्थर का गोदाम है? या फिर चाइना 6 साल से बंद पड़े इस रूट की आड़ में कोई नया मिलिट्री या फिर फॉरवर्ड लॉजिस्टिक बेस तैयार कर रहा है जिसे वह अभी भारतीयों की नजरों से छिपाना चाहता है। और सबसे बड़ा सवाल ठीक इसी वक्त यानी जुलाई के इसी महीने में हजारों किलोमीटर दूर अरुणाचल प्रदेश के पेंगसाऊ दर्रे पर म्यांमार के साथ भी 6 साल बाद बॉर्डर ट्रेड अचानक से क्यों खुल रहा है? क्या यह सिर्फ एक इत्तेफाक है या फिर नई दिल्ली के साउथ ब्लॉक में बैठी भारत सरकार ने कोई ऐसा मास्टर स्ट्रोक चला है जिसने एक ही वक्त के अंदर भारत के दो सबसे बड़े कॉम्प्लेक्स बॉर्डर्स के ऊपर एक नया जिओपॉलिटिकल गेम सेट कर दिया है। दोस्तों आज हम सिर्फ एक व्यापार की बात नहीं कर रहे हैं। हम बात कर रहे हैं भारत की उस अग्रेसिव बॉर्डर स्ट्रेटजी की जिसने खच्चरों के युग को खत्म करके ट्रकों की एंट्री करवा दी है और चाइना को उसके ही बिछाए जाल में सोचने पर मजबूर कर दिया है। दोस्तों इस पूरी कहानी को समझने के लिए आपको 2020 के उस दौर में जाना होगा जब कोविड-19 महामारी के कारण भारत चाइना और भारत म्यांमार दोनों सीमाओं पर ट्रेड लिंक पूरी तरह से बंद कर दिया गया था। पिछले छ सालों के अंदर दुनिया बदल गई जो पॉलिटिकल समीकरण बदल गए और सबसे अहम बात भारत का बॉर्डर इंफ्रास्ट्रक्चर पूरी तरह से ट्रांसफॉर्म हो गया है। लिपुलेख दर्रे से होने वाला भारत तिब्बत सीमा व्यापार कोई आम व्यापार नहीं है। यह ऐतिहासिक रूट सदियों से उत्तराखंड के सीमावर्ती क्षेत्रों की इकॉनमी की रीड रहा है। लेकिन साल 2020 के बाद से यहां सन्नाटा पसर गया था। अब दोस्तों 6 सालों के लंबे अंतराल के बाद में जब इसे दोबारा से शुरू करने का वक्त आया तो भारत ने एक ऐसा दांव चला जिसकी उम्मीद चाइना ने शायद कभी नहीं की थी। दोस्तों इस साल सीबा व्यापार में एक ऐतिहासिक बदलाव किया गया है। साल 2020 से पहले भारतीय व्यापारियों को अपने सामान तिब्बत तक पहुंचाने के लिए हफ्तों तक खच्चरों और पैदल रास्तों के ऊपर सहारा लेते हुए आगे बढ़ना पड़ता था। लेकिन इन छ सालों के अंदर भारत के बॉर्डर रोड्स ऑर्गेनाइजेशन यानी कि बीआरओ ने पहाड़ों का सीना चीर करके धारचुला लिपुलेख सड़क का निर्माण पूरा कर दिया है। यह सिर्फ एक सड़क नहीं है। यह भारत की स्ट्रेटेजिक ऑटोनोमी का सबसे बड़ा सबूत है। अब दोस्तों, पहली बार भारतीय व्यापारी अपने सामान को सीधे ट्रकों और गाड़ियों के जरिए भारत, तिब्बत सीमा पर स्थित इंडो तिब्बतियन ट्रेड पॉइंट तक पहुंचा सकेंगी।


ट्रकों की इस एंट्री ने चाइना की रातों की नींद हराम कर दी है। क्योंकि चाइना बहुत अच्छे तरीके से जानता है कि जो सड़क आज व्यापारियों के ट्रकों को बॉर्डर तक ला रही है वही सड़क जरूरत पड़ने पर इंडियन आर्मी के ट्रकों, आर्टलरी और लॉजिस्टिक्स को भी कुछ ही घंटों के अंदर लिपुलेखक के टॉप तक पहुंचा सकती है। दोस्तों, लिपुलेख कोई आम जगह नहीं है। यह भारत, नेपाल और चाइना का एक बेहद सेंसिटिव ट्राईजक्शन है। ऐसे में दोस्तों भारत का यह रैपिड इंफ्रास्ट्रक्चर डेवलपमेंट चाइना के लिए एक सीधा मैसेज है कि 1962 का भारत अब इतिहास बन चुका है। लेकिन दोस्तों कहानी में असली ट्विस्ट अब आता है। सड़क बन गई, गाड़ियां बॉर्डर तक पहुंच गई लेकिन फिर भी एक पेंच फंसा हुआ है। ट्रकों से सामान उतारने के बाद में भारतीय व्यापारियों को आज भी चाइना के क्षेत्र में प्रवेश करने के लिए लगभग 2 कि.मी. पैदल चलना पड़ेगा। आखिर क्यों? तो दोस्तों, यह वो नौ मैनस लैंड और चाइनीस टेरिटरी का वो बफर जोन है जहां ड्रैगन अपना साइकोलॉजिकल गेम खेल रहा है। वो 2 किलोमीटर का पैदल रास्ता सिर्फ एक भौगोलिक दूरी नहीं है बल्कि यह चाइना की उस सोची समझी रणनीति का हिस्सा है जिसके तहत वो भारतीय पहुंच को एक लिमिट तक रिस्ट्रिक्ट करना चाहता है और इसी 2 कि.मी. के उस पार तिब्बत के तकलाकोट के अंदर वह रहस्यमई वेयर हाउस बन रहा है। अब दोस्तों जरा चाइना के उस ईमेल को डिकोड करते हैं जो 7 जुलाई को आया। चाइना यह कह रहा है कि वो मार्केट प्लेस बना रहा है। लेकिन डिफेंस एक्सपर्ट्स और जियोपॉलिटिकल एनालिस्ट इस बात को बखूबी समझते हैं कि पीपल्स लिबरेशन आर्मी यानी कि पीएलए की डिक्शनरी के अंदर सिविलियन इंफ्रास्ट्रक्चर नाम की कोई जगह नहीं होती है। चाइना तिब्बत के बॉर्डर एरियाज के अंदर जो भी बनाता है वो ड्यूल यूज़ का होता है। यानी कि शांति के वक्त वो गोदाम या फिर गांव हो सकता है। लेकिन युद्ध या तनाव के वक्त वो सीधा मिलिट्री बेस बन जाता है।


 दोस्तों इस बात की पूरी संभावना है कि टकलाकोट में रातोंरात जो कंस्ट्रक्शन चल रहा है वो पीएलए के लिए विंटर लॉजिस्टिक राशन कम्युनिकेशन इक्विपमेंट्स या फिर सर्लांस सिस्टम स्टोर करने का एक फॉरवर्ड बेस हो। दोस्तों, चाइना नहीं चाहता है कि भारतीय व्यापारी अभी वहां आए और अपनी आंखों से उस बड़े कंस्ट्रक्शन का स्केल देखें। क्योंकि व्यापारी जब सीमा पार जाते हैं तो वह सिर्फ सामान नहीं ले जाते हैं। वो वहां की टेपोग्राफी, मिलिट्री मूवमेंट्स और इंफ्रास्ट्रक्चर की जानकारी का एक बड़ा सोर्स भी होते हैं। चाइना इसी ह्यूमन इंटेलिजेंस को ब्लॉक करने के लिए 7 जुलाई का वो ईमेल भेज के टाइम पास कर रहा है। लेकिन भारत भी अब चुप बैठने वाला नहीं है। नई दिल्ली की स्ट्रेटेजिक थिंकिंग अब डिफेंसिव से ऑफेंसिव हो चुकी है और इसका सबसे बड़ा सबूत आपको भारत के पूर्वी छोर पर मिलेगा। दोस्तों एक तरफ चाइना लिपुलेख में चालबाजी कर रहा है और ठीक उसी वक्त भारत ने अरुणाचल प्रदेश के चांगला जिले के अंदर भारत म्यांमार सीमा पर पेंग साऊ दर्रे से व्यापार को फिर से खोलने का ऐलान कर दिया है। यह टाइमिंग कोई संयोग नहीं है। 3 फरवरी 2020 को बंद हुआ यह ट्रेड लिंक 20 जुलाई से दोबारा शुरू होने जा रहा है। दोस्तों 9 जुलाई को अरुणाचल के चांगलांग के अंदर भारतीय व्यापार प्रतिनिधियों और म्यांमार के उनके समकक्षों के बीच में एक बेहद अहम मीटिंग हुई है और इस प्रक्रिया को अंतिम रूप दिया गया है। म्यांमार इस वक्त एक भयानक गृह युद्ध से जूझ रहा है। वहां की मिलिट्री जुमटा और विद्रोही गुटों के बीच में खूनी संघर्ष चल रहा है। दोस्तों ऐसे मुश्किल वक्त में भी भारत का वहां बॉर्डर ट्रेड शुरू करना एक बहुत बड़ा कूटनीतिक और सुरक्षा दांव है। यहां भारत सरकार ने एक बहुत ही शार्प पॉलिसी का इस्तेमाल किया है जिसे फ्री मूवमेंट रिजीम यानी कि एफएमआर कहा जाता है। वैसे तो दोस्तों एफएमआर को लेकर के देश में काफी बहस चल रही है और सुरक्षा कारणों से इसे कई जगह सस्पेंड भी कर दिया गया है। लेकिन चांगलांग के अंदर इसे बहुत ही कैलकुलेटेड तरीके से लागू किया जा रहा है। इसके तहत सीमा के दोनों ओर 10 कि.मी. के दायरे में रहने वाले लोगों को स्थानीय व्यापार और लेनदेन की छूट मिलेगी। लेकिन जरा दोस्तों सुरक्षा एजेंसियों के दिमाग को दाद दीजिए। यह बॉर्डर हार्ट हर दिन नहीं लगेगी।

 इसके लिए महीने की केवल 10, 20 और 30 तारीख ही चुनी गई है। आखिर ये तीन डेट ही क्यों चुनी गई है? क्योंकि 10, 20 और 30 तारीख का यह फार्मूला हमारी सुरक्षा एजेंसियों, असम राइफल्स और इंटेलिजेंस ग्रिड को बॉर्डर मैनेजमेंट के अंदर एक स्ट्रक्चरल कंट्रोल देता है। अगर बॉर्डर हर दिन खुला रहेगा तो इंसजेंसी वेपनरी की तस्करी और इललीगल माइग्रेशन का खतरा बढ़ जाएगा। लेकिन दोस्तों महीने के अंदर सिर्फ तीन दिन तक ही एक फिक्स डेट के ऊपर ही हार्ट लगने से फोर्सेस को पता होगा कि भीड़ कब आएगी, मॉनिटरिंग कैसे करनी है और ट्रेड को सुरक्षित कैसे रखना है। यह सिक्योरिटी और इकॉनमी का एक परफेक्ट बैलेंस है। अब दोस्तों जरा इस लोकल बॉर्डर इकॉनमी के स्केल को समझिए। सुनने में आपको शायद अजीब लगे कि आज के हाईटेक जमाने में भारतीय व्यापारी लिपुलेखक से गुड़, मिश्री, माचिस और बर्तन जैसी मामूली चीजें लेकर के तिब्बत जा रहे हैं। लेकिन असली खेल इन चीजों का नहीं है। असली खेल उस डिपेंडेंसी का है। तिब्बत के उस दुर्गम इलाके के अंदर रहने वाले लोगों के लिए भारत से जाने वाला यह सामान किसी लाइफ लाइन से कम नहीं है। वहां ऑक्सीजन कम है, सर्वाइवल मुश्किल है और चाइना की सप्लाई चेन हमेशा रिलायबल

नहीं होती है। तिब्बती लोग सदियों से भारतीय गुड़ और माचिस के ऊपर जिंदा है। बदले में वहां से जो ऊन, चरू, पशमीना, कीमती पत्थर और कंबल भारत आते हैं। उनकी डिमांड भारतीय बाजारों के अंदर बहुत ज्यादा होती है। इस करोड़ों रुपए के ट्रेड से सीधा फायदा व्यास दर्मा और चौदास घाटी के अंदर रहने वाले हमारे भारतीय नागरिकों को होता है और यहीं पर एंट्री होती है मोदी सरकार की उस सबसे बड़ी पॉलिसी की जिसने चाइना की नींद उड़ा रखी है वो है वाइब्रेंट विलेज प्रोग्राम। दोस्तों दशकों तक भारत की नीति यह थी कि बॉर्डर को खाली रखो। सड़कें मत बनाओ ताकि दुश्मन अंदर ना

आ सके। इस डरपोक नीति का नतीजा यह हुआ कि हमारे बॉर्डर के गांव खाली हो गए। लोग पलायन कर गए और चाइना ने खाली जगह देख के वहां पर अतिक्रमण स्टार्ट कर दिया। लेकिन अब स्ट्रेटजी पूरी तरह से पलट चुकी है। दोस्तों भारत सरकार जानती है कि बॉर्डर को सुरक्षित रखने का मजबूत तरीका वहां फौज खड़ी करना नहीं है बल्कि वहां के गांव को आबाद करना है। जब बॉर्डर ट्रेड शुरू होता है तो ट्रांसपोर्ट का बिजनेस बढ़ता है। होटल्स खुलते हैं, ढाबे चलते हैं। स्थानीय युवाओं को रोजगार मिलता है। व्यापार संघ के सचिव दौलत सिंह रायपा और स्थानीय विधायक लेसम सिमाई जैसे लोग जब इस ट्रेड के खुलने पर खुशी जताते हैं तो वह सिर्फ चंद रुपयों का मामला नहीं होता है। वह उस पूरे सीमांत इलाके की डेमोग्राफी को मजबूत करने का एक टूल होता है। जब तक सीमा पर हमारे नागरिक मौजूद हैं, व्यापार कर रहे हैं, तब तक चाइना का कोई भी इस्लामी स्लाइसिंग का मंसूबा कामयाब नहीं हो सकता है। दोस्तों, चाइना की बौखलाहट का एक और बड़ा कारण यह है कि भारत अब तक दो फ्रंट्स पर प्रोएक्टिव हो गया है। एक तरफ अरुणाचल प्रदेश के अंदर जिसे चाइना अपना हिस्सा बताने का झूठा प्रोपेगेंडा फैलाता है, वहां भारत पग साऊ पास पर म्यांमार के साथ में ट्रेड शुरू करके अपनी एडमिनिस्ट्रेटिव और सोवन पावर को ज्यादा एक्सपेंड कर रहा है।

दूसरी तरफ उत्तराखंड के लिपुलेख में भारत अपनी शर्तों पर ट्रकों से सामान लाद करके चाइना पर दबाव बना रहा है कि वह ट्रेड एग्रीमेंट का सम्मान करें। चाइना अगर व्यापार को ज्यादा दिन तक रोकता है तो तकलाकोट के स्थानीय तिब्बती लोगों के अंदर चाइना की कम्युनिस्ट सरकार के खिलाफ गुस्सा भड़क जाएगा और अगर चाइना व्यापार खोलता है तो भारतीय व्यापारियों की आवाजाही से चाइना की उस दीवार के अंदर सुराख होगा जिसके पीछे वो अपनी मिलिट्री एक्टिविटी छुपाना चाहता है। दोस्तों ये भारत की तरफ से बिछाई गई एक ऐसी शतरंजी चाल है जिसमें ड्रैगन दोनों तरफ से मात खा रहा है। इस पूरे डेवलपमेंट का ग्लोबल एंगल भी दोस्तों समझना बेहद जरूरी है। आज दुनिया भारत को एक राइजिंग पावर के रूप में देख रही है। म्यांमार के अंदरूनी हालात बहुत ज्यादा खराब हैं। वेस्टर्न देश और अमेरिका म्यांमार के ऊपर सेंशंस लगा के बैठे हैं। दोस्तों, चाइना म्यांमार के विद्रोही गुटों को हथियार देकर के वहां अपना कंट्रोल बढ़ाना चाहता है। लेकिन भारत ने वहां की मिलिट्री या पॉलिटिक्स के अंदर सीधे उलझने की बजाय अरुणाचल प्रदेश के चांगलांग के अंदर स्थानीय स्तर पर बॉर्डर ट्रेड खोल कर के म्यांमार की आम जनता और लोकल अथॉरिटीज के साथ में एक सॉफ्ट पावर का इस्तेमाल किया है। भारतीय पक्ष के स्थानीय व्यापार संगठन के अध्यक्ष जोंगम मोरांग का यह कहना है कि इससे महामारी के दौरान हुई आजीविका वापस आएगी। यह दर्शाता है कि भारत म्यांमार के लोगों के लिए एक स्टेबलाइजर का काम कर रहा है। जब म्यांमार के लोग भारत से होने वाले इस ट्रेड के ऊपर डिपेंडेंट होंगे तो वहां चाइना का इन्फ्लुएंस अपने आप कमजोर पड़ने लगेगा। अब दोस्तों जरा सोचिए कि इस पूरे गेम में असल बात क्या है जो आम खबरों से मिस हो रही है। तो बात सिर्फ कुछ 100 ट्रकों या फिर महीने के अंदर तीन दिन लगने वाले हार्ट की नहीं है। बात है नेशनल कॉन्फिडेंस की। आज भारत की लीडरशिप ने यह तय कर लिया है कि हमारी सीमाएं हमारे लिए एंड पॉइंट नहीं है बल्कि हमारी ताकत का स्टार्टिंग पॉइंट है। लिपुलेख में ट्रकों की गर्जना और पेंगसाऊ में लगने वाला बाजार दोनों इस बात का ऐलान है कि भारत अपनी टेरिटोरियल इंटीग्रिटी के साथ-साथ अपने इकोनॉमिक इंटरेस्ट को प्रोटेक्ट करने के लिए किसी भी हद तक जाने को तैयार है। दोस्तों, विदेश मंत्रालय का समय पर ट्रेड परमिट जारी करना, कस्टम्स का तैयार रहना और बीआरओ का सड़कों को मोटरेबल बनाना यह दिखाता है कि भारत का सरकारी सिस्टम अब साइलोस के अंदर काम नहीं कर रहा है। डिफेंस, इकॉनमी और डिप्लोमेसी तीनों एक ही डायरेक्शन के अंदर सिंक होकर के काम कर रहे हैं। भविष्य के अंदर इसके बहुत गहरे परिणाम देखने को मिलेंगे। जैसे-जैसे लिपुलेख रूट के ऊपर ट्रकों की आवाजाही नॉर्मल होगी, यह रास्ता इंडो तिब्बत ट्रेड का सबसे बड़ा हब बन जाएगा। चाइना का तकलाकोट वेयर हाउस चाहे कितना भी बड़ा क्यों ना हो, उसे भारतीय इकॉनमी की सप्लाई चेन से जुड़ना ही पड़ेगा। वहीं दूसरी ओर म्यांमार बॉर्डर के ऊपर शुरू हो रहा ट्रेड पूर्वोत्तर भारत की एक्ट ईस्ट पॉलिसी को एक नया जीवन देगा। दोस्तों, यह सब दिखाता है कि 21वीं सदी का भारत अब केवल रेस्पोंड नहीं करता है बल्कि वो नैरेटिव सेट करता है और दुश्मन को अपने बनाए हुए मैदान पर खेलने के लिए मजबूर करता है। 



अब दोस्तों आपको क्या लगता है? चाइना ने जो तकलाकोट में नया वेयर हाउस बनाने का बहाना दिया है। क्या वो सिर्फ एक व्यापारिक सुविधा है 

या फिर पीएलए द्वारा गुपचुप तरीके से कोई बड़ा मिलिट्री बेस तैयार किया जा रहा है जिसे वो दुनिया की नजरों से छिपाना चाहता है? और क्या भारत का एक ही वक्त के अंदर नेपाल बॉर्डर, चाइना बॉर्डर और म्यांमार बॉर्डर पर इंफ्रास्ट्रक्चर और ट्रेड को एग्रेसिव तरीके से पुश करना चाइना को काउंटर करने का सबसे बेहतरीन तरीका है। अपनी राय जरूर लिखें। नमस्कार दोस्तों।



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Monday, June 22, 2026

दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से

दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से

 Sergei Gor अमित शाह से मिलते हैं। एक लिस्ट एक्सचेंज होती है और हमें पता लगता है कि दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां वो मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से।एक हाइली फंडेड एंटी इंडिया प्रोपगेंड है जो कि अमेरिका में रहती थी। नाम था लोरा बलिक।वो एक्चुअल नाम था इसका। लौड़ा बलिक मार दी गई। न्यूयॉर्क के एक पार्क में घूम रही थी। मार दिया किसी ने।उसका काम क्या था? उसने एक डिजिटल मशीन को यूज किया हुआ था

अमेरिका के अंदर। जहां पर वो हिंदू भगवानों को वो डिमीन करती थी वो। ओपनली अपने फॉलोअर्स को बोलती थी कि हिंदू जो देवी देवता हैं उनको गालियां निकालिए। उसको कर्स कीजिए। उसको मार दिया गया। उसको क्या लगता था कि अमेरिका की धरती पर बैठी है। उसे कोई टच कर नहीं सकता। ये उसका गलतफहमी थी। शी वाज़ एंटायरली रॉन्ग। उसकी बॉडी डिस्कवर हुई है। डिस्कवर हुई आइसोलेटेड न्यूयॉर्क के एक स्टेट के पार्क के अंदर। अब सीआईए और एफबीआई को बुलाया गया है। स्टेट पुलिस ने बोल दिया कि हमें तो कोई क्लू नहीं मिल रहा क्योंकि कोई फुटप्रिंट्स भी नहीं है कि कोई आया उसको मार के चला गया। जो पूरी की पूरी जो ट्रेल है वो कंप्लीटली कोल्ड है। इसलिए उन्होंने एफबीआई को बुलाया है इसको इन्वेस्टिगेट करने के लिए। लेकिन अभी तक कुछ भी पता नहीं लगा कि ये अननोन गन मैन कहां से आए।

 कब हवा में ही काम करके वो चले गए। कोई वहां पे निशान गोली का नहीं है। कोई निशान मारा पट्टी का नहीं है। कोई गला दबाया नहीं गया। कुछ नहीं किया। लेकिन लेडी मरी पड़ी है। ये है अननोन गन मैन का काम।महादेव की यह सेना है। कब आएगी, कब काम करके जाएगी यह किसी को पता लगेगा नहीं। अब आपको लगेगा यार अमेरिका में ही काम कर दिया। नहीं। सिर्फ अमेरिका में नहीं हुआ। अभी थोड़ा सा डायरेक्टली आप पाकिस्तान की तरफ भी आ जाइए। वहां पर भी कुछ काम हो गया है। वहां पे क्या हुआ? एक लेफ्टिनेंट कर्नल है इमरान दयाल।उसको Olla के पास भेज दिया। पाकिस्तान आर्मी का यह लेफ्टिनेंट कर्नल है। ही वाज़ फाउंड दैट शॉट बाय अननोन गन मैन एज ऑलवेज। दोस्तों लेकिन जो खासियत ये नहीं है कि हमने लेफ्टिनेंट कर्नल को मारा। नॉर्मल न्यूज़ है। मारा कहां है? हाइली गार्डेड जो इनका डेरा इस्माइल खान का एरिया है। उसके अंदर इसको मारा गया है। फ्लोलेस हाइपरस सर्जिकल स्ट्राइक। दोस्तों ये जो है ना बंदे को मारा वहां पे जो पुलिस इसकी ISI है नंबर वन और जो नंबर वन मिलिट्री है पाकिस्तान की वो कहते हैं हमें फुटप्रिंट्स भी नहीं मिल रहे कि कौन सा बंदा कब आके ना कोई मोटरसाइकिल के ना गाड़ी के ना ही किसी के पैरों के निशान है कि कोई आया और मार के चला गया। लेकिन गोली लगी है यहां पे बंदूक रख कर। कोई दूर से मारा नहीं गया है। और मारा भी कहां है? उसके अपना जो किला था उसके बीच में बैठकर उसको मारा गया है। अब पाकिस्तान क्या कर रहा है? वो बोलता है कोई Ghost आया था वो मार के चला गया। अब पाकिस्तान की आर्मी वो घोस्ट को ढूंढ रही है।

जब यूएसए के एंबेसडर सर्ग गौर जब वो हाइली सिक्योर रूम के अंदर बैठे  मोदी जी के साथ नहीं जयशंकर के साथ नहीं वो बैठे इंडियन होम मिनिस्टर अमित शाह के पास। मैंने तब आपको एक एक्सक्लूसिव चीज बताई थी कि वहां पर एक लिस्ट को एक्सचेंज किया गया है। जहां पर हमने बोला कि अब काउंटर टेररिज्म के ऊपर काम हमें इकट्ठे मिलकर करना पड़ेगा। अभी तो ख़स्तानियों का नाम आएगा इसमें। आप देख लेना अगले 40-50 दिनों में  आपको बड़ा खास्तानी मारा हुआ दिखेगा।अमित शाह को मालूम है आर्किटेक्ट हैं भारत की इंटरनल सिक्योरिटी के और वो रेयरली किसी भी फॉरेन डेलीगेट्स को वो नहीं मिलते डायरेक्टली। यह काम जयशंकर का है। टाइमिंग एब्सोल्यूटली एक्सप्लोसिव थी। क्योंकि जो गौर है वो G7 की मीटिंग को छोड़कर फ्रांस में वो सीधा आते हैं अमित शाह के कमरे के अंदर। और आपको मालूम है प्रधानमंत्री मोदी और डोन्ड ट्रंप वहां पर मीटिंग कर रहे थे जब यहां पर स्वर्गीय गॉड और अमित शाह मीटिंग कर रहे थे। डिस्कस क्या किया गया तब मैंने बताया था आपको टू कंट्रोल टेररिज्म और दूसरा जो भारत के खिलाफ अमेरिका में बैठकर हमें धमकियां देते हैं हमारे धर्म को भी और हमारे कंट्री को उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। और ये दोनों कंट्रीज ने एग्री किया कि अब जॉइंटली जो ये क्रिमिनल माइंडसेट के लोग हैं इनको जस्टिस दिलाई जाएगी। जस्टिस कोर्ट में जाकर नहीं होती है। यह अननोन गन मैन ही यह जस्टिस दिलाते हैं। अब ग्रीन लाइट मिल गई है अमेरिका से जो आप कर रहे हैं। हम आपके साथ हैं। जो हम करेंगे आप भी हमारे साथ रहेंगे। इसको बोलते हैं जियोपॉलिटिकल चेस बोर्ड को फ्लिप करना। अब ये कोई रैंडम कोइजिडेंसेस नहीं है। दो बहुत डिफरेंट टारगेट्स। दो डिफरेंट कंट्रीज के अंदर। और वो टारगेट कौन थे? जो ओपनली होस्टाइल थे भारत की स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट के लिए उनको मारा गया है। दोनों को एलिमिनेट किया कुछ दिनों में कह दीजिए या कुछ घंटों के बीच में।

दोस्तों पिछले 20-30 साल में हुआ क्या था जो भारत की गवर्नमेंट थी वो डिफेंसिव खेलती रही। आपको मालूम है हम डोज़ियर पे डोज़ियर देते रहे। कभी यूनाइटेड स्टेट्स को, कभी कनाडा को, कभी यूनाइटेड नेशंस में और कभी पाकिस्तान को। हम कंप्लेन करते रहे ग्लोबल कम्युनिटी को कि यार ये लोग हमारे देश के खिलाफ ये काम कर रहे हैं। इनको रोको। और जो हमारे दुश्मन है वो हमारे मुंह के ऊपर हंसते थे। आज जो उन्होंने काम क्या किया था? हमारी जो डेमोक्रेटिक वैल्यू्यूज हैं या डेमोक्रेसी हमारी कंट्री की है उसको वेपन की तरह हमारे ऊपर यूज़ कर दिया। अगर हमने किसी को मारने की कोशिश करी या बोला हम आपको मार देंगे तो बोलते हैं ये डेमोक्रेटिक नहीं है। ये तो ह्यूमन राइट्स की वायलेशन है।

हमने बोल दिया ह्यूमन राइट्स ह्यूमंस के लिए होते हैं। लिब्रांडू और मुसलमान वो ह्यूमंस की कैटेगरी में वो आते ही नहीं है। ये डॉक्ट्राइन है गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का। इसलिए जो ये लोग सोचते थे कि पाकिस्तान के अंदर हम एक किले में बैठे हैं। अमेरिका में बैठे हैं। हमें कौन टच करेगा? वो एरा ऑफिशियली वो खत्म हो चुका है। अब क्या हो रहा है? जो हंटर है वो हम बन चुके हैं। हम हंटिंग कर रहे हैं अब इनकी कहीं भी हो दुनिया में और मैसिव ग्लोबल मनी ट्रेल को अगर आप फॉलो करेंगे तो आपको पता लगेगा ये सारे के सारे जो एंटी इंडिया के नेटवर्क्स हैं जहां पे पैसे आ रहे थे उसको भी ब्लॉक किया जा रहा है जो हॉस्टाइल कंट्रीज थी जो यूज़ करती थी हमारी जो फ्रिक्शन है कंट्री के अंदर छोटे-छोटे मुद्दों के ऊपर जियोपॉलिटिकल लीवरेज के लिए वो यूज़ करते थे हमने उसको भी बंद करना शुरू कर दिया आप यूज़ तो करके देखिए गोली ना आए अननोन गन मैन से नाम बदल देना भारत का भाई इंडिया का नाम बदल के भारत कर देना। हमें कोई दिक्कत नहीं है। एक राइजिंग पावर जब बढ़ती है उसे डिस्टेबलाइज करने के लिए आपके पास दो तीन मोहरे ही होते हैं। एक आप यहां पर उग्रवादी भेज दीजिए। हमारी तरक्की रुकवा दीजिए। दूसरा है कि आप नरेटिव्स को क्रिएट कीजिए। जैसे ये लौड़ा कर रही थी अमेरिका में बैठकर ताकि जो फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट्स है वो यहां पर भारत में ना आ सके। इसलिए जो ऑपरेशंस हैं ऐसे प्रोपेगेंडा करने वालों के जैसे बालिक थी ये ऑपरेशंस अब चालू हो चुके हैं। इनका जो मनी फ्लो है जो फाइनेंसियल मनी इनको मिलता था हमारे खिलाफ काम करने के लिए अब वो मनी फ्लो बंद हो जाएगा क्योंकि उनके जो लाउडस्पीकर्स हैं उसी को हमने साइलेंस कर  दिया। नेटवर्क कंप्लीटली फ्रैक्चर करके रख दिया है।लगेगा यार एक आधी लेडी को मार के क्या हो जाएगा अमेरिका में या एक कॉकरोच को आपने पाकिस्तान में मार दिया। की फर्क पड़ता है यही होता है कि जब आप इनको मारते हैं तो जो वेल्थदी जो डोनर्स हैं जो इनको फंडिंग करते हैं वह अपने पैसे को वो पीछे पीछे करना वो शुरू कर देंगे क्योंकि उनके जो रिटर्न ऑफ इन्वेस्टमेंट है वो क्रैश हो गई। अब उन्होंने इतने करोड़ों रुपए लगाए नरेटिव बिल्ड करने के लिए सोशल मीडिया पे स्प्रेड करने के लिए आज वो सारी इन्वेस्टमेंट जीरो

 कर दी आपने दो बंदों को मारकर। अब कनेक्ट कीजिए इसको पाकिस्तान के साथ। पाकिस्तान में जब से हमने सर्जिकल स्टाइल्स करनी शुरू करी है। क्या चक्कर है? पाकिस्तान इकोनॉमिकली भिखारी हो गया। कभी नोट किया आपने? हमने पहले काम किया था एक हमने सर्जिकल स्ट्राइक करी थी पाकिस्तान की घुस के अंदर के अंदर घुसकर नहीं। हमने जब डीमोनेटाइजेशन किया उसके बाद पाकिस्तान भिखारी होना शुरू हो गया। क्योंकि प्रिंटिंग मशीन कांग्रेस ने पाकिस्तान के अंदर लगाई हुई थी हमारी ही करेंसी की। उसके बाद दूसरा हमने किया जब अननोन गन मैन ने इनके बड़े-बड़े कॉकरोचों को मारना शुरू किया। उसके बाद जो इनको पैसे मिलते थे भारत को तंग करने के लिए वो मिलने बंद हो गए। अब आप सोच के देखिए 20 साल पीछे जाइए हिस्ट्री में तब क्या होता था। पाकिस्तान ने एक डॉक्ट्रिन बनाया था कि भारत को हर रोज हम जख्म देंगे। ये उनकी मास्टर पीस स्ट्रेटजी थी। उन्होंने नॉन स्टेट एक्टर्स को यूज़ किया जिओपॉलिटिकल वेपन की तरह। क्या बोलते थे वो? वो बोलते थे कि भ हमने तो कुछ किया ही नहीं। ये तो टेररिस्ट हैं। फ्रीडर फाइटर्स हैं। ये अपनी धरती के लिए ये लड़ रहे हैं। ग्लोबल स्टेज के ऊपर इनको ये नॉन स्टेक एक्टर्स बोल दिया गया। या

 बोल दीजिए अननोन गन मैन वो यूज़ करते थे। स्ट्रेटजी सफोकेटिंग थी। लेकिन लेकिन कामयाब थी पाकिस्तान के लिए। अब जो इकोनमिक कॉस्ट है इसकी वो ये थी कि इनको लगातार फंडिंग चाहिए ताकि इस नेटवर्क को जिंदा रख सके। हमने क्या किया? फंडिंग जहां से आती है पहले तो वहां से बंद करवाई। उसके बाद जिसको आती है उसको लुल्ला के पास हमने भेजना शुरू कर दिया। इनकी जो करेंसी है वो इसीलिए आज फेल हो रही है पाकिस्तान की। क्योंकि पीछे से जो टूटी थी पैसे आने की वो बंद हो गई। दोस्तों एक और भी चीज है कि ये जो पाकिस्तान है आज ये बेल आउट लेता है। बेल आउट भी हमने इनको दिलवाने बंद कर दिए। क्यों? क्योंकि बेल आउट आता है उससे ये उग्रवादी ही खड़ा करते हैं। हमने उस रास्ते को भी बंद कर दिया। सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ ये दो लोगों को मारने से नहीं हुई। हमने पाकिस्तान के ऊपर भी सर्जिकल स्ट्राइक्स बार-बार हमने करी है। कोई बात नहीं। इनको ये पाकिस्तानी बोलेंगे आज इस वीडियो के नीचे कि सर हमें तो जी 25 बार तो भीख मिल गई। एक बार और मिल जाएगी। आपके रोकने से क्या हो गया? होता क्या है? जब इनको भीख चाहिए हम उस वक्त नहीं दिलाने देते। हम देते हैं साल के बाद 8 महीने के बाद। जब उसका बोझ इतना बढ़ चुका होता है कि सिर्फ इंटरेस्ट पेमेंट में सारी की सारी भीख वो निकल जाती है। इसको बोलते हैं इनका वेट इतना बढ़ा देना है कि अपने वेट के नीचे ये दब के ही मर जाए। दोस्तों अब हो क्या रहा है? ये जो पाकिस्तान है ये जो जिसको हमने दीनदयाल को मारा है वहां पर दयालु होकर उसको ऊपर भेज दिया। ये वो आदमी है जिसको फंड करती थी मिलिट्री मिलिट्री ये हैंडलर्स थे मिलिट्री के अंदर इसको मार दिया गया और ये जरूरी था क्योंकि पाकिस्तान की एक फेटल मिसकलकुलेशन है उनको लगा कि यार दिल्ली के अगेंस्ट कुछ भी करते रहे हैं भारत के अगेंस्ट हमारे पास वो हिंदुओं की गवर्नमेंट है एपिटाइट ही नहीं है कि हम एस्केलेट करेंगे दे वर एम्बरेसिंगली रोंग हमारी जो इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं उन्होंने अब एविडेंस को कलेक्ट करना बंद कर दिया और जाकर हम फॉरेन की कोर्ट में जाके बोलते थे कि ये एविडेंस इन्होंने मारा इनको कुछ बोलिए बिल्कुल भी नहीं आपके पास एक इंफॉर्मेशन आई आपने उसको यूज़ किया और काम तमाम कर दिया इंडियन मीडिया जो मेन स्ट्रीम मीडिया है कंप्लीटली अंडरप्ले करती है ये सारी की सारी जो हमारी डॉक्टाइन शिफ्ट हो चुकी है अब घर में घुस के मारेंगे और हर रोज मारेंगे अब तो अमेरिका को लिस्ट दे दी हमने ये लिस्ट है खाली कराओ और हमारे यहां पे जो लिस्ट है वो आप खाली करवाओ दोनों तरफ से काम चल रहा है दोस्तों जो हमारी मीडिया है और अपोजिशन है वो क्या बोलती है? वीक गवर्नमेंट है। मोदी जी सबसे ज्यादा वीक वो प्रधानमंत्री हैं। चलिए राहुल गांधगी का 2000 2011 का एक बयान है कि टेररिस्ट अटैक तो होते रहेंगे। गवर्नमेंट के पास इतनी पावर नहीं है कि वो सारे टेररिस्ट अटैक्स वो बंद करवा सके। चलिए 2014 के बाद ऐसी पावर क्या आ गई? वीक प्रधानमंत्री मोदी जी के हाथ में ऐसी कौन सी पावर आ गई कि अब टेररिस्ट अटैक होते नहीं है।अब एक काम और हो गया। वेस्टर्न इंटेलिजेंस जो अप्रेटस है वो वॉच कर रहा है। कोई जवाब नहीं है उनका। ना ही यह बोला जा रहा है कि जैसे Nijjar को अननोन गन मैन आकर कुत्ते की तरह मार के चले गए। वैसे ही इस लौड़ा को मार दिया। चुप्पी है। उन्हें मालूम है कि यह ब्रांड न्यू रियलिटी है। इसे एक्सेप्ट करना पड़ेगा। उन्हें पता लग गया कि जो गेम वो चलाते थे आज भारत ने उसको करना शुरू कर दिया। हमारे पास जो ऑपरेशनल जो रीच है वो ग्लोबल हो चुकी है। ये सारी दुनिया को  दिखती है। दोस्तों जो भी भारत के खिलाफ गेम प्ले करेगा। उसके पहले तो जो ये टेरर फंडिंग है उसको बंद किया जाएगा। उसके बाद उनको हंट किया जाएगा। ये दुनिया को समझ आ गया। और जो पाकिस्तान के अंदर जो कंटोनमेंट एरिया है वो भी सेफ नहीं रहे। न्यूयॉर्क के पास जो पार्क हैं जहां पर कैमरे लगे हुए थे चारों तरफ वो भी सेफ नहीं है इनके लिए। ये जो पुराना जिओपॉलिटिकल सेफ्टी नेट था वो कंप्लीटली हमने कोलैप्स कर दिया और जो हमारा इंटेलिजेंस एजेंसीज का जो रीच है वो एब्सोल्यूट स्ट्रेटेजिक पैर के ऊपर आ गई है। अब हम मोसाद की तरह काम करते हैं। अब डेमोंस्ट्रेट करते हैं हम लोग कि जैसे सीआईए हर जगह पे जाकर गंध डाल सकती है। हम भी डाल सकते हैं। पाकिस्तान पैरालाइज्ड है अंदर से। स्ट्रेटेजिक जो उनकी इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं वो बिल्कुल दे आर लाइक यू नो जैसे मक्खियों को मारते हैं हम लोग वो हाल हो गया। नंबर वन बोलते हैं अपने आपको। आज लंबड़वान रह गए हैं वो और कुछ भी नहीं है। दे कैन नॉट इवन प्रोटेक्ट देयर ओन ऑफिसर्स। लेफ्टिनेंट कर्नल को कुत्ते की तरह हमने मार के फेंक दिया। हमने बोला हूं और गर्व से बोल रहा हूं। और उनको मालूम है कि जो हिट लिस्ट है हमारे पास वो बहुत लंबी है। ये आदमी वो था जिसने पहलगाम के अटैक के अंदर पूरा जो लॉजिस्टिक्स का काम था वो इसने करवा के दिया था। जो कॉस्ट है प्रॉक्सी वॉर की वो इतनी बड़ी हब पाकिस्तान के ऊपर कर रहे हैं कि जो जो ये अननोन गन मैन है इनक्रेडिबली पेशेंटली हाईली स्किल्ड वो ऑपरेशंस कर रहे हैं ताकि इनकी कॉस्ट बढ़ती रहे। दोस्तों उन्होंने एक डॉक्ट्रन शुरू किया भारत के खिलाफ। हम 1000 कट्स देंगे भारत को। भारत ने बोला कोई बात नहीं आपने 1000 दिए हम 10,000 दे सकते हैं। कल पीओके के अंदर एक डेमोंस्ट्रेशन और हुआ। क्या बोला उन्होंने कि आपके लोगों को पाकिस्तान को बोला है अपने लोगों को निकाल के बाहर निकालो। अब पीओके के लोग और भारत अपने आप निपट लेंगे कि हमने क्या करना है। क्या बोला? पीओके के लोग बोलते हैं कि हम भारत के साथ अपने आप डिसाइड कर लेंगे हमने क्या करना है। तुम यहां से दफा हो जाओ अपने बैग को लेकर। कल पीओके के अंदर यह काम हो गया। यह है ऑपरेशंस विद डेवस्टेटिंग इंप्युरिटी ग्लोबल हिट लिस्ट एक्सट्रीमली एक्टिव है। जो एनिमीज़ हैं भारत के उन्हें मालूम है कि क्या आने वाला है। उनकी नींदें अब हराम करने का टाइम आ गया। मैं कई बार बोलता हूं हमारे जो मेन स्ट्रीम मीडिया के कई लोग हैं जो छोड़ के कोई जर्मनी जर्मन शेफर्ड बन गया। कोई अमेरिका में अमेरिकन डॉग बन गया। कोई ऑस्ट्रेलिया में चला गया। ये जो वहां बैठ के भारत के खिलाफ काम करते हैं। मुझे लगता है इनका नाम भी उस लिस्ट में होना चाहिए। मुझे नहीं मालूम है कि नहीं लेकिन मैं बोल रहा हूं होना चाहिए और अननोन गन मैन को बोल सकते हैं हम लोग कि भैया आपको अगर पैसे चाहिए हमारे जैसे लोग बैठे हैं फंडिंग करने के लिए आप बताओ कितने चाहिए लेकिन ये सारे जो जर्मन शेफर्ड एंड ऑल इनको खत्म करो यार ये न्यूसेंस बहुत लंबी हो गई और जो शेरवानी है फटी हुई भारत में उसका भी कोई काम करना  पड़ेगा आपको क्योंकि बेचारी बहुत तंग है कहती है यार हम बड़े तंग है यहां पर क्योंकि इनकी जिंदगी जो है वो तो लुल्ला के पास जाकर ही पूरी होती है तो क्यों ना इनको भेज दिया जाए ये जब तक इनको ट्रेंबल हम नहीं करवाएंगे आएंगे तब तक काम होगा नहीं और आपको अब अमेरिका की तरफ से कोई स्टेटमेंट कनाडा की तरफ से आपके खिलाफ अब नहीं आएगी क्योंकि उन्हें मालूम है एक तूफान शुरू हो चुका है न्यू दिल्ली में नॉर्थ ब्लॉक में अमित शाह के कमरे से रूल्स ऑफ द गेम चेंज हो गए हैं फॉर एवर तो ओनली क्वेश्चन लेफ्ट इज नाउ हु इज नेक्स्ट

 मुझे बड़ी खुशी होगी जिस दिन ख़स्तानी मरने शुरू होंगे कनाडा में अमेरिका में ऑस्ट्रेलिया में और जहां-जहां यह बैठे हैं।

जय हिंद।


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दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से

दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से

 Sergei Gor अमित शाह से मिलते हैं। एक लिस्ट एक्सचेंज होती है और हमें पता लगता है कि दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां वो मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से।एक हाइली फंडेड एंटी इंडिया प्रोपगेंड है जो कि अमेरिका में रहती थी। नाम था लोरा बलिक।वो एक्चुअल नाम था इसका। लौड़ा बलिक मार दी गई। न्यूयॉर्क के एक पार्क में घूम रही थी। मार दिया किसी ने।उसका काम क्या था? उसने एक डिजिटल मशीन को यूज किया हुआ था

अमेरिका के अंदर। जहां पर वो हिंदू भगवानों को वो डिमीन करती थी वो। ओपनली अपने फॉलोअर्स को बोलती थी कि हिंदू जो देवी देवता हैं उनको गालियां निकालिए। उसको कर्स कीजिए। उसको मार दिया गया। उसको क्या लगता था कि अमेरिका की धरती पर बैठी है। उसे कोई टच कर नहीं सकता। ये उसका गलतफहमी थी। शी वाज़ एंटायरली रॉन्ग। उसकी बॉडी डिस्कवर हुई है। डिस्कवर हुई आइसोलेटेड न्यूयॉर्क के एक स्टेट के पार्क के अंदर। अब सीआईए और एफबीआई को बुलाया गया है। स्टेट पुलिस ने बोल दिया कि हमें तो कोई क्लू नहीं मिल रहा क्योंकि कोई फुटप्रिंट्स भी नहीं है कि कोई आया उसको मार के चला गया। जो पूरी की पूरी जो ट्रेल है वो कंप्लीटली कोल्ड है। इसलिए उन्होंने एफबीआई को बुलाया है इसको इन्वेस्टिगेट करने के लिए। लेकिन अभी तक कुछ भी पता नहीं लगा कि ये अननोन गन मैन कहां से आए।

 कब हवा में ही काम करके वो चले गए। कोई वहां पे निशान गोली का नहीं है। कोई निशान मारा पट्टी का नहीं है। कोई गला दबाया नहीं गया। कुछ नहीं किया। लेकिन लेडी मरी पड़ी है। ये है अननोन गन मैन का काम।महादेव की यह सेना है। कब आएगी, कब काम करके जाएगी यह किसी को पता लगेगा नहीं। अब आपको लगेगा यार अमेरिका में ही काम कर दिया। नहीं। सिर्फ अमेरिका में नहीं हुआ। अभी थोड़ा सा डायरेक्टली आप पाकिस्तान की तरफ भी आ जाइए। वहां पर भी कुछ काम हो गया है। वहां पे क्या हुआ? एक लेफ्टिनेंट कर्नल है इमरान दयाल।उसको Olla के पास भेज दिया। पाकिस्तान आर्मी का यह लेफ्टिनेंट कर्नल है। ही वाज़ फाउंड दैट शॉट बाय अननोन गन मैन एज ऑलवेज। दोस्तों लेकिन जो खासियत ये नहीं है कि हमने लेफ्टिनेंट कर्नल को मारा। नॉर्मल न्यूज़ है। मारा कहां है? हाइली गार्डेड जो इनका डेरा इस्माइल खान का एरिया है। उसके अंदर इसको मारा गया है। फ्लोलेस हाइपरस सर्जिकल स्ट्राइक। दोस्तों ये जो है ना बंदे को मारा वहां पे जो पुलिस इसकी ISI है नंबर वन और जो नंबर वन मिलिट्री है पाकिस्तान की वो कहते हैं हमें फुटप्रिंट्स भी नहीं मिल रहे कि कौन सा बंदा कब आके ना कोई मोटरसाइकिल के ना गाड़ी के ना ही किसी के पैरों के निशान है कि कोई आया और मार के चला गया। लेकिन गोली लगी है यहां पे बंदूक रख कर। कोई दूर से मारा नहीं गया है। और मारा भी कहां है? उसके अपना जो किला था उसके बीच में बैठकर उसको मारा गया है। अब पाकिस्तान क्या कर रहा है? वो बोलता है कोई Ghost आया था वो मार के चला गया। अब पाकिस्तान की आर्मी वो घोस्ट को ढूंढ रही है।

जब यूएसए के एंबेसडर सर्ग गौर जब वो हाइली सिक्योर रूम के अंदर बैठे  मोदी जी के साथ नहीं जयशंकर के साथ नहीं वो बैठे इंडियन होम मिनिस्टर अमित शाह के पास। मैंने तब आपको एक एक्सक्लूसिव चीज बताई थी कि वहां पर एक लिस्ट को एक्सचेंज किया गया है। जहां पर हमने बोला कि अब काउंटर टेररिज्म के ऊपर काम हमें इकट्ठे मिलकर करना पड़ेगा। अभी तो ख़स्तानियों का नाम आएगा इसमें। आप देख लेना अगले 40-50 दिनों में  आपको बड़ा खास्तानी मारा हुआ दिखेगा।अमित शाह को मालूम है आर्किटेक्ट हैं भारत की इंटरनल सिक्योरिटी के और वो रेयरली किसी भी फॉरेन डेलीगेट्स को वो नहीं मिलते डायरेक्टली। यह काम जयशंकर का है। टाइमिंग एब्सोल्यूटली एक्सप्लोसिव थी। क्योंकि जो गौर है वो G7 की मीटिंग को छोड़कर फ्रांस में वो सीधा आते हैं अमित शाह के कमरे के अंदर। और आपको मालूम है प्रधानमंत्री मोदी और डोन्ड ट्रंप वहां पर मीटिंग कर रहे थे जब यहां पर स्वर्गीय गॉड और अमित शाह मीटिंग कर रहे थे। डिस्कस क्या किया गया तब मैंने बताया था आपको टू कंट्रोल टेररिज्म और दूसरा जो भारत के खिलाफ अमेरिका में बैठकर हमें धमकियां देते हैं हमारे धर्म को भी और हमारे कंट्री को उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। और ये दोनों कंट्रीज ने एग्री किया कि अब जॉइंटली जो ये क्रिमिनल माइंडसेट के लोग हैं इनको जस्टिस दिलाई जाएगी। जस्टिस कोर्ट में जाकर नहीं होती है। यह अननोन गन मैन ही यह जस्टिस दिलाते हैं। अब ग्रीन लाइट मिल गई है अमेरिका से जो आप कर रहे हैं। हम आपके साथ हैं। जो हम करेंगे आप भी हमारे साथ रहेंगे। इसको बोलते हैं जियोपॉलिटिकल चेस बोर्ड को फ्लिप करना। अब ये कोई रैंडम कोइजिडेंसेस नहीं है। दो बहुत डिफरेंट टारगेट्स। दो डिफरेंट कंट्रीज के अंदर। और वो टारगेट कौन थे? जो ओपनली होस्टाइल थे भारत की स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट के लिए उनको मारा गया है। दोनों को एलिमिनेट किया कुछ दिनों में कह दीजिए या कुछ घंटों के बीच में।

दोस्तों पिछले 20-30 साल में हुआ क्या था जो भारत की गवर्नमेंट थी वो डिफेंसिव खेलती रही। आपको मालूम है हम डोज़ियर पे डोज़ियर देते रहे। कभी यूनाइटेड स्टेट्स को, कभी कनाडा को, कभी यूनाइटेड नेशंस में और कभी पाकिस्तान को। हम कंप्लेन करते रहे ग्लोबल कम्युनिटी को कि यार ये लोग हमारे देश के खिलाफ ये काम कर रहे हैं। इनको रोको। और जो हमारे दुश्मन है वो हमारे मुंह के ऊपर हंसते थे। आज जो उन्होंने काम क्या किया था? हमारी जो डेमोक्रेटिक वैल्यू्यूज हैं या डेमोक्रेसी हमारी कंट्री की है उसको वेपन की तरह हमारे ऊपर यूज़ कर दिया। अगर हमने किसी को मारने की कोशिश करी या बोला हम आपको मार देंगे तो बोलते हैं ये डेमोक्रेटिक नहीं है। ये तो ह्यूमन राइट्स की वायलेशन है।

हमने बोल दिया ह्यूमन राइट्स ह्यूमंस के लिए होते हैं। लिब्रांडू और मुसलमान वो ह्यूमंस की कैटेगरी में वो आते ही नहीं है। ये डॉक्ट्राइन है गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का। इसलिए जो ये लोग सोचते थे कि पाकिस्तान के अंदर हम एक किले में बैठे हैं। अमेरिका में बैठे हैं। हमें कौन टच करेगा? वो एरा ऑफिशियली वो खत्म हो चुका है। अब क्या हो रहा है? जो हंटर है वो हम बन चुके हैं। हम हंटिंग कर रहे हैं अब इनकी कहीं भी हो दुनिया में और मैसिव ग्लोबल मनी ट्रेल को अगर आप फॉलो करेंगे तो आपको पता लगेगा ये सारे के सारे जो एंटी इंडिया के नेटवर्क्स हैं जहां पे पैसे आ रहे थे उसको भी ब्लॉक किया जा रहा है जो हॉस्टाइल कंट्रीज थी जो यूज़ करती थी हमारी जो फ्रिक्शन है कंट्री के अंदर छोटे-छोटे मुद्दों के ऊपर जियोपॉलिटिकल लीवरेज के लिए वो यूज़ करते थे हमने उसको भी बंद करना शुरू कर दिया आप यूज़ तो करके देखिए गोली ना आए अननोन गन मैन से नाम बदल देना भारत का भाई इंडिया का नाम बदल के भारत कर देना। हमें कोई दिक्कत नहीं है। एक राइजिंग पावर जब बढ़ती है उसे डिस्टेबलाइज करने के लिए आपके पास दो तीन मोहरे ही होते हैं। एक आप यहां पर उग्रवादी भेज दीजिए। हमारी तरक्की रुकवा दीजिए। दूसरा है कि आप नरेटिव्स को क्रिएट कीजिए। जैसे ये लौड़ा कर रही थी अमेरिका में बैठकर ताकि जो फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट्स है वो यहां पर भारत में ना आ सके। इसलिए जो ऑपरेशंस हैं ऐसे प्रोपेगेंडा करने वालों के जैसे बालिक थी ये ऑपरेशंस अब चालू हो चुके हैं। इनका जो मनी फ्लो है जो फाइनेंसियल मनी इनको मिलता था हमारे खिलाफ काम करने के लिए अब वो मनी फ्लो बंद हो जाएगा क्योंकि उनके जो लाउडस्पीकर्स हैं उसी को हमने साइलेंस कर  दिया। नेटवर्क कंप्लीटली फ्रैक्चर करके रख दिया है।लगेगा यार एक आधी लेडी को मार के क्या हो जाएगा अमेरिका में या एक कॉकरोच को आपने पाकिस्तान में मार दिया। की फर्क पड़ता है यही होता है कि जब आप इनको मारते हैं तो जो वेल्थदी जो डोनर्स हैं जो इनको फंडिंग करते हैं वह अपने पैसे को वो पीछे पीछे करना वो शुरू कर देंगे क्योंकि उनके जो रिटर्न ऑफ इन्वेस्टमेंट है वो क्रैश हो गई। अब उन्होंने इतने करोड़ों रुपए लगाए नरेटिव बिल्ड करने के लिए सोशल मीडिया पे स्प्रेड करने के लिए आज वो सारी इन्वेस्टमेंट जीरो

 कर दी आपने दो बंदों को मारकर। अब कनेक्ट कीजिए इसको पाकिस्तान के साथ। पाकिस्तान में जब से हमने सर्जिकल स्टाइल्स करनी शुरू करी है। क्या चक्कर है? पाकिस्तान इकोनॉमिकली भिखारी हो गया। कभी नोट किया आपने? हमने पहले काम किया था एक हमने सर्जिकल स्ट्राइक करी थी पाकिस्तान की घुस के अंदर के अंदर घुसकर नहीं। हमने जब डीमोनेटाइजेशन किया उसके बाद पाकिस्तान भिखारी होना शुरू हो गया। क्योंकि प्रिंटिंग मशीन कांग्रेस ने पाकिस्तान के अंदर लगाई हुई थी हमारी ही करेंसी की। उसके बाद दूसरा हमने किया जब अननोन गन मैन ने इनके बड़े-बड़े कॉकरोचों को मारना शुरू किया। उसके बाद जो इनको पैसे मिलते थे भारत को तंग करने के लिए वो मिलने बंद हो गए। अब आप सोच के देखिए 20 साल पीछे जाइए हिस्ट्री में तब क्या होता था। पाकिस्तान ने एक डॉक्ट्रिन बनाया था कि भारत को हर रोज हम जख्म देंगे। ये उनकी मास्टर पीस स्ट्रेटजी थी। उन्होंने नॉन स्टेट एक्टर्स को यूज़ किया जिओपॉलिटिकल वेपन की तरह। क्या बोलते थे वो? वो बोलते थे कि भ हमने तो कुछ किया ही नहीं। ये तो टेररिस्ट हैं। फ्रीडर फाइटर्स हैं। ये अपनी धरती के लिए ये लड़ रहे हैं। ग्लोबल स्टेज के ऊपर इनको ये नॉन स्टेक एक्टर्स बोल दिया गया। या

 बोल दीजिए अननोन गन मैन वो यूज़ करते थे। स्ट्रेटजी सफोकेटिंग थी। लेकिन लेकिन कामयाब थी पाकिस्तान के लिए। अब जो इकोनमिक कॉस्ट है इसकी वो ये थी कि इनको लगातार फंडिंग चाहिए ताकि इस नेटवर्क को जिंदा रख सके। हमने क्या किया? फंडिंग जहां से आती है पहले तो वहां से बंद करवाई। उसके बाद जिसको आती है उसको लुल्ला के पास हमने भेजना शुरू कर दिया। इनकी जो करेंसी है वो इसीलिए आज फेल हो रही है पाकिस्तान की। क्योंकि पीछे से जो टूटी थी पैसे आने की वो बंद हो गई। दोस्तों एक और भी चीज है कि ये जो पाकिस्तान है आज ये बेल आउट लेता है। बेल आउट भी हमने इनको दिलवाने बंद कर दिए। क्यों? क्योंकि बेल आउट आता है उससे ये उग्रवादी ही खड़ा करते हैं। हमने उस रास्ते को भी बंद कर दिया। सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ ये दो लोगों को मारने से नहीं हुई। हमने पाकिस्तान के ऊपर भी सर्जिकल स्ट्राइक्स बार-बार हमने करी है। कोई बात नहीं। इनको ये पाकिस्तानी बोलेंगे आज इस वीडियो के नीचे कि सर हमें तो जी 25 बार तो भीख मिल गई। एक बार और मिल जाएगी। आपके रोकने से क्या हो गया? होता क्या है? जब इनको भीख चाहिए हम उस वक्त नहीं दिलाने देते। हम देते हैं साल के बाद 8 महीने के बाद। जब उसका बोझ इतना बढ़ चुका होता है कि सिर्फ इंटरेस्ट पेमेंट में सारी की सारी भीख वो निकल जाती है। इसको बोलते हैं इनका वेट इतना बढ़ा देना है कि अपने वेट के नीचे ये दब के ही मर जाए। दोस्तों अब हो क्या रहा है? ये जो पाकिस्तान है ये जो जिसको हमने दीनदयाल को मारा है वहां पर दयालु होकर उसको ऊपर भेज दिया। ये वो आदमी है जिसको फंड करती थी मिलिट्री मिलिट्री ये हैंडलर्स थे मिलिट्री के अंदर इसको मार दिया गया और ये जरूरी था क्योंकि पाकिस्तान की एक फेटल मिसकलकुलेशन है उनको लगा कि यार दिल्ली के अगेंस्ट कुछ भी करते रहे हैं भारत के अगेंस्ट हमारे पास वो हिंदुओं की गवर्नमेंट है एपिटाइट ही नहीं है कि हम एस्केलेट करेंगे दे वर एम्बरेसिंगली रोंग हमारी जो इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं उन्होंने अब एविडेंस को कलेक्ट करना बंद कर दिया और जाकर हम फॉरेन की कोर्ट में जाके बोलते थे कि ये एविडेंस इन्होंने मारा इनको कुछ बोलिए बिल्कुल भी नहीं आपके पास एक इंफॉर्मेशन आई आपने उसको यूज़ किया और काम तमाम कर दिया इंडियन मीडिया जो मेन स्ट्रीम मीडिया है कंप्लीटली अंडरप्ले करती है ये सारी की सारी जो हमारी डॉक्टाइन शिफ्ट हो चुकी है अब घर में घुस के मारेंगे और हर रोज मारेंगे अब तो अमेरिका को लिस्ट दे दी हमने ये लिस्ट है खाली कराओ और हमारे यहां पे जो लिस्ट है वो आप खाली करवाओ दोनों तरफ से काम चल रहा है दोस्तों जो हमारी मीडिया है और अपोजिशन है वो क्या बोलती है? वीक गवर्नमेंट है। मोदी जी सबसे ज्यादा वीक वो प्रधानमंत्री हैं। चलिए राहुल गांधगी का 2000 2011 का एक बयान है कि टेररिस्ट अटैक तो होते रहेंगे। गवर्नमेंट के पास इतनी पावर नहीं है कि वो सारे टेररिस्ट अटैक्स वो बंद करवा सके। चलिए 2014 के बाद ऐसी पावर क्या आ गई? वीक प्रधानमंत्री मोदी जी के हाथ में ऐसी कौन सी पावर आ गई कि अब टेररिस्ट अटैक होते नहीं है।अब एक काम और हो गया। वेस्टर्न इंटेलिजेंस जो अप्रेटस है वो वॉच कर रहा है। कोई जवाब नहीं है उनका। ना ही यह बोला जा रहा है कि जैसे Nijjar को अननोन गन मैन आकर कुत्ते की तरह मार के चले गए। वैसे ही इस लौड़ा को मार दिया। चुप्पी है। उन्हें मालूम है कि यह ब्रांड न्यू रियलिटी है। इसे एक्सेप्ट करना पड़ेगा। उन्हें पता लग गया कि जो गेम वो चलाते थे आज भारत ने उसको करना शुरू कर दिया। हमारे पास जो ऑपरेशनल जो रीच है वो ग्लोबल हो चुकी है। ये सारी दुनिया को  दिखती है। दोस्तों जो भी भारत के खिलाफ गेम प्ले करेगा। उसके पहले तो जो ये टेरर फंडिंग है उसको बंद किया जाएगा। उसके बाद उनको हंट किया जाएगा। ये दुनिया को समझ आ गया। और जो पाकिस्तान के अंदर जो कंटोनमेंट एरिया है वो भी सेफ नहीं रहे। न्यूयॉर्क के पास जो पार्क हैं जहां पर कैमरे लगे हुए थे चारों तरफ वो भी सेफ नहीं है इनके लिए। ये जो पुराना जिओपॉलिटिकल सेफ्टी नेट था वो कंप्लीटली हमने कोलैप्स कर दिया और जो हमारा इंटेलिजेंस एजेंसीज का जो रीच है वो एब्सोल्यूट स्ट्रेटेजिक पैर के ऊपर आ गई है। अब हम मोसाद की तरह काम करते हैं। अब डेमोंस्ट्रेट करते हैं हम लोग कि जैसे सीआईए हर जगह पे जाकर गंध डाल सकती है। हम भी डाल सकते हैं। पाकिस्तान पैरालाइज्ड है अंदर से। स्ट्रेटेजिक जो उनकी इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं वो बिल्कुल दे आर लाइक यू नो जैसे मक्खियों को मारते हैं हम लोग वो हाल हो गया। नंबर वन बोलते हैं अपने आपको। आज लंबड़वान रह गए हैं वो और कुछ भी नहीं है। दे कैन नॉट इवन प्रोटेक्ट देयर ओन ऑफिसर्स। लेफ्टिनेंट कर्नल को कुत्ते की तरह हमने मार के फेंक दिया। हमने बोला हूं और गर्व से बोल रहा हूं। और उनको मालूम है कि जो हिट लिस्ट है हमारे पास वो बहुत लंबी है। ये आदमी वो था जिसने पहलगाम के अटैक के अंदर पूरा जो लॉजिस्टिक्स का काम था वो इसने करवा के दिया था। जो कॉस्ट है प्रॉक्सी वॉर की वो इतनी बड़ी हब पाकिस्तान के ऊपर कर रहे हैं कि जो जो ये अननोन गन मैन है इनक्रेडिबली पेशेंटली हाईली स्किल्ड वो ऑपरेशंस कर रहे हैं ताकि इनकी कॉस्ट बढ़ती रहे। दोस्तों उन्होंने एक डॉक्ट्रन शुरू किया भारत के खिलाफ। हम 1000 कट्स देंगे भारत को। भारत ने बोला कोई बात नहीं आपने 1000 दिए हम 10,000 दे सकते हैं। कल पीओके के अंदर एक डेमोंस्ट्रेशन और हुआ। क्या बोला उन्होंने कि आपके लोगों को पाकिस्तान को बोला है अपने लोगों को निकाल के बाहर निकालो। अब पीओके के लोग और भारत अपने आप निपट लेंगे कि हमने क्या करना है। क्या बोला? पीओके के लोग बोलते हैं कि हम भारत के साथ अपने आप डिसाइड कर लेंगे हमने क्या करना है। तुम यहां से दफा हो जाओ अपने बैग को लेकर। कल पीओके के अंदर यह काम हो गया। यह है ऑपरेशंस विद डेवस्टेटिंग इंप्युरिटी ग्लोबल हिट लिस्ट एक्सट्रीमली एक्टिव है। जो एनिमीज़ हैं भारत के उन्हें मालूम है कि क्या आने वाला है। उनकी नींदें अब हराम करने का टाइम आ गया। मैं कई बार बोलता हूं हमारे जो मेन स्ट्रीम मीडिया के कई लोग हैं जो छोड़ के कोई जर्मनी जर्मन शेफर्ड बन गया। कोई अमेरिका में अमेरिकन डॉग बन गया। कोई ऑस्ट्रेलिया में चला गया। ये जो वहां बैठ के भारत के खिलाफ काम करते हैं। मुझे लगता है इनका नाम भी उस लिस्ट में होना चाहिए। मुझे नहीं मालूम है कि नहीं लेकिन मैं बोल रहा हूं होना चाहिए और अननोन गन मैन को बोल सकते हैं हम लोग कि भैया आपको अगर पैसे चाहिए हमारे जैसे लोग बैठे हैं फंडिंग करने के लिए आप बताओ कितने चाहिए लेकिन ये सारे जो जर्मन शेफर्ड एंड ऑल इनको खत्म करो यार ये न्यूसेंस बहुत लंबी हो गई और जो शेरवानी है फटी हुई भारत में उसका भी कोई काम करना  पड़ेगा आपको क्योंकि बेचारी बहुत तंग है कहती है यार हम बड़े तंग है यहां पर क्योंकि इनकी जिंदगी जो है वो तो लुल्ला के पास जाकर ही पूरी होती है तो क्यों ना इनको भेज दिया जाए ये जब तक इनको ट्रेंबल हम नहीं करवाएंगे आएंगे तब तक काम होगा नहीं और आपको अब अमेरिका की तरफ से कोई स्टेटमेंट कनाडा की तरफ से आपके खिलाफ अब नहीं आएगी क्योंकि उन्हें मालूम है एक तूफान शुरू हो चुका है न्यू दिल्ली में नॉर्थ ब्लॉक में अमित शाह के कमरे से रूल्स ऑफ द गेम चेंज हो गए हैं फॉर एवर तो ओनली क्वेश्चन लेफ्ट इज नाउ हु इज नेक्स्ट

 मुझे बड़ी खुशी होगी जिस दिन ख़स्तानी मरने शुरू होंगे कनाडा में अमेरिका में ऑस्ट्रेलिया में और जहां-जहां यह बैठे हैं।

जय हिंद।


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दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से

दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से
दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से

 Sergei Gor अमित शाह से मिलते हैं। एक लिस्ट एक्सचेंज होती है और हमें पता लगता है कि दो बहुत बड़ी-बड़ी मछलियां वो मारी गई अननोन गन मैन की तरफ से।एक हाइली फंडेड एंटी इंडिया प्रोपगेंड है जो कि अमेरिका में रहती थी। नाम था लोरा बलिक।वो एक्चुअल नाम था इसका। लौड़ा बलिक मार दी गई। न्यूयॉर्क के एक पार्क में घूम रही थी। मार दिया किसी ने।उसका काम क्या था? उसने एक डिजिटल मशीन को यूज किया हुआ था

अमेरिका के अंदर। जहां पर वो हिंदू भगवानों को वो डिमीन करती थी वो। ओपनली अपने फॉलोअर्स को बोलती थी कि हिंदू जो देवी देवता हैं उनको गालियां निकालिए। उसको कर्स कीजिए। उसको मार दिया गया। उसको क्या लगता था कि अमेरिका की धरती पर बैठी है। उसे कोई टच कर नहीं सकता। ये उसका गलतफहमी थी। शी वाज़ एंटायरली रॉन्ग। उसकी बॉडी डिस्कवर हुई है। डिस्कवर हुई आइसोलेटेड न्यूयॉर्क के एक स्टेट के पार्क के अंदर। अब सीआईए और एफबीआई को बुलाया गया है। स्टेट पुलिस ने बोल दिया कि हमें तो कोई क्लू नहीं मिल रहा क्योंकि कोई फुटप्रिंट्स भी नहीं है कि कोई आया उसको मार के चला गया। जो पूरी की पूरी जो ट्रेल है वो कंप्लीटली कोल्ड है। इसलिए उन्होंने एफबीआई को बुलाया है इसको इन्वेस्टिगेट करने के लिए। लेकिन अभी तक कुछ भी पता नहीं लगा कि ये अननोन गन मैन कहां से आए।

 कब हवा में ही काम करके वो चले गए। कोई वहां पे निशान गोली का नहीं है। कोई निशान मारा पट्टी का नहीं है। कोई गला दबाया नहीं गया। कुछ नहीं किया। लेकिन लेडी मरी पड़ी है। ये है अननोन गन मैन का काम।महादेव की यह सेना है। कब आएगी, कब काम करके जाएगी यह किसी को पता लगेगा नहीं। अब आपको लगेगा यार अमेरिका में ही काम कर दिया। नहीं। सिर्फ अमेरिका में नहीं हुआ। अभी थोड़ा सा डायरेक्टली आप पाकिस्तान की तरफ भी आ जाइए। वहां पर भी कुछ काम हो गया है। वहां पे क्या हुआ? एक लेफ्टिनेंट कर्नल है इमरान दयाल।उसको Olla के पास भेज दिया। पाकिस्तान आर्मी का यह लेफ्टिनेंट कर्नल है। ही वाज़ फाउंड दैट शॉट बाय अननोन गन मैन एज ऑलवेज। दोस्तों लेकिन जो खासियत ये नहीं है कि हमने लेफ्टिनेंट कर्नल को मारा। नॉर्मल न्यूज़ है। मारा कहां है? हाइली गार्डेड जो इनका डेरा इस्माइल खान का एरिया है। उसके अंदर इसको मारा गया है। फ्लोलेस हाइपरस सर्जिकल स्ट्राइक। दोस्तों ये जो है ना बंदे को मारा वहां पे जो पुलिस इसकी ISI है नंबर वन और जो नंबर वन मिलिट्री है पाकिस्तान की वो कहते हैं हमें फुटप्रिंट्स भी नहीं मिल रहे कि कौन सा बंदा कब आके ना कोई मोटरसाइकिल के ना गाड़ी के ना ही किसी के पैरों के निशान है कि कोई आया और मार के चला गया। लेकिन गोली लगी है यहां पे बंदूक रख कर। कोई दूर से मारा नहीं गया है। और मारा भी कहां है? उसके अपना जो किला था उसके बीच में बैठकर उसको मारा गया है। अब पाकिस्तान क्या कर रहा है? वो बोलता है कोई Ghost आया था वो मार के चला गया। अब पाकिस्तान की आर्मी वो घोस्ट को ढूंढ रही है।

जब यूएसए के एंबेसडर सर्ग गौर जब वो हाइली सिक्योर रूम के अंदर बैठे  मोदी जी के साथ नहीं जयशंकर के साथ नहीं वो बैठे इंडियन होम मिनिस्टर अमित शाह के पास। मैंने तब आपको एक एक्सक्लूसिव चीज बताई थी कि वहां पर एक लिस्ट को एक्सचेंज किया गया है। जहां पर हमने बोला कि अब काउंटर टेररिज्म के ऊपर काम हमें इकट्ठे मिलकर करना पड़ेगा। अभी तो ख़स्तानियों का नाम आएगा इसमें। आप देख लेना अगले 40-50 दिनों में  आपको बड़ा खास्तानी मारा हुआ दिखेगा।अमित शाह को मालूम है आर्किटेक्ट हैं भारत की इंटरनल सिक्योरिटी के और वो रेयरली किसी भी फॉरेन डेलीगेट्स को वो नहीं मिलते डायरेक्टली। यह काम जयशंकर का है। टाइमिंग एब्सोल्यूटली एक्सप्लोसिव थी। क्योंकि जो गौर है वो G7 की मीटिंग को छोड़कर फ्रांस में वो सीधा आते हैं अमित शाह के कमरे के अंदर। और आपको मालूम है प्रधानमंत्री मोदी और डोन्ड ट्रंप वहां पर मीटिंग कर रहे थे जब यहां पर स्वर्गीय गॉड और अमित शाह मीटिंग कर रहे थे। डिस्कस क्या किया गया तब मैंने बताया था आपको टू कंट्रोल टेररिज्म और दूसरा जो भारत के खिलाफ अमेरिका में बैठकर हमें धमकियां देते हैं हमारे धर्म को भी और हमारे कंट्री को उन्हें छोड़ा नहीं जाएगा। और ये दोनों कंट्रीज ने एग्री किया कि अब जॉइंटली जो ये क्रिमिनल माइंडसेट के लोग हैं इनको जस्टिस दिलाई जाएगी। जस्टिस कोर्ट में जाकर नहीं होती है। यह अननोन गन मैन ही यह जस्टिस दिलाते हैं। अब ग्रीन लाइट मिल गई है अमेरिका से जो आप कर रहे हैं। हम आपके साथ हैं। जो हम करेंगे आप भी हमारे साथ रहेंगे। इसको बोलते हैं जियोपॉलिटिकल चेस बोर्ड को फ्लिप करना। अब ये कोई रैंडम कोइजिडेंसेस नहीं है। दो बहुत डिफरेंट टारगेट्स। दो डिफरेंट कंट्रीज के अंदर। और वो टारगेट कौन थे? जो ओपनली होस्टाइल थे भारत की स्ट्रेटेजिक इंटरेस्ट के लिए उनको मारा गया है। दोनों को एलिमिनेट किया कुछ दिनों में कह दीजिए या कुछ घंटों के बीच में।

दोस्तों पिछले 20-30 साल में हुआ क्या था जो भारत की गवर्नमेंट थी वो डिफेंसिव खेलती रही। आपको मालूम है हम डोज़ियर पे डोज़ियर देते रहे। कभी यूनाइटेड स्टेट्स को, कभी कनाडा को, कभी यूनाइटेड नेशंस में और कभी पाकिस्तान को। हम कंप्लेन करते रहे ग्लोबल कम्युनिटी को कि यार ये लोग हमारे देश के खिलाफ ये काम कर रहे हैं। इनको रोको। और जो हमारे दुश्मन है वो हमारे मुंह के ऊपर हंसते थे। आज जो उन्होंने काम क्या किया था? हमारी जो डेमोक्रेटिक वैल्यू्यूज हैं या डेमोक्रेसी हमारी कंट्री की है उसको वेपन की तरह हमारे ऊपर यूज़ कर दिया। अगर हमने किसी को मारने की कोशिश करी या बोला हम आपको मार देंगे तो बोलते हैं ये डेमोक्रेटिक नहीं है। ये तो ह्यूमन राइट्स की वायलेशन है।

हमने बोल दिया ह्यूमन राइट्स ह्यूमंस के लिए होते हैं। लिब्रांडू और मुसलमान वो ह्यूमंस की कैटेगरी में वो आते ही नहीं है। ये डॉक्ट्राइन है गवर्नमेंट ऑफ इंडिया का। इसलिए जो ये लोग सोचते थे कि पाकिस्तान के अंदर हम एक किले में बैठे हैं। अमेरिका में बैठे हैं। हमें कौन टच करेगा? वो एरा ऑफिशियली वो खत्म हो चुका है। अब क्या हो रहा है? जो हंटर है वो हम बन चुके हैं। हम हंटिंग कर रहे हैं अब इनकी कहीं भी हो दुनिया में और मैसिव ग्लोबल मनी ट्रेल को अगर आप फॉलो करेंगे तो आपको पता लगेगा ये सारे के सारे जो एंटी इंडिया के नेटवर्क्स हैं जहां पे पैसे आ रहे थे उसको भी ब्लॉक किया जा रहा है जो हॉस्टाइल कंट्रीज थी जो यूज़ करती थी हमारी जो फ्रिक्शन है कंट्री के अंदर छोटे-छोटे मुद्दों के ऊपर जियोपॉलिटिकल लीवरेज के लिए वो यूज़ करते थे हमने उसको भी बंद करना शुरू कर दिया आप यूज़ तो करके देखिए गोली ना आए अननोन गन मैन से नाम बदल देना भारत का भाई इंडिया का नाम बदल के भारत कर देना। हमें कोई दिक्कत नहीं है। एक राइजिंग पावर जब बढ़ती है उसे डिस्टेबलाइज करने के लिए आपके पास दो तीन मोहरे ही होते हैं। एक आप यहां पर उग्रवादी भेज दीजिए। हमारी तरक्की रुकवा दीजिए। दूसरा है कि आप नरेटिव्स को क्रिएट कीजिए। जैसे ये लौड़ा कर रही थी अमेरिका में बैठकर ताकि जो फॉरेन डायरेक्ट इन्वेस्टमेंट्स है वो यहां पर भारत में ना आ सके। इसलिए जो ऑपरेशंस हैं ऐसे प्रोपेगेंडा करने वालों के जैसे बालिक थी ये ऑपरेशंस अब चालू हो चुके हैं। इनका जो मनी फ्लो है जो फाइनेंसियल मनी इनको मिलता था हमारे खिलाफ काम करने के लिए अब वो मनी फ्लो बंद हो जाएगा क्योंकि उनके जो लाउडस्पीकर्स हैं उसी को हमने साइलेंस कर  दिया। नेटवर्क कंप्लीटली फ्रैक्चर करके रख दिया है।लगेगा यार एक आधी लेडी को मार के क्या हो जाएगा अमेरिका में या एक कॉकरोच को आपने पाकिस्तान में मार दिया। की फर्क पड़ता है यही होता है कि जब आप इनको मारते हैं तो जो वेल्थदी जो डोनर्स हैं जो इनको फंडिंग करते हैं वह अपने पैसे को वो पीछे पीछे करना वो शुरू कर देंगे क्योंकि उनके जो रिटर्न ऑफ इन्वेस्टमेंट है वो क्रैश हो गई। अब उन्होंने इतने करोड़ों रुपए लगाए नरेटिव बिल्ड करने के लिए सोशल मीडिया पे स्प्रेड करने के लिए आज वो सारी इन्वेस्टमेंट जीरो

 कर दी आपने दो बंदों को मारकर। अब कनेक्ट कीजिए इसको पाकिस्तान के साथ। पाकिस्तान में जब से हमने सर्जिकल स्टाइल्स करनी शुरू करी है। क्या चक्कर है? पाकिस्तान इकोनॉमिकली भिखारी हो गया। कभी नोट किया आपने? हमने पहले काम किया था एक हमने सर्जिकल स्ट्राइक करी थी पाकिस्तान की घुस के अंदर के अंदर घुसकर नहीं। हमने जब डीमोनेटाइजेशन किया उसके बाद पाकिस्तान भिखारी होना शुरू हो गया। क्योंकि प्रिंटिंग मशीन कांग्रेस ने पाकिस्तान के अंदर लगाई हुई थी हमारी ही करेंसी की। उसके बाद दूसरा हमने किया जब अननोन गन मैन ने इनके बड़े-बड़े कॉकरोचों को मारना शुरू किया। उसके बाद जो इनको पैसे मिलते थे भारत को तंग करने के लिए वो मिलने बंद हो गए। अब आप सोच के देखिए 20 साल पीछे जाइए हिस्ट्री में तब क्या होता था। पाकिस्तान ने एक डॉक्ट्रिन बनाया था कि भारत को हर रोज हम जख्म देंगे। ये उनकी मास्टर पीस स्ट्रेटजी थी। उन्होंने नॉन स्टेट एक्टर्स को यूज़ किया जिओपॉलिटिकल वेपन की तरह। क्या बोलते थे वो? वो बोलते थे कि भ हमने तो कुछ किया ही नहीं। ये तो टेररिस्ट हैं। फ्रीडर फाइटर्स हैं। ये अपनी धरती के लिए ये लड़ रहे हैं। ग्लोबल स्टेज के ऊपर इनको ये नॉन स्टेक एक्टर्स बोल दिया गया। या

 बोल दीजिए अननोन गन मैन वो यूज़ करते थे। स्ट्रेटजी सफोकेटिंग थी। लेकिन लेकिन कामयाब थी पाकिस्तान के लिए। अब जो इकोनमिक कॉस्ट है इसकी वो ये थी कि इनको लगातार फंडिंग चाहिए ताकि इस नेटवर्क को जिंदा रख सके। हमने क्या किया? फंडिंग जहां से आती है पहले तो वहां से बंद करवाई। उसके बाद जिसको आती है उसको लुल्ला के पास हमने भेजना शुरू कर दिया। इनकी जो करेंसी है वो इसीलिए आज फेल हो रही है पाकिस्तान की। क्योंकि पीछे से जो टूटी थी पैसे आने की वो बंद हो गई। दोस्तों एक और भी चीज है कि ये जो पाकिस्तान है आज ये बेल आउट लेता है। बेल आउट भी हमने इनको दिलवाने बंद कर दिए। क्यों? क्योंकि बेल आउट आता है उससे ये उग्रवादी ही खड़ा करते हैं। हमने उस रास्ते को भी बंद कर दिया। सर्जिकल स्ट्राइक सिर्फ ये दो लोगों को मारने से नहीं हुई। हमने पाकिस्तान के ऊपर भी सर्जिकल स्ट्राइक्स बार-बार हमने करी है। कोई बात नहीं। इनको ये पाकिस्तानी बोलेंगे आज इस वीडियो के नीचे कि सर हमें तो जी 25 बार तो भीख मिल गई। एक बार और मिल जाएगी। आपके रोकने से क्या हो गया? होता क्या है? जब इनको भीख चाहिए हम उस वक्त नहीं दिलाने देते। हम देते हैं साल के बाद 8 महीने के बाद। जब उसका बोझ इतना बढ़ चुका होता है कि सिर्फ इंटरेस्ट पेमेंट में सारी की सारी भीख वो निकल जाती है। इसको बोलते हैं इनका वेट इतना बढ़ा देना है कि अपने वेट के नीचे ये दब के ही मर जाए। दोस्तों अब हो क्या रहा है? ये जो पाकिस्तान है ये जो जिसको हमने दीनदयाल को मारा है वहां पर दयालु होकर उसको ऊपर भेज दिया। ये वो आदमी है जिसको फंड करती थी मिलिट्री मिलिट्री ये हैंडलर्स थे मिलिट्री के अंदर इसको मार दिया गया और ये जरूरी था क्योंकि पाकिस्तान की एक फेटल मिसकलकुलेशन है उनको लगा कि यार दिल्ली के अगेंस्ट कुछ भी करते रहे हैं भारत के अगेंस्ट हमारे पास वो हिंदुओं की गवर्नमेंट है एपिटाइट ही नहीं है कि हम एस्केलेट करेंगे दे वर एम्बरेसिंगली रोंग हमारी जो इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं उन्होंने अब एविडेंस को कलेक्ट करना बंद कर दिया और जाकर हम फॉरेन की कोर्ट में जाके बोलते थे कि ये एविडेंस इन्होंने मारा इनको कुछ बोलिए बिल्कुल भी नहीं आपके पास एक इंफॉर्मेशन आई आपने उसको यूज़ किया और काम तमाम कर दिया इंडियन मीडिया जो मेन स्ट्रीम मीडिया है कंप्लीटली अंडरप्ले करती है ये सारी की सारी जो हमारी डॉक्टाइन शिफ्ट हो चुकी है अब घर में घुस के मारेंगे और हर रोज मारेंगे अब तो अमेरिका को लिस्ट दे दी हमने ये लिस्ट है खाली कराओ और हमारे यहां पे जो लिस्ट है वो आप खाली करवाओ दोनों तरफ से काम चल रहा है दोस्तों जो हमारी मीडिया है और अपोजिशन है वो क्या बोलती है? वीक गवर्नमेंट है। मोदी जी सबसे ज्यादा वीक वो प्रधानमंत्री हैं। चलिए राहुल गांधगी का 2000 2011 का एक बयान है कि टेररिस्ट अटैक तो होते रहेंगे। गवर्नमेंट के पास इतनी पावर नहीं है कि वो सारे टेररिस्ट अटैक्स वो बंद करवा सके। चलिए 2014 के बाद ऐसी पावर क्या आ गई? वीक प्रधानमंत्री मोदी जी के हाथ में ऐसी कौन सी पावर आ गई कि अब टेररिस्ट अटैक होते नहीं है।अब एक काम और हो गया। वेस्टर्न इंटेलिजेंस जो अप्रेटस है वो वॉच कर रहा है। कोई जवाब नहीं है उनका। ना ही यह बोला जा रहा है कि जैसे Nijjar को अननोन गन मैन आकर कुत्ते की तरह मार के चले गए। वैसे ही इस लौड़ा को मार दिया। चुप्पी है। उन्हें मालूम है कि यह ब्रांड न्यू रियलिटी है। इसे एक्सेप्ट करना पड़ेगा। उन्हें पता लग गया कि जो गेम वो चलाते थे आज भारत ने उसको करना शुरू कर दिया। हमारे पास जो ऑपरेशनल जो रीच है वो ग्लोबल हो चुकी है। ये सारी दुनिया को  दिखती है। दोस्तों जो भी भारत के खिलाफ गेम प्ले करेगा। उसके पहले तो जो ये टेरर फंडिंग है उसको बंद किया जाएगा। उसके बाद उनको हंट किया जाएगा। ये दुनिया को समझ आ गया। और जो पाकिस्तान के अंदर जो कंटोनमेंट एरिया है वो भी सेफ नहीं रहे। न्यूयॉर्क के पास जो पार्क हैं जहां पर कैमरे लगे हुए थे चारों तरफ वो भी सेफ नहीं है इनके लिए। ये जो पुराना जिओपॉलिटिकल सेफ्टी नेट था वो कंप्लीटली हमने कोलैप्स कर दिया और जो हमारा इंटेलिजेंस एजेंसीज का जो रीच है वो एब्सोल्यूट स्ट्रेटेजिक पैर के ऊपर आ गई है। अब हम मोसाद की तरह काम करते हैं। अब डेमोंस्ट्रेट करते हैं हम लोग कि जैसे सीआईए हर जगह पे जाकर गंध डाल सकती है। हम भी डाल सकते हैं। पाकिस्तान पैरालाइज्ड है अंदर से। स्ट्रेटेजिक जो उनकी इंटेलिजेंस एजेंसीज हैं वो बिल्कुल दे आर लाइक यू नो जैसे मक्खियों को मारते हैं हम लोग वो हाल हो गया। नंबर वन बोलते हैं अपने आपको। आज लंबड़वान रह गए हैं वो और कुछ भी नहीं है। दे कैन नॉट इवन प्रोटेक्ट देयर ओन ऑफिसर्स। लेफ्टिनेंट कर्नल को कुत्ते की तरह हमने मार के फेंक दिया। हमने बोला हूं और गर्व से बोल रहा हूं। और उनको मालूम है कि जो हिट लिस्ट है हमारे पास वो बहुत लंबी है। ये आदमी वो था जिसने पहलगाम के अटैक के अंदर पूरा जो लॉजिस्टिक्स का काम था वो इसने करवा के दिया था। जो कॉस्ट है प्रॉक्सी वॉर की वो इतनी बड़ी हब पाकिस्तान के ऊपर कर रहे हैं कि जो जो ये अननोन गन मैन है इनक्रेडिबली पेशेंटली हाईली स्किल्ड वो ऑपरेशंस कर रहे हैं ताकि इनकी कॉस्ट बढ़ती रहे। दोस्तों उन्होंने एक डॉक्ट्रन शुरू किया भारत के खिलाफ। हम 1000 कट्स देंगे भारत को। भारत ने बोला कोई बात नहीं आपने 1000 दिए हम 10,000 दे सकते हैं। कल पीओके के अंदर एक डेमोंस्ट्रेशन और हुआ। क्या बोला उन्होंने कि आपके लोगों को पाकिस्तान को बोला है अपने लोगों को निकाल के बाहर निकालो। अब पीओके के लोग और भारत अपने आप निपट लेंगे कि हमने क्या करना है। क्या बोला? पीओके के लोग बोलते हैं कि हम भारत के साथ अपने आप डिसाइड कर लेंगे हमने क्या करना है। तुम यहां से दफा हो जाओ अपने बैग को लेकर। कल पीओके के अंदर यह काम हो गया। यह है ऑपरेशंस विद डेवस्टेटिंग इंप्युरिटी ग्लोबल हिट लिस्ट एक्सट्रीमली एक्टिव है। जो एनिमीज़ हैं भारत के उन्हें मालूम है कि क्या आने वाला है। उनकी नींदें अब हराम करने का टाइम आ गया। मैं कई बार बोलता हूं हमारे जो मेन स्ट्रीम मीडिया के कई लोग हैं जो छोड़ के कोई जर्मनी जर्मन शेफर्ड बन गया। कोई अमेरिका में अमेरिकन डॉग बन गया। कोई ऑस्ट्रेलिया में चला गया। ये जो वहां बैठ के भारत के खिलाफ काम करते हैं। मुझे लगता है इनका नाम भी उस लिस्ट में होना चाहिए। मुझे नहीं मालूम है कि नहीं लेकिन मैं बोल रहा हूं होना चाहिए और अननोन गन मैन को बोल सकते हैं हम लोग कि भैया आपको अगर पैसे चाहिए हमारे जैसे लोग बैठे हैं फंडिंग करने के लिए आप बताओ कितने चाहिए लेकिन ये सारे जो जर्मन शेफर्ड एंड ऑल इनको खत्म करो यार ये न्यूसेंस बहुत लंबी हो गई और जो शेरवानी है फटी हुई भारत में उसका भी कोई काम करना  पड़ेगा आपको क्योंकि बेचारी बहुत तंग है कहती है यार हम बड़े तंग है यहां पर क्योंकि इनकी जिंदगी जो है वो तो लुल्ला के पास जाकर ही पूरी होती है तो क्यों ना इनको भेज दिया जाए ये जब तक इनको ट्रेंबल हम नहीं करवाएंगे आएंगे तब तक काम होगा नहीं और आपको अब अमेरिका की तरफ से कोई स्टेटमेंट कनाडा की तरफ से आपके खिलाफ अब नहीं आएगी क्योंकि उन्हें मालूम है एक तूफान शुरू हो चुका है न्यू दिल्ली में नॉर्थ ब्लॉक में अमित शाह के कमरे से रूल्स ऑफ द गेम चेंज हो गए हैं फॉर एवर तो ओनली क्वेश्चन लेफ्ट इज नाउ हु इज नेक्स्ट

 मुझे बड़ी खुशी होगी जिस दिन ख़स्तानी मरने शुरू होंगे कनाडा में अमेरिका में ऑस्ट्रेलिया में और जहां-जहां यह बैठे हैं।

जय हिंद।


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