सुप्रीम कोर्ट के द्वारा एक खतरनाक कमेंट किया गया। खतरनाक ऑनरेबल चीफ जस्टिस का अभी तक का यह सबसे खतरनाक स्टेटमेंट है। और उन्होंने पूरी न्याय व्यवस्था को पूरी न्याय व्यवस्था का मतलब पूरी न्याय व्यवस्था को देश की कड़घरे पर खड़ा कर दिया है। उन्होंने न्याय व्यवस्था के मामले में कहा कि हम विदेशी नहीं हैं। हम भारत हैं। भारत को ध्यान में रखते हुए जजमेंट होने चाहिए। भारत को ध्यान में रखते हुए ही कारवाई होनी चाहिए। हम विदेशियों की तरह सेक्सुअल ऑफेंसेस में यह निर्णय नहीं दे सकते। यह सेंसिटिविटी हमारे जजेस में होनी चाहिए। राष्ट्र दिमाग में होना चाहिए। देश दिमाग में होना चाहिए। देश की संप्रभुता, देश का सोशल स्ट्रक्चर, देश का इकोनॉमिक स्ट्रक्चर ये सारे दिमाग में होने चाहिए। जिस समय कोई जजमेंट दिया जाए। फिर उन्होंने कहा कि मैं आदेश देता हूं नेशनल जुडिशियल एकेडमी को और मैं उनसे कहता हूं जस्टिस अनिरुद्ध बोस जो कि इस समय नेशनल जुडिशियल एकेडमी के इस समय प्रेसिडेंट हैं। पांच सदस्यों की एक कमेटी बनाई और कहा कि फिर से रिवैल्यूएट करिए कि हमारे जजेस को क्या पढ़ाया जा रहा है।
हर राज्य में एक जुडिशियल कमेटी होती है। जुडिशियल एकेडमी होती है हर राज्य में छोटे जजेस को छोटे जजेस से मतलब है डिस्ट्रिक्ट कोर्ट तक के जजेस को वो एकेडमी पढ़ाती है।पर्टिकुलर सिलेबस तैयार कर दिया जाता है। उन सिलेबस में कुछ चुनिंदा केसेस डाल दिए जाते हैं। उनका एक ओवरव्यू डाल दिया जाता है। उसी ओवरव्यू के आधार पर नीचे की कोर्ट यानी कि डिस्ट्रिक्ट की कोर्ट डिसीजन देना शुरू करती है। खासतौर से लोअर कोर्ट जो ट्रायल कोर्ट फर्स्ट ट्रायल कोर्ट है सबसे पहले वो उसी के आधार पर वो अपनी डायरी साथ में रखते हैं। जैसे ही उनके सामने कोई ऐसा पेचीदा मामला आता है डायरी खोलते हैं। डायरी में जो लिखा होता है कि इसको ऐसे करना चाहिए वैसे उसका डिसाइड कर देते हैं। फिर वो सोचते हैं कि जाने दो ऊपर जब कुछ गड़बड़ होएगी तो अपीली कोर्ट उसको डिसाइड कर देगी। इस प्रकार एकेडमी जब नया हाई कोर्ट के जजेस अपॉइंट होते हैं तो उनको भी एकेडमी भेजा जाता है।
नेशनल जुडिशियल एकेडमी भी होती है। उसमें भी वही किया जाता है। नेशनल जुडिशियल एकेडमी हमारे यहां भोपाल में है। वहां पर जो भी लॉर्डशिप का अपॉइंटमेंट होता है, लॉर्डशिप के अपॉइंटमेंट से पहले मतलब पहला जब एलिवेशन होता है तो एलिवेशन से पहले उनको सेंसिटिविटी दिखाई जाती है, पढ़ाई जाती है, सिखाई जाती है। और कैसे बिहेवियर होना चाहिए? क्या हमारे हमारे रिपरकेशंस हैं? क्या हमारी बाउंड्रीज हैं? क्या हम तय करें? यह सब कुछ पहले से तय किया जाता मतलब वहां पर पढ़ाया जाता है। उसके बाद लॉर्डशिप मतलब जब कोर्ट में जाते हैं तो प्रोवेशन पे एक दो साल रहते हैं। प्रोवेशन के बाद परमानेंट हो जाते हैं तो लॉर्डशिप हो जाती है। लॉर्डशिप हो जाती है तो फिर तो हम जानते ही हैं कि वो क्या करने लगते हैं। फिर उनको वो ना तो काबू में रह सकते हैं ना ही उनके ऊपर कोई दबाव हो सकता है। उनके ऊपर सिर्फ एक काम हो सकता है। वो है महाभियोग। इसलिए महाभियोग की प्रक्रिया हम सब जानते हैं। भारत में आज तक एक भी जज महाभियोग से नहीं हटाया गया। या तो उन्होंने खुद इस्तीफा दे दिया होगा या फिर पार्लियामेंट के अंदर बहुमत नहीं मिला होगा या फिर वहां सरकार गिर गई होगी। लेकिन एक भी जज का अभी तक वो नहीं हुआ। हम जस्टिस यशवंत वर्मा का मामला इस समय देख ही रहे हैं। इतने नोटों की गड्डियां मिलने के बावजूद जब पार्लियामेंट ने या लोकसभा ने कमेटी बिठा दी कि इस पर जांच करो तो फिर सुप्रीम कोर्ट आते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट जाते हैं। फिर सुप्रीम कोर्ट कहता है अब इसको देख रहे हैं। अब उसको देख रहे हैं। वो मतलब किस तरह से उलझए हुए हैं।मुझे लगता है कि वो भी थोड़ा सा लंबा खींच जाएगा।
मैं आपको बता दूं कि ये जो मामला आया है बहुत सेंसिटिव है। आपको याद होगा एक नागपुर का मामला आया था। नागपुर हाई कोर्ट की एक महिला जज ने भी कुछ समय पहले ऐसा ही एक डिसीजन दिया था जिन्होंने कहा था कि कपड़े ऊपर से पहने हुए थी लड़की अगर तो फिर वो ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता। अब कपड़े ऊपर से पहने हुए थे। ऑफेंस की कैटेगरी में नहीं आता क्योंकि बीच में कपड़े हैं उसके और व्यक्ति के बीच में कपड़े हैं। उन्होंने कपड़े पहन रखे हैं। तो ये अटेम्प्ट टू रेप नहीं हो सकता। ऐसा कुछ उन्होंने डिसीजन दिया था। लेकिन उन जैसा साहिबा की खास बात ये थी कि वो प्रोबेशन पर थी और प्रोबेशन पर होने की वजह से उनको परमानेंट नहीं किया गया था। अबकि उनको परमानेंट नहीं किया गया था तो वो वापस बैक टू पवेलियन चली गई होंगी या फिर प्रैक्टिस करना शुरू कर दिया होगा जो भी हो।
ऐसा ही एक सेंसिटिव मामला पॉक्सो एक्ट का फिर से आया ऑनरेबल इलाहाबाद हाई कोर्ट का। ऑनरेबल इलाहाबाद हाईको ने जो डिसीजन दिया वो विदेशी धारणाओं के आधार पर था। जैसा कि विदेशों में होता है। कोर्ट ने कहा है च्यू फॉरेन मेथड्स। ये जो विदेशों के मेथड है ना सेक्सुअल ऑफेंसेस में बचाने की। किसी तरह से बचा लो। उनके बीच में कॉम्प्रोमाइज हो जाए। कॉम्प्रोमाइज होकर मामला निपट जाए। अपने-अपने घर जाए। क्या फर्क पड़ता है? वो उनके आपस के पर्सनल रिलेशंस लड़के लड़की के रहते हैं। जो ऑफेंडर है उसके या जो एक जो एक्यूज्ड है उसके और जो विक्टिम है उसके उनके आपस के रिलेशन है। अगर वो आपस में समझौता कर लेते हैं तो सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी खतरनाक टाइप के सेक्सुअल ऑफेंसेस में भी वहां बचा दिया जाता है। कंपनसेशन लेके लड़की अपने घर चली जाती है। लड़का अपने घर चला जाता है। परिवार के बीच में या दोनों के बीच में समझौता हो जाता है।
लेकिन भारत ऐसा नहीं। भारत में हर एक ऑफेंस अगेंस्ट द स्टेट है। राज्य की अपनी एक धारणा है। राज्य का अपना एक स्टाइल है। राज्य का अपनी व्यवस्था है। राज्य का अपना एक संस्कार है। राज्य की अपनी एक संस्कृति
है और राज्य में रहने वाले लोगों की ये अपनी धारणा है। मैं इसको अगर दूसरे शब्दों में कहूं तो ये डेफिनेशन पहले भी सुप्रीम कोर्ट बता चुका है कि उत्तर में जिसके हिमालय हो दक्षिण में जिसके महासागर हो उस भूमि पर रहने वाले लोगों का जो स्वभाव है वे ऑफ लाइफ है उसको ही हिंदू कहते हैं। उसको ही हिंदूइज़्म कहते हैं। और कोई अलग से डेफिनेशन नहीं है। यहां की संस्कृति, यहां के संस्कार, यहां का पहनावा, उड़ावा और जो पूर्वजों के द्वारा किए गए कार्य, पूर्वजों के शौर्य और पूर्वजों की मान्यता, पूर्वजों के द्वारा मूल्य निर्धारित किए गए मूल्यों की जो स्थापना है, वही भारत है।
ऑनरेबल सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस हम सब जानते हैं कि ऑनरेबल जस्टिस सूर्यकांत जब बैठे थे उसी समय उन्होंने कहा था रोहिंग्या अंदर आ गए तो क्या इनको रेड कॉरपेट बिछाऊं? क्या इनको मैं एजुकेशन दूं? क्या इनके खाने पीने की व्यवस्था करूं? इनके लिए यहां स्थान नहीं है। जो बॉर्डर तोड़कर आया है, जो कानून तोड़कर आया है, उसको भारत में स्थान नहीं दिया जा सकता। ऐसे ही कई मामलों में उन्होंने अब नई दोबारा से फाइलें खोलनी शुरू कर दी हैं। मैंने अभी बताया था शरूर मठ का मामला दोबारा खोल दिया गया है सबरीमाला के नाम से। लेकिन अब वहां जो सरकारी आधिपत्य है मंदिरों पर सरकार का उससे मुक्ति का समय आ गया है। नई जजेस की बेंच बिठाकर उस पर सुनवाई। मैंने उस पर एक पूरा लेक्चर रिकॉर्ड किया था। उसका कानूनी पहलू बताया था और कोर्ट की धारणा भी बताई थी और कैसे कोर्ट ने नए जजेस की बेंच बनाई वो अगर आपने ना देखा हो तो उसको देखना चाहिए। मैं समझता हूं कि आज सुप्रीम कोर्ट ने जब कहा और मामला क्या था? एक नाबालिक लड़की पर किसी लड़के ने प्रहार किया। किसी आदमी ने प्रहार किया। प्रहार करते समय उसने उसकी छाती पर प्रहार किया और कपड़े खोल रहा था। इस स्थिति में दूसरे लोग वहां पर आ गए जिसकी वजह से वो लड़की बच गई। जब लड़की बच गई तो मुकदमा लिखवाया गया। मुकदमे में यह अटेमप्ट टू रेप का मुकदमा था। लेकिन जब हाई कोर्ट पहुंचा तो हाई कोर्ट ने कहा कि छाती पर हाथ मारना किसी भी तरह से अटेमप्ट टू रेप नहीं है। ऑनेरेबल सुप्रीम कोर्ट में जब उसकी अपील आई तो आज तीन जजेस की बेंच ने उसको सुना। अब तीन जजेस की बेंच जब उसको सुन रही थी। सुनते समय चीफ जस्टिस को ये कहना पड़ा कि ये कैसा न्याय हम कर रहे हैं? ये कैसा भारत हम बना रहे हैं? भारत में हम किस प्रकार की धारणा रखे हुए हैं? क्या हम विदेशियों के आधार पर यहां तय करने लगे लगना शुरू कर दिया है? क्या हमारी धारणाएं विदेशी धारणाएं हो गई है? क्या हम विदेशियों के नक्शे कदम पर चल पड़े हैं।आपको एक बात बताऊं कि भारत में एक बड़ा अच्छा चलन चला था। चलन ये चला था कि अगर ऑक्सफोर्ड हालांकि सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस ने आज ऑक्सफोर्ड का भी नाम लिया इसमें। हमारे यहां एक चलन चल गया था और चलन यह था कि जो कैमब्रिज, ऑक्सफोर्ड और तमाम तरह के इन विद्यालयों से पढ़कर आए, इन यूनिवर्सिटी से पढ़कर आए वो बहुत काबिल होता है और वो काबिल होता था तो वो जज जब बनकर बैठता है तो वो क्या
करता है? वो कहता है सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में लड़की और लड़के को पूर्ण रूप से ऑटोनोमी है। वो कहता है कि गे मैरिज वैलिड है। जब वो वहां से पढ़कर आते हैं तो यहां पर वो धारणा रखते हैं कि गेज हैविंग द फंडामेंटल राइट टू गेट अ जज ऑफ द सुप्रीम कोर्ट। एक गे जो महिला गे हो वकालत करता है उसको सुप्रीम कोर्ट का जज होने का भी अधिकार है। उसको हाई कोर्ट का जज होने का अधिकार है। किस तरह का मैसेज हमारे जजेस दे देते रहे हैं। गे मैरिज के मामले में या सेम सेक्स मैरिज के मामले में या फिर तमाम ये जो एडल्टरी के मामले हैं उन मामलों में एक्स्ट्रा मैरिटल अफेयर्स के मामले में ये भारत की धारणा तो नहीं थी। लेकिन पिछले 5 साल में इस तरह के कई एक जजमेंट भारत में दिए गए। ये वो जजेस थे मोस्टली जिन्होंने ये जजमेंट दिए जो विदेशों में पढ़कर आए थे। विदेशों में पढ़ने के बाद वहां का माहौल, वहां का एटमॉस्फियर, वहां का वातावरण उसके आधार पर डिसीजन दे दिए उन्होंने और कहा कि नहीं नहीं वो सामन ने ऐसा लिखा था कि सेवनी ने ऐसा लिखा था कि वो ऑस्टिन ने ऐसा लिखा था। बड़े-बड़े भारीभरकम नाम बैकग्राउंड में देकर जरिसुडेंस के और अंग्रेजी जरिसुडेंस को यहां लिखकर जजमेंट देते रहे हैं और उन जजमेंटों में सरकार को पीछे छोड़ते रहे हैं। सरकार के ऊपर फंडामेंटल राइट के नाम से तमाम अत्याचार करते अत्याचार से मतलब है तमाम ऐसे जजमेंट देते रहे हैं जो भारत की सोवनिटी को चैलेंज करते थे। ऐसे तमाम जजमेंट होते रहे हैं जो भारत की बाउंड्री को प्रोटेक्ट नहीं करते। भारत के लोगों के फंडामेंटल राइटों को प्रोटेक्ट नहीं करते। विदेशियों को भारत में शरण देना, विदेशियों के फंडामेंटल राइट हमारे यहां होता रहा है। जजमेंट भी होते रहे कि भ अगर विदेशी है तो क्या हुआ? इसको पढ़ने का राइट है। इसको खाने का राइट है। इसको सोने का राइट है। इसको ये राइट है। इसको राइट टू लाइफ एंड पर्सनल लिबर्टी है। हम नहीं छीन सकते। इसलिए इसके स्कूलों में एडमिशन करवा दिए जाए। इनको वो वजीफे दिए जाए। इनको इस तरह के जजमेंट भारत में होते रहे।
मैं साधुवाद कहूंगा ऑनरेबल चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जिन्होंने आज ये ये जो दर्द था उस दर्द को खुलकर कह दिया। भले ही केस किसी दूसरे प्रकार का था लेकिन उन्होंने खुलकर कहा और कहा कि विदेशी आधार पर विदेशी धारणा के आधार पर विदेशी बचाव के आधार पर भारत में अदालतें नहीं चलनी चाहिए। भारत के जजों को सेंसिटिव होना चाहिए।इंडियन इको सिस्टम से फेमिलियर होना चाहिए। भारत की सोशल स्ट्रक्चर को पता होना चाहिए। भारत में वो मैसेज कैसा जाएगा। क्योंकि पहले यह होता रहा है कि जब जजेस डिसीजन देते थे तो आंख पर पट्टी बांधकर अंधा कानून ऐसा दिखाया जाता था। यानी कि कानून के जो अप एंड डाउन्स हैं, कानून के जो डिसीजंस हैं उनको ही केवल फॉलो किया जाएगा। चाहे वो जज साहब को मालूम हो कि वो सही है, जज साहब को मालूम हो कि वो नहीं सही। कुछ भी हो। लेकिन जो फार्मूला बन गया है उसी फार्मूले पर चलने वाले हमारे यहां कोर्ट रहे।
चीफ जस्टिस ने कहा एक बात ध्यान रखिए भारत है। भारत में भारतीय प्रेसिडेंट भी है। भारतीय कल्चर भी है। भारत का अपना स्वभाव है। उसके अनुसार क्या मैसेज देना चाहते हैं? जजेस को चाहिए कि वो केवल लीगल ग्राउंड ना लगाएं। यह भी देखें कि उनके जजमेंट से देश पर प्रभाव क्या पड़ेगा? उनके जजमेंट से समाज पर क्या प्रभाव पड़ेगा? उनके ऑर्डर से देश में आने वाली पीढ़ी क्या सबक लेंगी? ये सारी बातें उन्होंने आज जो कही हैं मैं समझता हूं कि दिल खुश कर दिया मेरे जैसे व्यक्ति का जो लगातार ये कहता आया मैं हमेशा से कहता हूं हम हैं आप हैं कोई भी प्रोफेशन में है मैं जज हूं मैं वकील हूं मैं डॉक्टर हूं मैं इंजीनियर हूं मैं पत्रकार हूं भाई राष्ट्रित तो में हूं कहां है वो जजेस जो कि आजादी से पहले हुआ करते थे और कहां गए वो जजेस भारत में आक्रांताओं ने जब कब्जे किए तो उससे पहले न्यायाधीश बैठा करते थे वो कोई नहीं रहता। जब देश गुलाम होता है तो हर व्यक्ति गुलाम होता है। जब देश खतरे में होता है तो हर व्यक्ति खतरे में होता है। किसी का कोई फंडामेंटल राइट नहीं होता और कोई राइट ही नहीं होता। जब राष्ट्र है तो हम हैं। राष्ट्र प्रथम की भावना करके कोई भी काम किया जाए। पत्रकार लिखता है तो राष्ट्र प्रथम लिखे। इंजीनियर बिल्डिंग बनाता है तो राष्ट्र प्रथम बनाए। डॉक्टर दवाई देता है तो राष्ट्र प्रथम की बनाए। वकील वकालत करता है तो राष्ट्र प्रथम पे बनाए। करें और अगर जज जजमेंट देता है तो राष्ट्र प्रथम का जजमेंट क्यों ना दिया जाए।
आज का मैसेज जो उन्होंने दिया है जुडिशरी जैसा वो बता रहे हैं वैसी ही होनी चाहिए। मेरा मन तो यही कहता है कि जुडिशरी वैसी होनी चाहिए जैसा कि ऑनरेबल चीफ जस्टिस ने आज कहा। आप सोच कर देखिए। सेक्सुअल ऑफेंसेस के मामले में भी आप ऑक्सफोर्ड और कैंब्रिज को फॉलो करते हैं। आप वो वातावरण को फॉलो करते हैं जो लोग कॉन्वेंट में बच्चों को पढ़ाया करते थे। कॉन्वेंट का मतलब ये होता था विदेशी भाषा में अगर देखोगे तो कॉन्वेंट का मतलब अनाथालय है। वो अनाथालय में पढ़ाया करते थे। क्यों? क्योंकि वो प्लूटो और सुकरात कहता था कि महिला और पुरुष का जो साथ होता है वो बच्चे पालने के लिए नहीं होता है। वो केवल एंजॉय करने के लिए होता है। अगर बच्चे पालने के लिए नहीं तो बच्चों का क्या होगा? तो फिर वो ऑर्फनेज में रखे जाते थे। ऑर्फनेज में जो स्कूल खोला जाता था जहां पर पढ़ाई भी होती थी उसको कॉन्वेंट कहा जाता था। यानी कि अब वो फ्री है। आज भी उनके यहां का वातावरण कुछ ऐसा ही है कि एक महिला अपने एक मैं किसी का उदाहरण सुन रहा था। एक महिला अपने पति की कब्र पर झूला झुला रही थी या पंखा डुला रही थी। कुछ लोग वहां गए तो हिंदुस्तान के रहने वाले थे। उनको लगा कि देखो ये ईसाइयत की धरती पर कितनी अच्छी महिला है। ये तो भारत के संस्कारों से भी बड़े संस्कार हैं। उस महिला से उन्होंने बात की। उन्होंने कहा कि हमने तो विदेशों के बारे में, ईसाइयों के बारे में जो वहां पर रहते हैं उनके विषय में बड़ा गलत सुना है कि वो तो इंटैक्ट होते नहीं है। वो तो कॉन्ट्रैक्ट में रहते हैं। तो वो महिला हंसने लगी और उसने कहा कि हम कब्र सूखने से पहले विवाह नहीं कर सकते। इसलिए मैं पंखे से कब्र सुखा रही हूं ताकि कब्र सूख जाए तो मैं विवाह कर लूं। दूसरा विवाह मेरा हो जाए। इतने रिस्ट्रिक्शन की कब्र सूखने तक का रिस्ट्रिक्शन है। यह भारत नहीं है। आप देखो जहां पर इस प्रकार की व्यवस्थाएं हो कि वो कॉन्ट्रैक्ट है। आज हमारा तो कल तुम्हारा जानवरों की तरह जिनका व्यवहार है।
जानवरों की तरह जिनका चाल चलन है। जानवरों की तरह जिनकी रिहाइश
है। उनको कैसे फॉलो कर सकते हैं। भारत विश्व गुरु के पद पर इसलिए आसीन था क्योंकि भारत विश्व भर को मैसेज देने वाला देश है। भारत विश्व भर में बताने वाला देश है कि आखिर हम कैसी सभ्यता चाहते हैं? संसार कैसा होना चाहिए? मैं समझता हूं कि फिल्म इंडस्ट्री में भी कुछ इसी प्रकार के एक्सपेरिमेंट होने चाहिए। क्योंकि हमारे यहां की जो संस्कृति संस्कार रहे हैं उन संस्कारों और संस्कृतियों में हम ये कहते रहे हैं कि हम समगोत्री विवाह नहीं करेंगे। समगोत्री का मतलब एक ही विद्यालय में पढ़ने वाला बेटा और बेटी मतलब महिला और लड़का विवाह नहीं कर सकता क्योंकि वो भाई बहन हो जाते हैं वो गुरु भाई बहन हो जाते हैं। लेकिन आज की फिल्म इंडस्ट्री स्कूल कॉलेज का मतलब यह दिखाती है कि किस तरह से वो आगे गठबंधन में चले जाएंगे। एजुकेशन कहीं नहीं आती। सिर्फ यह दिखाया जाता है कि विद्यालय में पढ़ने गए हैं या यूनिवर्सिटी में पढ़ने गए हैं तो उनका चूच का मुरब्बा कैसे बनेगा। आप सोच के देखिए कि इस प्रकार की धारणा जिस देश में बनने लगी हो उस देश का क्या हो सकता है? ये ध्यान रखना चाहिए कि भारत में समगोत्री विवाह रोका गया था। भारत में सपिंडी विवाह रोका गया था। भारत में सात पीढ़ी पिता की और पांच पीढ़ी मां के तरफ का रिश्ता रोका गया था। इन सबको भाई-बहन कहा गया और गुरु बहन और गुरु भाई को भी गुरुओं के बच्चे को भी भाई-बहन कहा गया।
ऐसा देश जहां इतने उच्च सिद्धांत हो उस देश में ऐसे जजमेंट चीफ जस्टिस मुझे लगता है कि उनको भी समझ में आ गया कि वाकई में हम किस तरह भारत को ले जा रहे हैं। इसलिए उन्होंने आदेश दिया कि मूल्यों के आधार पर नया सिलेबस बने। मूल्यों के आधार पर नया करिकुलम बने। जजेस को पढ़ाते समय संवेदनशीलता डाली जाए और भारत उनको पहले पढ़ाया जाए ताकि वो भारत के अनुरूप डिसीजन दे सकें। भारत की जुडिशरी भारत के अनुरूप चले।
भारत की जुडिशरी विदेशों के आधार पर ना चले।सैल्यूट चीफ जस्टिस सूर्यकांत जी को जय हिंद जय भारत
No comments:
Post a Comment