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Thursday, July 3, 2025

Not Free Speech: Allahabad HC Refuses Bail Over Alleged Posts Depicting PM Apologizing to Pakistan and Indian Jets Being Shot Down




Not Free Speech: Allahabad HC Refuses Bail Over Alleged Posts Depicting PM Apologizing to Pakistan and Indian Jets Being Shot Down 


The Allahabad High Court has today declined to approve bail for an individual accused of sharing inappropriate material on social media targeting the Prime Minister of India and the Indian military. Justice Arun Kumar Singh Deshwal, part of the bench, noted that the constitutional right to free speech does not encompass actions that insult esteemed officials and foster discord among citizens. 


The judge also commented that it seems to have become a trend among certain groups to exploit social media under the guise of free speech by leveling baseless accusations against prominent figures, posting content that incites division and animosity among the populace. In summary, the accused, Asharaf Khan Alais Nisrat, who is charged under Sections 152 and 197 BNS, reportedly shared altered videos on his Facebook account during the recent conflict between India and Pakistan


According to the prosecution, the accused allegedly uploaded content suggesting that Prime Minister Narendra Modi was seen next to a donkey pulling a cart with an aircraft, further portraying him as asking for forgiveness from Pakistan. The contested post additionally depicted Wing Commander Vyomika Singh (from the Indian Air Force) meeting with Pakistan’s army chief and suggested that PM Modi was fleeing from a Pakistani missile attack


Another post celebrated the Pakistan Air Force and illustrated Indian jets being downed by Pakistani forces. There were also other 'objectionable' posts targeting Defence Minister Rajnath Singh and PM Modi shared by the accused. Although his lawyer claimed the accused is innocent and argued that he did not distribute the offensive post, which was nonetheless found on his mobile device, the State contended that the alleged social media posts promote discord among the Indian populace and show disrespect towards the Indian military and Air Force; thus, his request for bail was contested. 


In light of these arguments, the court, while denying bail to the accused, made the following pointed remarks: "While our Constitution confers every citizen the right to free speech and expression, this liberty does not extend to allowing someone to share videos and posts that ridicule the Prime Minister of India, the Indian military, and its officials, as such actions foster division among the Indian populace and may also encourage separatism, jeopardizing the country's sovereignty, unity, and integrity.” Finally, realizing that the nature of the social media posts by the accused disrespected not only the Prime Minister but also the Indian military and its personnel, the court denied the request for bail. Accordingly, the bail petition was dismissed.




Tuesday, July 1, 2025

न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश

न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश
न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश
न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश
न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश

हम इस देश की न्याय प्रणाली में जो कुछ चल रहा है कालेजियम  के नाम पर चल रहा है उसको बदलाव लाने के लिए जनता कुछ कर सकती है. हम जो कुछ बन सकता है उसी कोशिश में जुटे हुए और इसके लिए हम आप लोगों के सामने  एक नए भाषण की या फिर आप न्यायमूर्ति ओक ने जो संदेश दिया है भारत के कालेजियम और अपने दोस्त को और साथ  मुख्य न्यायाधीश को. उन्होंने पूरे एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपनी जो बातें उसके माध्यम से देने की कोशिश की. न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के भी दूसरे जजों  को एक संदेश देने की कोशिश की.

न्यायमूर्ति ओक ने कहा है कि केवल न्याय उसी को नहीं समझा जाना चाहिए जिसमें का फैसला सरकार के विरोध हो या सरकार के विरोध में हो. उनका यह कहना है कि अगर कोई मामला ऐसा है जिसमें सरकार अपने स्तर पर सही है, सरकार का निर्णय सही है तो जज को केवल सरकार के विरोध में फैसला देकर यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि वह न्याय के साथ खड़े हैं. उन्होंने स्पष्ट किया किों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो फैसला ले रहे हैं, वह कानून के अनुरूप है. और दूसरी जो बात है, वह यह है कि क्या वह संविधान के दायरे में है?

संविधान में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ डायरशंस दिए गए हैं, क्या यह फैसला उसके अनुरूप है? ऐसा के कर न्यायमूर्ति ओक ने उस धारणा को पूरी तरीके से खारिज कर दिया है जिसमें यह कहा जाता है कि अगर कोई भी कोई भी याचिका सुप्री कोर्ट हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ लगाई जाएगी तो यही न्याय का पक्ष होगा. क्योंकि ऐसा करने के पीछे कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे जैसे या दूसरे और भी तमाम वकीलों के बड़े वकीलों की फौज है, वह लोग खड़े होते हैं. यह लोग हमेशा सरकार के खिलाफ सरकार के निर्ण को गलत बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईर्ट में पहुंचे होते हैं और मीडिया के माध्यम से यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि सरकार अन्य कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ फैसला देकर इस पर न्याय करेंेगा. न्यायमूर्ति ओक ने यह सारा संदेश जो दिया है,अपने पुराने साथियों को दिया है, अपने मित्र CJI  गवाई को दिया है कनिष्ठ रहे और वो खुद खुलकर कहते की  गवाई मेरे मित्र है

 एक और बड़ी बात जो हमारे देश में सब लोग महसूस कर रहे हैं लेकिन बोलता उसे पर कोई नहीं है यह है कि लोग पुलिस में हो या राजनेता हो वो कल कोर्ट वालों से बहुत डरते हैं. कहा कि जजों को वकीलों को खुश करने के लिए भी फैसले नहीं देने चाहिए. ऐसा कहकर जस्टिस को का उस बात की तरफ इशारा करते हुए नजर आ रहे हैं जो हम बार-बार उठा रहे हैं. जो बड़े ज होते हैं ह कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के होते हैं वह सामने कौन वकील खड़ा है, कौन वकील इस मामले को लेकर आया है इस पर भी निर्णय देने से पहले कई बार सोचते हैं और उनकी शक्ल से ही वो प्रभावित भी होते हैं. इसको तमाम बड़े लोग उठा भी चुके हैं और यह एक ओपन सीक्रेट भी है. की जिस मामले में कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे  प्रशांत भूषण टाइप राजीव धवन टाइप के वकील खड़े हो जाते हैं. तो आप समझ लीजिए जजों पर एक दबाव या  प्रभाव पर चुका होता है. उनके पक्ष में फसलों को देने को लेकर. इसको लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बड़ा अच्छा फैसला दिया है उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जो जजे है हाई कोर्ट के उनको पूरीरी तरीके से एक्सपोज कर दिया है और आईना दिखा दिया है ये इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ का बड़ा अच्छा दोतीन फैसले आए हैं.

यहां जस्टिस ओक की बातों पर ही हम चर्चा कर रहे और जस्टिस ने जो सा संदेश दे दिया है की सरकार के विरोध में फैसला लेना ही नहीं है सरकार के में भी हो सकता है और सरकार के. कामों पर अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट लगाता है तो यह कहीं से भी नहीं कहा जा सकता. दूसरा उन्होंने जो कहा है कि वकीलों को खुश करने के लिए फैसले नहीं लेने चाहिए. उनके फैसले केवल दो बातों पर निर्भर रहने चाहिए और उन्होंने कहा भी मैं जब भी जजे को ट्रेनिंग देने के लिए जाता था. जैसा की सुप्रीम कोर्ट के जो वरिष्ठ जज होते हैं उनको भेजा जाता है लेक्चर देने के लिए या इस तरीके के. जो सेमिनार वगैरा में जजे को डायरेक्शन या टीचिंग देने के लिए. तो उन्होंने कहा, मैं उन्हें यही केवल सिखाता रहा हू की आपके फैसले केवल और केवल कानून के अनुरूप होने चाहिए और संविधान के दायरे में होने चाहिए. बाकी सब बातों को आपको भूल जाना चाहिए. और लगता है कि उनके ज्यादातर जो फैसले रहे, जब तक सुप्रीम कोर्ट में रहे या उससे पहले हाई कोर्ट्स में भी रहे, इसी तरीके के देखने के मिले.

हालांकि एक-दो फैसले में कुछ चीज ऐसी बातें हो सकती हैं और इतना गलती का मौका तो हर व्यक्ति के पास है क्योंकि जो मनुष्य है वह गलतियों का पुतला ही है और हम भी किसी से भी उम्मीद नहीं करते की वो परफेक्ट हो सकता है. लेकिन अगर आपके फैसले ज्यादातर न्याय है, आपने ज्यादातर समय पर न्याय का पक्ष लिया है तो आपको न्यायपूर्ण ही कहा जा सकता है. और अब खुलकर उन्होंने बिना किसी का नाम लिए बिना किसी को इंगित किए इतनी बड़ी बात कह दी है तो निश्चित तोर पर यह बात जस्टिस बी तक भी जाएगी. उनके जो दूसरे साथी है उन तक भी जाएगी और हाय कोर्ट के तमाम जो दूसरे जगह है उन तक भी जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि उन से कितने बातों पर अमल करें. अगर अमल नहीं करेंगे तो कोई मतलब नहीं और हमारी भी कोशिश होगी की अगर हम महारा में कोई प्रोग्राम अगर करेंगे इस लेकर तो सब्सिस जरूर में बुलाने की कोशिश करेंगे और उनसे सामने बैठकर सवाल करेंगे हम. क्योंकि अभी भी पर. उने ज्यादा मुर नहीं हुए हैं. कॉले को लेकर उन्होंने और उसमें लगभग उसका पक्ष लेते हुए ही नजर आए तो यह अलग बात है. हो सकता है वह खुलकर बोल रहे कॉलेज पर जस्टिसया भी वहां पर साथ में बैठे. द और दूसरे जो हाई कोर्ट्स के भी दो-तीन जस्टे बॉम्बे कोर्ट के बैठे थे. लेकिन अगर वह अकेले में होंगे और अकेले में बात कर रहे होंगे तो हो सकता है कि जिस. कॉलेज पर खुलकर बोलेंगे लेकिन जितना उन्होंने बोला है वह निश्चित ही इस देश की जो हर ज्य्यूडिशरी है, चाहे सुप्रीम कोर्ट के जे हो या हाई कोर्ट्स के जज हो, उनको एक रास्ता दिखाने का और उनको न्याय का पथ चुनने का एक सीधा-सीधा संकेत दिया है जस्टिस ओक ने. 


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न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश

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हम इस देश की न्याय प्रणाली में जो कुछ चल रहा है कालेजियम  के नाम पर चल रहा है उसको बदलाव लाने के लिए जनता कुछ कर सकती है. हम जो कुछ बन सकता है उसी कोशिश में जुटे हुए और इसके लिए हम आप लोगों के सामने  एक नए भाषण की या फिर आप न्यायमूर्ति ओक ने जो संदेश दिया है भारत के कालेजियम और अपने दोस्त को और साथ  मुख्य न्यायाधीश को. उन्होंने पूरे एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपनी जो बातें उसके माध्यम से देने की कोशिश की. न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के भी दूसरे जजों  को एक संदेश देने की कोशिश की.

न्यायमूर्ति ओक ने कहा है कि केवल न्याय उसी को नहीं समझा जाना चाहिए जिसमें का फैसला सरकार के विरोध हो या सरकार के विरोध में हो. उनका यह कहना है कि अगर कोई मामला ऐसा है जिसमें सरकार अपने स्तर पर सही है, सरकार का निर्णय सही है तो जज को केवल सरकार के विरोध में फैसला देकर यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि वह न्याय के साथ खड़े हैं. उन्होंने स्पष्ट किया किों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो फैसला ले रहे हैं, वह कानून के अनुरूप है. और दूसरी जो बात है, वह यह है कि क्या वह संविधान के दायरे में है?

संविधान में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ डायरशंस दिए गए हैं, क्या यह फैसला उसके अनुरूप है? ऐसा के कर न्यायमूर्ति ओक ने उस धारणा को पूरी तरीके से खारिज कर दिया है जिसमें यह कहा जाता है कि अगर कोई भी कोई भी याचिका सुप्री कोर्ट हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ लगाई जाएगी तो यही न्याय का पक्ष होगा. क्योंकि ऐसा करने के पीछे कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे जैसे या दूसरे और भी तमाम वकीलों के बड़े वकीलों की फौज है, वह लोग खड़े होते हैं. यह लोग हमेशा सरकार के खिलाफ सरकार के निर्ण को गलत बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईर्ट में पहुंचे होते हैं और मीडिया के माध्यम से यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि सरकार अन्य कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ फैसला देकर इस पर न्याय करेंेगा. न्यायमूर्ति ओक ने यह सारा संदेश जो दिया है,अपने पुराने साथियों को दिया है, अपने मित्र CJI  गवाई को दिया है कनिष्ठ रहे और वो खुद खुलकर कहते की  गवाई मेरे मित्र है

 एक और बड़ी बात जो हमारे देश में सब लोग महसूस कर रहे हैं लेकिन बोलता उसे पर कोई नहीं है यह है कि लोग पुलिस में हो या राजनेता हो वो कल कोर्ट वालों से बहुत डरते हैं. कहा कि जजों को वकीलों को खुश करने के लिए भी फैसले नहीं देने चाहिए. ऐसा कहकर जस्टिस को का उस बात की तरफ इशारा करते हुए नजर आ रहे हैं जो हम बार-बार उठा रहे हैं. जो बड़े ज होते हैं ह कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के होते हैं वह सामने कौन वकील खड़ा है, कौन वकील इस मामले को लेकर आया है इस पर भी निर्णय देने से पहले कई बार सोचते हैं और उनकी शक्ल से ही वो प्रभावित भी होते हैं. इसको तमाम बड़े लोग उठा भी चुके हैं और यह एक ओपन सीक्रेट भी है. की जिस मामले में कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे  प्रशांत भूषण टाइप राजीव धवन टाइप के वकील खड़े हो जाते हैं. तो आप समझ लीजिए जजों पर एक दबाव या  प्रभाव पर चुका होता है. उनके पक्ष में फसलों को देने को लेकर. इसको लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बड़ा अच्छा फैसला दिया है उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जो जजे है हाई कोर्ट के उनको पूरीरी तरीके से एक्सपोज कर दिया है और आईना दिखा दिया है ये इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ का बड़ा अच्छा दोतीन फैसले आए हैं.

यहां जस्टिस ओक की बातों पर ही हम चर्चा कर रहे और जस्टिस ने जो सा संदेश दे दिया है की सरकार के विरोध में फैसला लेना ही नहीं है सरकार के में भी हो सकता है और सरकार के. कामों पर अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट लगाता है तो यह कहीं से भी नहीं कहा जा सकता. दूसरा उन्होंने जो कहा है कि वकीलों को खुश करने के लिए फैसले नहीं लेने चाहिए. उनके फैसले केवल दो बातों पर निर्भर रहने चाहिए और उन्होंने कहा भी मैं जब भी जजे को ट्रेनिंग देने के लिए जाता था. जैसा की सुप्रीम कोर्ट के जो वरिष्ठ जज होते हैं उनको भेजा जाता है लेक्चर देने के लिए या इस तरीके के. जो सेमिनार वगैरा में जजे को डायरेक्शन या टीचिंग देने के लिए. तो उन्होंने कहा, मैं उन्हें यही केवल सिखाता रहा हू की आपके फैसले केवल और केवल कानून के अनुरूप होने चाहिए और संविधान के दायरे में होने चाहिए. बाकी सब बातों को आपको भूल जाना चाहिए. और लगता है कि उनके ज्यादातर जो फैसले रहे, जब तक सुप्रीम कोर्ट में रहे या उससे पहले हाई कोर्ट्स में भी रहे, इसी तरीके के देखने के मिले.

हालांकि एक-दो फैसले में कुछ चीज ऐसी बातें हो सकती हैं और इतना गलती का मौका तो हर व्यक्ति के पास है क्योंकि जो मनुष्य है वह गलतियों का पुतला ही है और हम भी किसी से भी उम्मीद नहीं करते की वो परफेक्ट हो सकता है. लेकिन अगर आपके फैसले ज्यादातर न्याय है, आपने ज्यादातर समय पर न्याय का पक्ष लिया है तो आपको न्यायपूर्ण ही कहा जा सकता है. और अब खुलकर उन्होंने बिना किसी का नाम लिए बिना किसी को इंगित किए इतनी बड़ी बात कह दी है तो निश्चित तोर पर यह बात जस्टिस बी तक भी जाएगी. उनके जो दूसरे साथी है उन तक भी जाएगी और हाय कोर्ट के तमाम जो दूसरे जगह है उन तक भी जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि उन से कितने बातों पर अमल करें. अगर अमल नहीं करेंगे तो कोई मतलब नहीं और हमारी भी कोशिश होगी की अगर हम महारा में कोई प्रोग्राम अगर करेंगे इस लेकर तो सब्सिस जरूर में बुलाने की कोशिश करेंगे और उनसे सामने बैठकर सवाल करेंगे हम. क्योंकि अभी भी पर. उने ज्यादा मुर नहीं हुए हैं. कॉले को लेकर उन्होंने और उसमें लगभग उसका पक्ष लेते हुए ही नजर आए तो यह अलग बात है. हो सकता है वह खुलकर बोल रहे कॉलेज पर जस्टिसया भी वहां पर साथ में बैठे. द और दूसरे जो हाई कोर्ट्स के भी दो-तीन जस्टे बॉम्बे कोर्ट के बैठे थे. लेकिन अगर वह अकेले में होंगे और अकेले में बात कर रहे होंगे तो हो सकता है कि जिस. कॉलेज पर खुलकर बोलेंगे लेकिन जितना उन्होंने बोला है वह निश्चित ही इस देश की जो हर ज्य्यूडिशरी है, चाहे सुप्रीम कोर्ट के जे हो या हाई कोर्ट्स के जज हो, उनको एक रास्ता दिखाने का और उनको न्याय का पथ चुनने का एक सीधा-सीधा संकेत दिया है जस्टिस ओक ने. 


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हम इस देश की न्याय प्रणाली में जो कुछ चल रहा है कालेजियम  के नाम पर चल रहा है उसको बदलाव लाने के लिए जनता कुछ कर सकती है. हम जो कुछ बन सकता है उसी कोशिश में जुटे हुए और इसके लिए हम आप लोगों के सामने  एक नए भाषण की या फिर आप न्यायमूर्ति ओक ने जो संदेश दिया है भारत के कालेजियम और अपने दोस्त को और साथ  मुख्य न्यायाधीश को. उन्होंने पूरे एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपनी जो बातें उसके माध्यम से देने की कोशिश की. न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के भी दूसरे जजों  को एक संदेश देने की कोशिश की.

न्यायमूर्ति ओक ने कहा है कि केवल न्याय उसी को नहीं समझा जाना चाहिए जिसमें का फैसला सरकार के विरोध हो या सरकार के विरोध में हो. उनका यह कहना है कि अगर कोई मामला ऐसा है जिसमें सरकार अपने स्तर पर सही है, सरकार का निर्णय सही है तो जज को केवल सरकार के विरोध में फैसला देकर यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि वह न्याय के साथ खड़े हैं. उन्होंने स्पष्ट किया किों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो फैसला ले रहे हैं, वह कानून के अनुरूप है. और दूसरी जो बात है, वह यह है कि क्या वह संविधान के दायरे में है?

संविधान में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ डायरशंस दिए गए हैं, क्या यह फैसला उसके अनुरूप है? ऐसा के कर न्यायमूर्ति ओक ने उस धारणा को पूरी तरीके से खारिज कर दिया है जिसमें यह कहा जाता है कि अगर कोई भी कोई भी याचिका सुप्री कोर्ट हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ लगाई जाएगी तो यही न्याय का पक्ष होगा. क्योंकि ऐसा करने के पीछे कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे जैसे या दूसरे और भी तमाम वकीलों के बड़े वकीलों की फौज है, वह लोग खड़े होते हैं. यह लोग हमेशा सरकार के खिलाफ सरकार के निर्ण को गलत बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईर्ट में पहुंचे होते हैं और मीडिया के माध्यम से यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि सरकार अन्य कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ फैसला देकर इस पर न्याय करेंेगा. न्यायमूर्ति ओक ने यह सारा संदेश जो दिया है,अपने पुराने साथियों को दिया है, अपने मित्र CJI  गवाई को दिया है कनिष्ठ रहे और वो खुद खुलकर कहते की  गवाई मेरे मित्र है

 एक और बड़ी बात जो हमारे देश में सब लोग महसूस कर रहे हैं लेकिन बोलता उसे पर कोई नहीं है यह है कि लोग पुलिस में हो या राजनेता हो वो कल कोर्ट वालों से बहुत डरते हैं. कहा कि जजों को वकीलों को खुश करने के लिए भी फैसले नहीं देने चाहिए. ऐसा कहकर जस्टिस को का उस बात की तरफ इशारा करते हुए नजर आ रहे हैं जो हम बार-बार उठा रहे हैं. जो बड़े ज होते हैं ह कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के होते हैं वह सामने कौन वकील खड़ा है, कौन वकील इस मामले को लेकर आया है इस पर भी निर्णय देने से पहले कई बार सोचते हैं और उनकी शक्ल से ही वो प्रभावित भी होते हैं. इसको तमाम बड़े लोग उठा भी चुके हैं और यह एक ओपन सीक्रेट भी है. की जिस मामले में कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे  प्रशांत भूषण टाइप राजीव धवन टाइप के वकील खड़े हो जाते हैं. तो आप समझ लीजिए जजों पर एक दबाव या  प्रभाव पर चुका होता है. उनके पक्ष में फसलों को देने को लेकर. इसको लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बड़ा अच्छा फैसला दिया है उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जो जजे है हाई कोर्ट के उनको पूरीरी तरीके से एक्सपोज कर दिया है और आईना दिखा दिया है ये इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ का बड़ा अच्छा दोतीन फैसले आए हैं.

यहां जस्टिस ओक की बातों पर ही हम चर्चा कर रहे और जस्टिस ने जो सा संदेश दे दिया है की सरकार के विरोध में फैसला लेना ही नहीं है सरकार के में भी हो सकता है और सरकार के. कामों पर अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट लगाता है तो यह कहीं से भी नहीं कहा जा सकता. दूसरा उन्होंने जो कहा है कि वकीलों को खुश करने के लिए फैसले नहीं लेने चाहिए. उनके फैसले केवल दो बातों पर निर्भर रहने चाहिए और उन्होंने कहा भी मैं जब भी जजे को ट्रेनिंग देने के लिए जाता था. जैसा की सुप्रीम कोर्ट के जो वरिष्ठ जज होते हैं उनको भेजा जाता है लेक्चर देने के लिए या इस तरीके के. जो सेमिनार वगैरा में जजे को डायरेक्शन या टीचिंग देने के लिए. तो उन्होंने कहा, मैं उन्हें यही केवल सिखाता रहा हू की आपके फैसले केवल और केवल कानून के अनुरूप होने चाहिए और संविधान के दायरे में होने चाहिए. बाकी सब बातों को आपको भूल जाना चाहिए. और लगता है कि उनके ज्यादातर जो फैसले रहे, जब तक सुप्रीम कोर्ट में रहे या उससे पहले हाई कोर्ट्स में भी रहे, इसी तरीके के देखने के मिले.

हालांकि एक-दो फैसले में कुछ चीज ऐसी बातें हो सकती हैं और इतना गलती का मौका तो हर व्यक्ति के पास है क्योंकि जो मनुष्य है वह गलतियों का पुतला ही है और हम भी किसी से भी उम्मीद नहीं करते की वो परफेक्ट हो सकता है. लेकिन अगर आपके फैसले ज्यादातर न्याय है, आपने ज्यादातर समय पर न्याय का पक्ष लिया है तो आपको न्यायपूर्ण ही कहा जा सकता है. और अब खुलकर उन्होंने बिना किसी का नाम लिए बिना किसी को इंगित किए इतनी बड़ी बात कह दी है तो निश्चित तोर पर यह बात जस्टिस बी तक भी जाएगी. उनके जो दूसरे साथी है उन तक भी जाएगी और हाय कोर्ट के तमाम जो दूसरे जगह है उन तक भी जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि उन से कितने बातों पर अमल करें. अगर अमल नहीं करेंगे तो कोई मतलब नहीं और हमारी भी कोशिश होगी की अगर हम महारा में कोई प्रोग्राम अगर करेंगे इस लेकर तो सब्सिस जरूर में बुलाने की कोशिश करेंगे और उनसे सामने बैठकर सवाल करेंगे हम. क्योंकि अभी भी पर. उने ज्यादा मुर नहीं हुए हैं. कॉले को लेकर उन्होंने और उसमें लगभग उसका पक्ष लेते हुए ही नजर आए तो यह अलग बात है. हो सकता है वह खुलकर बोल रहे कॉलेज पर जस्टिसया भी वहां पर साथ में बैठे. द और दूसरे जो हाई कोर्ट्स के भी दो-तीन जस्टे बॉम्बे कोर्ट के बैठे थे. लेकिन अगर वह अकेले में होंगे और अकेले में बात कर रहे होंगे तो हो सकता है कि जिस. कॉलेज पर खुलकर बोलेंगे लेकिन जितना उन्होंने बोला है वह निश्चित ही इस देश की जो हर ज्य्यूडिशरी है, चाहे सुप्रीम कोर्ट के जे हो या हाई कोर्ट्स के जज हो, उनको एक रास्ता दिखाने का और उनको न्याय का पथ चुनने का एक सीधा-सीधा संकेत दिया है जस्टिस ओक ने. 


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न्यायमूर्ति ओक ने कहा है कि केवल न्याय उसी को नहीं समझा जाना चाहिए जिसमें का फैसला सरकार के विरोध हो या सरकार के विरोध में हो. उनका यह कहना है कि अगर कोई मामला ऐसा है जिसमें सरकार अपने स्तर पर सही है, सरकार का निर्णय सही है तो जज को केवल सरकार के विरोध में फैसला देकर यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि वह न्याय के साथ खड़े हैं. उन्होंने स्पष्ट किया किों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो फैसला ले रहे हैं, वह कानून के अनुरूप है. और दूसरी जो बात है, वह यह है कि क्या वह संविधान के दायरे में है?

संविधान में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ डायरशंस दिए गए हैं, क्या यह फैसला उसके अनुरूप है? ऐसा के कर न्यायमूर्ति ओक ने उस धारणा को पूरी तरीके से खारिज कर दिया है जिसमें यह कहा जाता है कि अगर कोई भी कोई भी याचिका सुप्री कोर्ट हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ लगाई जाएगी तो यही न्याय का पक्ष होगा. क्योंकि ऐसा करने के पीछे कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे जैसे या दूसरे और भी तमाम वकीलों के बड़े वकीलों की फौज है, वह लोग खड़े होते हैं. यह लोग हमेशा सरकार के खिलाफ सरकार के निर्ण को गलत बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईर्ट में पहुंचे होते हैं और मीडिया के माध्यम से यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि सरकार अन्य कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ फैसला देकर इस पर न्याय करेंेगा. न्यायमूर्ति ओक ने यह सारा संदेश जो दिया है,अपने पुराने साथियों को दिया है, अपने मित्र CJI  गवाई को दिया है कनिष्ठ रहे और वो खुद खुलकर कहते की  गवाई मेरे मित्र है

 एक और बड़ी बात जो हमारे देश में सब लोग महसूस कर रहे हैं लेकिन बोलता उसे पर कोई नहीं है यह है कि लोग पुलिस में हो या राजनेता हो वो कल कोर्ट वालों से बहुत डरते हैं. कहा कि जजों को वकीलों को खुश करने के लिए भी फैसले नहीं देने चाहिए. ऐसा कहकर जस्टिस को का उस बात की तरफ इशारा करते हुए नजर आ रहे हैं जो हम बार-बार उठा रहे हैं. जो बड़े ज होते हैं ह कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के होते हैं वह सामने कौन वकील खड़ा है, कौन वकील इस मामले को लेकर आया है इस पर भी निर्णय देने से पहले कई बार सोचते हैं और उनकी शक्ल से ही वो प्रभावित भी होते हैं. इसको तमाम बड़े लोग उठा भी चुके हैं और यह एक ओपन सीक्रेट भी है. की जिस मामले में कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे  प्रशांत भूषण टाइप राजीव धवन टाइप के वकील खड़े हो जाते हैं. तो आप समझ लीजिए जजों पर एक दबाव या  प्रभाव पर चुका होता है. उनके पक्ष में फसलों को देने को लेकर. इसको लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बड़ा अच्छा फैसला दिया है उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जो जजे है हाई कोर्ट के उनको पूरीरी तरीके से एक्सपोज कर दिया है और आईना दिखा दिया है ये इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ का बड़ा अच्छा दोतीन फैसले आए हैं.

यहां जस्टिस ओक की बातों पर ही हम चर्चा कर रहे और जस्टिस ने जो सा संदेश दे दिया है की सरकार के विरोध में फैसला लेना ही नहीं है सरकार के में भी हो सकता है और सरकार के. कामों पर अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट लगाता है तो यह कहीं से भी नहीं कहा जा सकता. दूसरा उन्होंने जो कहा है कि वकीलों को खुश करने के लिए फैसले नहीं लेने चाहिए. उनके फैसले केवल दो बातों पर निर्भर रहने चाहिए और उन्होंने कहा भी मैं जब भी जजे को ट्रेनिंग देने के लिए जाता था. जैसा की सुप्रीम कोर्ट के जो वरिष्ठ जज होते हैं उनको भेजा जाता है लेक्चर देने के लिए या इस तरीके के. जो सेमिनार वगैरा में जजे को डायरेक्शन या टीचिंग देने के लिए. तो उन्होंने कहा, मैं उन्हें यही केवल सिखाता रहा हू की आपके फैसले केवल और केवल कानून के अनुरूप होने चाहिए और संविधान के दायरे में होने चाहिए. बाकी सब बातों को आपको भूल जाना चाहिए. और लगता है कि उनके ज्यादातर जो फैसले रहे, जब तक सुप्रीम कोर्ट में रहे या उससे पहले हाई कोर्ट्स में भी रहे, इसी तरीके के देखने के मिले.

हालांकि एक-दो फैसले में कुछ चीज ऐसी बातें हो सकती हैं और इतना गलती का मौका तो हर व्यक्ति के पास है क्योंकि जो मनुष्य है वह गलतियों का पुतला ही है और हम भी किसी से भी उम्मीद नहीं करते की वो परफेक्ट हो सकता है. लेकिन अगर आपके फैसले ज्यादातर न्याय है, आपने ज्यादातर समय पर न्याय का पक्ष लिया है तो आपको न्यायपूर्ण ही कहा जा सकता है. और अब खुलकर उन्होंने बिना किसी का नाम लिए बिना किसी को इंगित किए इतनी बड़ी बात कह दी है तो निश्चित तोर पर यह बात जस्टिस बी तक भी जाएगी. उनके जो दूसरे साथी है उन तक भी जाएगी और हाय कोर्ट के तमाम जो दूसरे जगह है उन तक भी जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि उन से कितने बातों पर अमल करें. अगर अमल नहीं करेंगे तो कोई मतलब नहीं और हमारी भी कोशिश होगी की अगर हम महारा में कोई प्रोग्राम अगर करेंगे इस लेकर तो सब्सिस जरूर में बुलाने की कोशिश करेंगे और उनसे सामने बैठकर सवाल करेंगे हम. क्योंकि अभी भी पर. उने ज्यादा मुर नहीं हुए हैं. कॉले को लेकर उन्होंने और उसमें लगभग उसका पक्ष लेते हुए ही नजर आए तो यह अलग बात है. हो सकता है वह खुलकर बोल रहे कॉलेज पर जस्टिसया भी वहां पर साथ में बैठे. द और दूसरे जो हाई कोर्ट्स के भी दो-तीन जस्टे बॉम्बे कोर्ट के बैठे थे. लेकिन अगर वह अकेले में होंगे और अकेले में बात कर रहे होंगे तो हो सकता है कि जिस. कॉलेज पर खुलकर बोलेंगे लेकिन जितना उन्होंने बोला है वह निश्चित ही इस देश की जो हर ज्य्यूडिशरी है, चाहे सुप्रीम कोर्ट के जे हो या हाई कोर्ट्स के जज हो, उनको एक रास्ता दिखाने का और उनको न्याय का पथ चुनने का एक सीधा-सीधा संकेत दिया है जस्टिस ओक ने. 


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July 01, 2025 at 07:40PM

न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के जजों को एक संदेश


हम इस देश की न्याय प्रणाली में जो कुछ चल रहा है कालेजियम  के नाम पर चल रहा है उसको बदलाव लाने के लिए जनता कुछ कर सकती है. हम जो कुछ बन सकता है उसी कोशिश में जुटे हुए और इसके लिए हम आप लोगों के सामने  एक नए भाषण की या फिर आप न्यायमूर्ति ओक ने जो संदेश दिया है भारत के कालेजियम और अपने दोस्त को और साथ  मुख्य न्यायाधीश को. उन्होंने पूरे एसोसिएशन द्वारा आयोजित कार्यक्रम में अपनी जो बातें उसके माध्यम से देने की कोशिश की. न्यायमूर्ति ओक ने सुप्रीम कोर्ट के तमाम जजों को और भारत उच्च न्यायालय के भी दूसरे जजों  को एक संदेश देने की कोशिश की.

न्यायमूर्ति ओक ने कहा है कि केवल न्याय उसी को नहीं समझा जाना चाहिए जिसमें का फैसला सरकार के विरोध हो या सरकार के विरोध में हो. उनका यह कहना है कि अगर कोई मामला ऐसा है जिसमें सरकार अपने स्तर पर सही है, सरकार का निर्णय सही है तो जज को केवल सरकार के विरोध में फैसला देकर यह साबित करने की जरूरत नहीं है कि वह न्याय के साथ खड़े हैं. उन्होंने स्पष्ट किया किों को यह ध्यान रखने की जरूरत है कि जो फैसला ले रहे हैं, वह कानून के अनुरूप है. और दूसरी जो बात है, वह यह है कि क्या वह संविधान के दायरे में है?

संविधान में जो कुछ कहा गया है, जो कुछ डायरशंस दिए गए हैं, क्या यह फैसला उसके अनुरूप है? ऐसा के कर न्यायमूर्ति ओक ने उस धारणा को पूरी तरीके से खारिज कर दिया है जिसमें यह कहा जाता है कि अगर कोई भी कोई भी याचिका सुप्री कोर्ट हाई कोर्ट में सरकार के खिलाफ लगाई जाएगी तो यही न्याय का पक्ष होगा. क्योंकि ऐसा करने के पीछे कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे जैसे या दूसरे और भी तमाम वकीलों के बड़े वकीलों की फौज है, वह लोग खड़े होते हैं. यह लोग हमेशा सरकार के खिलाफ सरकार के निर्ण को गलत बताने के लिए सुप्रीम कोर्ट और हाईर्ट में पहुंचे होते हैं और मीडिया के माध्यम से यह माहौल बनाने की कोशिश की जाती है कि सरकार अन्य कर रही है और सुप्रीम कोर्ट सरकार के खिलाफ फैसला देकर इस पर न्याय करेंेगा. न्यायमूर्ति ओक ने यह सारा संदेश जो दिया है,अपने पुराने साथियों को दिया है, अपने मित्र CJI  गवाई को दिया है कनिष्ठ रहे और वो खुद खुलकर कहते की  गवाई मेरे मित्र है

 एक और बड़ी बात जो हमारे देश में सब लोग महसूस कर रहे हैं लेकिन बोलता उसे पर कोई नहीं है यह है कि लोग पुलिस में हो या राजनेता हो वो कल कोर्ट वालों से बहुत डरते हैं. कहा कि जजों को वकीलों को खुश करने के लिए भी फैसले नहीं देने चाहिए. ऐसा कहकर जस्टिस को का उस बात की तरफ इशारा करते हुए नजर आ रहे हैं जो हम बार-बार उठा रहे हैं. जो बड़े ज होते हैं ह कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के होते हैं वह सामने कौन वकील खड़ा है, कौन वकील इस मामले को लेकर आया है इस पर भी निर्णय देने से पहले कई बार सोचते हैं और उनकी शक्ल से ही वो प्रभावित भी होते हैं. इसको तमाम बड़े लोग उठा भी चुके हैं और यह एक ओपन सीक्रेट भी है. की जिस मामले में कपिल सिब्बल अभिषेक मनु सिंघवी, प्रशांत भूषण, दुष्‍यंत दवे  प्रशांत भूषण टाइप राजीव धवन टाइप के वकील खड़े हो जाते हैं. तो आप समझ लीजिए जजों पर एक दबाव या  प्रभाव पर चुका होता है. उनके पक्ष में फसलों को देने को लेकर. इसको लेकर इलाहाबाद हाई कोर्ट के एक बड़ा अच्छा फैसला दिया है उन्होंने भी सुप्रीम कोर्ट के जो जजे है हाई कोर्ट के उनको पूरीरी तरीके से एक्सपोज कर दिया है और आईना दिखा दिया है ये इलाहाबाद हाई कोर्ट के जस्टिस सिद्धार्थ का बड़ा अच्छा दोतीन फैसले आए हैं.

यहां जस्टिस ओक की बातों पर ही हम चर्चा कर रहे और जस्टिस ने जो सा संदेश दे दिया है की सरकार के विरोध में फैसला लेना ही नहीं है सरकार के में भी हो सकता है और सरकार के. कामों पर अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट लगाता है तो यह कहीं से भी नहीं कहा जा सकता. दूसरा उन्होंने जो कहा है कि वकीलों को खुश करने के लिए फैसले नहीं लेने चाहिए. उनके फैसले केवल दो बातों पर निर्भर रहने चाहिए और उन्होंने कहा भी मैं जब भी जजे को ट्रेनिंग देने के लिए जाता था. जैसा की सुप्रीम कोर्ट के जो वरिष्ठ जज होते हैं उनको भेजा जाता है लेक्चर देने के लिए या इस तरीके के. जो सेमिनार वगैरा में जजे को डायरेक्शन या टीचिंग देने के लिए. तो उन्होंने कहा, मैं उन्हें यही केवल सिखाता रहा हू की आपके फैसले केवल और केवल कानून के अनुरूप होने चाहिए और संविधान के दायरे में होने चाहिए. बाकी सब बातों को आपको भूल जाना चाहिए. और लगता है कि उनके ज्यादातर जो फैसले रहे, जब तक सुप्रीम कोर्ट में रहे या उससे पहले हाई कोर्ट्स में भी रहे, इसी तरीके के देखने के मिले.

हालांकि एक-दो फैसले में कुछ चीज ऐसी बातें हो सकती हैं और इतना गलती का मौका तो हर व्यक्ति के पास है क्योंकि जो मनुष्य है वह गलतियों का पुतला ही है और हम भी किसी से भी उम्मीद नहीं करते की वो परफेक्ट हो सकता है. लेकिन अगर आपके फैसले ज्यादातर न्याय है, आपने ज्यादातर समय पर न्याय का पक्ष लिया है तो आपको न्यायपूर्ण ही कहा जा सकता है. और अब खुलकर उन्होंने बिना किसी का नाम लिए बिना किसी को इंगित किए इतनी बड़ी बात कह दी है तो निश्चित तोर पर यह बात जस्टिस बी तक भी जाएगी. उनके जो दूसरे साथी है उन तक भी जाएगी और हाय कोर्ट के तमाम जो दूसरे जगह है उन तक भी जाएगी. लेकिन सवाल यह है कि उन से कितने बातों पर अमल करें. अगर अमल नहीं करेंगे तो कोई मतलब नहीं और हमारी भी कोशिश होगी की अगर हम महारा में कोई प्रोग्राम अगर करेंगे इस लेकर तो सब्सिस जरूर में बुलाने की कोशिश करेंगे और उनसे सामने बैठकर सवाल करेंगे हम. क्योंकि अभी भी पर. उने ज्यादा मुर नहीं हुए हैं. कॉले को लेकर उन्होंने और उसमें लगभग उसका पक्ष लेते हुए ही नजर आए तो यह अलग बात है. हो सकता है वह खुलकर बोल रहे कॉलेज पर जस्टिसया भी वहां पर साथ में बैठे. द और दूसरे जो हाई कोर्ट्स के भी दो-तीन जस्टे बॉम्बे कोर्ट के बैठे थे. लेकिन अगर वह अकेले में होंगे और अकेले में बात कर रहे होंगे तो हो सकता है कि जिस. कॉलेज पर खुलकर बोलेंगे लेकिन जितना उन्होंने बोला है वह निश्चित ही इस देश की जो हर ज्य्यूडिशरी है, चाहे सुप्रीम कोर्ट के जे हो या हाई कोर्ट्स के जज हो, उनको एक रास्ता दिखाने का और उनको न्याय का पथ चुनने का एक सीधा-सीधा संकेत दिया है जस्टिस ओक ने. 

Sunday, June 29, 2025

Air India crash: Possibility of sabotage in AI 171 disaster that killed 274, says MoS Aviation

 


Air India crash: Possibility of sabotage in AI 171 disaster that killed 274, says MoS Aviation 


India's Aircraft Accident Investigation Bureau (AAIB) is considering every potential factor, including the possibility of sabotage, following the tragic Air India AI 171 accident in Ahmedabad last month that resulted in 274 fatalities. Minister of State (MoS) for Civil Aviation Murlidhar Mohol disclosed this information on Saturday, June 29. In an interview with NDTV, the minister emphasized that the recovered black boxes from the aircraft will remain in India for analysis. He stated that the AAIB is thoroughly investigating the tragic incident and examining every potential lead. Characterizing the event as "unprecedented," he assured that the inquiry team is diligently exploring every avenue.


Is sabotage a possibility? 

At this moment, the exact reason behind the aircraft's crash shortly after takeoff remains uncertain. Mohol referred to the crash as an "unfortunate incident," adding, "The AAIB has initiated a comprehensive investigation into the matter... All possibilities, including sabotage, are being explored. The CCTV footage is under review, and every angle is being analyzed... multiple agencies are involved in the investigation."

What led to the AI 171 crash? 

The Boeing 787-8 Dreamliner, which was headed for London and carried 242 individuals, went down just moments after taking off from Sardar Vallabhbhai Patel International Airport in Ahmedabad on June 12. Out of the 242 aboard, 241 lost their lives, leaving just one survivor. Additionally, 33 others died as the aircraft crashed into the residential area of BJ Medical College.


Reports indicate that the plane began to lose altitude almost immediately after takeoff and collided with BJ Medical College’s residential buildings, leading to a significant fire. Nine students and their family members on the ground also perished. Prior to the impact, the pilot issued a 'Mayday' call due to total engine failure. Mohol acknowledged this situation, pointing out that simultaneous failure of both engines is "extremely rare." He remarked, "Once the (investigation) report is completed, we will determine whether it was due to an engine malfunction or a fuel supply issue, or why both engines ceased to function. The black box contains a cockpit voice recorder (CVR) that has preserved the dialogue between the two pilots. It's premature to draw conclusions, but the findings will be revealed. The report is expected in three months."


Black Box to remain in India

In response to rumors about the flight's black box being sent overseas, Mohol stated, “It will not be going anywhere. It is currently with the AAIB, and there is no necessity to send it outside the country. We will conduct the complete investigation ourselves.”

Exclusive research on PM Narendra Modi Govt Spending on SC ST OBC & Muslims of India- 2014-2026

Exclusive research on PM Narendra Modi Govt Spending on SC ST OBC & Muslims of India- 2014-2026 Exclusive research on PM Narendra Modi ...