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Monday, November 10, 2025

गुवाहाटी हाई कोर्ट में जस्टिस कमल राय सुराना और जस्टिस सुष्मिता फूकन के फैसले से न्याय की जीत

गुवाहाटी हाई कोर्ट में जस्टिस कमल राय सुराना और जस्टिस सुष्मिता फूकन के फैसले से न्याय की जीत

 


 अभी पिछले दिनों एक सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया था और यह निर्णय था नागरिकों के मूल अधिकारों को लेकर। आपने अक्सर सुना होगा हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जो लिबरल कांग्रेसी गैंग है यह हमेशा ही मौलिक अधिकारों के नाम पर अपराधियों को बचाने की कोशिश करता हुआ नजर आता है और उसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया और आर्टिकल 22 के तहत हर गिरफ्तार होने वाले व्यक्ति को यह अधिकार दिया कि उसको गिरफ्तारी से पहले लिखित में उसकी गिरफ्तारी की वजह बतानी पड़ेगी और विशेष स्थितियों में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से 2 घंटे पहले कम से कम यह वजह बतानी पड़ेगी अन्यथा गिरफ्तारी को अवैध माना जाएगा। इसी से कुछ रिलेटेड एक मामला आता है गुवाहाटी हाई कोर्ट में। और गुवाहाटी हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कर रहे थे जस्टिस कमल राय सुराना और जस्टिस सुष्मिता फूकन। इन्होंने जो मामले में संविधान में जो मौलिक अधिकारों का पूरा का पूरा व्याख्या है और उसको किस तरीके से मिसयूज किया जाता है उसके संदर्भ में जो फैसला दिया है वोआज भारत के हर नागरिक को जानना जरूरी है

इसलिए भी जानना जरूरी है कि कॉलेजियम से आने वाले ये तमाम जो जजेस होते हैं जो कांग्रेस कम्युनिस्ट लिबरल को बहुत ज्यादा सपोर्ट करते हैं और इस हद तक सपोर्ट करते हैं कि अपराधियों, आतंकवादियों, विदेशियों तक को नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की दायरे में लाने की कोशिश करते हैं। गुवाहाटी हाई कोर्ट में जो मामला है वो मौलिक अधिकारों से ही संबंधित है। लेकिन बड़े ही व्यापक विस्तार के साथ दोनों जजों ने साफ कह दिया है कि जो संवैधानिक अधिकार यानी मौलिक अधिकार जो होते हैं वो नागरिकों के लिए होते हैं घुसपैठियों या विदेशियों के लिए नहीं होते। अब आप कुछ-कछ मामले को समझने लगे होंगे। देखिए बांग्लादेशी घुसपैठियों की जो सबसे ज्यादा समस्या झेल रहे राज्य हैं उनमें सबसे पहला नंबर आता है असम का उसके बाद पश्चिम बंगाल का उड़ीसा और जो बाकी के नॉर्थ ईस्ट के दूसरे राज्य हैं उनमें भी ये बड़ी समस्या है। लेकिन पश्चिम बंगाल में पहले कम्युनिस्टों का शासन रहा और उसके बाद तृणमूल की सरकार आई। इसलिए वहां इसको समस्या के रूप में नहीं देखा जाता है बल्कि इसको वहां पर एक एसेट्स के रूप में या तुष्टीरण की राजनीति के हथियार के रूप में देखा जाता है।

असम में भी वही पहले चलता था जब वहां कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थी। लेकिन इसके खिलाफ असम में खूब आंदोलन हुए। वहां पर फॉरेन ट्रिब्यूनल बनी। डिटेंशन सेंटर्स खोले गए और विदेशियों की पहचान की गई। भारत में जो नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप है एनआरसी वो भी असम में ही लागू हुआ। मामला यहां पर यह आया था कि एक रजिया खातून नाम की महमला ने हेबियस कॉरपस यानी कि बंदी प्रतिच्छीकरण की याचिका हाई कोर्ट में लगाई थी और यह कहा था कि मेरे पति को पता नहीं राज्य सरकार या पुलिस ने कितने दिनों से गायब कर रखा है। उसकी कोई खोजखबर नहीं बताई जा रही है। वह क्यों गिरफ्तार किया गया है यह भी नहीं बताया जा रहा है। और अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी ये कह दिया है कि किसी भी व्यक्ति को बिना उसकी गिरफ्तारी के कारण बताए लिखित में कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। इसलिए पुलिस और राज्य सरकार को इसका जो मेंडामस दिया जाए इस मामले में बदली प्रत्यक्षीकरण में आदेश दिया जाए कि वो मेरे पति को सामने पेश करें।

मामले की सुनवाई करते हुए दोनों जज महोदय ने साफ कर दिया कि देश में जो घुसपैठियों की समस्या है वो बहुत ज्यादा विकराल रूप लेती जा रही है और जो मौलिक अधिकार है चाहे 14 आर्टिकल 14 हो 15 16 17 18 19 20 21 22 ये जितने आर्टिकल है ये जो है ये केवल और केवल भारतीय नागरिकों के लिए है विदेशियों या घुसपैठियों के लिए नहीं है। यह जो महिला है जिसने अपने पति के बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका लगाई थी।हेबियस कॉर्पस की याचिका लगाई थी। इसका पति फॉरेन ट्रिब्यूनल के द्वारा एक घोषित विदेशी है। यानी उसे कई साल पहले ही फॉरेन ट्रिब्यूनल ने बांग्लादेशी घोषित कर दिया था और उसको कुछ सालों के लिए डिटेंशन सेंटर में रखा भी गया। बाद में इसको छोड़ा गया तो यह कहा गया था कि हर हफ्ते यह थाने में जाकर हाजिरी लगाएगा और बाद में फिर से उसको पुलिस ने डिटेंशन में ले लिया।

अब इस वजह से इसकी पत्नी ने याचिका लगाई तो कोर्ट ने यह कहा कि यह विदेशी है और विदेशी व्यक्ति जो घोषित विदेशी है उसको उसके देश में निष्कासित जा सकता है। दूसरी तरफ कोर्ट ने उस मुद्दे को भी उठाया कि आज मीडिया में जो एक एक्सपेंशन का एक टर्म होता है जो कि घोषित विदेशियों के लिए होता है और एक टर्म होता है डिपोर्टेशन का। डिपोर्टेशन उसका होता है जो वैलिड तौर पर किसी देश में एंट्री लेता है लेकिन उसके जो वीजा की अवधि है वो बीत जाती है और वो उसके बावजूद अगर किसी देश में बना रहता है तो उसको डिपोर्ट किया जाता है और जो विदेशी होता है उसको  किया जाता है यानी कि उसको निष्कासित किया जाता है। हिंदी में अगर देखें तो डिपोर्टेशन के लिए निर्वासन का शब्द होता है  तो यहां इस व्यक्ति को निष्कासित करने के लिए अगर सरकार ने सरकारी एजेंसियों ने डिटेन किया है तो फिर किसी भी तरीके से यह अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। और आर्टिकल 22 के तहत इस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं बनता है या फिर बंदी प्रत्यक्षीकरण के तहत भी इसका कोई अधिकार नहीं बनता है। इसलिए यह अपील खारिज की जाती है।

अब आप इसका पूरा का पूरा इंपैक्ट समझिए कि अब तक चाहे प्रशांत भूषण हो या जो दूसरे लोग थे जब वो ऑपरेशन सिंदूर चल रहा था और देश से बाहर लोगों को निकाला जा रहा था। पाकिस्तानियों को, बांग्लादेशियों को तो यह याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को बड़े ही गंभीरता से सुना था। उसके साथ-साथ जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट का भी एक फैसला आया था कि एक महिला जिसे वापस भेज दिया गया था पाकिस्तान उसको बुलाने तक का आदेश दे दिया था हाईकोर्ट ने। यह दोनों जो प्रश्न है वह इस केस में पूरी तरीके से देखे गए हैं और यहां दोनों चीजें स्पष्ट कर दी गई है कि अगर व्यक्ति वैलिड वीजा लेकर पासपोर्ट के माध्यम से देश में आया है और उसकी अवधि समाप्त हो गई है तो उसे डिपोर्ट किया जा सकता है वो भी लीगल है और अगर वह अवैध रूप से आया है वो घुसपैठिया है वो विदेशी है चोरी छुपे आया है तो फिर उसको निष्कासित किया जा सकता है और इसके खिलाफ कोई भी व्यक्ति कोर्ट के अंदर बंदी प्रत्यक्षीकरण या हैवियस कॉरपस की याचिका नहीं लगा सकता क्योंकि यह जो संवैधानिक अधिकार हैं वो सिर्फ और सिर्फ नागरिकों के लिए होते हैं।


अब इस पूरे फैसले के बाद में बहुत से लोग ये कहेंगे कि अब ये जो रजिया खातून है वो सुप्रीम कोर्ट आएगी। सुप्रीम कोर्ट उसे राहत दे देगा। देखिए इतना आसान नहीं होता है। जब संवैधानिक प्रश्न किसी संवैधानिक न्यायालय के द्वारा सुलझाए जाते हैं तो उनको खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को भी रीजनिंग देनी पड़ती है। पहले ये सब बड़ी आसानी से हो जाता था क्योंकि पेड मीडिया का जमाना था और जो पेड मीडिया होता है वो डरा हुआ मीडिया है। वो इन चीजों पर पहले तो रिपोर्टिंग नहीं करता और करता है तो एक तरीके से चाटुकारता पूर्ण रिपोर्टिंग करता है। लेकिन अब इन चीजों के जब जनता की नजर में ये चीजें आती है तो फिर सुप्रीम कोर्ट में चाहे सीजीआई सुनवाई करे या कोई  जज उसकी सुनवाई करे। वो हर मामले को उतने ज्यादा हल्के में नहीं ले सकता जैसे वो पहले ले सकते थे।

 इस हिसाब से यह जो गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला है यह एक लैंडमार्क फैसला कहा जा सकता है और जो घुसपैठिए हैं जो विदेशी हैं उनके मामलों में अब राज्य सरकार को एक शक्ति दे सकता है क्योंकि अगर ऐसे व्यक्तियों के बंदी प्रत्यक्षीकरण की मांग उठाई जाएगी तो फिर यह फैसला उसमें एक लैंडमार्क साबित होगा और इसको सुप्रीम कोर्ट इतनी आसानी से पलट नहीं सकता है क्योंकि कोर्ट ने जिस तरीके तरीके से सारी चीजों को स्पष्ट तौर पर डिफाइन कर दिया है। उसके बाद कोई भी यह नहीं कह सकता कि उसके अधिकार थे। क्योंकि अधिकार तो सिर्फ नागरिकों के होते हैं।जिन अधिकारों के नाम पर चाहे नेचुरल जस्टिस का अधिकार हो या फिर दूसरे ह्यूमन राइट्स की बात हो। ये जो बचाव किया जाता है अपराधियों का, आतंकवादियों का, देश विरोधियों का उसकी एक सीमा जरूर होनी चाहिए। और जो अधिकार किसी नागरिक के होते हैं वो किसी विदेशी के या घुसपैठिए के किसी भी हालत में नहीं हो सकते। दुनिया का कोई भी कानून, कोई भी संविधान इसकी बात नहीं करता है।

लेकिन हमारे देश के जो ग्लोबल सिटीजंस हैं यानी कि जो कम्युनिस्ट हैं या फिर कांग्रेसी लिबरल गैंग के जो लोग हैं वो अपने आप को ग्लोबल सिटीजन मानते हैं और हर अपराधी चाहे वो बांग्लादेश से आया हो, पाकिस्तान से आया हो, चीन से आया हो उसको भी बराबर के अधिकार देने की वकालत ये लोग करते हैं। और सिबल सिंह भी या प्रशांत भूषण टाइप के वकीलों के कुतर्कों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से ऐसे लोगों को राहत दिलाने में कामयाब भी हो जाते हैं। लेकिन अब यह कर पाना उतना आसान नहीं होगा क्योंकि जनता भी इन सारे जो पेचीदे विषय थे उनको आसानी से समझने लगी है। जनता का जो आक्रोश है वो जन भावना वाली जो ये सोशल मीडिया जिसे कहा जाता है इसके माध्यम से प्रधानमंत्री को भी पता चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट को भी पता चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के अलावा जुडिशरी के जितने भी कोर्ट हैं उन सबको यह दिखाई दे रहा है कि जनता इस समय ना तो गूंगी है ना बहरी है और ना ही अंधी है। साथ में मैं उन लोगों से भी कहना चाहूंगा जो ये कहते हैं कि इससे क्या हो गया सुप्रीम कोर्ट खारिज कर देगा। आप लोगों को इन चीजों के महत्व को समझना चाहिए। चाहे हिमाचल प्रदेश का मंदिर के दान का मामला हो। तमिलनाडु का जो कब्रिस्तान से कब्रें खोदने का मामला हो या इस तरीके के जो छिटपुट ये केसेस आ रहे हैं वो इसीलिए आ रहे हैं कि अब जो जज जो कॉलेजियम से ही चुनकर आए हैं लेकिन वो राष्ट्र के प्रति समर्पित है। देश और समाज के प्रति उनकी निष्ठा है। उनके अंदर एक हिम्मत आ रही है। तो हम लोगों को ऐसे जो फैसले हैं उनकी चर्चा भी करनी चाहिए। उनको सुनना भी चाहिए और उन्हें जानना भी चाहिए।

जैसा कि छत्तीसगढ़ में भी हुआ कि वहां किस तरीके से ग्राम सभा ने एक बोर्ड लगा दिया कि कन्वर्जन करने आने वाले पादरियों का गांव में प्रवेश वर्जित है और हाई कोर्ट ने इसको सही ठहराया था। इन लोगों को सपोर्ट तभी मिल सकता है कि जब जनता ऐसे फैसलों का स्वागत करें। ऐसे फैसले देने वाले जो साहसी जज हैं उनके समर्थन में खड़ी हो। अन्यथा जो पूरी की पूरी लॉबी है अगर आप की डेट में देखें तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मिलाकर करीब 850 जज बैठते हैं। इनमें से कम से कम 20% यानी 150 जज तो ऐसे हैं जो राष्ट्र और समाज के लिए ही निर्णय लेना चाहते हैं। निष्ठा पूर्वक काम करते हैं। ईमानदारी से काम करते हैं। अगर इन लोगों को जनता का साथ मिलेगा। ऐसे फैसलों की चर्चा होगी। आप निश्चित मानिए ये संख्या 20% से 30% भी हो जाएगी, 40% भी हो जाएगी क्योंकि कोई भी परिवर्तन क्रांतिकारी रूप से नहीं आता है। समाज हो, दुनिया हो, कोई भी चीज हो, ज्यादातर जो परिवर्तन होते हैं वो क्रमिक होते हैं। भूकंप में ही परिवर्तन एकदम से आता है और वो नेचुरल होता है। उसमें व्यक्ति नहीं कर सकता है। तो ये जो बदलाव धीरे-धीरे देखने को मिल रहे हैं, जजों के अच्छे फैसले आ रहे हैं। का आपको सम्मान करना चाहिए और ऐसे जजों के साथ खड़े होना चाहिए। यही वजह है कि ढूंढ कर ऐसे पॉजिटिव और सकारात्मक फैसलों को आपके सामने रखते हैं जिससे लोगों को पता चले कि अगर जनता के अंदर आक्रोश है तो उसका पॉजिटिव असर होता हुआ भी दिख रहा है। जज भी हिम्मत दिखाते हुए ऐसे कड़े फैसले लेने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं।

आपको नहीं पता कि ये जो जज चाहे गुवाहाटी हाई कोर्ट के हो, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हो, हिमाचल के हो या तमिलनाडु की जो एन माला जज साहिबा थी इन सबके कैरियर पे भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है जब ये राष्ट्र हित में कोई फैसला लेते हैं। क्योंकि कॉलेजियम के जो गिरोह वाले लोग हैं वो ऐसे जजों को मार्क कर लेते हैं। जैसे आपको याद होगा शेखर यादव के मामले में हुआ था। शेखर यादव ने कुछ भी गलत नहीं कहा था। उसके बावजूद उनके खिलाफ महाभियोग लाने तक की कोशिश कर दी गई और कपिल सिब्बल ने यह मुद्दा भी बना दिया था कि यदि यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग लाया जा रहा है तो जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ भी आना चाहिए। तो ये अपने उस कॉलेजियम की कृपा को भी ताक पर रखकर अगर अच्छे फैसले दे रहे हैं तो आपका भी फर्ज बनता है कि इनकी तारीफ की जाए। इनके समर्थन में हम लोग खड़े हो जिससे और ज्यादा से ज्यादा हाई कोर्ट्स के अंदर ऐसे फैसले आए और जब ऐसे फैसले आएंगे तो न्याय की जीत होती हुई भी नजर आएगी और न्याय होता हुआ भी नजर आएगा।

जय हिंद।



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November 10, 2025 at 04:49PM

गुवाहाटी हाई कोर्ट में जस्टिस कमल राय सुराना और जस्टिस सुष्मिता फूकन के फैसले से न्याय की जीत

 


 अभी पिछले दिनों एक सुप्रीम कोर्ट का निर्णय आया था और यह निर्णय था नागरिकों के मूल अधिकारों को लेकर। आपने अक्सर सुना होगा हाई कोर्ट सुप्रीम कोर्ट में जो लिबरल कांग्रेसी गैंग है यह हमेशा ही मौलिक अधिकारों के नाम पर अपराधियों को बचाने की कोशिश करता हुआ नजर आता है और उसी कड़ी में सुप्रीम कोर्ट ने बड़ा फैसला लिया और आर्टिकल 22 के तहत हर गिरफ्तार होने वाले व्यक्ति को यह अधिकार दिया कि उसको गिरफ्तारी से पहले लिखित में उसकी गिरफ्तारी की वजह बतानी पड़ेगी और विशेष स्थितियों में मजिस्ट्रेट के सामने पेश करने से 2 घंटे पहले कम से कम यह वजह बतानी पड़ेगी अन्यथा गिरफ्तारी को अवैध माना जाएगा। इसी से कुछ रिलेटेड एक मामला आता है गुवाहाटी हाई कोर्ट में। और गुवाहाटी हाई कोर्ट में इस मामले की सुनवाई कर रहे थे जस्टिस कमल राय सुराना और जस्टिस सुष्मिता फूकन। इन्होंने जो मामले में संविधान में जो मौलिक अधिकारों का पूरा का पूरा व्याख्या है और उसको किस तरीके से मिसयूज किया जाता है उसके संदर्भ में जो फैसला दिया है वोआज भारत के हर नागरिक को जानना जरूरी है

इसलिए भी जानना जरूरी है कि कॉलेजियम से आने वाले ये तमाम जो जजेस होते हैं जो कांग्रेस कम्युनिस्ट लिबरल को बहुत ज्यादा सपोर्ट करते हैं और इस हद तक सपोर्ट करते हैं कि अपराधियों, आतंकवादियों, विदेशियों तक को नागरिकों के संवैधानिक अधिकारों की दायरे में लाने की कोशिश करते हैं। गुवाहाटी हाई कोर्ट में जो मामला है वो मौलिक अधिकारों से ही संबंधित है। लेकिन बड़े ही व्यापक विस्तार के साथ दोनों जजों ने साफ कह दिया है कि जो संवैधानिक अधिकार यानी मौलिक अधिकार जो होते हैं वो नागरिकों के लिए होते हैं घुसपैठियों या विदेशियों के लिए नहीं होते। अब आप कुछ-कछ मामले को समझने लगे होंगे। देखिए बांग्लादेशी घुसपैठियों की जो सबसे ज्यादा समस्या झेल रहे राज्य हैं उनमें सबसे पहला नंबर आता है असम का उसके बाद पश्चिम बंगाल का उड़ीसा और जो बाकी के नॉर्थ ईस्ट के दूसरे राज्य हैं उनमें भी ये बड़ी समस्या है। लेकिन पश्चिम बंगाल में पहले कम्युनिस्टों का शासन रहा और उसके बाद तृणमूल की सरकार आई। इसलिए वहां इसको समस्या के रूप में नहीं देखा जाता है बल्कि इसको वहां पर एक एसेट्स के रूप में या तुष्टीरण की राजनीति के हथियार के रूप में देखा जाता है।

असम में भी वही पहले चलता था जब वहां कांग्रेस की सरकारें हुआ करती थी। लेकिन इसके खिलाफ असम में खूब आंदोलन हुए। वहां पर फॉरेन ट्रिब्यूनल बनी। डिटेंशन सेंटर्स खोले गए और विदेशियों की पहचान की गई। भारत में जो नेशनल रजिस्टर ऑफ सिटीजनशिप है एनआरसी वो भी असम में ही लागू हुआ। मामला यहां पर यह आया था कि एक रजिया खातून नाम की महमला ने हेबियस कॉरपस यानी कि बंदी प्रतिच्छीकरण की याचिका हाई कोर्ट में लगाई थी और यह कहा था कि मेरे पति को पता नहीं राज्य सरकार या पुलिस ने कितने दिनों से गायब कर रखा है। उसकी कोई खोजखबर नहीं बताई जा रही है। वह क्यों गिरफ्तार किया गया है यह भी नहीं बताया जा रहा है। और अब तो सुप्रीम कोर्ट ने भी ये कह दिया है कि किसी भी व्यक्ति को बिना उसकी गिरफ्तारी के कारण बताए लिखित में कारण बताए गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। इसलिए पुलिस और राज्य सरकार को इसका जो मेंडामस दिया जाए इस मामले में बदली प्रत्यक्षीकरण में आदेश दिया जाए कि वो मेरे पति को सामने पेश करें।

मामले की सुनवाई करते हुए दोनों जज महोदय ने साफ कर दिया कि देश में जो घुसपैठियों की समस्या है वो बहुत ज्यादा विकराल रूप लेती जा रही है और जो मौलिक अधिकार है चाहे 14 आर्टिकल 14 हो 15 16 17 18 19 20 21 22 ये जितने आर्टिकल है ये जो है ये केवल और केवल भारतीय नागरिकों के लिए है विदेशियों या घुसपैठियों के लिए नहीं है। यह जो महिला है जिसने अपने पति के बंदी प्रत्यक्षीकरण की याचिका लगाई थी।हेबियस कॉर्पस की याचिका लगाई थी। इसका पति फॉरेन ट्रिब्यूनल के द्वारा एक घोषित विदेशी है। यानी उसे कई साल पहले ही फॉरेन ट्रिब्यूनल ने बांग्लादेशी घोषित कर दिया था और उसको कुछ सालों के लिए डिटेंशन सेंटर में रखा भी गया। बाद में इसको छोड़ा गया तो यह कहा गया था कि हर हफ्ते यह थाने में जाकर हाजिरी लगाएगा और बाद में फिर से उसको पुलिस ने डिटेंशन में ले लिया।

अब इस वजह से इसकी पत्नी ने याचिका लगाई तो कोर्ट ने यह कहा कि यह विदेशी है और विदेशी व्यक्ति जो घोषित विदेशी है उसको उसके देश में निष्कासित जा सकता है। दूसरी तरफ कोर्ट ने उस मुद्दे को भी उठाया कि आज मीडिया में जो एक एक्सपेंशन का एक टर्म होता है जो कि घोषित विदेशियों के लिए होता है और एक टर्म होता है डिपोर्टेशन का। डिपोर्टेशन उसका होता है जो वैलिड तौर पर किसी देश में एंट्री लेता है लेकिन उसके जो वीजा की अवधि है वो बीत जाती है और वो उसके बावजूद अगर किसी देश में बना रहता है तो उसको डिपोर्ट किया जाता है और जो विदेशी होता है उसको  किया जाता है यानी कि उसको निष्कासित किया जाता है। हिंदी में अगर देखें तो डिपोर्टेशन के लिए निर्वासन का शब्द होता है  तो यहां इस व्यक्ति को निष्कासित करने के लिए अगर सरकार ने सरकारी एजेंसियों ने डिटेन किया है तो फिर किसी भी तरीके से यह अधिकारों का उल्लंघन नहीं है। और आर्टिकल 22 के तहत इस व्यक्ति का कोई अधिकार नहीं बनता है या फिर बंदी प्रत्यक्षीकरण के तहत भी इसका कोई अधिकार नहीं बनता है। इसलिए यह अपील खारिज की जाती है।

अब आप इसका पूरा का पूरा इंपैक्ट समझिए कि अब तक चाहे प्रशांत भूषण हो या जो दूसरे लोग थे जब वो ऑपरेशन सिंदूर चल रहा था और देश से बाहर लोगों को निकाला जा रहा था। पाकिस्तानियों को, बांग्लादेशियों को तो यह याचिका लेकर सुप्रीम कोर्ट पहुंची थी और सुप्रीम कोर्ट ने उनकी याचिका को बड़े ही गंभीरता से सुना था। उसके साथ-साथ जम्मू कश्मीर हाईकोर्ट का भी एक फैसला आया था कि एक महिला जिसे वापस भेज दिया गया था पाकिस्तान उसको बुलाने तक का आदेश दे दिया था हाईकोर्ट ने। यह दोनों जो प्रश्न है वह इस केस में पूरी तरीके से देखे गए हैं और यहां दोनों चीजें स्पष्ट कर दी गई है कि अगर व्यक्ति वैलिड वीजा लेकर पासपोर्ट के माध्यम से देश में आया है और उसकी अवधि समाप्त हो गई है तो उसे डिपोर्ट किया जा सकता है वो भी लीगल है और अगर वह अवैध रूप से आया है वो घुसपैठिया है वो विदेशी है चोरी छुपे आया है तो फिर उसको निष्कासित किया जा सकता है और इसके खिलाफ कोई भी व्यक्ति कोर्ट के अंदर बंदी प्रत्यक्षीकरण या हैवियस कॉरपस की याचिका नहीं लगा सकता क्योंकि यह जो संवैधानिक अधिकार हैं वो सिर्फ और सिर्फ नागरिकों के लिए होते हैं।


अब इस पूरे फैसले के बाद में बहुत से लोग ये कहेंगे कि अब ये जो रजिया खातून है वो सुप्रीम कोर्ट आएगी। सुप्रीम कोर्ट उसे राहत दे देगा। देखिए इतना आसान नहीं होता है। जब संवैधानिक प्रश्न किसी संवैधानिक न्यायालय के द्वारा सुलझाए जाते हैं तो उनको खारिज करने के लिए सुप्रीम कोर्ट को भी रीजनिंग देनी पड़ती है। पहले ये सब बड़ी आसानी से हो जाता था क्योंकि पेड मीडिया का जमाना था और जो पेड मीडिया होता है वो डरा हुआ मीडिया है। वो इन चीजों पर पहले तो रिपोर्टिंग नहीं करता और करता है तो एक तरीके से चाटुकारता पूर्ण रिपोर्टिंग करता है। लेकिन अब इन चीजों के जब जनता की नजर में ये चीजें आती है तो फिर सुप्रीम कोर्ट में चाहे सीजीआई सुनवाई करे या कोई  जज उसकी सुनवाई करे। वो हर मामले को उतने ज्यादा हल्के में नहीं ले सकता जैसे वो पहले ले सकते थे।

 इस हिसाब से यह जो गुवाहाटी हाई कोर्ट का फैसला है यह एक लैंडमार्क फैसला कहा जा सकता है और जो घुसपैठिए हैं जो विदेशी हैं उनके मामलों में अब राज्य सरकार को एक शक्ति दे सकता है क्योंकि अगर ऐसे व्यक्तियों के बंदी प्रत्यक्षीकरण की मांग उठाई जाएगी तो फिर यह फैसला उसमें एक लैंडमार्क साबित होगा और इसको सुप्रीम कोर्ट इतनी आसानी से पलट नहीं सकता है क्योंकि कोर्ट ने जिस तरीके तरीके से सारी चीजों को स्पष्ट तौर पर डिफाइन कर दिया है। उसके बाद कोई भी यह नहीं कह सकता कि उसके अधिकार थे। क्योंकि अधिकार तो सिर्फ नागरिकों के होते हैं।जिन अधिकारों के नाम पर चाहे नेचुरल जस्टिस का अधिकार हो या फिर दूसरे ह्यूमन राइट्स की बात हो। ये जो बचाव किया जाता है अपराधियों का, आतंकवादियों का, देश विरोधियों का उसकी एक सीमा जरूर होनी चाहिए। और जो अधिकार किसी नागरिक के होते हैं वो किसी विदेशी के या घुसपैठिए के किसी भी हालत में नहीं हो सकते। दुनिया का कोई भी कानून, कोई भी संविधान इसकी बात नहीं करता है।

लेकिन हमारे देश के जो ग्लोबल सिटीजंस हैं यानी कि जो कम्युनिस्ट हैं या फिर कांग्रेसी लिबरल गैंग के जो लोग हैं वो अपने आप को ग्लोबल सिटीजन मानते हैं और हर अपराधी चाहे वो बांग्लादेश से आया हो, पाकिस्तान से आया हो, चीन से आया हो उसको भी बराबर के अधिकार देने की वकालत ये लोग करते हैं। और सिबल सिंह भी या प्रशांत भूषण टाइप के वकीलों के कुतर्कों के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट से ऐसे लोगों को राहत दिलाने में कामयाब भी हो जाते हैं। लेकिन अब यह कर पाना उतना आसान नहीं होगा क्योंकि जनता भी इन सारे जो पेचीदे विषय थे उनको आसानी से समझने लगी है। जनता का जो आक्रोश है वो जन भावना वाली जो ये सोशल मीडिया जिसे कहा जाता है इसके माध्यम से प्रधानमंत्री को भी पता चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट को भी पता चल रहा है। सुप्रीम कोर्ट के अलावा जुडिशरी के जितने भी कोर्ट हैं उन सबको यह दिखाई दे रहा है कि जनता इस समय ना तो गूंगी है ना बहरी है और ना ही अंधी है। साथ में मैं उन लोगों से भी कहना चाहूंगा जो ये कहते हैं कि इससे क्या हो गया सुप्रीम कोर्ट खारिज कर देगा। आप लोगों को इन चीजों के महत्व को समझना चाहिए। चाहे हिमाचल प्रदेश का मंदिर के दान का मामला हो। तमिलनाडु का जो कब्रिस्तान से कब्रें खोदने का मामला हो या इस तरीके के जो छिटपुट ये केसेस आ रहे हैं वो इसीलिए आ रहे हैं कि अब जो जज जो कॉलेजियम से ही चुनकर आए हैं लेकिन वो राष्ट्र के प्रति समर्पित है। देश और समाज के प्रति उनकी निष्ठा है। उनके अंदर एक हिम्मत आ रही है। तो हम लोगों को ऐसे जो फैसले हैं उनकी चर्चा भी करनी चाहिए। उनको सुनना भी चाहिए और उन्हें जानना भी चाहिए।

जैसा कि छत्तीसगढ़ में भी हुआ कि वहां किस तरीके से ग्राम सभा ने एक बोर्ड लगा दिया कि कन्वर्जन करने आने वाले पादरियों का गांव में प्रवेश वर्जित है और हाई कोर्ट ने इसको सही ठहराया था। इन लोगों को सपोर्ट तभी मिल सकता है कि जब जनता ऐसे फैसलों का स्वागत करें। ऐसे फैसले देने वाले जो साहसी जज हैं उनके समर्थन में खड़ी हो। अन्यथा जो पूरी की पूरी लॉबी है अगर आप की डेट में देखें तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में मिलाकर करीब 850 जज बैठते हैं। इनमें से कम से कम 20% यानी 150 जज तो ऐसे हैं जो राष्ट्र और समाज के लिए ही निर्णय लेना चाहते हैं। निष्ठा पूर्वक काम करते हैं। ईमानदारी से काम करते हैं। अगर इन लोगों को जनता का साथ मिलेगा। ऐसे फैसलों की चर्चा होगी। आप निश्चित मानिए ये संख्या 20% से 30% भी हो जाएगी, 40% भी हो जाएगी क्योंकि कोई भी परिवर्तन क्रांतिकारी रूप से नहीं आता है। समाज हो, दुनिया हो, कोई भी चीज हो, ज्यादातर जो परिवर्तन होते हैं वो क्रमिक होते हैं। भूकंप में ही परिवर्तन एकदम से आता है और वो नेचुरल होता है। उसमें व्यक्ति नहीं कर सकता है। तो ये जो बदलाव धीरे-धीरे देखने को मिल रहे हैं, जजों के अच्छे फैसले आ रहे हैं। का आपको सम्मान करना चाहिए और ऐसे जजों के साथ खड़े होना चाहिए। यही वजह है कि ढूंढ कर ऐसे पॉजिटिव और सकारात्मक फैसलों को आपके सामने रखते हैं जिससे लोगों को पता चले कि अगर जनता के अंदर आक्रोश है तो उसका पॉजिटिव असर होता हुआ भी दिख रहा है। जज भी हिम्मत दिखाते हुए ऐसे कड़े फैसले लेने की कोशिश करते नजर आ रहे हैं।

आपको नहीं पता कि ये जो जज चाहे गुवाहाटी हाई कोर्ट के हो, छत्तीसगढ़ हाई कोर्ट के हो, हिमाचल के हो या तमिलनाडु की जो एन माला जज साहिबा थी इन सबके कैरियर पे भी प्रश्न चिन्ह लग जाता है जब ये राष्ट्र हित में कोई फैसला लेते हैं। क्योंकि कॉलेजियम के जो गिरोह वाले लोग हैं वो ऐसे जजों को मार्क कर लेते हैं। जैसे आपको याद होगा शेखर यादव के मामले में हुआ था। शेखर यादव ने कुछ भी गलत नहीं कहा था। उसके बावजूद उनके खिलाफ महाभियोग लाने तक की कोशिश कर दी गई और कपिल सिब्बल ने यह मुद्दा भी बना दिया था कि यदि यशवंत वर्मा के खिलाफ महाभियोग लाया जा रहा है तो जस्टिस शेखर यादव के खिलाफ भी आना चाहिए। तो ये अपने उस कॉलेजियम की कृपा को भी ताक पर रखकर अगर अच्छे फैसले दे रहे हैं तो आपका भी फर्ज बनता है कि इनकी तारीफ की जाए। इनके समर्थन में हम लोग खड़े हो जिससे और ज्यादा से ज्यादा हाई कोर्ट्स के अंदर ऐसे फैसले आए और जब ऐसे फैसले आएंगे तो न्याय की जीत होती हुई भी नजर आएगी और न्याय होता हुआ भी नजर आएगा।

जय हिंद।


Thursday, November 6, 2025

Attorney General R. Venkataramani strongly rebutted CJI Gavai accusation Modi government of cunning tactics

 

  Supreme Court Hearing of Tribunal Reform Act 2021


  • Context and Opening Remarks
    There was tense atmosphere in the Supreme Court during the hearing on the validity of the Tribunal Reform Act 2021. Chief Justice of India (CJI) B.R. Gavai accused the Modi government of cunning tactics to avoid this bench and misusing constitutional processes. Attorney General R. Venkataramani strongly rebutted, stating the government is legitimately exercising constitutional powers, not engaging in any trickery. Question is whether CJI Gavai is acting on a government-opposition agenda rather than impartial justice. The background and courtroom drama, along with CJI Gavai’s perceived anti-government stance, are introduced for detailed analysis.

  • Background of the Tribunal Reform Act 2021
    The Tribunal Reform Act 2021 was a significant initiative by the Indian government aimed at strengthening, streamlining, and making the country’s tribunal system more efficient and transparent. Prior to the Act, multiple tribunals such as:

    Tribunal NameIssues Faced
    Income Tax Appellate Tribunal (ITAT)Delays, corruption, overlapping jurisdiction
    Central Administrative Tribunal (CAT)Delays, corruption, overlapping jurisdiction
    National Green Tribunal (NGT)Delays, corruption, overlapping jurisdiction
    Armed Forces Tribunal (AFT)Delays, corruption, overlapping jurisdiction

    In 2019, the Supreme Court expressed concern in R.C. Madan Gopal vs Union of India over the tribunals’ condition, emphasizing the need for stronger tribunals with independence. The Modi government introduced the Tribunal Reform Act in 2021 to address these concerns.

    However, opposition parties such as the Congress and Trinamool Congress challenged the Act in the Supreme Court, alleging it violates constitutional Articles 323A and 323B by undermining tribunal independence.


  • Court Hearing and Key Arguments
    The hearing has been ongoing since 2022. In 2025, a new development occurred when the government proposed minor amendments to increase tribunal benches and mandate digital hearings.

    On 5 November 2025, the Supreme Court’s Constitution Bench led by CJI Gavai conducted the hearing. Petitioners argued that the Act enhances executive dominance over tribunals, which CJI Gavai seemed to agree with, suggesting increased executive control would benefit the ruling party.

    Attorney General Venkataramani defended the Act as a reform, not interference, emphasizing the executive’s constitutional role. CJI Gavai interrupted, accusing the government of trying to dodge this bench and using amendments to delay the hearing, calling it disrespectful to constitutional processes.

    Venkataramani retorted firmly:

    • The government is exercising legitimate constitutional powers under Articles 53 and 73.
    • This is a lawful use of executive authority, not trickery.
    • If the court finds any fault, it should rule accordingly rather than level accusations.

    This response silenced the courtroom for a moment. CJI Gavai’s tone softened slightly, and the hearing was adjourned until 20 November 2025.


  • Analysis of the Conflict and Criticism of CJI Gavai
    It was shocking of CJI Gavai’s behavior, labeling it as government-oppositional bias rather than judicial impartiality. Key points include:

    • Fact Ignorance: Data shows pendency of tribunal cases decreased by 25%, appointments increased by 40% in 2024, contradicting Gavai’s accusations.
    • Selective Criticism: The judiciary was silent during corruption-ridden tribunals under the Congress government (2004-2014) but now attacks the Modi government’s reforms.
    • Pattern of Opposition: Since becoming CJI in May 2025, Gavai has challenged government policies like electoral bonds and CAA, seemingly benefiting opposition parties.
    • Judicial Decorum: Public reprimand of the Attorney General by the CJI is seen as damaging to the dignity of the Supreme Court. Critics argue Gavai should decide on the law, not engage in political rhetoric aligned with opposition narratives.

    Rahul Gandhi’s posted on X supporting CJI Gavai is highlighted, implying Gavai may have become the Congress party’s de facto “B team.”


  • Government’s Firm Stance and Venkataramani’s Defiance
    The Modi government, through Law Minister Arjun Ram Meghwal, reaffirmed its commitment to reforms and respect for court decisions, urging against bias. The government asserts that tribunal reforms have positively impacted over 100,000 cases in 2025 alone, emphasizing that reforms will continue despite judicial opposition.

    Attorney General Venkataramani’s sharp rebuttal to CJI Gavai has become emblematic of the government’s firm stance. The video highlights that despite nearing retirement, CJI Gavai continues to publicly challenge the government, seemingly to maintain limelight and promote an anti-Modi/Yogi narrative.


  • The Constitutional Debate over Powers and Courtroom Dynamics
    In the final segment, the video analyses the constitutional and procedural aspects of the dispute:

    • Venkataramani argues that if the government genuinely wants to avoid this bench, but is doing so within constitutional provisions, there is no issue.
    • The government’s use of constitutional powers is lawful and open to judicial review.
    • The Attorney General challenges Gavai to issue a decision if he disagrees rather than making political statements.
    • The controversy reflects a broader trend where judges face less scrutiny for political remarks against the government, but the government responds firmly.
    • The video suggests that the Supreme Court’s legitimacy is at stake if personal or political biases overshadow constitutional interpretations.

Key Insights and Conclusions

  • Tribunal Reform Act 2021: Aimed at improving tribunal efficiency, transparency, and reducing case backlogs, backed by quantitative improvements in case disposal and appointments.
  • Constitutional Challenge: Opposition claims the Act undermines tribunal independence under Articles 323A and 323B; government defends it as legitimate constitutional exercise under Articles 53 and 73.
  • Supreme Court Hearing: Marked by confrontation between CJI B.R. Gavai and Attorney General Venkataramani, with accusations of government evasion and government’s denial of such tactics.
  • Judicial Impartiality Questioned: During hearing CJI Gavai displays an anti-government bias, influencing court proceedings and public perception.
  • Government’s Firm Defense: The Modi administration emphasizes commitment to reform, respect for judiciary, and challenges the politicization of legal proceedings.
  • Impact on Judiciary: Public courtroom rebukes and political rhetoric risk damaging the Supreme Court’s perceived neutrality and dignity.
  • Jai Hind

अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case

अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case
अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case
अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case
अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case

 


सुप्रीम कोर्ट की हवा में तकरार की गंध घुली हुई थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट 2021 की वैधता पर सुनवाई के दौरान CJI बी आर गवई ने मोदी सरकार पर चालाकी का आरोप लगाते हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकट रमणी को फटकार लगाने की कोशिश की। गवई साहब का कहना था कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है और संवैधानिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर रही है। लेकिन वेंकट रमणी ने कड़े शब्दों में पलटवार किया। उन्होंने कहा कि सरकार कोई चाल नहीं चल रही है बल्कि संवैधानिक शक्तियों का वैध प्रयोग कर रही है। कार्यपालिका की जो शक्तियां हैं उनका इस्तेमाल किया जा रहा है केंद्र सरकार की तरफ से ना कि कोई चाल चली जा रही है। यह जवाब ना सिर्फ CJI की हेकड़ी निकाल गया बल्कि उनकी सरकार विरोधी मानसिकता को भी बेनकाब कर दिया। क्या गवई साहब न्याय के बजाय विपक्ष के एजेंडे पर चल रहे हैं?

 इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म के बैकग्राउंड से लेकर के कोर्ट रूम के ड्रामा तक और  CJI गवई की जो सरकार विरोधी मानसिकता है वो अब कैसे उजागर हो चुकी है उसको भी हम समझेंगे। ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट 2021 भारत सरकार का एकत्वाकांक्षी कदम था। जिसका उद्देश्य देश के ट्रिब्यूनल सिस्टम को मजबूत, कुशल और पारदर्शी बनाना था। पहले विभिन्न कानूनों के तहत बने ट्रिब्यूनल्स जैसे कि इनकम टैक्स अपीलमैन ट्रिब्यूनल यानी कि आईटीएटी, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी कि सीएटी, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी कि एनजीटी और आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल यानी कि एएफटी में भारी देरी, भ्रष्टाचार और ओवरलैपिंग जुरिसडिक्शन की समस्या थी। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद आरसी गोपाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में ट्रिब्यूनल्स की स्थिति पर चिंता जताई थी। कहते हुए कि ट्रिब्यूनल्स को मजबूत बनाना जरूरी है लेकिन बिना स्वतंत्रता के नहीं। अब मोदी की सरकार ने इसी को आधार बना करके साल 2021 में ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट लेकर के आए। यह एक्ट संसद में साल 2021 में पारित किया गया। लेकिन विपक्ष यानी कि कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने इसे न्यायपालिका पर हमला बता करके सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा कि एक्ट संविधान की धारा 323 ए और 323 बी का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। क्योंकि यह ट्रिब्यूनल्स 

की स्वतंत्रता को छीनता है।

सुनवाई साल 2022 से लगातार इस मामले में चल रही है। लेकिन साल 2025 में अब नया मोड़ तब आ गया जब सरकार ने एक्ट में मामूली संशोधन का प्रस्ताव रख दिया। ट्रिब्यूनल बेंचों की संख्या बढ़ाने और डिजिटल हियरिंग को अनिवार्य करने का दरअसल यही वो पॉइंट था जिस पर CJI गवई की हेकड़ी सामने आई है। 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच यानी कि CJI गवई के नेतृत्व में इस मामले में सुनवाई हो रही थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट पर सुनवाई चल रही थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया हुआ है कि इस एक्ट से कार्यपालिका का वर्चस्व बढ़ेगा। यानी कि CJI ऐसा लग रहा है कि कार्यपालिका का अगर वर्चस्व बढ़ेगा तो फिर ये सरकार के हित में होगा। सरकार के हित में होगा तो सत्ता पर काबिज कौन है? ये बहुत सारे सवाल उनके दिमाग में चल रहे होंगे।

अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने बचाव में कहा कि यह सुधार है। हस्तक्षेप नहीं। एससी में सीजीआई का प्रतिनिधित्व दरअसल सुनिश्चित करता है। लेकिन CJI गवई ने बीच में टोकते हुए कहा कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है। आप चाल चल रहे हैं। यानी मोदी सरकार चाल चल रही है। संशोधन का प्रस्ताव रखकर के सुनवाई को आप टलवाना चाहते हैं। यह संवैधानिक प्रक्रिया का अपमान है। दोस्तों, यह सुनते ही अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने बिना हिले जवाब दिया।सरकार कोई भी चाल नहीं चल रही है। हम संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। कार्यपालिका की जो शक्तियां अनुच्छेद 53 और अनुच्छेद 73 के तहत हैं विधाई सुधार और प्रशासनिक दक्षता को लेकर के उनका वैध इस्तेमाल कर रही है मोदी सरकार ना कि कोई चाल चल रही है। अगर कोर्ट को लगता है कि यह गलत है तो फिर फैसला सुनाए लेकिन आरोप ना लगाए। यह जवाब इतना कड़ा था कि कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।CJI गवई ने कुछ देर चुप रहने के बाद में कहा कि हम देखेंगे लेकिन उनकी आवाज में पहले जैसी धाक नहीं थी सुनवाई अब 20 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है। यानी कि सीजीआई गवई सरकार पर हावी होना चाहते थे। वेंकट रमणी ने सारी हेकड़ी निकाल दी। सीजीआई गवाई की हरकत उनकी सरकार विरोधी मानसिकता का साफ प्रमाण है। एक तरफ से वह खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के हर सुधार का हमला कर देते हैं। तीखी आलोचना का पहली बिंदु यह है कि तथ्यों की अनदेखी की गई। ट्रिब्यूनल एक्ट से पेंडिंग केस 25% कम हुए हैं। एनजेडीजी डाटा के मुताबिक साल साल 2024 की बात कर रहा हूं। नियुक्तियां 40% तेज हुई है। फिर भी गवई साहब चालाकी का आरोप लगाते हैं। यह निष्पक्षता कहां की है? दूसरा चयनात्मक आलोचना का मुद्दा यह है कि जब कांग्रेस सरकार के समय 2004 और 14 की बात कर रहा हूं। ट्रिब्यूनल्स में भ्रष्टाचार चरम पर था तब कोर्ट चुप क्यों बैठा था? लेकिन मोदी के सुधारों पर हमला क्यों? तीसरा उनकी हेकड़ी का जो इतिहास है मई 2025 में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बनने के बाद से गब ने इलेक्टोरल बॉन्ड सीएए और अब ट्रिब्यूनल पर सरकार को घेरने की जो कोशिश की क्या यह संयोग है कि हर बार विपक्ष को फायदा होता है? चौथा जो मेन बिंदु है वो यह है कि कोर्ट रूम में अटॉर्नी जनरल को फटकारना यह सर्वोच्च पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। सीजीआई गवई साहब अगर आपको सुधार पसंद नहीं है तो आप फैसला दे दीजिए ना कि राजनैतिक भाषण बाजी की क्या जरूरत है? यह मानसिकता विपक्षी है। जो विपक्षी जो एजेंडा है उससे यह प्रेरित लगती है मानसिकता। राहुल गांधी ने तुरंत ट्वीट किया। सीजीआई साहब सही कह रहे हैं। क्या गवाई साहब अनजाने में कांग्रेस पार्टी की बी टीम बन चुके हैं? मोदी सरकार ने कभी पीछे नहीं हटना सीखा। अटर्नी जनरल वेंकट रमनी का जवाब एक मिसाल के तौर पर याद रखा जाएगा। संवैधानिक शक्तियों का हवाला देकर के उन्होंने सीजीआई को पाठ पढ़ाने वाली कोशिश को धूल चटा दी। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बाद में कहा कि सरकार सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी। पूर्वाग्रह ना दिखाएं। यह स्टैंड साफ करता है कि कार्यपालिका अपनी भूमिका निभाएगी लेकिन टकराव नहीं करना चाहती। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म से देश को फायदा हो रहा है। साल 2025 में 1 लाख से ज्यादा केस तेजी से निपटे हैं। सरकार का संदेश साफ है कि सुधार रुकेंगे नहीं। चाहे सीजीआई की हेकड़ी ही क्यों ना फूटे। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म केस ने साबित कर दिया है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई की सरकार विरोधी मानसिकता न्यायपालिका को कमजोर करने की कवायद में कदम है। अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी का दो टूक जवाब उनकी हेकड़ी निकाल देने वाला था।

अब समय है कि गवई साहब तथ्यों पर चलें। एजेंडा चलाने की जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट में। और जैसा कि लगातार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई को लेकर के बार-बार एक नैरेटिव चल रहा था इस देश में। लोगों की तमाम जो भावनाएं थी वो निकल निकल कर के सामने आ रही थी कि कैसे बीआर गवई साहब एक मोदी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। एक योगी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। लगा था कि रिटायरमेंट के टाइम पर कम से कम सीजीआई गवई साहब चुप्पी साध करके बैठेंगे। कम से कम वो न्यूट्रल होकर के जो है सरकार से भिड़ने की कोशिश नहीं करेंगे। इधर-उधर की बात ना करते हुए सिर्फ और सिर्फ केस पर टिके रहेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि जब रिटायरमेंट में कुछ एक हफ्ते ही बचे हैं। जब सीजीआई गवई का कार्यकाल पूरा होने वाला है तो इस दौर में अब गवई साहब का यह स्टेटमेंट गवई साहब का अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी को फटकार लगाना यह दिखाता है कि रिटायरमेंट के वक्त भी सीजीआई गवई साहब लाइमलाइट बटोरना चाहते हैं। जो मोदी योगी विरोधी मानसिकता जो उनकी है वह कहीं ना कहीं दिखा के जाना चाहते हैं। लेकिन सरकार की तरफ से जो अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो दो टूक जवाब दिया है गवई साहब को उस जवाब से सुप्रीम कोर्ट के पटल पर सन्नाटा छा गया था। उसके जवाब में बीआर गवई साहब को जल्द से जल्द जवाब तक नहीं आया। काफी देर तक कोर्ट रूम में शांति बनी रही। उसके बाद में गवई साहब कहते हैं कि हम देखेंगे और अटॉर्नी जनरल वेंकट रमली ने यह कह दिया है कि अगर आपको कोई भी दिक्कत है तो आप सीधे फैसला सुना दीजिए। आप भले ही हमारे अगेंस्ट में फैसला सुना करके आइए। हम कानूनी प्रक्रिया का पालन करेंगे। जो कार्यपालिका की शक्तियां संविधान में निहित हैं, हम उनका पालन करेंगे। आप उन्हें रोक नहीं सकते। गवई साहब की यह हिमाकत कैसे हो गई यह कहने की कि मौजूदा केंद्र सरकार उनकी बेंच के सामने सुनवाई ना हो इस बाबत बचना चाहती है। वो जानबूझकर के इस केस को टालना चाहती है ताकि गवई साहब की बेंच के सामने इस केस की सुनवाई ना हो पाए। तो इसका दो टूक जवाब दिया है अटॉर्नी जनरल जनरल वेंकट रमनी ने सरकार की तरफ से कि हम कोई चालाकी नहीं दिखा रहे हैं। हम आपसे बचना नहीं चाहते बल्कि जो हमारा संविधान कार्यपालिका को शक्तियां देता है तो हम उन शक्तियों को यूटिलाइज कर रहे हैं। जब सुप्रीम कोर्ट अपनी शक्तियों को यूटिलाइज कर सकता है। जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बी आर गवई अपनी शक्तियों को जो है यूटिलाइज कर सकते हैं तो क्या सरकार को हक नहीं है कि वो संविधान में नहीं तो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें। अपने शक्तियों के हिसाब से जो है कदम उठाए।

 मान लीजिए थोड़ी देर के लिए अगर यह सच भी है कि केंद्र सरकार वाकई में गवई साहब की बेंच के सामने इस केस में सुनवाई नहीं चाहती। मान लीजिए जानबूझकर के केंद्र सरकार चाल भी चल रही है। तो अगर संविधान इसकी इजाजत देता है। अगर संविधान में इस तरीके का कोई नियम है जिसका इस्तेमाल करके केंद्र सरकार किसी कदम को आगे या पीछे ले सकती है तो फिर इसमें तकलीफ क्या है? मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी भी तरीके की तकलीफ होनी चाहिए क्योंकि इस संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सब कुछ जो है केंद्र सरकार कर रही है ना कि संविधान के दायरे से बाहर जाकर के या फिर सिर्फ और सिर्फ विपक्षी एजेंडे के लिए इस तरीके के जो है तल्ख टिप्पणी करना कोर्ट में सरकार के खिलाफ में आजकल जजों के लिए कहीं ना कहीं बहुत आसान सा होता चला जा रहा है। लेकिन अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने सीजीआई गवई साहब के इस रवैया को बहुत लाइटली नहीं लिया। दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जज साहब अगर आपको फैसला सुनाना है तो आप फैसला सुना दीजिए। हम कानूनी प्रक्रिया का ही पालन कर रहे हैं। हम कार्यपालिका की शक्तियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। हम आउट ऑफ द बॉक्स जाकर के कुछ नहीं कर रहे हैं। तो कुल मिलाकर के अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो सीजीआई गवई साहब को उसी तरीके से उसी लहजे में जवाब दिया जिस तरीके से गवई साहब यह कहीं ना कहीं हिमाकत कर बैठे थे कि सरकार उनसे डर रही है। सरकार एक चाल चल रही है। सरकार जानबूझकर के उस बेंच के सामने सुनवाई नहीं करनी चाहती। इन तमाम मुद्दों पर, तमाम पहलुओं पर सरकार का दो टूक जवाब सुप्रीम कोर्ट के पटल पर गूंज उठा है।

Jai Hind



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Wednesday, November 5, 2025

अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case

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सुप्रीम कोर्ट की हवा में तकरार की गंध घुली हुई थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट 2021 की वैधता पर सुनवाई के दौरान CJI बी आर गवई ने मोदी सरकार पर चालाकी का आरोप लगाते हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकट रमणी को फटकार लगाने की कोशिश की। गवई साहब का कहना था कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है और संवैधानिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर रही है। लेकिन वेंकट रमणी ने कड़े शब्दों में पलटवार किया। उन्होंने कहा कि सरकार कोई चाल नहीं चल रही है बल्कि संवैधानिक शक्तियों का वैध प्रयोग कर रही है। कार्यपालिका की जो शक्तियां हैं उनका इस्तेमाल किया जा रहा है केंद्र सरकार की तरफ से ना कि कोई चाल चली जा रही है। यह जवाब ना सिर्फ CJI की हेकड़ी निकाल गया बल्कि उनकी सरकार विरोधी मानसिकता को भी बेनकाब कर दिया। क्या गवई साहब न्याय के बजाय विपक्ष के एजेंडे पर चल रहे हैं?

 इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म के बैकग्राउंड से लेकर के कोर्ट रूम के ड्रामा तक और  CJI गवई की जो सरकार विरोधी मानसिकता है वो अब कैसे उजागर हो चुकी है उसको भी हम समझेंगे। ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट 2021 भारत सरकार का एकत्वाकांक्षी कदम था। जिसका उद्देश्य देश के ट्रिब्यूनल सिस्टम को मजबूत, कुशल और पारदर्शी बनाना था। पहले विभिन्न कानूनों के तहत बने ट्रिब्यूनल्स जैसे कि इनकम टैक्स अपीलमैन ट्रिब्यूनल यानी कि आईटीएटी, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी कि सीएटी, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी कि एनजीटी और आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल यानी कि एएफटी में भारी देरी, भ्रष्टाचार और ओवरलैपिंग जुरिसडिक्शन की समस्या थी। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद आरसी गोपाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में ट्रिब्यूनल्स की स्थिति पर चिंता जताई थी। कहते हुए कि ट्रिब्यूनल्स को मजबूत बनाना जरूरी है लेकिन बिना स्वतंत्रता के नहीं। अब मोदी की सरकार ने इसी को आधार बना करके साल 2021 में ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट लेकर के आए। यह एक्ट संसद में साल 2021 में पारित किया गया। लेकिन विपक्ष यानी कि कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने इसे न्यायपालिका पर हमला बता करके सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा कि एक्ट संविधान की धारा 323 ए और 323 बी का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। क्योंकि यह ट्रिब्यूनल्स 

की स्वतंत्रता को छीनता है।

सुनवाई साल 2022 से लगातार इस मामले में चल रही है। लेकिन साल 2025 में अब नया मोड़ तब आ गया जब सरकार ने एक्ट में मामूली संशोधन का प्रस्ताव रख दिया। ट्रिब्यूनल बेंचों की संख्या बढ़ाने और डिजिटल हियरिंग को अनिवार्य करने का दरअसल यही वो पॉइंट था जिस पर CJI गवई की हेकड़ी सामने आई है। 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच यानी कि CJI गवई के नेतृत्व में इस मामले में सुनवाई हो रही थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट पर सुनवाई चल रही थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया हुआ है कि इस एक्ट से कार्यपालिका का वर्चस्व बढ़ेगा। यानी कि CJI ऐसा लग रहा है कि कार्यपालिका का अगर वर्चस्व बढ़ेगा तो फिर ये सरकार के हित में होगा। सरकार के हित में होगा तो सत्ता पर काबिज कौन है? ये बहुत सारे सवाल उनके दिमाग में चल रहे होंगे।

अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने बचाव में कहा कि यह सुधार है। हस्तक्षेप नहीं। एससी में सीजीआई का प्रतिनिधित्व दरअसल सुनिश्चित करता है। लेकिन CJI गवई ने बीच में टोकते हुए कहा कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है। आप चाल चल रहे हैं। यानी मोदी सरकार चाल चल रही है। संशोधन का प्रस्ताव रखकर के सुनवाई को आप टलवाना चाहते हैं। यह संवैधानिक प्रक्रिया का अपमान है। दोस्तों, यह सुनते ही अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने बिना हिले जवाब दिया।सरकार कोई भी चाल नहीं चल रही है। हम संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। कार्यपालिका की जो शक्तियां अनुच्छेद 53 और अनुच्छेद 73 के तहत हैं विधाई सुधार और प्रशासनिक दक्षता को लेकर के उनका वैध इस्तेमाल कर रही है मोदी सरकार ना कि कोई चाल चल रही है। अगर कोर्ट को लगता है कि यह गलत है तो फिर फैसला सुनाए लेकिन आरोप ना लगाए। यह जवाब इतना कड़ा था कि कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।CJI गवई ने कुछ देर चुप रहने के बाद में कहा कि हम देखेंगे लेकिन उनकी आवाज में पहले जैसी धाक नहीं थी सुनवाई अब 20 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है। यानी कि सीजीआई गवई सरकार पर हावी होना चाहते थे। वेंकट रमणी ने सारी हेकड़ी निकाल दी। सीजीआई गवाई की हरकत उनकी सरकार विरोधी मानसिकता का साफ प्रमाण है। एक तरफ से वह खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के हर सुधार का हमला कर देते हैं। तीखी आलोचना का पहली बिंदु यह है कि तथ्यों की अनदेखी की गई। ट्रिब्यूनल एक्ट से पेंडिंग केस 25% कम हुए हैं। एनजेडीजी डाटा के मुताबिक साल साल 2024 की बात कर रहा हूं। नियुक्तियां 40% तेज हुई है। फिर भी गवई साहब चालाकी का आरोप लगाते हैं। यह निष्पक्षता कहां की है? दूसरा चयनात्मक आलोचना का मुद्दा यह है कि जब कांग्रेस सरकार के समय 2004 और 14 की बात कर रहा हूं। ट्रिब्यूनल्स में भ्रष्टाचार चरम पर था तब कोर्ट चुप क्यों बैठा था? लेकिन मोदी के सुधारों पर हमला क्यों? तीसरा उनकी हेकड़ी का जो इतिहास है मई 2025 में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बनने के बाद से गब ने इलेक्टोरल बॉन्ड सीएए और अब ट्रिब्यूनल पर सरकार को घेरने की जो कोशिश की क्या यह संयोग है कि हर बार विपक्ष को फायदा होता है? चौथा जो मेन बिंदु है वो यह है कि कोर्ट रूम में अटॉर्नी जनरल को फटकारना यह सर्वोच्च पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। सीजीआई गवई साहब अगर आपको सुधार पसंद नहीं है तो आप फैसला दे दीजिए ना कि राजनैतिक भाषण बाजी की क्या जरूरत है? यह मानसिकता विपक्षी है। जो विपक्षी जो एजेंडा है उससे यह प्रेरित लगती है मानसिकता। राहुल गांधी ने तुरंत ट्वीट किया। सीजीआई साहब सही कह रहे हैं। क्या गवाई साहब अनजाने में कांग्रेस पार्टी की बी टीम बन चुके हैं? मोदी सरकार ने कभी पीछे नहीं हटना सीखा। अटर्नी जनरल वेंकट रमनी का जवाब एक मिसाल के तौर पर याद रखा जाएगा। संवैधानिक शक्तियों का हवाला देकर के उन्होंने सीजीआई को पाठ पढ़ाने वाली कोशिश को धूल चटा दी। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बाद में कहा कि सरकार सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी। पूर्वाग्रह ना दिखाएं। यह स्टैंड साफ करता है कि कार्यपालिका अपनी भूमिका निभाएगी लेकिन टकराव नहीं करना चाहती। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म से देश को फायदा हो रहा है। साल 2025 में 1 लाख से ज्यादा केस तेजी से निपटे हैं। सरकार का संदेश साफ है कि सुधार रुकेंगे नहीं। चाहे सीजीआई की हेकड़ी ही क्यों ना फूटे। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म केस ने साबित कर दिया है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई की सरकार विरोधी मानसिकता न्यायपालिका को कमजोर करने की कवायद में कदम है। अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी का दो टूक जवाब उनकी हेकड़ी निकाल देने वाला था।

अब समय है कि गवई साहब तथ्यों पर चलें। एजेंडा चलाने की जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट में। और जैसा कि लगातार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई को लेकर के बार-बार एक नैरेटिव चल रहा था इस देश में। लोगों की तमाम जो भावनाएं थी वो निकल निकल कर के सामने आ रही थी कि कैसे बीआर गवई साहब एक मोदी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। एक योगी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। लगा था कि रिटायरमेंट के टाइम पर कम से कम सीजीआई गवई साहब चुप्पी साध करके बैठेंगे। कम से कम वो न्यूट्रल होकर के जो है सरकार से भिड़ने की कोशिश नहीं करेंगे। इधर-उधर की बात ना करते हुए सिर्फ और सिर्फ केस पर टिके रहेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि जब रिटायरमेंट में कुछ एक हफ्ते ही बचे हैं। जब सीजीआई गवई का कार्यकाल पूरा होने वाला है तो इस दौर में अब गवई साहब का यह स्टेटमेंट गवई साहब का अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी को फटकार लगाना यह दिखाता है कि रिटायरमेंट के वक्त भी सीजीआई गवई साहब लाइमलाइट बटोरना चाहते हैं। जो मोदी योगी विरोधी मानसिकता जो उनकी है वह कहीं ना कहीं दिखा के जाना चाहते हैं। लेकिन सरकार की तरफ से जो अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो दो टूक जवाब दिया है गवई साहब को उस जवाब से सुप्रीम कोर्ट के पटल पर सन्नाटा छा गया था। उसके जवाब में बीआर गवई साहब को जल्द से जल्द जवाब तक नहीं आया। काफी देर तक कोर्ट रूम में शांति बनी रही। उसके बाद में गवई साहब कहते हैं कि हम देखेंगे और अटॉर्नी जनरल वेंकट रमली ने यह कह दिया है कि अगर आपको कोई भी दिक्कत है तो आप सीधे फैसला सुना दीजिए। आप भले ही हमारे अगेंस्ट में फैसला सुना करके आइए। हम कानूनी प्रक्रिया का पालन करेंगे। जो कार्यपालिका की शक्तियां संविधान में निहित हैं, हम उनका पालन करेंगे। आप उन्हें रोक नहीं सकते। गवई साहब की यह हिमाकत कैसे हो गई यह कहने की कि मौजूदा केंद्र सरकार उनकी बेंच के सामने सुनवाई ना हो इस बाबत बचना चाहती है। वो जानबूझकर के इस केस को टालना चाहती है ताकि गवई साहब की बेंच के सामने इस केस की सुनवाई ना हो पाए। तो इसका दो टूक जवाब दिया है अटॉर्नी जनरल जनरल वेंकट रमनी ने सरकार की तरफ से कि हम कोई चालाकी नहीं दिखा रहे हैं। हम आपसे बचना नहीं चाहते बल्कि जो हमारा संविधान कार्यपालिका को शक्तियां देता है तो हम उन शक्तियों को यूटिलाइज कर रहे हैं। जब सुप्रीम कोर्ट अपनी शक्तियों को यूटिलाइज कर सकता है। जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बी आर गवई अपनी शक्तियों को जो है यूटिलाइज कर सकते हैं तो क्या सरकार को हक नहीं है कि वो संविधान में नहीं तो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें। अपने शक्तियों के हिसाब से जो है कदम उठाए।

 मान लीजिए थोड़ी देर के लिए अगर यह सच भी है कि केंद्र सरकार वाकई में गवई साहब की बेंच के सामने इस केस में सुनवाई नहीं चाहती। मान लीजिए जानबूझकर के केंद्र सरकार चाल भी चल रही है। तो अगर संविधान इसकी इजाजत देता है। अगर संविधान में इस तरीके का कोई नियम है जिसका इस्तेमाल करके केंद्र सरकार किसी कदम को आगे या पीछे ले सकती है तो फिर इसमें तकलीफ क्या है? मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी भी तरीके की तकलीफ होनी चाहिए क्योंकि इस संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सब कुछ जो है केंद्र सरकार कर रही है ना कि संविधान के दायरे से बाहर जाकर के या फिर सिर्फ और सिर्फ विपक्षी एजेंडे के लिए इस तरीके के जो है तल्ख टिप्पणी करना कोर्ट में सरकार के खिलाफ में आजकल जजों के लिए कहीं ना कहीं बहुत आसान सा होता चला जा रहा है। लेकिन अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने सीजीआई गवई साहब के इस रवैया को बहुत लाइटली नहीं लिया। दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जज साहब अगर आपको फैसला सुनाना है तो आप फैसला सुना दीजिए। हम कानूनी प्रक्रिया का ही पालन कर रहे हैं। हम कार्यपालिका की शक्तियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। हम आउट ऑफ द बॉक्स जाकर के कुछ नहीं कर रहे हैं। तो कुल मिलाकर के अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो सीजीआई गवई साहब को उसी तरीके से उसी लहजे में जवाब दिया जिस तरीके से गवई साहब यह कहीं ना कहीं हिमाकत कर बैठे थे कि सरकार उनसे डर रही है। सरकार एक चाल चल रही है। सरकार जानबूझकर के उस बेंच के सामने सुनवाई नहीं करनी चाहती। इन तमाम मुद्दों पर, तमाम पहलुओं पर सरकार का दो टूक जवाब सुप्रीम कोर्ट के पटल पर गूंज उठा है।

Jai Hind



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अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case

अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case
अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case

 


सुप्रीम कोर्ट की हवा में तकरार की गंध घुली हुई थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट 2021 की वैधता पर सुनवाई के दौरान CJI बी आर गवई ने मोदी सरकार पर चालाकी का आरोप लगाते हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकट रमणी को फटकार लगाने की कोशिश की। गवई साहब का कहना था कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है और संवैधानिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर रही है। लेकिन वेंकट रमणी ने कड़े शब्दों में पलटवार किया। उन्होंने कहा कि सरकार कोई चाल नहीं चल रही है बल्कि संवैधानिक शक्तियों का वैध प्रयोग कर रही है। कार्यपालिका की जो शक्तियां हैं उनका इस्तेमाल किया जा रहा है केंद्र सरकार की तरफ से ना कि कोई चाल चली जा रही है। यह जवाब ना सिर्फ CJI की हेकड़ी निकाल गया बल्कि उनकी सरकार विरोधी मानसिकता को भी बेनकाब कर दिया। क्या गवई साहब न्याय के बजाय विपक्ष के एजेंडे पर चल रहे हैं?

 इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म के बैकग्राउंड से लेकर के कोर्ट रूम के ड्रामा तक और  CJI गवई की जो सरकार विरोधी मानसिकता है वो अब कैसे उजागर हो चुकी है उसको भी हम समझेंगे। ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट 2021 भारत सरकार का एकत्वाकांक्षी कदम था। जिसका उद्देश्य देश के ट्रिब्यूनल सिस्टम को मजबूत, कुशल और पारदर्शी बनाना था। पहले विभिन्न कानूनों के तहत बने ट्रिब्यूनल्स जैसे कि इनकम टैक्स अपीलमैन ट्रिब्यूनल यानी कि आईटीएटी, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी कि सीएटी, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी कि एनजीटी और आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल यानी कि एएफटी में भारी देरी, भ्रष्टाचार और ओवरलैपिंग जुरिसडिक्शन की समस्या थी। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद आरसी गोपाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में ट्रिब्यूनल्स की स्थिति पर चिंता जताई थी। कहते हुए कि ट्रिब्यूनल्स को मजबूत बनाना जरूरी है लेकिन बिना स्वतंत्रता के नहीं। अब मोदी की सरकार ने इसी को आधार बना करके साल 2021 में ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट लेकर के आए। यह एक्ट संसद में साल 2021 में पारित किया गया। लेकिन विपक्ष यानी कि कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने इसे न्यायपालिका पर हमला बता करके सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा कि एक्ट संविधान की धारा 323 ए और 323 बी का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। क्योंकि यह ट्रिब्यूनल्स 

की स्वतंत्रता को छीनता है।

सुनवाई साल 2022 से लगातार इस मामले में चल रही है। लेकिन साल 2025 में अब नया मोड़ तब आ गया जब सरकार ने एक्ट में मामूली संशोधन का प्रस्ताव रख दिया। ट्रिब्यूनल बेंचों की संख्या बढ़ाने और डिजिटल हियरिंग को अनिवार्य करने का दरअसल यही वो पॉइंट था जिस पर CJI गवई की हेकड़ी सामने आई है। 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच यानी कि CJI गवई के नेतृत्व में इस मामले में सुनवाई हो रही थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट पर सुनवाई चल रही थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया हुआ है कि इस एक्ट से कार्यपालिका का वर्चस्व बढ़ेगा। यानी कि CJI ऐसा लग रहा है कि कार्यपालिका का अगर वर्चस्व बढ़ेगा तो फिर ये सरकार के हित में होगा। सरकार के हित में होगा तो सत्ता पर काबिज कौन है? ये बहुत सारे सवाल उनके दिमाग में चल रहे होंगे।

अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने बचाव में कहा कि यह सुधार है। हस्तक्षेप नहीं। एससी में सीजीआई का प्रतिनिधित्व दरअसल सुनिश्चित करता है। लेकिन CJI गवई ने बीच में टोकते हुए कहा कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है। आप चाल चल रहे हैं। यानी मोदी सरकार चाल चल रही है। संशोधन का प्रस्ताव रखकर के सुनवाई को आप टलवाना चाहते हैं। यह संवैधानिक प्रक्रिया का अपमान है। दोस्तों, यह सुनते ही अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने बिना हिले जवाब दिया।सरकार कोई भी चाल नहीं चल रही है। हम संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। कार्यपालिका की जो शक्तियां अनुच्छेद 53 और अनुच्छेद 73 के तहत हैं विधाई सुधार और प्रशासनिक दक्षता को लेकर के उनका वैध इस्तेमाल कर रही है मोदी सरकार ना कि कोई चाल चल रही है। अगर कोर्ट को लगता है कि यह गलत है तो फिर फैसला सुनाए लेकिन आरोप ना लगाए। यह जवाब इतना कड़ा था कि कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।CJI गवई ने कुछ देर चुप रहने के बाद में कहा कि हम देखेंगे लेकिन उनकी आवाज में पहले जैसी धाक नहीं थी सुनवाई अब 20 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है। यानी कि सीजीआई गवई सरकार पर हावी होना चाहते थे। वेंकट रमणी ने सारी हेकड़ी निकाल दी। सीजीआई गवाई की हरकत उनकी सरकार विरोधी मानसिकता का साफ प्रमाण है। एक तरफ से वह खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के हर सुधार का हमला कर देते हैं। तीखी आलोचना का पहली बिंदु यह है कि तथ्यों की अनदेखी की गई। ट्रिब्यूनल एक्ट से पेंडिंग केस 25% कम हुए हैं। एनजेडीजी डाटा के मुताबिक साल साल 2024 की बात कर रहा हूं। नियुक्तियां 40% तेज हुई है। फिर भी गवई साहब चालाकी का आरोप लगाते हैं। यह निष्पक्षता कहां की है? दूसरा चयनात्मक आलोचना का मुद्दा यह है कि जब कांग्रेस सरकार के समय 2004 और 14 की बात कर रहा हूं। ट्रिब्यूनल्स में भ्रष्टाचार चरम पर था तब कोर्ट चुप क्यों बैठा था? लेकिन मोदी के सुधारों पर हमला क्यों? तीसरा उनकी हेकड़ी का जो इतिहास है मई 2025 में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बनने के बाद से गब ने इलेक्टोरल बॉन्ड सीएए और अब ट्रिब्यूनल पर सरकार को घेरने की जो कोशिश की क्या यह संयोग है कि हर बार विपक्ष को फायदा होता है? चौथा जो मेन बिंदु है वो यह है कि कोर्ट रूम में अटॉर्नी जनरल को फटकारना यह सर्वोच्च पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। सीजीआई गवई साहब अगर आपको सुधार पसंद नहीं है तो आप फैसला दे दीजिए ना कि राजनैतिक भाषण बाजी की क्या जरूरत है? यह मानसिकता विपक्षी है। जो विपक्षी जो एजेंडा है उससे यह प्रेरित लगती है मानसिकता। राहुल गांधी ने तुरंत ट्वीट किया। सीजीआई साहब सही कह रहे हैं। क्या गवाई साहब अनजाने में कांग्रेस पार्टी की बी टीम बन चुके हैं? मोदी सरकार ने कभी पीछे नहीं हटना सीखा। अटर्नी जनरल वेंकट रमनी का जवाब एक मिसाल के तौर पर याद रखा जाएगा। संवैधानिक शक्तियों का हवाला देकर के उन्होंने सीजीआई को पाठ पढ़ाने वाली कोशिश को धूल चटा दी। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बाद में कहा कि सरकार सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी। पूर्वाग्रह ना दिखाएं। यह स्टैंड साफ करता है कि कार्यपालिका अपनी भूमिका निभाएगी लेकिन टकराव नहीं करना चाहती। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म से देश को फायदा हो रहा है। साल 2025 में 1 लाख से ज्यादा केस तेजी से निपटे हैं। सरकार का संदेश साफ है कि सुधार रुकेंगे नहीं। चाहे सीजीआई की हेकड़ी ही क्यों ना फूटे। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म केस ने साबित कर दिया है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई की सरकार विरोधी मानसिकता न्यायपालिका को कमजोर करने की कवायद में कदम है। अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी का दो टूक जवाब उनकी हेकड़ी निकाल देने वाला था।

अब समय है कि गवई साहब तथ्यों पर चलें। एजेंडा चलाने की जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट में। और जैसा कि लगातार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई को लेकर के बार-बार एक नैरेटिव चल रहा था इस देश में। लोगों की तमाम जो भावनाएं थी वो निकल निकल कर के सामने आ रही थी कि कैसे बीआर गवई साहब एक मोदी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। एक योगी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। लगा था कि रिटायरमेंट के टाइम पर कम से कम सीजीआई गवई साहब चुप्पी साध करके बैठेंगे। कम से कम वो न्यूट्रल होकर के जो है सरकार से भिड़ने की कोशिश नहीं करेंगे। इधर-उधर की बात ना करते हुए सिर्फ और सिर्फ केस पर टिके रहेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि जब रिटायरमेंट में कुछ एक हफ्ते ही बचे हैं। जब सीजीआई गवई का कार्यकाल पूरा होने वाला है तो इस दौर में अब गवई साहब का यह स्टेटमेंट गवई साहब का अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी को फटकार लगाना यह दिखाता है कि रिटायरमेंट के वक्त भी सीजीआई गवई साहब लाइमलाइट बटोरना चाहते हैं। जो मोदी योगी विरोधी मानसिकता जो उनकी है वह कहीं ना कहीं दिखा के जाना चाहते हैं। लेकिन सरकार की तरफ से जो अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो दो टूक जवाब दिया है गवई साहब को उस जवाब से सुप्रीम कोर्ट के पटल पर सन्नाटा छा गया था। उसके जवाब में बीआर गवई साहब को जल्द से जल्द जवाब तक नहीं आया। काफी देर तक कोर्ट रूम में शांति बनी रही। उसके बाद में गवई साहब कहते हैं कि हम देखेंगे और अटॉर्नी जनरल वेंकट रमली ने यह कह दिया है कि अगर आपको कोई भी दिक्कत है तो आप सीधे फैसला सुना दीजिए। आप भले ही हमारे अगेंस्ट में फैसला सुना करके आइए। हम कानूनी प्रक्रिया का पालन करेंगे। जो कार्यपालिका की शक्तियां संविधान में निहित हैं, हम उनका पालन करेंगे। आप उन्हें रोक नहीं सकते। गवई साहब की यह हिमाकत कैसे हो गई यह कहने की कि मौजूदा केंद्र सरकार उनकी बेंच के सामने सुनवाई ना हो इस बाबत बचना चाहती है। वो जानबूझकर के इस केस को टालना चाहती है ताकि गवई साहब की बेंच के सामने इस केस की सुनवाई ना हो पाए। तो इसका दो टूक जवाब दिया है अटॉर्नी जनरल जनरल वेंकट रमनी ने सरकार की तरफ से कि हम कोई चालाकी नहीं दिखा रहे हैं। हम आपसे बचना नहीं चाहते बल्कि जो हमारा संविधान कार्यपालिका को शक्तियां देता है तो हम उन शक्तियों को यूटिलाइज कर रहे हैं। जब सुप्रीम कोर्ट अपनी शक्तियों को यूटिलाइज कर सकता है। जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बी आर गवई अपनी शक्तियों को जो है यूटिलाइज कर सकते हैं तो क्या सरकार को हक नहीं है कि वो संविधान में नहीं तो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें। अपने शक्तियों के हिसाब से जो है कदम उठाए।

 मान लीजिए थोड़ी देर के लिए अगर यह सच भी है कि केंद्र सरकार वाकई में गवई साहब की बेंच के सामने इस केस में सुनवाई नहीं चाहती। मान लीजिए जानबूझकर के केंद्र सरकार चाल भी चल रही है। तो अगर संविधान इसकी इजाजत देता है। अगर संविधान में इस तरीके का कोई नियम है जिसका इस्तेमाल करके केंद्र सरकार किसी कदम को आगे या पीछे ले सकती है तो फिर इसमें तकलीफ क्या है? मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी भी तरीके की तकलीफ होनी चाहिए क्योंकि इस संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सब कुछ जो है केंद्र सरकार कर रही है ना कि संविधान के दायरे से बाहर जाकर के या फिर सिर्फ और सिर्फ विपक्षी एजेंडे के लिए इस तरीके के जो है तल्ख टिप्पणी करना कोर्ट में सरकार के खिलाफ में आजकल जजों के लिए कहीं ना कहीं बहुत आसान सा होता चला जा रहा है। लेकिन अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने सीजीआई गवई साहब के इस रवैया को बहुत लाइटली नहीं लिया। दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जज साहब अगर आपको फैसला सुनाना है तो आप फैसला सुना दीजिए। हम कानूनी प्रक्रिया का ही पालन कर रहे हैं। हम कार्यपालिका की शक्तियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। हम आउट ऑफ द बॉक्स जाकर के कुछ नहीं कर रहे हैं। तो कुल मिलाकर के अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो सीजीआई गवई साहब को उसी तरीके से उसी लहजे में जवाब दिया जिस तरीके से गवई साहब यह कहीं ना कहीं हिमाकत कर बैठे थे कि सरकार उनसे डर रही है। सरकार एक चाल चल रही है। सरकार जानबूझकर के उस बेंच के सामने सुनवाई नहीं करनी चाहती। इन तमाम मुद्दों पर, तमाम पहलुओं पर सरकार का दो टूक जवाब सुप्रीम कोर्ट के पटल पर गूंज उठा है।

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अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने CJI गवई का कड़े शब्दों में पलटवार किया-Tribunal Reform Case

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सुप्रीम कोर्ट की हवा में तकरार की गंध घुली हुई थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट 2021 की वैधता पर सुनवाई के दौरान CJI बी आर गवई ने मोदी सरकार पर चालाकी का आरोप लगाते हुए अटॉर्नी जनरल आर वेंकट रमणी को फटकार लगाने की कोशिश की। गवई साहब का कहना था कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है और संवैधानिक प्रक्रियाओं का दुरुपयोग कर रही है। लेकिन वेंकट रमणी ने कड़े शब्दों में पलटवार किया। उन्होंने कहा कि सरकार कोई चाल नहीं चल रही है बल्कि संवैधानिक शक्तियों का वैध प्रयोग कर रही है। कार्यपालिका की जो शक्तियां हैं उनका इस्तेमाल किया जा रहा है केंद्र सरकार की तरफ से ना कि कोई चाल चली जा रही है। यह जवाब ना सिर्फ CJI की हेकड़ी निकाल गया बल्कि उनकी सरकार विरोधी मानसिकता को भी बेनकाब कर दिया। क्या गवई साहब न्याय के बजाय विपक्ष के एजेंडे पर चल रहे हैं?

 इस पूरे मामले को विस्तार से समझते हैं। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म के बैकग्राउंड से लेकर के कोर्ट रूम के ड्रामा तक और  CJI गवई की जो सरकार विरोधी मानसिकता है वो अब कैसे उजागर हो चुकी है उसको भी हम समझेंगे। ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट 2021 भारत सरकार का एकत्वाकांक्षी कदम था। जिसका उद्देश्य देश के ट्रिब्यूनल सिस्टम को मजबूत, कुशल और पारदर्शी बनाना था। पहले विभिन्न कानूनों के तहत बने ट्रिब्यूनल्स जैसे कि इनकम टैक्स अपीलमैन ट्रिब्यूनल यानी कि आईटीएटी, सेंट्रल एडमिनिस्ट्रेटिव ट्रिब्यूनल यानी कि सीएटी, नेशनल ग्रीन ट्रिब्यूनल यानी कि एनजीटी और आर्म्ड फोर्सेस ट्रिब्यूनल यानी कि एएफटी में भारी देरी, भ्रष्टाचार और ओवरलैपिंग जुरिसडिक्शन की समस्या थी। साल 2019 में सुप्रीम कोर्ट ने खुद आरसी गोपाल बनाम यूनियन ऑफ इंडिया केस में ट्रिब्यूनल्स की स्थिति पर चिंता जताई थी। कहते हुए कि ट्रिब्यूनल्स को मजबूत बनाना जरूरी है लेकिन बिना स्वतंत्रता के नहीं। अब मोदी की सरकार ने इसी को आधार बना करके साल 2021 में ट्रिब्यूनल्स रिफॉर्म एक्ट लेकर के आए। यह एक्ट संसद में साल 2021 में पारित किया गया। लेकिन विपक्ष यानी कि कांग्रेस पार्टी और तृणमूल कांग्रेस ने इसे न्यायपालिका पर हमला बता करके सुप्रीम कोर्ट में चैलेंज कर दिया। याचिकाकर्ताओं का दावा कि एक्ट संविधान की धारा 323 ए और 323 बी का सीधे तौर पर उल्लंघन करता है। क्योंकि यह ट्रिब्यूनल्स 

की स्वतंत्रता को छीनता है।

सुनवाई साल 2022 से लगातार इस मामले में चल रही है। लेकिन साल 2025 में अब नया मोड़ तब आ गया जब सरकार ने एक्ट में मामूली संशोधन का प्रस्ताव रख दिया। ट्रिब्यूनल बेंचों की संख्या बढ़ाने और डिजिटल हियरिंग को अनिवार्य करने का दरअसल यही वो पॉइंट था जिस पर CJI गवई की हेकड़ी सामने आई है। 5 नवंबर को सुप्रीम कोर्ट की कॉन्स्टिट्यूशन बेंच यानी कि CJI गवई के नेतृत्व में इस मामले में सुनवाई हो रही थी। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म एक्ट पर सुनवाई चल रही थी। याचिकाकर्ताओं ने तर्क दिया हुआ है कि इस एक्ट से कार्यपालिका का वर्चस्व बढ़ेगा। यानी कि CJI ऐसा लग रहा है कि कार्यपालिका का अगर वर्चस्व बढ़ेगा तो फिर ये सरकार के हित में होगा। सरकार के हित में होगा तो सत्ता पर काबिज कौन है? ये बहुत सारे सवाल उनके दिमाग में चल रहे होंगे।

अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने बचाव में कहा कि यह सुधार है। हस्तक्षेप नहीं। एससी में सीजीआई का प्रतिनिधित्व दरअसल सुनिश्चित करता है। लेकिन CJI गवई ने बीच में टोकते हुए कहा कि सरकार इस बेंच से बचना चाहती है। आप चाल चल रहे हैं। यानी मोदी सरकार चाल चल रही है। संशोधन का प्रस्ताव रखकर के सुनवाई को आप टलवाना चाहते हैं। यह संवैधानिक प्रक्रिया का अपमान है। दोस्तों, यह सुनते ही अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी ने बिना हिले जवाब दिया।सरकार कोई भी चाल नहीं चल रही है। हम संवैधानिक शक्तियों का प्रयोग कर रहे हैं। कार्यपालिका की जो शक्तियां अनुच्छेद 53 और अनुच्छेद 73 के तहत हैं विधाई सुधार और प्रशासनिक दक्षता को लेकर के उनका वैध इस्तेमाल कर रही है मोदी सरकार ना कि कोई चाल चल रही है। अगर कोर्ट को लगता है कि यह गलत है तो फिर फैसला सुनाए लेकिन आरोप ना लगाए। यह जवाब इतना कड़ा था कि कोर्ट रूम में सन्नाटा छा गया।CJI गवई ने कुछ देर चुप रहने के बाद में कहा कि हम देखेंगे लेकिन उनकी आवाज में पहले जैसी धाक नहीं थी सुनवाई अब 20 नवंबर तक के लिए स्थगित कर दी गई है। यानी कि सीजीआई गवई सरकार पर हावी होना चाहते थे। वेंकट रमणी ने सारी हेकड़ी निकाल दी। सीजीआई गवाई की हरकत उनकी सरकार विरोधी मानसिकता का साफ प्रमाण है। एक तरफ से वह खुद को लोकतंत्र का रक्षक बताते हैं तो दूसरी तरफ मोदी सरकार के हर सुधार का हमला कर देते हैं। तीखी आलोचना का पहली बिंदु यह है कि तथ्यों की अनदेखी की गई। ट्रिब्यूनल एक्ट से पेंडिंग केस 25% कम हुए हैं। एनजेडीजी डाटा के मुताबिक साल साल 2024 की बात कर रहा हूं। नियुक्तियां 40% तेज हुई है। फिर भी गवई साहब चालाकी का आरोप लगाते हैं। यह निष्पक्षता कहां की है? दूसरा चयनात्मक आलोचना का मुद्दा यह है कि जब कांग्रेस सरकार के समय 2004 और 14 की बात कर रहा हूं। ट्रिब्यूनल्स में भ्रष्टाचार चरम पर था तब कोर्ट चुप क्यों बैठा था? लेकिन मोदी के सुधारों पर हमला क्यों? तीसरा उनकी हेकड़ी का जो इतिहास है मई 2025 में चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बनने के बाद से गब ने इलेक्टोरल बॉन्ड सीएए और अब ट्रिब्यूनल पर सरकार को घेरने की जो कोशिश की क्या यह संयोग है कि हर बार विपक्ष को फायदा होता है? चौथा जो मेन बिंदु है वो यह है कि कोर्ट रूम में अटॉर्नी जनरल को फटकारना यह सर्वोच्च पद की गरिमा को ठेस पहुंचाता है। सीजीआई गवई साहब अगर आपको सुधार पसंद नहीं है तो आप फैसला दे दीजिए ना कि राजनैतिक भाषण बाजी की क्या जरूरत है? यह मानसिकता विपक्षी है। जो विपक्षी जो एजेंडा है उससे यह प्रेरित लगती है मानसिकता। राहुल गांधी ने तुरंत ट्वीट किया। सीजीआई साहब सही कह रहे हैं। क्या गवाई साहब अनजाने में कांग्रेस पार्टी की बी टीम बन चुके हैं? मोदी सरकार ने कभी पीछे नहीं हटना सीखा। अटर्नी जनरल वेंकट रमनी का जवाब एक मिसाल के तौर पर याद रखा जाएगा। संवैधानिक शक्तियों का हवाला देकर के उन्होंने सीजीआई को पाठ पढ़ाने वाली कोशिश को धूल चटा दी। कानून मंत्री अर्जुन राम मेघवाल ने बाद में कहा कि सरकार सुधारों के लिए प्रतिबद्ध है। लेकिन कोर्ट के फैसले का सम्मान करेगी। पूर्वाग्रह ना दिखाएं। यह स्टैंड साफ करता है कि कार्यपालिका अपनी भूमिका निभाएगी लेकिन टकराव नहीं करना चाहती। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म से देश को फायदा हो रहा है। साल 2025 में 1 लाख से ज्यादा केस तेजी से निपटे हैं। सरकार का संदेश साफ है कि सुधार रुकेंगे नहीं। चाहे सीजीआई की हेकड़ी ही क्यों ना फूटे। ट्रिब्यूनल रिफॉर्म केस ने साबित कर दिया है कि चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई की सरकार विरोधी मानसिकता न्यायपालिका को कमजोर करने की कवायद में कदम है। अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी का दो टूक जवाब उनकी हेकड़ी निकाल देने वाला था।

अब समय है कि गवई साहब तथ्यों पर चलें। एजेंडा चलाने की जरूरत नहीं है सुप्रीम कोर्ट में। और जैसा कि लगातार चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बीआर गवई को लेकर के बार-बार एक नैरेटिव चल रहा था इस देश में। लोगों की तमाम जो भावनाएं थी वो निकल निकल कर के सामने आ रही थी कि कैसे बीआर गवई साहब एक मोदी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। एक योगी विरोधी सीजीआई बनकर के उभरे हैं। लगा था कि रिटायरमेंट के टाइम पर कम से कम सीजीआई गवई साहब चुप्पी साध करके बैठेंगे। कम से कम वो न्यूट्रल होकर के जो है सरकार से भिड़ने की कोशिश नहीं करेंगे। इधर-उधर की बात ना करते हुए सिर्फ और सिर्फ केस पर टिके रहेंगे। लेकिन ऐसा लगता है कि जब रिटायरमेंट में कुछ एक हफ्ते ही बचे हैं। जब सीजीआई गवई का कार्यकाल पूरा होने वाला है तो इस दौर में अब गवई साहब का यह स्टेटमेंट गवई साहब का अटॉर्नी जनरल वेंकट रमणी को फटकार लगाना यह दिखाता है कि रिटायरमेंट के वक्त भी सीजीआई गवई साहब लाइमलाइट बटोरना चाहते हैं। जो मोदी योगी विरोधी मानसिकता जो उनकी है वह कहीं ना कहीं दिखा के जाना चाहते हैं। लेकिन सरकार की तरफ से जो अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो दो टूक जवाब दिया है गवई साहब को उस जवाब से सुप्रीम कोर्ट के पटल पर सन्नाटा छा गया था। उसके जवाब में बीआर गवई साहब को जल्द से जल्द जवाब तक नहीं आया। काफी देर तक कोर्ट रूम में शांति बनी रही। उसके बाद में गवई साहब कहते हैं कि हम देखेंगे और अटॉर्नी जनरल वेंकट रमली ने यह कह दिया है कि अगर आपको कोई भी दिक्कत है तो आप सीधे फैसला सुना दीजिए। आप भले ही हमारे अगेंस्ट में फैसला सुना करके आइए। हम कानूनी प्रक्रिया का पालन करेंगे। जो कार्यपालिका की शक्तियां संविधान में निहित हैं, हम उनका पालन करेंगे। आप उन्हें रोक नहीं सकते। गवई साहब की यह हिमाकत कैसे हो गई यह कहने की कि मौजूदा केंद्र सरकार उनकी बेंच के सामने सुनवाई ना हो इस बाबत बचना चाहती है। वो जानबूझकर के इस केस को टालना चाहती है ताकि गवई साहब की बेंच के सामने इस केस की सुनवाई ना हो पाए। तो इसका दो टूक जवाब दिया है अटॉर्नी जनरल जनरल वेंकट रमनी ने सरकार की तरफ से कि हम कोई चालाकी नहीं दिखा रहे हैं। हम आपसे बचना नहीं चाहते बल्कि जो हमारा संविधान कार्यपालिका को शक्तियां देता है तो हम उन शक्तियों को यूटिलाइज कर रहे हैं। जब सुप्रीम कोर्ट अपनी शक्तियों को यूटिलाइज कर सकता है। जब चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया बी आर गवई अपनी शक्तियों को जो है यूटिलाइज कर सकते हैं तो क्या सरकार को हक नहीं है कि वो संविधान में नहीं तो अपनी शक्तियों का इस्तेमाल करें। अपने शक्तियों के हिसाब से जो है कदम उठाए।

 मान लीजिए थोड़ी देर के लिए अगर यह सच भी है कि केंद्र सरकार वाकई में गवई साहब की बेंच के सामने इस केस में सुनवाई नहीं चाहती। मान लीजिए जानबूझकर के केंद्र सरकार चाल भी चल रही है। तो अगर संविधान इसकी इजाजत देता है। अगर संविधान में इस तरीके का कोई नियम है जिसका इस्तेमाल करके केंद्र सरकार किसी कदम को आगे या पीछे ले सकती है तो फिर इसमें तकलीफ क्या है? मुझे नहीं लगता कि इसमें किसी भी तरीके की तकलीफ होनी चाहिए क्योंकि इस संवैधानिक प्रक्रिया के तहत सब कुछ जो है केंद्र सरकार कर रही है ना कि संविधान के दायरे से बाहर जाकर के या फिर सिर्फ और सिर्फ विपक्षी एजेंडे के लिए इस तरीके के जो है तल्ख टिप्पणी करना कोर्ट में सरकार के खिलाफ में आजकल जजों के लिए कहीं ना कहीं बहुत आसान सा होता चला जा रहा है। लेकिन अटॉर्नी जनरल वेंकट रमनी ने सीजीआई गवई साहब के इस रवैया को बहुत लाइटली नहीं लिया। दो टूक जवाब देते हुए कहा कि जज साहब अगर आपको फैसला सुनाना है तो आप फैसला सुना दीजिए। हम कानूनी प्रक्रिया का ही पालन कर रहे हैं। हम कार्यपालिका की शक्तियों का ही इस्तेमाल कर रहे हैं। हम आउट ऑफ द बॉक्स जाकर के कुछ नहीं कर रहे हैं। तो कुल मिलाकर के अटर्नी जनरल वेंकट रमनी ने जो सीजीआई गवई साहब को उसी तरीके से उसी लहजे में जवाब दिया जिस तरीके से गवई साहब यह कहीं ना कहीं हिमाकत कर बैठे थे कि सरकार उनसे डर रही है। सरकार एक चाल चल रही है। सरकार जानबूझकर के उस बेंच के सामने सुनवाई नहीं करनी चाहती। इन तमाम मुद्दों पर, तमाम पहलुओं पर सरकार का दो टूक जवाब सुप्रीम कोर्ट के पटल पर गूंज उठा है।

Jai Hind



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November 05, 2025 at 08:18PM

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