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Saturday, January 3, 2026

क्या मोहन भागवत गुजराती लॉबी के मुखिया नरेंद्र मोदी अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं?

क्या मोहन भागवत गुजराती लॉबी के मुखिया नरेंद्र मोदी अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं?
क्या मोहन भागवत गुजराती लॉबी के मुखिया नरेंद्र मोदी अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं?

 


इंदौर में जो कुछ हुआ वो तो अपने आप में शर्मनाक था ही लेकिन उसके बाद जो कुछ हो रहा है जो कुछ किया जा रहा है मध्य प्रदेश की सरकार द्वारा वो तो अपने आप में उससे भी कहीं ज्यादा शर्मनाक है। हमें चार, 10 और 15 के खेले में उलझाया जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक संजीवनी देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत लगातार भारतीय जनता पार्टी के साथ पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं। यूं कहूं कि भारतीय जनता पार्टी से पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं और इंदौर से महज 200 किलोमीटर दूर प्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंचकर मोहन भागवत कुछ इस तरह का बयान देते हैं। जिस बयान के बाद एक बार फिर से यही सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या मोहन भागवत भारतीय जनता पार्टी को चलाने वाली गुजराती लॉबी के मुखिया यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं।

क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने मोहन भागवत को भारतीय जनता पार्टी से फैसला लेने वाले एक महत्वपूर्ण नेता के पद से पूरी तरह से बेदखल कर दिया है। इससे पहले कि तमाम लोग कहे कि भाजपा से मोहन भागवत साहब का क्या लेना देना है। तो कई इतिहास है कि भारतीय जनता पार्टी से मोहन भागवत का क्या लेना देना है।लेकिन शुरुआत मोहन भागवत के उस बयान से करूंगा और ये भी बताऊंगा कि भोपाल पहुंचकर एक कार्यक्रम में शामिल होते हैं। जहां से मुख्यमंत्री आवास की दूरी कोई बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन उनकी जुबान तक नहीं खुलती। इंदौर में हुई मौतों पर लेकिन वो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और भारतीय जनता पार्टी से किनारा करते हुए नजर आते हैं।

तो सवाल ये उठ रहा है कि क्या वाकई मोहन भागवत निराश और हताश हो गए हैं या वो जानबूझकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक को और खासतौर से इस देश के करोड़ों हिंदुओं को अपने एक नए जाल में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो कह सके कि हमारी तो कोई सुन नहीं रहा। हमारी तो कुछ चलती नहीं है। तो उमा भारती का बयान जो कि उन्होंने मध्य प्रदेश के शासन और प्रशासन के लिए कल पोस्ट किया था। मैं कहूंगा कि मोहन भागवत साहब उसको भी याद कर ले कि अगर कोई आपकी सुन नहीं रहा है तो फिर आप क्यों आरएसएस के मुखिया के तौर पर देश भर में घूम घूम कर हिंदुत्व का प्रचार कर रहे हैं और हिंदुत्व के बहाने भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जिताने के लिए प्रचार कर रहे हैं। आप राष्ट्र निर्माण में लगे हुए हैं या सत्ता निर्माण में लगे हुए हैं? इन तमाम सवालों के जवाब आपको देने चाहिए। मैं तो चाहूंगा कि स्वयंसेवक ये सवाल पूछे। देश के हिंदू ये सवाल पूछे कि मोहन भागवत साहब आखिर कर क्या रहे हैं? मोहन भागवत साहब आखिर चाहते क्या हैं? और मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कैसे एक के बाद एक लोगों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं? वो भी आपके सामने बताऊंगा। लेकिन शुरुआत मोहन भागवत से करता हूं। भोपाल की धरती पर पहुंचते हैं मोहन भागवत साहब। और एक बार फिर से बोल देते हैं कि भैया भाजपा को आरएसएस कंट्रोल नहीं करता। संघ को पार्टी के यानी भारतीय जनता पार्टी के नजरिए से देखना गलत है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक पैराबिलिटी फोर्स नहीं है। जरा मैं बता दूं कि भोपाल की धरती पर पहुंचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने शुक्रवार को उसी दिन जिस दिन उमा भारती ने खुली बगावत कर दी थी भारतीय जनता पार्टी के इको सिस्टम के खिलाफ पोस्ट करके महापाप की बात करके भ्रष्टाचार या घोर दंड की बात करके उसी दिन मोहन भागवत उसी मध्य प्रदेश की धरती पर थे। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की धरती पर थे और उन्होंने कहा कि भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नजरिए से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखना समझना गलत है। सभी स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और संघ किसी को कंट्रोल नहीं करता। भाजपा को कंट्रोल नहीं करता। इस ये संदर्भ था उनका। संघ का उद्देश्य सत्ता टिकट या चुनाव नहीं बल्कि समाज की गुणवत्ता और चरित्र निर्माण है और ये कितना बढ़िया चरित्र निर्माण कर रहे हैं। उत्तराखंड के भाजपा नेता के बयान से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

भोपाल में आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में बोलते हुए भागवत ने कहा कि हम वर्दी पहनते हैं, मार्च निकालते हैं और लाठी का अभ्यास करते हैं। ऐसे में अगर कोई सोचता है कि यह एक पैरामिलिट्री फोर्स है तो यह एक गलती होगी। भागवत ने आगे कहा कि हमारा मत, पंथ संप्रदाय, भाषा और जाति अलग हो सकती है। लेकिन हिंदू पहचान हम सबको जोड़ती है। हमारी संस्कृति एक है, धर्म एक है और हमारे पूर्वज भी समान है। भागवत साहब इंदौर में जिन लोगों ने आपकी सरकार, आपके मुख्यमंत्री की लापरवाही और निकम्मेपन के कारण दूषित पानी पीकर अपनी जान गवाई है वो हिंदू ही थे। आगे देखिए मोहन भागवत ने राजनीति, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, युवाओं की दिशा, पारिवारिक जीवन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। अनुशासन की बात कही। टेरी विदेशी निर्भरता की बात कही। उन्होंने नई पीढ़ी को भारतीयता से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। फैशन, फास्ट फूड और परिवार पर चिंता जताई। संघ को समझने की जरूरत की बात कही। संघ कैसे पैदा हुआ इसको लेकर उन्होंने बात कही। समाज बदलेगा तभी देश बदले जाने की बात कही। उन्होंने प्रेशर ग्रुप नहीं संपूर्ण समाज के संगठन की बात कही और यह भी कहा कि संघ केवल स्वयंसेवक बनाता है। यानी संघ जो है वो राष्ट्र निर्माण है। लेकिन मैं तो इस सीधे कहूंगा कि संघ जो है वो सरकार के निर्माण में लगा हुआ है। सत्ता हासिल करने में लगा हुआ है। नहीं तो क्या फर्क है? क्या जरूरत पड़ती है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आपके स्वयंसेवक सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जितवाने में लगे रहते हैं। अगर संघ को सत्ता से कोई लेना देना नहीं है तो संघ के नेता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास पर जाकर क्यों बैठक करते हैं? अगर संघ को सत्ता से कुछ लेना देना नहीं है तो संघ के नेता राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के दिग्गज नेताओं के साथ क्यों बैठक करते हैं? राज्यों के स्तर पर जहां-जहां सरकारें वहां जाकर भारतीय जनता पार्टी के मुख्यंत्रियों से क्यों मिलते हैं और जहांजहां भी सरकारें नहीं है वहां भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से क्यों मिलते हैं? और फिर अखबार में इस तरह की खबरें क्यों छपवाई जाती है? छपवाई जाती है कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव को जिताने में आरएसएस ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? हरियाणा के विधानसभा चुनाव को जितवाने में आरएसएस ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार, दिल्ली इन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में पहुंचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आप मध्य प्रदेश की धरती पर पहुंचकर भी अपने ही प्रचार द्वारा बनाई गई सरकार और मुख्यमंत्री के रवैया पर कुछ नहीं बोलते। अब आप देखिए कि इंदौर में जो कुछ हुआ पत्रकार के साथ जो कुछ हुआ हंसते हुए नजर आए कैलाश विजयवर्गीय उससे आगे बढ़कर क्या कर दिया उन्होंने वहां पर 15 व्यक्तियों की मौत की बात कही जा रही है सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती है वहां के मेयर जो है वो खुद कह चुके हैं कि 10 लोगों का तो कंफर्म कर चुके हैं कि उनकी मृत्यु हुई है लेकिन वहां के हाई कोर्ट में सरकार ने जो एफिडेविट दिया उसने बताया कि भाई दूषित पानी पीने से सिर्फ चार लोग मरे हैं। उमा भारती ने जब बगावत का बिगुल बजा दिया तो एक पोस्ट करते हुए मोहन यादव नजर आए जिसमें एक आध लोगों को हटाने की बात थी कारण बताओ नोटिस जारी करने की बात थी लेकिन बवाल बढ़ता गया तो देर रात एक और पोस्ट किया उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव हाई कोर्ट की आंख में तो आंख हाई कोर्ट की आंख में तो धूल झोंक चुके हैं। कह रहे हैं कि चार ही लोग मरे हैं दूषित पानी पीने से और अब वो जनता की आंख में भी कैसे धूल झोंक रहे हैं। को देखिए कि उन्होंने दोपहर में क्या ट्वीट किया और कल को देर रात क्या ट्वीट किया और

देर रात जो उन्होंने पोस्ट कियाकि प्रेशर बहुत ज्यादा है तो देर रात को उन्होंने 9:21 पर पोस्ट कर दिया। उन्होंने कहा कि इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल के कारण कोई घटना में राज्य सरकार लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगी। इस संबंध में कठोर निर्णय लिए जा रहे हैं। निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया पीएचडी के प्रभारी अधीक्षक यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित किया गया है और इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को भी हटाने के निर्देश दे दिए गए हैं। ध्यान से सुनिएगा। इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को भी हटाने के निर्देश दे दिए गए हैं।उसने उनहीं दिलीप कुमार यादव के ट्रांसफर के आर्डर की कॉपी को पोस्ट कर दिया है। और ये जो ट्रांसफर के आर्डर की कॉपी है 2 जनवरी की और इसमें ये बताया गया है कि दिलीप कुमार यादव 2014 बैच के जो है आयुक्त है और इंदौर के आयुक्त है उनको ट्रांसफर करके उप सचिव मध्य प्रदेश शासन का बना दिया गया है पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में। अब सवाल यह है कि मोहन यादव साहब पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन उनको इतना तो पता होगा कि ट्रांसफर करने का मतलब हटाना नहीं होता। आपने एक जगह से पद से हटाकर दूसरी जगह भेज दिया। क्या इसको आप सजा देना कहेंगे? क्या आप इसको दंड देना कहेंगे? या आप सीधे-सीधे जनता की आंखों में धूल झोंक रहे हैं और यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत अब भारतीय जनता पार्टी से लगातार पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं।

मैंने आपको बताया कि मोहन भागवत क्यों बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं? क्या वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रवय से इतने ज्यादा हताश, निराश और दुखी हो गए हैं? क्या भारतीय जनता पार्टी के फैसला करने में उनकी सुनी नहीं जा रही? उनकी चल नहीं रही। इसलिए वो उससे किनारा कर रहे हैं। क्या भारतीय जनता पार्टी के नेता एक के बाद एक उसको क्या कहे वो भारती की नजरों में पाप और महापाप किए जा रहे हैं। उससे डरकर मोहन भागवत पल्ला झाड़ रहे हैं। या उनको लगता है कि जहांजहां वो प्रवास पर जाते हैं वहां स्वयंसेवक उनसे सवाल ना पूछ ले। हिंदू उनसे सवाल ना पूछ ले। इसलिए वो जानबूझकर स्वयं सैनिकों की आंखों में धूल झोंकने के लिए हिंदुओं को भरमाने के लिए हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने के लिए अपने आप को भारतीय जनता पार्टी के कर्मों से उमा भारती के शब्दों में कहूं तो पाप और महापापों से पिंड छुड़ाने के लिए भारतीय जनता पार्टी से अलग थलग होने का सिर्फ और सिर्फ नाटक कर रहे हैं। सच क्या है? अपने तमाम दर्शकों से कहूंगा कि मुझे कमेंट करके जरूर बताइएगा और ये भी बताइएगा मोहन यादव के लिए कम से कम बता दीजिएगा भैया कि अधिकारी को हटाना क्या दंड देना होता है? अधिकारी को हटाना क्या सजा देना होता है? और आखिर ऐसा करके मोहन यादव क्या हासिल करना चाहते हैं? कारवाई कब? जिम्मेदार लोगों पर कारवाई कब?

 उमा भारती ने जो मांग की कि नीचे से ऊपर तक सब जिम्मेदार है। उन लोगों पर कारवाई कब? प्रायश्चित या दंड? ये कब? ये तमाम सवाल आप भी पूछते रहिए। हम भी पूछते रहेंगे जब तक ये जवाब नहीं मिलेगा। और यह सवाल मेरे मन में जरूर आएगा कि इंदौर से 200 किलोमीटर से भी कम की दूरी पर खड़े होकर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में खड़े होकर मोहन भागवत को मध्य प्रदेश के बच्चों की याद क्यों नहीं आती? जो कप सिरप पीकर अपनी जान गवा चुके हैं। इंदौर के लोगों की याद क्यों नहीं आती? जो दूषित पानी पीकर अपनी जान गवा चुके हैं। वहां मरने वाले बच्चों की याद क्यों नहीं आती? 

Jai Hind  Jai Sanatan


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January 03, 2026 at 05:46PM
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January 03, 2026 at 06:13PM

क्या मोहन भागवत गुजराती लॉबी के मुखिया नरेंद्र मोदी अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं?

क्या मोहन भागवत गुजराती लॉबी के मुखिया नरेंद्र मोदी अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं?

 


इंदौर में जो कुछ हुआ वो तो अपने आप में शर्मनाक था ही लेकिन उसके बाद जो कुछ हो रहा है जो कुछ किया जा रहा है मध्य प्रदेश की सरकार द्वारा वो तो अपने आप में उससे भी कहीं ज्यादा शर्मनाक है। हमें चार, 10 और 15 के खेले में उलझाया जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक संजीवनी देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत लगातार भारतीय जनता पार्टी के साथ पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं। यूं कहूं कि भारतीय जनता पार्टी से पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं और इंदौर से महज 200 किलोमीटर दूर प्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंचकर मोहन भागवत कुछ इस तरह का बयान देते हैं। जिस बयान के बाद एक बार फिर से यही सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या मोहन भागवत भारतीय जनता पार्टी को चलाने वाली गुजराती लॉबी के मुखिया यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं।

क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने मोहन भागवत को भारतीय जनता पार्टी से फैसला लेने वाले एक महत्वपूर्ण नेता के पद से पूरी तरह से बेदखल कर दिया है। इससे पहले कि तमाम लोग कहे कि भाजपा से मोहन भागवत साहब का क्या लेना देना है। तो कई इतिहास है कि भारतीय जनता पार्टी से मोहन भागवत का क्या लेना देना है।लेकिन शुरुआत मोहन भागवत के उस बयान से करूंगा और ये भी बताऊंगा कि भोपाल पहुंचकर एक कार्यक्रम में शामिल होते हैं। जहां से मुख्यमंत्री आवास की दूरी कोई बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन उनकी जुबान तक नहीं खुलती। इंदौर में हुई मौतों पर लेकिन वो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और भारतीय जनता पार्टी से किनारा करते हुए नजर आते हैं।

तो सवाल ये उठ रहा है कि क्या वाकई मोहन भागवत निराश और हताश हो गए हैं या वो जानबूझकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक को और खासतौर से इस देश के करोड़ों हिंदुओं को अपने एक नए जाल में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो कह सके कि हमारी तो कोई सुन नहीं रहा। हमारी तो कुछ चलती नहीं है। तो उमा भारती का बयान जो कि उन्होंने मध्य प्रदेश के शासन और प्रशासन के लिए कल पोस्ट किया था। मैं कहूंगा कि मोहन भागवत साहब उसको भी याद कर ले कि अगर कोई आपकी सुन नहीं रहा है तो फिर आप क्यों आरएसएस के मुखिया के तौर पर देश भर में घूम घूम कर हिंदुत्व का प्रचार कर रहे हैं और हिंदुत्व के बहाने भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जिताने के लिए प्रचार कर रहे हैं। आप राष्ट्र निर्माण में लगे हुए हैं या सत्ता निर्माण में लगे हुए हैं? इन तमाम सवालों के जवाब आपको देने चाहिए। मैं तो चाहूंगा कि स्वयंसेवक ये सवाल पूछे। देश के हिंदू ये सवाल पूछे कि मोहन भागवत साहब आखिर कर क्या रहे हैं? मोहन भागवत साहब आखिर चाहते क्या हैं? और मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कैसे एक के बाद एक लोगों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं? वो भी आपके सामने बताऊंगा। लेकिन शुरुआत मोहन भागवत से करता हूं। भोपाल की धरती पर पहुंचते हैं मोहन भागवत साहब। और एक बार फिर से बोल देते हैं कि भैया भाजपा को आरएसएस कंट्रोल नहीं करता। संघ को पार्टी के यानी भारतीय जनता पार्टी के नजरिए से देखना गलत है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक पैराबिलिटी फोर्स नहीं है। जरा मैं बता दूं कि भोपाल की धरती पर पहुंचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने शुक्रवार को उसी दिन जिस दिन उमा भारती ने खुली बगावत कर दी थी भारतीय जनता पार्टी के इको सिस्टम के खिलाफ पोस्ट करके महापाप की बात करके भ्रष्टाचार या घोर दंड की बात करके उसी दिन मोहन भागवत उसी मध्य प्रदेश की धरती पर थे। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की धरती पर थे और उन्होंने कहा कि भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नजरिए से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखना समझना गलत है। सभी स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और संघ किसी को कंट्रोल नहीं करता। भाजपा को कंट्रोल नहीं करता। इस ये संदर्भ था उनका। संघ का उद्देश्य सत्ता टिकट या चुनाव नहीं बल्कि समाज की गुणवत्ता और चरित्र निर्माण है और ये कितना बढ़िया चरित्र निर्माण कर रहे हैं। उत्तराखंड के भाजपा नेता के बयान से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

भोपाल में आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में बोलते हुए भागवत ने कहा कि हम वर्दी पहनते हैं, मार्च निकालते हैं और लाठी का अभ्यास करते हैं। ऐसे में अगर कोई सोचता है कि यह एक पैरामिलिट्री फोर्स है तो यह एक गलती होगी। भागवत ने आगे कहा कि हमारा मत, पंथ संप्रदाय, भाषा और जाति अलग हो सकती है। लेकिन हिंदू पहचान हम सबको जोड़ती है। हमारी संस्कृति एक है, धर्म एक है और हमारे पूर्वज भी समान है। भागवत साहब इंदौर में जिन लोगों ने आपकी सरकार, आपके मुख्यमंत्री की लापरवाही और निकम्मेपन के कारण दूषित पानी पीकर अपनी जान गवाई है वो हिंदू ही थे। आगे देखिए मोहन भागवत ने राजनीति, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, युवाओं की दिशा, पारिवारिक जीवन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। अनुशासन की बात कही। टेरी विदेशी निर्भरता की बात कही। उन्होंने नई पीढ़ी को भारतीयता से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। फैशन, फास्ट फूड और परिवार पर चिंता जताई। संघ को समझने की जरूरत की बात कही। संघ कैसे पैदा हुआ इसको लेकर उन्होंने बात कही। समाज बदलेगा तभी देश बदले जाने की बात कही। उन्होंने प्रेशर ग्रुप नहीं संपूर्ण समाज के संगठन की बात कही और यह भी कहा कि संघ केवल स्वयंसेवक बनाता है। यानी संघ जो है वो राष्ट्र निर्माण है। लेकिन मैं तो इस सीधे कहूंगा कि संघ जो है वो सरकार के निर्माण में लगा हुआ है। सत्ता हासिल करने में लगा हुआ है। नहीं तो क्या फर्क है? क्या जरूरत पड़ती है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आपके स्वयंसेवक सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जितवाने में लगे रहते हैं। अगर संघ को सत्ता से कोई लेना देना नहीं है तो संघ के नेता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास पर जाकर क्यों बैठक करते हैं? अगर संघ को सत्ता से कुछ लेना देना नहीं है तो संघ के नेता राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के दिग्गज नेताओं के साथ क्यों बैठक करते हैं? राज्यों के स्तर पर जहां-जहां सरकारें वहां जाकर भारतीय जनता पार्टी के मुख्यंत्रियों से क्यों मिलते हैं और जहांजहां भी सरकारें नहीं है वहां भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से क्यों मिलते हैं? और फिर अखबार में इस तरह की खबरें क्यों छपवाई जाती है? छपवाई जाती है कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव को जिताने में आरएसएस ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? हरियाणा के विधानसभा चुनाव को जितवाने में आरएसएस ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार, दिल्ली इन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में पहुंचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आप मध्य प्रदेश की धरती पर पहुंचकर भी अपने ही प्रचार द्वारा बनाई गई सरकार और मुख्यमंत्री के रवैया पर कुछ नहीं बोलते। अब आप देखिए कि इंदौर में जो कुछ हुआ पत्रकार के साथ जो कुछ हुआ हंसते हुए नजर आए कैलाश विजयवर्गीय उससे आगे बढ़कर क्या कर दिया उन्होंने वहां पर 15 व्यक्तियों की मौत की बात कही जा रही है सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती है वहां के मेयर जो है वो खुद कह चुके हैं कि 10 लोगों का तो कंफर्म कर चुके हैं कि उनकी मृत्यु हुई है लेकिन वहां के हाई कोर्ट में सरकार ने जो एफिडेविट दिया उसने बताया कि भाई दूषित पानी पीने से सिर्फ चार लोग मरे हैं। उमा भारती ने जब बगावत का बिगुल बजा दिया तो एक पोस्ट करते हुए मोहन यादव नजर आए जिसमें एक आध लोगों को हटाने की बात थी कारण बताओ नोटिस जारी करने की बात थी लेकिन बवाल बढ़ता गया तो देर रात एक और पोस्ट किया उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव हाई कोर्ट की आंख में तो आंख हाई कोर्ट की आंख में तो धूल झोंक चुके हैं। कह रहे हैं कि चार ही लोग मरे हैं दूषित पानी पीने से और अब वो जनता की आंख में भी कैसे धूल झोंक रहे हैं। को देखिए कि उन्होंने दोपहर में क्या ट्वीट किया और कल को देर रात क्या ट्वीट किया और

देर रात जो उन्होंने पोस्ट कियाकि प्रेशर बहुत ज्यादा है तो देर रात को उन्होंने 9:21 पर पोस्ट कर दिया। उन्होंने कहा कि इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल के कारण कोई घटना में राज्य सरकार लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगी। इस संबंध में कठोर निर्णय लिए जा रहे हैं। निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया पीएचडी के प्रभारी अधीक्षक यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित किया गया है और इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को भी हटाने के निर्देश दे दिए गए हैं। ध्यान से सुनिएगा। इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को भी हटाने के निर्देश दे दिए गए हैं।उसने उनहीं दिलीप कुमार यादव के ट्रांसफर के आर्डर की कॉपी को पोस्ट कर दिया है। और ये जो ट्रांसफर के आर्डर की कॉपी है 2 जनवरी की और इसमें ये बताया गया है कि दिलीप कुमार यादव 2014 बैच के जो है आयुक्त है और इंदौर के आयुक्त है उनको ट्रांसफर करके उप सचिव मध्य प्रदेश शासन का बना दिया गया है पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में। अब सवाल यह है कि मोहन यादव साहब पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन उनको इतना तो पता होगा कि ट्रांसफर करने का मतलब हटाना नहीं होता। आपने एक जगह से पद से हटाकर दूसरी जगह भेज दिया। क्या इसको आप सजा देना कहेंगे? क्या आप इसको दंड देना कहेंगे? या आप सीधे-सीधे जनता की आंखों में धूल झोंक रहे हैं और यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत अब भारतीय जनता पार्टी से लगातार पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं।

मैंने आपको बताया कि मोहन भागवत क्यों बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं? क्या वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रवय से इतने ज्यादा हताश, निराश और दुखी हो गए हैं? क्या भारतीय जनता पार्टी के फैसला करने में उनकी सुनी नहीं जा रही? उनकी चल नहीं रही। इसलिए वो उससे किनारा कर रहे हैं। क्या भारतीय जनता पार्टी के नेता एक के बाद एक उसको क्या कहे वो भारती की नजरों में पाप और महापाप किए जा रहे हैं। उससे डरकर मोहन भागवत पल्ला झाड़ रहे हैं। या उनको लगता है कि जहांजहां वो प्रवास पर जाते हैं वहां स्वयंसेवक उनसे सवाल ना पूछ ले। हिंदू उनसे सवाल ना पूछ ले। इसलिए वो जानबूझकर स्वयं सैनिकों की आंखों में धूल झोंकने के लिए हिंदुओं को भरमाने के लिए हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने के लिए अपने आप को भारतीय जनता पार्टी के कर्मों से उमा भारती के शब्दों में कहूं तो पाप और महापापों से पिंड छुड़ाने के लिए भारतीय जनता पार्टी से अलग थलग होने का सिर्फ और सिर्फ नाटक कर रहे हैं। सच क्या है? अपने तमाम दर्शकों से कहूंगा कि मुझे कमेंट करके जरूर बताइएगा और ये भी बताइएगा मोहन यादव के लिए कम से कम बता दीजिएगा भैया कि अधिकारी को हटाना क्या दंड देना होता है? अधिकारी को हटाना क्या सजा देना होता है? और आखिर ऐसा करके मोहन यादव क्या हासिल करना चाहते हैं? कारवाई कब? जिम्मेदार लोगों पर कारवाई कब?

 उमा भारती ने जो मांग की कि नीचे से ऊपर तक सब जिम्मेदार है। उन लोगों पर कारवाई कब? प्रायश्चित या दंड? ये कब? ये तमाम सवाल आप भी पूछते रहिए। हम भी पूछते रहेंगे जब तक ये जवाब नहीं मिलेगा। और यह सवाल मेरे मन में जरूर आएगा कि इंदौर से 200 किलोमीटर से भी कम की दूरी पर खड़े होकर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में खड़े होकर मोहन भागवत को मध्य प्रदेश के बच्चों की याद क्यों नहीं आती? जो कप सिरप पीकर अपनी जान गवा चुके हैं। इंदौर के लोगों की याद क्यों नहीं आती? जो दूषित पानी पीकर अपनी जान गवा चुके हैं। वहां मरने वाले बच्चों की याद क्यों नहीं आती? 

Jai Hind  Jai Sanatan


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January 03, 2026 at 05:46PM

क्या मोहन भागवत गुजराती लॉबी के मुखिया नरेंद्र मोदी अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं?

 


इंदौर में जो कुछ हुआ वो तो अपने आप में शर्मनाक था ही लेकिन उसके बाद जो कुछ हो रहा है जो कुछ किया जा रहा है मध्य प्रदेश की सरकार द्वारा वो तो अपने आप में उससे भी कहीं ज्यादा शर्मनाक है। हमें चार, 10 और 15 के खेले में उलझाया जा रहा है। लेकिन इससे भी बड़ी बात है कि भारतीय जनता पार्टी को राजनीतिक संजीवनी देने वाले राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत लगातार भारतीय जनता पार्टी के साथ पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं। यूं कहूं कि भारतीय जनता पार्टी से पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं और इंदौर से महज 200 किलोमीटर दूर प्रदेश की राजधानी भोपाल पहुंचकर मोहन भागवत कुछ इस तरह का बयान देते हैं। जिस बयान के बाद एक बार फिर से यही सवाल खड़ा हो जाता है कि क्या मोहन भागवत भारतीय जनता पार्टी को चलाने वाली गुजराती लॉबी के मुखिया यानी नरेंद्र मोदी और अमित शाह से इतने ज्यादा निराश और हताश हो गए हैं कि वो बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं।

क्या नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने मोहन भागवत को भारतीय जनता पार्टी से फैसला लेने वाले एक महत्वपूर्ण नेता के पद से पूरी तरह से बेदखल कर दिया है। इससे पहले कि तमाम लोग कहे कि भाजपा से मोहन भागवत साहब का क्या लेना देना है। तो कई इतिहास है कि भारतीय जनता पार्टी से मोहन भागवत का क्या लेना देना है।लेकिन शुरुआत मोहन भागवत के उस बयान से करूंगा और ये भी बताऊंगा कि भोपाल पहुंचकर एक कार्यक्रम में शामिल होते हैं। जहां से मुख्यमंत्री आवास की दूरी कोई बहुत ज्यादा नहीं है। लेकिन उनकी जुबान तक नहीं खुलती। इंदौर में हुई मौतों पर लेकिन वो बड़ी-बड़ी बातें करते हैं और भारतीय जनता पार्टी से किनारा करते हुए नजर आते हैं।

तो सवाल ये उठ रहा है कि क्या वाकई मोहन भागवत निराश और हताश हो गए हैं या वो जानबूझकर राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के स्वयंसेवक को और खासतौर से इस देश के करोड़ों हिंदुओं को अपने एक नए जाल में फंसाने की कोशिश कर रहे हैं ताकि वो कह सके कि हमारी तो कोई सुन नहीं रहा। हमारी तो कुछ चलती नहीं है। तो उमा भारती का बयान जो कि उन्होंने मध्य प्रदेश के शासन और प्रशासन के लिए कल पोस्ट किया था। मैं कहूंगा कि मोहन भागवत साहब उसको भी याद कर ले कि अगर कोई आपकी सुन नहीं रहा है तो फिर आप क्यों आरएसएस के मुखिया के तौर पर देश भर में घूम घूम कर हिंदुत्व का प्रचार कर रहे हैं और हिंदुत्व के बहाने भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जिताने के लिए प्रचार कर रहे हैं। आप राष्ट्र निर्माण में लगे हुए हैं या सत्ता निर्माण में लगे हुए हैं? इन तमाम सवालों के जवाब आपको देने चाहिए। मैं तो चाहूंगा कि स्वयंसेवक ये सवाल पूछे। देश के हिंदू ये सवाल पूछे कि मोहन भागवत साहब आखिर कर क्या रहे हैं? मोहन भागवत साहब आखिर चाहते क्या हैं? और मोहन यादव मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री कैसे एक के बाद एक लोगों की आंखों में धूल झोंकने का काम कर रहे हैं? वो भी आपके सामने बताऊंगा। लेकिन शुरुआत मोहन भागवत से करता हूं। भोपाल की धरती पर पहुंचते हैं मोहन भागवत साहब। और एक बार फिर से बोल देते हैं कि भैया भाजपा को आरएसएस कंट्रोल नहीं करता। संघ को पार्टी के यानी भारतीय जनता पार्टी के नजरिए से देखना गलत है और राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ एक पैराबिलिटी फोर्स नहीं है। जरा मैं बता दूं कि भोपाल की धरती पर पहुंचे राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत ने शुक्रवार को उसी दिन जिस दिन उमा भारती ने खुली बगावत कर दी थी भारतीय जनता पार्टी के इको सिस्टम के खिलाफ पोस्ट करके महापाप की बात करके भ्रष्टाचार या घोर दंड की बात करके उसी दिन मोहन भागवत उसी मध्य प्रदेश की धरती पर थे। मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल की धरती पर थे और उन्होंने कहा कि भाजपा या विश्व हिंदू परिषद के नजरिए से राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ को देखना समझना गलत है। सभी स्वतंत्र रूप से काम करते हैं और संघ किसी को कंट्रोल नहीं करता। भाजपा को कंट्रोल नहीं करता। इस ये संदर्भ था उनका। संघ का उद्देश्य सत्ता टिकट या चुनाव नहीं बल्कि समाज की गुणवत्ता और चरित्र निर्माण है और ये कितना बढ़िया चरित्र निर्माण कर रहे हैं। उत्तराखंड के भाजपा नेता के बयान से इसका अंदाजा लगाया जा सकता है।

भोपाल में आरएसएस के 100 साल पूरे होने पर आयोजित प्रमुख जन गोष्ठी में बोलते हुए भागवत ने कहा कि हम वर्दी पहनते हैं, मार्च निकालते हैं और लाठी का अभ्यास करते हैं। ऐसे में अगर कोई सोचता है कि यह एक पैरामिलिट्री फोर्स है तो यह एक गलती होगी। भागवत ने आगे कहा कि हमारा मत, पंथ संप्रदाय, भाषा और जाति अलग हो सकती है। लेकिन हिंदू पहचान हम सबको जोड़ती है। हमारी संस्कृति एक है, धर्म एक है और हमारे पूर्वज भी समान है। भागवत साहब इंदौर में जिन लोगों ने आपकी सरकार, आपके मुख्यमंत्री की लापरवाही और निकम्मेपन के कारण दूषित पानी पीकर अपनी जान गवाई है वो हिंदू ही थे। आगे देखिए मोहन भागवत ने राजनीति, स्वदेशी अर्थव्यवस्था, युवाओं की दिशा, पारिवारिक जीवन और पर्यावरण जैसे मुद्दों पर खुलकर बातचीत की। अनुशासन की बात कही। टेरी विदेशी निर्भरता की बात कही। उन्होंने नई पीढ़ी को भारतीयता से जोड़ने की जरूरत पर जोर दिया। फैशन, फास्ट फूड और परिवार पर चिंता जताई। संघ को समझने की जरूरत की बात कही। संघ कैसे पैदा हुआ इसको लेकर उन्होंने बात कही। समाज बदलेगा तभी देश बदले जाने की बात कही। उन्होंने प्रेशर ग्रुप नहीं संपूर्ण समाज के संगठन की बात कही और यह भी कहा कि संघ केवल स्वयंसेवक बनाता है। यानी संघ जो है वो राष्ट्र निर्माण है। लेकिन मैं तो इस सीधे कहूंगा कि संघ जो है वो सरकार के निर्माण में लगा हुआ है। सत्ता हासिल करने में लगा हुआ है। नहीं तो क्या फर्क है? क्या जरूरत पड़ती है कि कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक आपके स्वयंसेवक सिर्फ और सिर्फ भारतीय जनता पार्टी को चुनाव जितवाने में लगे रहते हैं। अगर संघ को सत्ता से कोई लेना देना नहीं है तो संघ के नेता उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ के आवास पर जाकर क्यों बैठक करते हैं? अगर संघ को सत्ता से कुछ लेना देना नहीं है तो संघ के नेता राष्ट्रीय स्तर पर भाजपा के दिग्गज नेताओं के साथ क्यों बैठक करते हैं? राज्यों के स्तर पर जहां-जहां सरकारें वहां जाकर भारतीय जनता पार्टी के मुख्यंत्रियों से क्यों मिलते हैं और जहांजहां भी सरकारें नहीं है वहां भारतीय जनता पार्टी के नेताओं से क्यों मिलते हैं? और फिर अखबार में इस तरह की खबरें क्यों छपवाई जाती है? छपवाई जाती है कि महाराष्ट्र के विधानसभा चुनाव को जिताने में आरएसएस ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई? हरियाणा के विधानसभा चुनाव को जितवाने में आरएसएस ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई। मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, राजस्थान, बिहार, दिल्ली इन विधानसभा चुनावों में भारतीय जनता पार्टी को सत्ता में पहुंचाने में राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के कार्यकर्ताओं ने कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाई।

लेकिन सबसे बड़ी बात है कि आप मध्य प्रदेश की धरती पर पहुंचकर भी अपने ही प्रचार द्वारा बनाई गई सरकार और मुख्यमंत्री के रवैया पर कुछ नहीं बोलते। अब आप देखिए कि इंदौर में जो कुछ हुआ पत्रकार के साथ जो कुछ हुआ हंसते हुए नजर आए कैलाश विजयवर्गीय उससे आगे बढ़कर क्या कर दिया उन्होंने वहां पर 15 व्यक्तियों की मौत की बात कही जा रही है सैकड़ों लोग अस्पताल में भर्ती है वहां के मेयर जो है वो खुद कह चुके हैं कि 10 लोगों का तो कंफर्म कर चुके हैं कि उनकी मृत्यु हुई है लेकिन वहां के हाई कोर्ट में सरकार ने जो एफिडेविट दिया उसने बताया कि भाई दूषित पानी पीने से सिर्फ चार लोग मरे हैं। उमा भारती ने जब बगावत का बिगुल बजा दिया तो एक पोस्ट करते हुए मोहन यादव नजर आए जिसमें एक आध लोगों को हटाने की बात थी कारण बताओ नोटिस जारी करने की बात थी लेकिन बवाल बढ़ता गया तो देर रात एक और पोस्ट किया उन्होंने मध्य प्रदेश के मुख्यमंत्री मोहन यादव हाई कोर्ट की आंख में तो आंख हाई कोर्ट की आंख में तो धूल झोंक चुके हैं। कह रहे हैं कि चार ही लोग मरे हैं दूषित पानी पीने से और अब वो जनता की आंख में भी कैसे धूल झोंक रहे हैं। को देखिए कि उन्होंने दोपहर में क्या ट्वीट किया और कल को देर रात क्या ट्वीट किया और

देर रात जो उन्होंने पोस्ट कियाकि प्रेशर बहुत ज्यादा है तो देर रात को उन्होंने 9:21 पर पोस्ट कर दिया। उन्होंने कहा कि इंदौर के भागीरथपुरा में दूषित पेयजल के कारण कोई घटना में राज्य सरकार लापरवाही बर्दाश्त नहीं करेगी। इस संबंध में कठोर निर्णय लिए जा रहे हैं। निगम के अपर आयुक्त रोहित सिसोनिया पीएचडी के प्रभारी अधीक्षक यंत्री संजीव श्रीवास्तव को निलंबित किया गया है और इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को भी हटाने के निर्देश दे दिए गए हैं। ध्यान से सुनिएगा। इंदौर नगर निगम आयुक्त दिलीप कुमार यादव को भी हटाने के निर्देश दे दिए गए हैं।उसने उनहीं दिलीप कुमार यादव के ट्रांसफर के आर्डर की कॉपी को पोस्ट कर दिया है। और ये जो ट्रांसफर के आर्डर की कॉपी है 2 जनवरी की और इसमें ये बताया गया है कि दिलीप कुमार यादव 2014 बैच के जो है आयुक्त है और इंदौर के आयुक्त है उनको ट्रांसफर करके उप सचिव मध्य प्रदेश शासन का बना दिया गया है पंचायत एवं ग्रामीण विकास विभाग में। अब सवाल यह है कि मोहन यादव साहब पहली बार मुख्यमंत्री बने हैं। लेकिन उनको इतना तो पता होगा कि ट्रांसफर करने का मतलब हटाना नहीं होता। आपने एक जगह से पद से हटाकर दूसरी जगह भेज दिया। क्या इसको आप सजा देना कहेंगे? क्या आप इसको दंड देना कहेंगे? या आप सीधे-सीधे जनता की आंखों में धूल झोंक रहे हैं और यहां राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ के मुखिया मोहन भागवत अब भारतीय जनता पार्टी से लगातार पल्ला झाड़ते हुए नजर आ रहे हैं।

मैंने आपको बताया कि मोहन भागवत क्यों बीजेपी से पल्ला झाड़ रहे हैं? क्या वो नरेंद्र मोदी और अमित शाह के रवय से इतने ज्यादा हताश, निराश और दुखी हो गए हैं? क्या भारतीय जनता पार्टी के फैसला करने में उनकी सुनी नहीं जा रही? उनकी चल नहीं रही। इसलिए वो उससे किनारा कर रहे हैं। क्या भारतीय जनता पार्टी के नेता एक के बाद एक उसको क्या कहे वो भारती की नजरों में पाप और महापाप किए जा रहे हैं। उससे डरकर मोहन भागवत पल्ला झाड़ रहे हैं। या उनको लगता है कि जहांजहां वो प्रवास पर जाते हैं वहां स्वयंसेवक उनसे सवाल ना पूछ ले। हिंदू उनसे सवाल ना पूछ ले। इसलिए वो जानबूझकर स्वयं सैनिकों की आंखों में धूल झोंकने के लिए हिंदुओं को भरमाने के लिए हिंदुओं की आंखों में धूल झोंकने के लिए अपने आप को भारतीय जनता पार्टी के कर्मों से उमा भारती के शब्दों में कहूं तो पाप और महापापों से पिंड छुड़ाने के लिए भारतीय जनता पार्टी से अलग थलग होने का सिर्फ और सिर्फ नाटक कर रहे हैं। सच क्या है? अपने तमाम दर्शकों से कहूंगा कि मुझे कमेंट करके जरूर बताइएगा और ये भी बताइएगा मोहन यादव के लिए कम से कम बता दीजिएगा भैया कि अधिकारी को हटाना क्या दंड देना होता है? अधिकारी को हटाना क्या सजा देना होता है? और आखिर ऐसा करके मोहन यादव क्या हासिल करना चाहते हैं? कारवाई कब? जिम्मेदार लोगों पर कारवाई कब?

 उमा भारती ने जो मांग की कि नीचे से ऊपर तक सब जिम्मेदार है। उन लोगों पर कारवाई कब? प्रायश्चित या दंड? ये कब? ये तमाम सवाल आप भी पूछते रहिए। हम भी पूछते रहेंगे जब तक ये जवाब नहीं मिलेगा। और यह सवाल मेरे मन में जरूर आएगा कि इंदौर से 200 किलोमीटर से भी कम की दूरी पर खड़े होकर मध्य प्रदेश की राजधानी भोपाल में खड़े होकर मोहन भागवत को मध्य प्रदेश के बच्चों की याद क्यों नहीं आती? जो कप सिरप पीकर अपनी जान गवा चुके हैं। इंदौर के लोगों की याद क्यों नहीं आती? जो दूषित पानी पीकर अपनी जान गवा चुके हैं। वहां मरने वाले बच्चों की याद क्यों नहीं आती? 

Jai Hind  Jai Sanatan

Wednesday, December 31, 2025

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM
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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM

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