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Saturday, August 23, 2025

नायडू मोदी सरकार को ब्लैकमेल करने पर उतारू संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक लिखी ने चिट्ठी

 


नायडू दिल्ली पहुंचे और उसके बाद से खबरें तैरने लगी कि नायडू ने सीपी राधाकृष्णन को समर्थन दे दिया है। लेकिन इन सब के दरमियान कहीं से कहीं तक खबर यह नहीं बताई गई कि सीपी राधाकृष्णन को समर्थन तो दिया है लेकिन ब्लैकमेलिंग एक बार फिर शुरू कर दी है। नायडू फिर से मोदी सरकार को ब्लैकमेल करने पर उतारू हो चले हैं। दूसरी खबर। और यह इस वक्त की सबसे बड़ी खबर। संघ के एक वरिष्ठ प्रचारक ने एक चिट्ठी लिखी और उस चिट्ठी में प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और गृह मंत्री अमित शाह के माथे पर पसीने लाने वाली बातें हैं।

 सवाल यह है कि आज की तारीख में जो तख्त नसी हैं, वह आने वाली कितनी तारीखों तक तख्त पर बैठे रहेंगे? क्योंकि स्थितियां तेजी से बदल रही हैं। हालात तेजी से बदल रहे हैं। और हर गुजरते दिन के साथ कुर्सी हिल रही हैं। कुर्सी के पाएं हिल रहे हैं प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के। क्या-क्या हुआ है? नायडू साहब की ब्लैकमेलिंग से लेकर संघ द्वारा की जा रही घेराबंदी तक। और बात इसकी भी कि 2012 में जो नरेंद्र मोदी जी ने किया था वो पाप अब भारी पड़ने वाला है। 

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी  केचेहरे पर एक अलग सी खामोशी, एक अलग सी उदासी, एक अलग सी मायूसी है। इस मायूसी के पीछे का कारण क्या है? कुछ लोग कहते हैं कि सदन में लगते हुए वो नारे वोट चोर गद्दी छोड़। तो कुछ लोग कहते हैं कि तड़ी पार तड़ी पार के नारे। कुछ लोग कहते हैं कि दरअसल यह उदासी यह खामोशी, यह मायूसी इस वजह से है क्योंकि वोट चोरी का भंडाफोड़ हो गया है। लेकिन इससे भी कहीं ज्यादा कुछ अंदर खाने में चल रहा है। सबसे पहले तो जरा 2012 का साल और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक पुराना पाप आज की तारीख में याद करना

जरूरी है क्योंकि संघ की उस वरिष्ठ प्रचारक ने जो चिट्ठी लिखी है उसमें जो कहा गया है दरअसल 2012 से जाकर जुड़ जाता है। 2012 में एक बड़ा पाप किया था प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने। क्या था वो पाप जानते हैं आप? आज की तारीख में मोदी जी को कई बार हो सकता है उस बात पर अफसोस होता होगा। साल था 2012 उत्तर प्रदेश विधानसभा चुनाव और प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का एक अलग सा क्रेज था। उस वक्त पे प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी को उत्तर प्रदेश में चुनावी रैलियों की जिम्मेदारी दी गई। कहा गया कि आपका समय चाहिए। आपको आना है। उस वक्त वो  गुजरात के मुख्यमंत्री हुआ करते थे। और उन्होंने उस वक्त एक बात कही थी। भारतीय जनता पार्टी के तमाम वरिष्ठ नेताओं से कि जिस प्रदेश का प्रभारी संजय भाई जोशी हो मैं वहां पर चुनावी रैलियों को संबोधित करूं। मैं कदम नहीं रखूंगा। ऐसा नहीं हो सकता। कदापि नहीं हो सकता मैं नहीं आऊंगा।

 संजय भाई जोशी को तात्कालिक तौर पर वहां से हटा दिया गया। नेपथ्य में डाल दिए गए संजय भाई जोशी और फिर 2012 के बाद 2014 का साल आया प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री की कुर्सी पर विराजमान हो गए वो दिन और आज का दिन संजय भाई जोशी लगातार नेपथ्य में ही रहे हैं।


लेकिन संघ के उस वरिष्ठ प्रचारक ने क्या लिखा उस तरफ चलें उससे पहले एक और बात नायडू ने सीपी राधाकृष्णन को समर्थन देने का ऐलान तो कर दिया है। लेकिन इसके साथ ही साथ एक बार फिर नायडू की ब्लैकमेलिंग शुरू हो गई है। नायडू ने ₹5000 करोड़ मांगे हैं आंध्र प्रदेश के लिए। उन तमाम परियोजनाओं के लिए जो परियोजनाएं लटक गई हैं, अटक गई हैं, भटक गई हैं। जिसकी फाइलें रुक गई हैं। नायडू साहब की जो डिमांड है, वो जब भी दिल्ली आते हैं, झोला लेकर आते हैं और झोला भर के जाते हैं। दरअसल चंद्रबाबू नायडू गले की हड्डी बन चुके हैं इस वक्त पे मौजूदा मोदी सरकार के।एक बात बहुत अच्छे तरीके से समझा देना चाहता हूं कि दरअसल आज की तारीख में केंद्र सरकार की स्थिति यह नहीं है कि वो आंध्रा को लगातार बजट पे बजट देती रहे। नहीं है यह स्थिति।

साथ ही साथ इस बात पर भी गौर फरमाना चाहिए कि बिहार में चुनाव है। बिहार में तमाम परियोजनाओं पर पैसे खर्च हो रहे हैं। बिहार में तो चुनाव है लेकिन आंध्रा में अभी चुनाव है नहीं। और ऐसे में बार-बार जो डिमांड चंद्रबाबू नायडू कर रहे हैं उन्हें पता है कि वो एक बैसाखी हैं। वो एक मजबूरी है और इस वजह से  वो हर बार ब्लैकमेल कर रहे हैं मोदी सरकार को। आज एक बार फिर वही हुआ है। वित्त मंत्री से मुलाकात करी 5000 करोड़ की डिमांड रख दी और यकीन मानिए देश की आर्थिक स्थिति फिल वक्त यह नहीं है कि किसी एक राज्य को सारा पैसा दिया जाए या बार-बार बजट अलॉट किया जाए। ऐसा करते-करते मोदी सरकार खुद भी परेशान हो गई है। खुद भी थक गई है। और जिस दिन ये डिमांड्स नहीं पूरी करेंगे उस दिन मोदी सरकार का क्या होगा? यह मोदी जी को अच्छे से पता है तो उनकी मजबूरियां भी हैं।

 अब नायडू साहब किस तरीके से ब्लैकमेल कर रहे हैं और संघ की तरफ से क्या प्रेशर  आ रहा है और इन सबका मिलाजुला समीकरण क्या बता रहा है कि तख्त के कितने दिन जरा उसको समझिए और  केपी मलिक साहब का एक ट्वीट है। यह ट्वीट केपी मलिक साहब ने कुछ दिनों पहले किया और इस ट्वीट में उन्होंने एक बड़ी खबर ब्रेक कर दी। एक चिट्ठी ब्रेक कर दी। एक ऐसी चिट्ठी जो अभी तक आपके सामने नहीं आई होगी।जो वरिष्ठ प्रचारक हैं जिसने चिट्ठी लिखी है नागपुर को उसका मजमून डाला है और बताया है कि इस चिट्ठी में लिखा गया है:-

 "नियति अपना कार्य करती रहती है किंतु पुरुषार्थ के बिना राष्ट्र का भविष्य उज्जवल नहीं हो सकता इसलिए आज मैं हृदय से कुछ निवेदन कर रहा हूं और इसके साथ ही साथ जो तीसरा पैरा है इस चिट्ठी का वो बेहद खास है। इस चिट्ठी में लिखा गया है आज दुर्भाग्य से दिल्ली स्वार्थ और महिमा मंडल के जयचंदों के कब्जे में प्रतीत होती है। शीर्ष नेतृत्व में वैचारिक शुचिताऔर संघ की सादगी का स्थान चतुराई और आडंबर ने ले लिया है। संगठन और संघ की विचारधारा का उपहास होने लगा है। ऐसे समय में आवश्यकता है संघ के अनुशासन और दंड की। भाजपा का संगठन ऐसे व्यक्ति के हाथों में होना चाहिए जो चरित्रवान हो जिसकी जीवन शैली और व्यक्तित्व संघ की संस्कृति से मेल खाते हो जो छल कपट से दूर रहते हुए व्यवहार कुशलता से नीति और नियम में स्पष्टता रखता हो तथा मां भारती की सेवा के लिए अपने दिन रात को समर्पित कर दे और इसके बाद फिर यहां पर फंसते हैं। 2012 का पाप याद आता है। क्यों फंसते हैं? क्योंकि इस चिट्ठी में लिखा गया है सीधे तौर पर गहन चिंतन मनन के बाद एक ही नाम बार-बार स्मरण में आता है और वो है संघ और भाजपा के लोकप्रिय सिद्धस्थ एवं तपस्वी कार्यकर्ता संजय जोशी का यह केवल मेरा व्यक्तिगत मन नहीं है बल्कि चार दशकों से उनके व्यक्तित्व और कर्तृत्व को निकट से देखने के बाद बनी हुई मेरी गहरी धारणा है। संजय जी का जीवन राष्ट्र सेवा से पूर्णतः समर्पित रहा है। वे पूजनीय बाबू राय राव जी के प्रिय शिष्य रहे हैं। उनके भीतर आत्मबल है।"

यह चिट्ठी ऐसा नहीं है कि रात में सपना आया होगा और किसी ने लिख डाली होगी किसी वरिष्ठ प्रचारक ने ना। बीते कुछ दिनों की स्थितियां ऐसी बन चली हैं कि संघ दो पदों पर अड़ गया। एक तो उपराष्ट्रपति पद उसे चाहिए था। तो फिर सीपी राधाकृष्णन यह खोज कर लाए और सीपी राधाकृष्णन को उपराष्ट्रपति पद का उम्मीदवार बनाया एनडीए का। दूसरी तरफ भारतीय जनता पार्टी के अध्यक्ष का जो चुनाव नहीं हो पा रहा है उसकी सिर्फ और सिर्फ एक वजह है और वो वजह है संघ का अड़ना, संघ का भिड़ना, संघ का भारतीय जनता पार्टी से लगातार लड़ते रहना कि अध्यक्ष तो हमारा होगा, हमारी पसंद का होगा। और यदि संजय भाई जोशी होंगे तो फिर जरा सोचिए तख्त नशी के तख्त पर कितने दिन मोदी जी की जो कुर्सी है वो हर रोज उनसे दूर होती जा रही है। इसके पीछे कारण नायडू भी हैं। कारण बिहार का चुनाव भी है और सबसे बड़ा अगर कोई कारण है तो वह कारण है कि भारतीय जनता पार्टी के लोग खुद ही अंदर खाने बहुत ज्यादा परेशान हो चले हैं। वो संघ की शरण में जा चुके हैं कि भैया कुछ भी करो मुक्ति दिलाओ। 


Friday, August 22, 2025

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

 


राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सरकार की तरफ से पहले अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने अपनी दलीलें कल रखी थी और उसके बाद नंबर आया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जो कि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपनी दलीलें देते हुए नजर आ रहे हैं। 3 घंटे के करीब दलीलें दी थी अटर्नी जनरल ने और 5 घंटे के करीब दलीलें दे चुके हैं अटर्नी जनरल। अभी उनकी दलीलें समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जिस तरीके से इस पूरी सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आठ दिन की सुनवाई का समय निर्धारित किया है। उसमें चार दिन सरकार के और पक्ष में जो स्टेट बोलेंगे उनके लिए रखे हैं और चार दिन रखे हैं उन स्टेट्स के वकील्स के लिए वकीलों के लिए जो कि इसके विरोध में जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा गया है उसके विरोध में दलीलें रखेंगे। जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम क्योंकि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस है और स्टेट गवर्नमेंट जो राष्ट्रपति के फैसले के पक्ष में है, राज्यपाल के फैसले के पक्ष में है, उन्हें ज्यादा समय मिलना चाहिए था। लेकिन क्या कह सकते हैं? सीजीआई का निर्णय है। पांच जजों की बेंच इस पूरे केस की सुनवाई कर रही है। या फिर कहें कि राष्ट्रपति के 14 सवालों पर जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही है। लेकिन अभी तक जो दो दिन की कार्यवाही हुई है उसमें केवल चार जज ही पूछताछ करते हुए या प्रश्न पूछते हुए नजर आ रहे हैं। क्रॉस क्वेश्चन करते हुए नजर आ रहे हैं। पांचवें जो जज हैं अभी तक वो कुछ नहीं बोले हैं।

 सीजीआई बी आर गवई सवाल करते हैं, जस्टिस सूर्यकांत सवाल करते हैं, जस्टिस विक्रमनाथ सवाल करते हैं और जस्टिस पी एस नरसिम्हा सवाल करते हैं। लेकिन 4th जस्टिस अब तक कोई सवाल करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ किस तरीके से अटर्नी जनरल ने तमाम सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच के अधिकारों के ऊपर। उनका जो अधिकार क्षेत्र है उसके ऊपर उन्होंने जो कुछ अतिक्रमण किया उसके ऊपर और साथ ही साथ यह सवाल भी उन्होंने लंच के बाद उठाया था कि आर्टिकल 142 क्या पूरे संविधान के बाकी अनुच्छेदों को बाईपास करके सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा पावर दे सकता है या दे चुका है? उन्होंने बहुत तल्खी के साथ टिप्पणियां की थी जिसका संदेश साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को चला गया था और जब तुषार मेहता ने अपनी दलीलें शुरू की तो उन्होंने भी शुरुआत उसी अंदाज में की और उन्होंने कहा कि जिस तरीके की बातें की जा रही हैं जिस तरीके से आप लोगों के जेस्चर दिख रहे हैं लिप लिप रीडिंग हम अगर कर पा रहे हैं तो उसके बाद मैं इस मामले को हल्के-फुल्के अंदाज समय शुरू नहीं कर सकता।


 मेहता की मुख्य जो दलील है वो राज्यपाल को जो आर्टिकल 200 के तहत अधिकार मिले हुए हैं और उसके समर्थन में जो संविधान के तमाम अनुच्छेदों का उल्लेख उन्होंने किया है। उस पर उन्होंने बात की और इसी चर्चा में 5 घंटे का समय लग गया। बार-बार बेंच की तरफ से जिस तरीके से क्वेश्चंस हो रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि जो बेंच है जो दो जजों की बेंच ने फैसला लिया था उस फैसले को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रही है। इस सुनवाई के दौरान अंत में तुषार मेहता को यह भी कहना पड़ा कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि राज्यपाल के पास जो आर्टिकल 200 के तहत किसी भी विधेयक को रोकने की ताकत मिली हुई है वो अनावश्यक है। संविधान में गैर जरूरी जोड़ी गई है। यानी जिस तरीके के सवालात किए जा रहे थे, जिस अंदाज में सवालात किए जा रहे थे, उसके   बाद यह कहने के लिए सॉललीिसिटर जनरल को मजबूर होना पड़ा। कल जिस तरीके से अटर्नी जनरल ने ये कह दिया था कि सुप्रीम कोर्ट दोबारा से संविधान को लिखना चाहता है कि क्या लिख सकता है जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर है। आज चर्चा के दौरान जब सॉललीिसिटर जनरल ने यह कहा कि एक दिमाग में बात लोगों के यह बैठी हुई है कि जो राज्यपाल होते हैं वो अनइेड है। जबकि राष्ट्रपति इनडायरेक्टली इेड होते हैं। इसलिए लोगों के दिमाग में बहुत सी बातें आती हैं। इस पर सीजीआई ने जवाब दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राज्यपाल  राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत स्टेट के हेड होते हैं और हम भी तो राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत हैं। इससे पता चलता है कि इतना इन लोगों को याद तो है कि यह राष्ट्रपति के अंडर आते हैं लेकिन अभी उसको खुलकर मानते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

 यह एहसास क्यों नहीं हो पा रहा है कि उनके दो जजों ने राष्ट्रपति का जो अधिकार है उसको कम करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति को समय सीमा में जो बांधने की कोशिश की है। वो उनका अधिकार कैसे हो सकता है? जब वह हाई कोर्ट के जज को आदेश नहीं दे सकते तो वह राज्यपाल और राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकते हैं जो कि एक स्टेट में स्टेट हेड है और दूसरे राष्ट्र के नेशन के हेड हैं। संविधान के अनुसार भारत की जो तीनों ही शक्तियां होती है कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका उनके हेड राष्ट्रपति होते हैं। उसी तरीके से राज्यपाल, विधायिका के भी हेड होते हैं। विधायिका का गठन उनको शामिल करके ही माना जाता है। उसी तरीके से कार्यपालिका यानी कि मंत्रिमंडल भी राज्यपाल के समेत ही पूरा माना जाता है। और न्यायपालिका जो राज्यों में भी हाई कोर्ट होते हैं उसमें भी जब कॉलेजियम सिफारिश करता है जजों के नामों की तो वो पहले राज्यपाल की सहमति लेता है। यानी कि वो न्यायपालिका के हेड भी होते हैं स्टेट में। ऐसी स्थिति में फिर कैसे दो जजों की बेंच ने इतना बड़ा ब्लंडर कर दिया। यही सवाल है और इसी को बार-बार अब साबित करने के लिए संवैधानिक उपबंधों को लेने के लिए तुषार मेहता जी ने तमाम ऐसे विवरण दिए जिसमें 1919 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 का एक्ट, तमाम दूसरे एक्ट और दूसरे राज्यों को लेकर जो फैसले हुए थे उनकी भी चर्चा की। उसमें उन्होंने यह भी बताया कि यह जो दो जजों की बेंच थी इसने पांच और सात जजों की बेंच के फैसलों को भी नजरअंदाज कर दिया था। इस पर सीजीआई ने कहा कि वो दो जजों की बेंच ऐसा कैसे कर  सकती? इससे तो ऐसा लगता है कि यह जो बेंच बैठी हुई है यह पहले से कुछ मन बनाकर बैठी हुई है और इसी चीज को आज सुनवाई के दौरान जजों की तरफ से भी कहा गया कि यह ना समझा जाए कि हम इस मामले में राज्यपाल की शक्तियों पर जो सवाल उठा रहे हैं।

हम किसी प्रीजुडिस से यानी कि पहले से ही कुछ मन बनाकर बैठे हुए हैं। ये केवल हम पूरे मामले को सही तरीके से रखे जाने के लिए सवाल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरीके से टाइम अलॉट किया गया है, जिस तरीके से वकीलों की फौज बुलाई गई है अपने समर्थन के लिए और उनको बराबर का समय दिया गया है, उससे तो  भावनाएं साफ जाहिर होती है। हालांकि सुनवाई अभी दो ही दिन की हुई है। इसके अलावा छ दिन की सुनवाई और होनी है। जैसा शेड्यूल बताया गया है उसके हिसाब से अब 21 और 26 तारीख को जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस है उसके पक्ष में सुनवाई होगी और 28 2 39 सितंबर में यह जो सुनवाई होगी उसमें कपिल सिबल सिंह भी के के वेणुगोपाल पी बिल्सन जैसे जो वकील हैं जो एक तरीके से पारदी वाला और आर महादेवन के फैसले का बचाव करते हुए नजर आएंगे उनको समय अलॉट किया गया है। एक दिन का समय इन सब पर काउंटर के लिए 10 सितंबर का रखा गया है। सॉलिसिटर जनरल ने तमाम इसके रेफरेंस दिए। आजादी से पहले के भी रेफरेंस दिए। आजादी के बाद के भी रेफरेंस दिए और संविधान के तमाम अनुच्छेदों को बताने की कोशिश की। लेकिन जिस तरीके से क्रश क्वेश्चनिंग की गई उसकी वजह से आज केवल और केवल आर्टिकल 200 पर ही सवा चार घंटे चर्चा हो पाई जिसमें या तो सॉललीिसिटर जनरल बोले और थोड़ी देर के लिए नवीन किशन कॉल जो कि मध्य प्रदेश स्टेट की तरफ से हैं वो बोले और एक बार इस पूरे मामले में  घुसने की कोशिश की कपिल सिब्बल ने। उन्होंने यह कहने की कोशिश की कि अगर ऐसे किया गया तो फिर आर्टिकल वन का पूरा का पूरा मीनिंग बदल जाएगा। यानी ये जो वकील बैठे हैं वो कार्यवाही में सब कुछ नोट कर रहे हैं कि हमें किस तरीके से इस पूरे मामले को पलटना है।


 राष्ट्रपति ने जो सवाल पूछे हैं उसके बाद जो भी निर्णय आएगा वो देश के भविष्य को तय करेगा। इसलिए हमने कल भी कहा था कि यह जो फैसला है, इसकी जानकारी इसमें क्या-क्या हो रहा है, क्या-क्या मुद्दे रखे जा रहे हैं, क्या-क्या दलीलें दी जा रही है? और सुप्रीम कोर्ट की जो बेंच है, उसका  रिएक्शन क्या है, इसको देश के हर नागरिक को जानना ही चाहिए। इसीलिए हम इस पूरी बहस को आपको जिसज दिन बहस होगी, उसमें जितनी जरूरत पड़ेगी, उतना बड़ा वीडियो बनाकर आपको एक एक बारीकी, बड़े ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुद्दा महत्वपूर्ण इसलिए है कि अगर इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के सवालों का सही तरीके से जवाब ना दिया गया। जस्टिस पारदीवाला और आर महादेवन ने जो कुछ किया था उसको नहीं सुधारा गया तो आप समझ लीजिए कि देश के हालात बहुत ही दयनीय होने वाले हैं। फिर उसके बाद चाहे तमिलनाडु हो, केरल हो, कर्नाटक हो, जहांजहां केंद्र सरकार के  जो विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं वो सब के सब इस तरीके के विधेयक लेकर आएंगे और उन विधेयकों को डीम्ड एसेंट मान लिया जाएगा। सॉलिसिटीज ने आज यह सवाल भी उठाया कि जब लेजिस्लेचर की पूर्णता ही राज्यपाल को शामिल होने के बाद होती है तो फिर अगर राज्यपाल साइन नहीं करेगा तो वो विधेयक लेजिस्लेचर से पास कैसे मान लिया जाएगा क्योंकि लेजिस्लेचर का ही हिस्सा होते हैं राज्यपाल और संसद का हिस्सा होते हैं राष्ट्रपति इसलिए तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत होती है और आप कह रहे हैं कि उनके हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है वो बिना  राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही कानून बन जाएगा जो कि संविधान का जो मूल भावना है उसके खिलाफ है औरकि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपॉइंट किए जाते हैं राज्यपाल इसलिए उनकी जिम्मेदारी यह भी होती है कि कोई भी ऐसा कानून जो केंद्र सरकार ने बनाया है राज्य सरकार या राज्य की विधानसभा उसके विरोध में या उससे टकराव वाला कानून ना पास करे इसलिए तो यह जो विद करने की या फिर कहें कि अपने पास रोकने की ताकत राज्यपाल को मिली हुई है। आप उसको क्या यह कहना चाहते हैं कि यह बेकार है यह अनावश्यक है और क्या कोर्ट ये डिसाइड कर सकता है? क्या कोर्ट इस हद तक जा सकता है  कि उसकी जो फैसला है वो संवैधानिक अमेंडमेंट की शक्ल ले ले। इन सारी बहसों पर जो प्रतिक्रिया दी गई है जस्टिस बी आर गवई के द्वारा जस्टिस पी एस नरसिम्हा के द्वारा जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रमनाथ के द्वारा उससे आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। आपको याद होगा कि इन दोनों जजों की ही बेंच ने दो और फैसले दिए थे। एक में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को सजा दे दी थी और दूसरे फैसला दिया था जो गलियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर। लेकिन चीफ जस्टिस ने दोनों ही फैसलों को हस्तक्षेप करके बदलवा दिया या बदल दिया। पर यहां पूरे राष्ट्र


का मुद्दा है। देश के संवैधानिक प्रमुख के अधिकारों का मुद्दा है। यहां राज्य के हेड का मुद्दा है। उसके बावजूद बेंच का जो नजरिया है वो उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे वजह ये है कि पहले जो दो मुद्दे थे उनमें से इलाहाबाद हाईकोर्ट वाले केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने पत्र लिख दिया था सुप्रीम कोर्ट को और चीफ जस्टिस को कि इनकी बात को ना माना जाए। और दूसरे मुद्दे में पब्लिक सड़क पर आ गई थी। पब्लिक के विरोध के रिएक्शन को देखकर जो चीफ जस्टिस थे उन्होंने फैसला पलट दिया था। लेकिन यह जो मामला है इस पर कोई रिएक्शन देखने को नहीं


मिला है। पब्लिक को समझ में ही नहीं आ रहा है।


आने वाले भविष्य की उस रूपरेखा को नहीं देख पा रहे हैं जो इस फैसले के बाद देश के सामने पैदा हो सकती है। हम शुरुआत से बता रहे हैं कि अगर केजरीवाल जैसा कोई मुख्यमंत्री हो जिसके पास 70% से ज्यादा विधायक हो वो किसी भी तरीके का फैसला पारित कर सकता है और केजरीवाल ने ऐसे फैसले पारित करने की कोशिश भी की थी। केजरीवाल की पार्टी की पंजाब में सरकार है और इस मुद्दे को उठाया भी गया तुषार मेहता जी के द्वारा कि अगर  कोई बॉर्डरिंग स्टेट कुछ ऐसा फैसला ऐसा फैसला ले ले जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा हो या फिर कोई दूसरी स्टेट इंटरनेशनल ट्रेड की किसी ट्रीटी को नकारने का फैसला ले ले तो क्या यह राज्यपाल की बिना सहमति के कानून माना जाएगा तो उस स्थिति में क्या होगा? क्या देश के कूटनीतिक संबंधों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या देश की संप्रभुता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? सुरक्षा पर सवाल नहीं पड़ेगा? तो इस तरीके की चीजें जब इनवॉल्व है तो इसीलिए हम चाहते हैं कि देश की आम जनता भी इस मुद्दे को फॉलो करें। इसको सुने, इसको समझे  जो कुछ सुप्रीम कोर्ट पिछले 10 12 सालों में करने की कोशिश कर रहा है, आप देखेंगे कि कोई ऐसा डिपार्टमेंट नहीं है जिसमें सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। अभी राज्यपालों की नियुक्तियों में इनडायरेक्टली वो घुस चुके हैं। अभी उपराष्ट्रपति के चुनाव में एक पूर्व रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज को नॉमिनेट कर दिया गया है विपक्षी पार्टियों के द्वारा। तो इसमें कोई बड़ी आशंका नहीं है कि जब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होता हुआ विपक्ष को ना दिखे तो विपक्ष की तरफ से किसी सुप्रीम कोर्ट  के रिटायर्ड जज को ही प्रधानमंत्री कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ा दिया जाए और जिस तरीके से हमारे तमाम सुप्रीम कोर्ट के जज आजकल भाषण दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो भी इसकी तैयारी करते हुए नजर आ रहे हैं। कुछ रिटायर्ड जज भी अब खूब भाषण दे रहे हैं। चाहे एएस ओका हो, चाहे संजीव खन्ना हो, उनके भाषणों में भी उसी तरीके की सोच साफ नजर आ रही है जिसे वामपंथी और कांग्रेसी सोच कहा जाता है। ये सोच अगर राष्ट्र हित में होती तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन ये सोच प्रगतिशीलता के नाम पर राष्ट्र की सुरक्षा को, राष्ट्र  की संस्कृति को सब कुछ जाम लगाने पर राजी है। क्योंकि वो अपने आप को प्रगतिशील मानते हैं। एक तरफ सीजीआई कहते हैं कि कोई भी कानून देश की संस्कृति, देश की नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के खिलाफ नहीं हो सकता। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के तमाम जो फैसले हैं वो नैतिकता के भी खिलाफ है। भारतीय सामाजिक ताने-बाने के भी खिलाफ है। मैं किस-किस फैसले की बात करूं? चंचू साहब के मामले में तो बहुत सारे ऐसे फैसले आए थे जिसमें समलैंगिकों की शादी की बात हो या फिर दूसरे अवैध संबंधों को लेकर उनके जो फैसले थे क्या वो भारतीय सामाजिकता भारतीय  नैतिकता के अनुरूप थे अगर नहीं थे तो सुप्रीम कोर्ट ने उन सबको क्यों दिया यही प्रश्न देश की जनता को समझना है कि इनकी जो मनमानी चल रही है पेंडिंग केसेस पे ये कुछ नहीं करते वैकेंसी पड़ी हुई है 25% से ज्यादा ज्यादा डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट के लेवल पर जुडिशरी में वैकेंसी है। 30% की वैकेंसी है हाई कोर्ट्स के अंदर और अभी तक जैसा देखने को मिल रहा है कि सभी हाई कोर्ट में नियुक्तियां हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा वैकेंसी जहां इलाहाबाद हाई कोर्ट में है। 50% के करीब पद खाली हैं। 80 के करीब जजों के पद खाली है। अभी

तक वहां पिछले चार छ महीने या एक साल में 10 जजेस भी नियुक्त नहीं किए गए हैं। इसके पीछे क्या वजह है? क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट को आप अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते हैं? और ऐसा सीजीआई खुद बता चुके हैं कि सबसे पहले सीजीआई का जो कॉलेजियम है तीन जजों का तीन सीनियर मोस्ट जजेस का वो नामों की सिफारिश करता है। फिर हाई कोर्ट का जो कॉलेजियम होता है वो उन पर विचार करता है और उन नामों को राज्यपाल को भेजता है। फिर उसके बाद प्रक्रिया आती है कि फिर से वो नाम सुप्रीम कोर्ट आते हैं। यहां से फिर वो कानून मंत्री को जाते हैं, प्रधानमंत्री


को जाते हैं और राष्ट्रपति को जाते हैं। यानी कि हाई कोर्ट्स में भी जो नियुक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वह सुप्रीम कोर्ट की ही है। अगर डिफेक्टो देखा जाए तो तो फिर वो क्यों इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी तक नियुक्ति करने से बचते हुए नजर आ रहे हैं। इन सब बातों पर जनता को ध्यान देने की जरूरत है।जिस तरीके से तुषार मेहता साहब ने और कल भी जिस तरीके से तुषार मेहता और अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुराने गुनाहों को याद दिलाने की  कोशिश की है। उसके बाद ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने दो साथियों द्वारा लिए गए उन फैसलों पर सही तरीके से विचार करके राष्ट्रपति के सवालों का जवाब देना चाहिए।



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राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

 


राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सरकार की तरफ से पहले अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने अपनी दलीलें कल रखी थी और उसके बाद नंबर आया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जो कि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपनी दलीलें देते हुए नजर आ रहे हैं। 3 घंटे के करीब दलीलें दी थी अटर्नी जनरल ने और 5 घंटे के करीब दलीलें दे चुके हैं अटर्नी जनरल। अभी उनकी दलीलें समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जिस तरीके से इस पूरी सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आठ दिन की सुनवाई का समय निर्धारित किया है। उसमें चार दिन सरकार के और पक्ष में जो स्टेट बोलेंगे उनके लिए रखे हैं और चार दिन रखे हैं उन स्टेट्स के वकील्स के लिए वकीलों के लिए जो कि इसके विरोध में जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा गया है उसके विरोध में दलीलें रखेंगे। जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम क्योंकि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस है और स्टेट गवर्नमेंट जो राष्ट्रपति के फैसले के पक्ष में है, राज्यपाल के फैसले के पक्ष में है, उन्हें ज्यादा समय मिलना चाहिए था। लेकिन क्या कह सकते हैं? सीजीआई का निर्णय है। पांच जजों की बेंच इस पूरे केस की सुनवाई कर रही है। या फिर कहें कि राष्ट्रपति के 14 सवालों पर जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही है। लेकिन अभी तक जो दो दिन की कार्यवाही हुई है उसमें केवल चार जज ही पूछताछ करते हुए या प्रश्न पूछते हुए नजर आ रहे हैं। क्रॉस क्वेश्चन करते हुए नजर आ रहे हैं। पांचवें जो जज हैं अभी तक वो कुछ नहीं बोले हैं।

 सीजीआई बी आर गवई सवाल करते हैं, जस्टिस सूर्यकांत सवाल करते हैं, जस्टिस विक्रमनाथ सवाल करते हैं और जस्टिस पी एस नरसिम्हा सवाल करते हैं। लेकिन 4th जस्टिस अब तक कोई सवाल करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ किस तरीके से अटर्नी जनरल ने तमाम सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच के अधिकारों के ऊपर। उनका जो अधिकार क्षेत्र है उसके ऊपर उन्होंने जो कुछ अतिक्रमण किया उसके ऊपर और साथ ही साथ यह सवाल भी उन्होंने लंच के बाद उठाया था कि आर्टिकल 142 क्या पूरे संविधान के बाकी अनुच्छेदों को बाईपास करके सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा पावर दे सकता है या दे चुका है? उन्होंने बहुत तल्खी के साथ टिप्पणियां की थी जिसका संदेश साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को चला गया था और जब तुषार मेहता ने अपनी दलीलें शुरू की तो उन्होंने भी शुरुआत उसी अंदाज में की और उन्होंने कहा कि जिस तरीके की बातें की जा रही हैं जिस तरीके से आप लोगों के जेस्चर दिख रहे हैं लिप लिप रीडिंग हम अगर कर पा रहे हैं तो उसके बाद मैं इस मामले को हल्के-फुल्के अंदाज समय शुरू नहीं कर सकता।


 मेहता की मुख्य जो दलील है वो राज्यपाल को जो आर्टिकल 200 के तहत अधिकार मिले हुए हैं और उसके समर्थन में जो संविधान के तमाम अनुच्छेदों का उल्लेख उन्होंने किया है। उस पर उन्होंने बात की और इसी चर्चा में 5 घंटे का समय लग गया। बार-बार बेंच की तरफ से जिस तरीके से क्वेश्चंस हो रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि जो बेंच है जो दो जजों की बेंच ने फैसला लिया था उस फैसले को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रही है। इस सुनवाई के दौरान अंत में तुषार मेहता को यह भी कहना पड़ा कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि राज्यपाल के पास जो आर्टिकल 200 के तहत किसी भी विधेयक को रोकने की ताकत मिली हुई है वो अनावश्यक है। संविधान में गैर जरूरी जोड़ी गई है। यानी जिस तरीके के सवालात किए जा रहे थे, जिस अंदाज में सवालात किए जा रहे थे, उसके   बाद यह कहने के लिए सॉललीिसिटर जनरल को मजबूर होना पड़ा। कल जिस तरीके से अटर्नी जनरल ने ये कह दिया था कि सुप्रीम कोर्ट दोबारा से संविधान को लिखना चाहता है कि क्या लिख सकता है जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर है। आज चर्चा के दौरान जब सॉललीिसिटर जनरल ने यह कहा कि एक दिमाग में बात लोगों के यह बैठी हुई है कि जो राज्यपाल होते हैं वो अनइेड है। जबकि राष्ट्रपति इनडायरेक्टली इेड होते हैं। इसलिए लोगों के दिमाग में बहुत सी बातें आती हैं। इस पर सीजीआई ने जवाब दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राज्यपाल  राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत स्टेट के हेड होते हैं और हम भी तो राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत हैं। इससे पता चलता है कि इतना इन लोगों को याद तो है कि यह राष्ट्रपति के अंडर आते हैं लेकिन अभी उसको खुलकर मानते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

 यह एहसास क्यों नहीं हो पा रहा है कि उनके दो जजों ने राष्ट्रपति का जो अधिकार है उसको कम करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति को समय सीमा में जो बांधने की कोशिश की है। वो उनका अधिकार कैसे हो सकता है? जब वह हाई कोर्ट के जज को आदेश नहीं दे सकते तो वह राज्यपाल और राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकते हैं जो कि एक स्टेट में स्टेट हेड है और दूसरे राष्ट्र के नेशन के हेड हैं। संविधान के अनुसार भारत की जो तीनों ही शक्तियां होती है कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका उनके हेड राष्ट्रपति होते हैं। उसी तरीके से राज्यपाल, विधायिका के भी हेड होते हैं। विधायिका का गठन उनको शामिल करके ही माना जाता है। उसी तरीके से कार्यपालिका यानी कि मंत्रिमंडल भी राज्यपाल के समेत ही पूरा माना जाता है। और न्यायपालिका जो राज्यों में भी हाई कोर्ट होते हैं उसमें भी जब कॉलेजियम सिफारिश करता है जजों के नामों की तो वो पहले राज्यपाल की सहमति लेता है। यानी कि वो न्यायपालिका के हेड भी होते हैं स्टेट में। ऐसी स्थिति में फिर कैसे दो जजों की बेंच ने इतना बड़ा ब्लंडर कर दिया। यही सवाल है और इसी को बार-बार अब साबित करने के लिए संवैधानिक उपबंधों को लेने के लिए तुषार मेहता जी ने तमाम ऐसे विवरण दिए जिसमें 1919 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 का एक्ट, तमाम दूसरे एक्ट और दूसरे राज्यों को लेकर जो फैसले हुए थे उनकी भी चर्चा की। उसमें उन्होंने यह भी बताया कि यह जो दो जजों की बेंच थी इसने पांच और सात जजों की बेंच के फैसलों को भी नजरअंदाज कर दिया था। इस पर सीजीआई ने कहा कि वो दो जजों की बेंच ऐसा कैसे कर  सकती? इससे तो ऐसा लगता है कि यह जो बेंच बैठी हुई है यह पहले से कुछ मन बनाकर बैठी हुई है और इसी चीज को आज सुनवाई के दौरान जजों की तरफ से भी कहा गया कि यह ना समझा जाए कि हम इस मामले में राज्यपाल की शक्तियों पर जो सवाल उठा रहे हैं।

हम किसी प्रीजुडिस से यानी कि पहले से ही कुछ मन बनाकर बैठे हुए हैं। ये केवल हम पूरे मामले को सही तरीके से रखे जाने के लिए सवाल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरीके से टाइम अलॉट किया गया है, जिस तरीके से वकीलों की फौज बुलाई गई है अपने समर्थन के लिए और उनको बराबर का समय दिया गया है, उससे तो  भावनाएं साफ जाहिर होती है। हालांकि सुनवाई अभी दो ही दिन की हुई है। इसके अलावा छ दिन की सुनवाई और होनी है। जैसा शेड्यूल बताया गया है उसके हिसाब से अब 21 और 26 तारीख को जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस है उसके पक्ष में सुनवाई होगी और 28 2 39 सितंबर में यह जो सुनवाई होगी उसमें कपिल सिबल सिंह भी के के वेणुगोपाल पी बिल्सन जैसे जो वकील हैं जो एक तरीके से पारदी वाला और आर महादेवन के फैसले का बचाव करते हुए नजर आएंगे उनको समय अलॉट किया गया है। एक दिन का समय इन सब पर काउंटर के लिए 10 सितंबर का रखा गया है। सॉलिसिटर जनरल ने तमाम इसके रेफरेंस दिए। आजादी से पहले के भी रेफरेंस दिए। आजादी के बाद के भी रेफरेंस दिए और संविधान के तमाम अनुच्छेदों को बताने की कोशिश की। लेकिन जिस तरीके से क्रश क्वेश्चनिंग की गई उसकी वजह से आज केवल और केवल आर्टिकल 200 पर ही सवा चार घंटे चर्चा हो पाई जिसमें या तो सॉललीिसिटर जनरल बोले और थोड़ी देर के लिए नवीन किशन कॉल जो कि मध्य प्रदेश स्टेट की तरफ से हैं वो बोले और एक बार इस पूरे मामले में  घुसने की कोशिश की कपिल सिब्बल ने। उन्होंने यह कहने की कोशिश की कि अगर ऐसे किया गया तो फिर आर्टिकल वन का पूरा का पूरा मीनिंग बदल जाएगा। यानी ये जो वकील बैठे हैं वो कार्यवाही में सब कुछ नोट कर रहे हैं कि हमें किस तरीके से इस पूरे मामले को पलटना है।


 राष्ट्रपति ने जो सवाल पूछे हैं उसके बाद जो भी निर्णय आएगा वो देश के भविष्य को तय करेगा। इसलिए हमने कल भी कहा था कि यह जो फैसला है, इसकी जानकारी इसमें क्या-क्या हो रहा है, क्या-क्या मुद्दे रखे जा रहे हैं, क्या-क्या दलीलें दी जा रही है? और सुप्रीम कोर्ट की जो बेंच है, उसका  रिएक्शन क्या है, इसको देश के हर नागरिक को जानना ही चाहिए। इसीलिए हम इस पूरी बहस को आपको जिसज दिन बहस होगी, उसमें जितनी जरूरत पड़ेगी, उतना बड़ा वीडियो बनाकर आपको एक एक बारीकी, बड़े ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुद्दा महत्वपूर्ण इसलिए है कि अगर इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के सवालों का सही तरीके से जवाब ना दिया गया। जस्टिस पारदीवाला और आर महादेवन ने जो कुछ किया था उसको नहीं सुधारा गया तो आप समझ लीजिए कि देश के हालात बहुत ही दयनीय होने वाले हैं। फिर उसके बाद चाहे तमिलनाडु हो, केरल हो, कर्नाटक हो, जहांजहां केंद्र सरकार के  जो विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं वो सब के सब इस तरीके के विधेयक लेकर आएंगे और उन विधेयकों को डीम्ड एसेंट मान लिया जाएगा। सॉलिसिटीज ने आज यह सवाल भी उठाया कि जब लेजिस्लेचर की पूर्णता ही राज्यपाल को शामिल होने के बाद होती है तो फिर अगर राज्यपाल साइन नहीं करेगा तो वो विधेयक लेजिस्लेचर से पास कैसे मान लिया जाएगा क्योंकि लेजिस्लेचर का ही हिस्सा होते हैं राज्यपाल और संसद का हिस्सा होते हैं राष्ट्रपति इसलिए तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत होती है और आप कह रहे हैं कि उनके हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है वो बिना  राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही कानून बन जाएगा जो कि संविधान का जो मूल भावना है उसके खिलाफ है औरकि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपॉइंट किए जाते हैं राज्यपाल इसलिए उनकी जिम्मेदारी यह भी होती है कि कोई भी ऐसा कानून जो केंद्र सरकार ने बनाया है राज्य सरकार या राज्य की विधानसभा उसके विरोध में या उससे टकराव वाला कानून ना पास करे इसलिए तो यह जो विद करने की या फिर कहें कि अपने पास रोकने की ताकत राज्यपाल को मिली हुई है। आप उसको क्या यह कहना चाहते हैं कि यह बेकार है यह अनावश्यक है और क्या कोर्ट ये डिसाइड कर सकता है? क्या कोर्ट इस हद तक जा सकता है  कि उसकी जो फैसला है वो संवैधानिक अमेंडमेंट की शक्ल ले ले। इन सारी बहसों पर जो प्रतिक्रिया दी गई है जस्टिस बी आर गवई के द्वारा जस्टिस पी एस नरसिम्हा के द्वारा जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रमनाथ के द्वारा उससे आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। आपको याद होगा कि इन दोनों जजों की ही बेंच ने दो और फैसले दिए थे। एक में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को सजा दे दी थी और दूसरे फैसला दिया था जो गलियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर। लेकिन चीफ जस्टिस ने दोनों ही फैसलों को हस्तक्षेप करके बदलवा दिया या बदल दिया। पर यहां पूरे राष्ट्र


का मुद्दा है। देश के संवैधानिक प्रमुख के अधिकारों का मुद्दा है। यहां राज्य के हेड का मुद्दा है। उसके बावजूद बेंच का जो नजरिया है वो उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे वजह ये है कि पहले जो दो मुद्दे थे उनमें से इलाहाबाद हाईकोर्ट वाले केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने पत्र लिख दिया था सुप्रीम कोर्ट को और चीफ जस्टिस को कि इनकी बात को ना माना जाए। और दूसरे मुद्दे में पब्लिक सड़क पर आ गई थी। पब्लिक के विरोध के रिएक्शन को देखकर जो चीफ जस्टिस थे उन्होंने फैसला पलट दिया था। लेकिन यह जो मामला है इस पर कोई रिएक्शन देखने को नहीं


मिला है। पब्लिक को समझ में ही नहीं आ रहा है।


आने वाले भविष्य की उस रूपरेखा को नहीं देख पा रहे हैं जो इस फैसले के बाद देश के सामने पैदा हो सकती है। हम शुरुआत से बता रहे हैं कि अगर केजरीवाल जैसा कोई मुख्यमंत्री हो जिसके पास 70% से ज्यादा विधायक हो वो किसी भी तरीके का फैसला पारित कर सकता है और केजरीवाल ने ऐसे फैसले पारित करने की कोशिश भी की थी। केजरीवाल की पार्टी की पंजाब में सरकार है और इस मुद्दे को उठाया भी गया तुषार मेहता जी के द्वारा कि अगर  कोई बॉर्डरिंग स्टेट कुछ ऐसा फैसला ऐसा फैसला ले ले जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा हो या फिर कोई दूसरी स्टेट इंटरनेशनल ट्रेड की किसी ट्रीटी को नकारने का फैसला ले ले तो क्या यह राज्यपाल की बिना सहमति के कानून माना जाएगा तो उस स्थिति में क्या होगा? क्या देश के कूटनीतिक संबंधों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या देश की संप्रभुता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? सुरक्षा पर सवाल नहीं पड़ेगा? तो इस तरीके की चीजें जब इनवॉल्व है तो इसीलिए हम चाहते हैं कि देश की आम जनता भी इस मुद्दे को फॉलो करें। इसको सुने, इसको समझे  जो कुछ सुप्रीम कोर्ट पिछले 10 12 सालों में करने की कोशिश कर रहा है, आप देखेंगे कि कोई ऐसा डिपार्टमेंट नहीं है जिसमें सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। अभी राज्यपालों की नियुक्तियों में इनडायरेक्टली वो घुस चुके हैं। अभी उपराष्ट्रपति के चुनाव में एक पूर्व रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज को नॉमिनेट कर दिया गया है विपक्षी पार्टियों के द्वारा। तो इसमें कोई बड़ी आशंका नहीं है कि जब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होता हुआ विपक्ष को ना दिखे तो विपक्ष की तरफ से किसी सुप्रीम कोर्ट  के रिटायर्ड जज को ही प्रधानमंत्री कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ा दिया जाए और जिस तरीके से हमारे तमाम सुप्रीम कोर्ट के जज आजकल भाषण दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो भी इसकी तैयारी करते हुए नजर आ रहे हैं। कुछ रिटायर्ड जज भी अब खूब भाषण दे रहे हैं। चाहे एएस ओका हो, चाहे संजीव खन्ना हो, उनके भाषणों में भी उसी तरीके की सोच साफ नजर आ रही है जिसे वामपंथी और कांग्रेसी सोच कहा जाता है। ये सोच अगर राष्ट्र हित में होती तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन ये सोच प्रगतिशीलता के नाम पर राष्ट्र की सुरक्षा को, राष्ट्र  की संस्कृति को सब कुछ जाम लगाने पर राजी है। क्योंकि वो अपने आप को प्रगतिशील मानते हैं। एक तरफ सीजीआई कहते हैं कि कोई भी कानून देश की संस्कृति, देश की नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के खिलाफ नहीं हो सकता। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के तमाम जो फैसले हैं वो नैतिकता के भी खिलाफ है। भारतीय सामाजिक ताने-बाने के भी खिलाफ है। मैं किस-किस फैसले की बात करूं? चंचू साहब के मामले में तो बहुत सारे ऐसे फैसले आए थे जिसमें समलैंगिकों की शादी की बात हो या फिर दूसरे अवैध संबंधों को लेकर उनके जो फैसले थे क्या वो भारतीय सामाजिकता भारतीय  नैतिकता के अनुरूप थे अगर नहीं थे तो सुप्रीम कोर्ट ने उन सबको क्यों दिया यही प्रश्न देश की जनता को समझना है कि इनकी जो मनमानी चल रही है पेंडिंग केसेस पे ये कुछ नहीं करते वैकेंसी पड़ी हुई है 25% से ज्यादा ज्यादा डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट के लेवल पर जुडिशरी में वैकेंसी है। 30% की वैकेंसी है हाई कोर्ट्स के अंदर और अभी तक जैसा देखने को मिल रहा है कि सभी हाई कोर्ट में नियुक्तियां हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा वैकेंसी जहां इलाहाबाद हाई कोर्ट में है। 50% के करीब पद खाली हैं। 80 के करीब जजों के पद खाली है। अभी

तक वहां पिछले चार छ महीने या एक साल में 10 जजेस भी नियुक्त नहीं किए गए हैं। इसके पीछे क्या वजह है? क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट को आप अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते हैं? और ऐसा सीजीआई खुद बता चुके हैं कि सबसे पहले सीजीआई का जो कॉलेजियम है तीन जजों का तीन सीनियर मोस्ट जजेस का वो नामों की सिफारिश करता है। फिर हाई कोर्ट का जो कॉलेजियम होता है वो उन पर विचार करता है और उन नामों को राज्यपाल को भेजता है। फिर उसके बाद प्रक्रिया आती है कि फिर से वो नाम सुप्रीम कोर्ट आते हैं। यहां से फिर वो कानून मंत्री को जाते हैं, प्रधानमंत्री


को जाते हैं और राष्ट्रपति को जाते हैं। यानी कि हाई कोर्ट्स में भी जो नियुक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वह सुप्रीम कोर्ट की ही है। अगर डिफेक्टो देखा जाए तो तो फिर वो क्यों इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी तक नियुक्ति करने से बचते हुए नजर आ रहे हैं। इन सब बातों पर जनता को ध्यान देने की जरूरत है।जिस तरीके से तुषार मेहता साहब ने और कल भी जिस तरीके से तुषार मेहता और अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुराने गुनाहों को याद दिलाने की  कोशिश की है। उसके बाद ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने दो साथियों द्वारा लिए गए उन फैसलों पर सही तरीके से विचार करके राष्ट्रपति के सवालों का जवाब देना चाहिए।



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August 22, 2025 at 11:13AM

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई
राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

 


राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सरकार की तरफ से पहले अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने अपनी दलीलें कल रखी थी और उसके बाद नंबर आया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जो कि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपनी दलीलें देते हुए नजर आ रहे हैं। 3 घंटे के करीब दलीलें दी थी अटर्नी जनरल ने और 5 घंटे के करीब दलीलें दे चुके हैं अटर्नी जनरल। अभी उनकी दलीलें समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जिस तरीके से इस पूरी सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आठ दिन की सुनवाई का समय निर्धारित किया है। उसमें चार दिन सरकार के और पक्ष में जो स्टेट बोलेंगे उनके लिए रखे हैं और चार दिन रखे हैं उन स्टेट्स के वकील्स के लिए वकीलों के लिए जो कि इसके विरोध में जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा गया है उसके विरोध में दलीलें रखेंगे। जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम क्योंकि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस है और स्टेट गवर्नमेंट जो राष्ट्रपति के फैसले के पक्ष में है, राज्यपाल के फैसले के पक्ष में है, उन्हें ज्यादा समय मिलना चाहिए था। लेकिन क्या कह सकते हैं? सीजीआई का निर्णय है। पांच जजों की बेंच इस पूरे केस की सुनवाई कर रही है। या फिर कहें कि राष्ट्रपति के 14 सवालों पर जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही है। लेकिन अभी तक जो दो दिन की कार्यवाही हुई है उसमें केवल चार जज ही पूछताछ करते हुए या प्रश्न पूछते हुए नजर आ रहे हैं। क्रॉस क्वेश्चन करते हुए नजर आ रहे हैं। पांचवें जो जज हैं अभी तक वो कुछ नहीं बोले हैं।

 सीजीआई बी आर गवई सवाल करते हैं, जस्टिस सूर्यकांत सवाल करते हैं, जस्टिस विक्रमनाथ सवाल करते हैं और जस्टिस पी एस नरसिम्हा सवाल करते हैं। लेकिन 4th जस्टिस अब तक कोई सवाल करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ किस तरीके से अटर्नी जनरल ने तमाम सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच के अधिकारों के ऊपर। उनका जो अधिकार क्षेत्र है उसके ऊपर उन्होंने जो कुछ अतिक्रमण किया उसके ऊपर और साथ ही साथ यह सवाल भी उन्होंने लंच के बाद उठाया था कि आर्टिकल 142 क्या पूरे संविधान के बाकी अनुच्छेदों को बाईपास करके सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा पावर दे सकता है या दे चुका है? उन्होंने बहुत तल्खी के साथ टिप्पणियां की थी जिसका संदेश साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को चला गया था और जब तुषार मेहता ने अपनी दलीलें शुरू की तो उन्होंने भी शुरुआत उसी अंदाज में की और उन्होंने कहा कि जिस तरीके की बातें की जा रही हैं जिस तरीके से आप लोगों के जेस्चर दिख रहे हैं लिप लिप रीडिंग हम अगर कर पा रहे हैं तो उसके बाद मैं इस मामले को हल्के-फुल्के अंदाज समय शुरू नहीं कर सकता।


 मेहता की मुख्य जो दलील है वो राज्यपाल को जो आर्टिकल 200 के तहत अधिकार मिले हुए हैं और उसके समर्थन में जो संविधान के तमाम अनुच्छेदों का उल्लेख उन्होंने किया है। उस पर उन्होंने बात की और इसी चर्चा में 5 घंटे का समय लग गया। बार-बार बेंच की तरफ से जिस तरीके से क्वेश्चंस हो रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि जो बेंच है जो दो जजों की बेंच ने फैसला लिया था उस फैसले को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रही है। इस सुनवाई के दौरान अंत में तुषार मेहता को यह भी कहना पड़ा कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि राज्यपाल के पास जो आर्टिकल 200 के तहत किसी भी विधेयक को रोकने की ताकत मिली हुई है वो अनावश्यक है। संविधान में गैर जरूरी जोड़ी गई है। यानी जिस तरीके के सवालात किए जा रहे थे, जिस अंदाज में सवालात किए जा रहे थे, उसके   बाद यह कहने के लिए सॉललीिसिटर जनरल को मजबूर होना पड़ा। कल जिस तरीके से अटर्नी जनरल ने ये कह दिया था कि सुप्रीम कोर्ट दोबारा से संविधान को लिखना चाहता है कि क्या लिख सकता है जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर है। आज चर्चा के दौरान जब सॉललीिसिटर जनरल ने यह कहा कि एक दिमाग में बात लोगों के यह बैठी हुई है कि जो राज्यपाल होते हैं वो अनइेड है। जबकि राष्ट्रपति इनडायरेक्टली इेड होते हैं। इसलिए लोगों के दिमाग में बहुत सी बातें आती हैं। इस पर सीजीआई ने जवाब दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राज्यपाल  राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत स्टेट के हेड होते हैं और हम भी तो राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत हैं। इससे पता चलता है कि इतना इन लोगों को याद तो है कि यह राष्ट्रपति के अंडर आते हैं लेकिन अभी उसको खुलकर मानते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

 यह एहसास क्यों नहीं हो पा रहा है कि उनके दो जजों ने राष्ट्रपति का जो अधिकार है उसको कम करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति को समय सीमा में जो बांधने की कोशिश की है। वो उनका अधिकार कैसे हो सकता है? जब वह हाई कोर्ट के जज को आदेश नहीं दे सकते तो वह राज्यपाल और राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकते हैं जो कि एक स्टेट में स्टेट हेड है और दूसरे राष्ट्र के नेशन के हेड हैं। संविधान के अनुसार भारत की जो तीनों ही शक्तियां होती है कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका उनके हेड राष्ट्रपति होते हैं। उसी तरीके से राज्यपाल, विधायिका के भी हेड होते हैं। विधायिका का गठन उनको शामिल करके ही माना जाता है। उसी तरीके से कार्यपालिका यानी कि मंत्रिमंडल भी राज्यपाल के समेत ही पूरा माना जाता है। और न्यायपालिका जो राज्यों में भी हाई कोर्ट होते हैं उसमें भी जब कॉलेजियम सिफारिश करता है जजों के नामों की तो वो पहले राज्यपाल की सहमति लेता है। यानी कि वो न्यायपालिका के हेड भी होते हैं स्टेट में। ऐसी स्थिति में फिर कैसे दो जजों की बेंच ने इतना बड़ा ब्लंडर कर दिया। यही सवाल है और इसी को बार-बार अब साबित करने के लिए संवैधानिक उपबंधों को लेने के लिए तुषार मेहता जी ने तमाम ऐसे विवरण दिए जिसमें 1919 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 का एक्ट, तमाम दूसरे एक्ट और दूसरे राज्यों को लेकर जो फैसले हुए थे उनकी भी चर्चा की। उसमें उन्होंने यह भी बताया कि यह जो दो जजों की बेंच थी इसने पांच और सात जजों की बेंच के फैसलों को भी नजरअंदाज कर दिया था। इस पर सीजीआई ने कहा कि वो दो जजों की बेंच ऐसा कैसे कर  सकती? इससे तो ऐसा लगता है कि यह जो बेंच बैठी हुई है यह पहले से कुछ मन बनाकर बैठी हुई है और इसी चीज को आज सुनवाई के दौरान जजों की तरफ से भी कहा गया कि यह ना समझा जाए कि हम इस मामले में राज्यपाल की शक्तियों पर जो सवाल उठा रहे हैं।

हम किसी प्रीजुडिस से यानी कि पहले से ही कुछ मन बनाकर बैठे हुए हैं। ये केवल हम पूरे मामले को सही तरीके से रखे जाने के लिए सवाल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरीके से टाइम अलॉट किया गया है, जिस तरीके से वकीलों की फौज बुलाई गई है अपने समर्थन के लिए और उनको बराबर का समय दिया गया है, उससे तो  भावनाएं साफ जाहिर होती है। हालांकि सुनवाई अभी दो ही दिन की हुई है। इसके अलावा छ दिन की सुनवाई और होनी है। जैसा शेड्यूल बताया गया है उसके हिसाब से अब 21 और 26 तारीख को जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस है उसके पक्ष में सुनवाई होगी और 28 2 39 सितंबर में यह जो सुनवाई होगी उसमें कपिल सिबल सिंह भी के के वेणुगोपाल पी बिल्सन जैसे जो वकील हैं जो एक तरीके से पारदी वाला और आर महादेवन के फैसले का बचाव करते हुए नजर आएंगे उनको समय अलॉट किया गया है। एक दिन का समय इन सब पर काउंटर के लिए 10 सितंबर का रखा गया है। सॉलिसिटर जनरल ने तमाम इसके रेफरेंस दिए। आजादी से पहले के भी रेफरेंस दिए। आजादी के बाद के भी रेफरेंस दिए और संविधान के तमाम अनुच्छेदों को बताने की कोशिश की। लेकिन जिस तरीके से क्रश क्वेश्चनिंग की गई उसकी वजह से आज केवल और केवल आर्टिकल 200 पर ही सवा चार घंटे चर्चा हो पाई जिसमें या तो सॉललीिसिटर जनरल बोले और थोड़ी देर के लिए नवीन किशन कॉल जो कि मध्य प्रदेश स्टेट की तरफ से हैं वो बोले और एक बार इस पूरे मामले में  घुसने की कोशिश की कपिल सिब्बल ने। उन्होंने यह कहने की कोशिश की कि अगर ऐसे किया गया तो फिर आर्टिकल वन का पूरा का पूरा मीनिंग बदल जाएगा। यानी ये जो वकील बैठे हैं वो कार्यवाही में सब कुछ नोट कर रहे हैं कि हमें किस तरीके से इस पूरे मामले को पलटना है।


 राष्ट्रपति ने जो सवाल पूछे हैं उसके बाद जो भी निर्णय आएगा वो देश के भविष्य को तय करेगा। इसलिए हमने कल भी कहा था कि यह जो फैसला है, इसकी जानकारी इसमें क्या-क्या हो रहा है, क्या-क्या मुद्दे रखे जा रहे हैं, क्या-क्या दलीलें दी जा रही है? और सुप्रीम कोर्ट की जो बेंच है, उसका  रिएक्शन क्या है, इसको देश के हर नागरिक को जानना ही चाहिए। इसीलिए हम इस पूरी बहस को आपको जिसज दिन बहस होगी, उसमें जितनी जरूरत पड़ेगी, उतना बड़ा वीडियो बनाकर आपको एक एक बारीकी, बड़े ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुद्दा महत्वपूर्ण इसलिए है कि अगर इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के सवालों का सही तरीके से जवाब ना दिया गया। जस्टिस पारदीवाला और आर महादेवन ने जो कुछ किया था उसको नहीं सुधारा गया तो आप समझ लीजिए कि देश के हालात बहुत ही दयनीय होने वाले हैं। फिर उसके बाद चाहे तमिलनाडु हो, केरल हो, कर्नाटक हो, जहांजहां केंद्र सरकार के  जो विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं वो सब के सब इस तरीके के विधेयक लेकर आएंगे और उन विधेयकों को डीम्ड एसेंट मान लिया जाएगा। सॉलिसिटीज ने आज यह सवाल भी उठाया कि जब लेजिस्लेचर की पूर्णता ही राज्यपाल को शामिल होने के बाद होती है तो फिर अगर राज्यपाल साइन नहीं करेगा तो वो विधेयक लेजिस्लेचर से पास कैसे मान लिया जाएगा क्योंकि लेजिस्लेचर का ही हिस्सा होते हैं राज्यपाल और संसद का हिस्सा होते हैं राष्ट्रपति इसलिए तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत होती है और आप कह रहे हैं कि उनके हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है वो बिना  राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही कानून बन जाएगा जो कि संविधान का जो मूल भावना है उसके खिलाफ है औरकि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपॉइंट किए जाते हैं राज्यपाल इसलिए उनकी जिम्मेदारी यह भी होती है कि कोई भी ऐसा कानून जो केंद्र सरकार ने बनाया है राज्य सरकार या राज्य की विधानसभा उसके विरोध में या उससे टकराव वाला कानून ना पास करे इसलिए तो यह जो विद करने की या फिर कहें कि अपने पास रोकने की ताकत राज्यपाल को मिली हुई है। आप उसको क्या यह कहना चाहते हैं कि यह बेकार है यह अनावश्यक है और क्या कोर्ट ये डिसाइड कर सकता है? क्या कोर्ट इस हद तक जा सकता है  कि उसकी जो फैसला है वो संवैधानिक अमेंडमेंट की शक्ल ले ले। इन सारी बहसों पर जो प्रतिक्रिया दी गई है जस्टिस बी आर गवई के द्वारा जस्टिस पी एस नरसिम्हा के द्वारा जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रमनाथ के द्वारा उससे आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। आपको याद होगा कि इन दोनों जजों की ही बेंच ने दो और फैसले दिए थे। एक में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को सजा दे दी थी और दूसरे फैसला दिया था जो गलियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर। लेकिन चीफ जस्टिस ने दोनों ही फैसलों को हस्तक्षेप करके बदलवा दिया या बदल दिया। पर यहां पूरे राष्ट्र


का मुद्दा है। देश के संवैधानिक प्रमुख के अधिकारों का मुद्दा है। यहां राज्य के हेड का मुद्दा है। उसके बावजूद बेंच का जो नजरिया है वो उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे वजह ये है कि पहले जो दो मुद्दे थे उनमें से इलाहाबाद हाईकोर्ट वाले केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने पत्र लिख दिया था सुप्रीम कोर्ट को और चीफ जस्टिस को कि इनकी बात को ना माना जाए। और दूसरे मुद्दे में पब्लिक सड़क पर आ गई थी। पब्लिक के विरोध के रिएक्शन को देखकर जो चीफ जस्टिस थे उन्होंने फैसला पलट दिया था। लेकिन यह जो मामला है इस पर कोई रिएक्शन देखने को नहीं


मिला है। पब्लिक को समझ में ही नहीं आ रहा है।


आने वाले भविष्य की उस रूपरेखा को नहीं देख पा रहे हैं जो इस फैसले के बाद देश के सामने पैदा हो सकती है। हम शुरुआत से बता रहे हैं कि अगर केजरीवाल जैसा कोई मुख्यमंत्री हो जिसके पास 70% से ज्यादा विधायक हो वो किसी भी तरीके का फैसला पारित कर सकता है और केजरीवाल ने ऐसे फैसले पारित करने की कोशिश भी की थी। केजरीवाल की पार्टी की पंजाब में सरकार है और इस मुद्दे को उठाया भी गया तुषार मेहता जी के द्वारा कि अगर  कोई बॉर्डरिंग स्टेट कुछ ऐसा फैसला ऐसा फैसला ले ले जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा हो या फिर कोई दूसरी स्टेट इंटरनेशनल ट्रेड की किसी ट्रीटी को नकारने का फैसला ले ले तो क्या यह राज्यपाल की बिना सहमति के कानून माना जाएगा तो उस स्थिति में क्या होगा? क्या देश के कूटनीतिक संबंधों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या देश की संप्रभुता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? सुरक्षा पर सवाल नहीं पड़ेगा? तो इस तरीके की चीजें जब इनवॉल्व है तो इसीलिए हम चाहते हैं कि देश की आम जनता भी इस मुद्दे को फॉलो करें। इसको सुने, इसको समझे  जो कुछ सुप्रीम कोर्ट पिछले 10 12 सालों में करने की कोशिश कर रहा है, आप देखेंगे कि कोई ऐसा डिपार्टमेंट नहीं है जिसमें सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। अभी राज्यपालों की नियुक्तियों में इनडायरेक्टली वो घुस चुके हैं। अभी उपराष्ट्रपति के चुनाव में एक पूर्व रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज को नॉमिनेट कर दिया गया है विपक्षी पार्टियों के द्वारा। तो इसमें कोई बड़ी आशंका नहीं है कि जब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होता हुआ विपक्ष को ना दिखे तो विपक्ष की तरफ से किसी सुप्रीम कोर्ट  के रिटायर्ड जज को ही प्रधानमंत्री कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ा दिया जाए और जिस तरीके से हमारे तमाम सुप्रीम कोर्ट के जज आजकल भाषण दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो भी इसकी तैयारी करते हुए नजर आ रहे हैं। कुछ रिटायर्ड जज भी अब खूब भाषण दे रहे हैं। चाहे एएस ओका हो, चाहे संजीव खन्ना हो, उनके भाषणों में भी उसी तरीके की सोच साफ नजर आ रही है जिसे वामपंथी और कांग्रेसी सोच कहा जाता है। ये सोच अगर राष्ट्र हित में होती तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन ये सोच प्रगतिशीलता के नाम पर राष्ट्र की सुरक्षा को, राष्ट्र  की संस्कृति को सब कुछ जाम लगाने पर राजी है। क्योंकि वो अपने आप को प्रगतिशील मानते हैं। एक तरफ सीजीआई कहते हैं कि कोई भी कानून देश की संस्कृति, देश की नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के खिलाफ नहीं हो सकता। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के तमाम जो फैसले हैं वो नैतिकता के भी खिलाफ है। भारतीय सामाजिक ताने-बाने के भी खिलाफ है। मैं किस-किस फैसले की बात करूं? चंचू साहब के मामले में तो बहुत सारे ऐसे फैसले आए थे जिसमें समलैंगिकों की शादी की बात हो या फिर दूसरे अवैध संबंधों को लेकर उनके जो फैसले थे क्या वो भारतीय सामाजिकता भारतीय  नैतिकता के अनुरूप थे अगर नहीं थे तो सुप्रीम कोर्ट ने उन सबको क्यों दिया यही प्रश्न देश की जनता को समझना है कि इनकी जो मनमानी चल रही है पेंडिंग केसेस पे ये कुछ नहीं करते वैकेंसी पड़ी हुई है 25% से ज्यादा ज्यादा डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट के लेवल पर जुडिशरी में वैकेंसी है। 30% की वैकेंसी है हाई कोर्ट्स के अंदर और अभी तक जैसा देखने को मिल रहा है कि सभी हाई कोर्ट में नियुक्तियां हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा वैकेंसी जहां इलाहाबाद हाई कोर्ट में है। 50% के करीब पद खाली हैं। 80 के करीब जजों के पद खाली है। अभी

तक वहां पिछले चार छ महीने या एक साल में 10 जजेस भी नियुक्त नहीं किए गए हैं। इसके पीछे क्या वजह है? क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट को आप अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते हैं? और ऐसा सीजीआई खुद बता चुके हैं कि सबसे पहले सीजीआई का जो कॉलेजियम है तीन जजों का तीन सीनियर मोस्ट जजेस का वो नामों की सिफारिश करता है। फिर हाई कोर्ट का जो कॉलेजियम होता है वो उन पर विचार करता है और उन नामों को राज्यपाल को भेजता है। फिर उसके बाद प्रक्रिया आती है कि फिर से वो नाम सुप्रीम कोर्ट आते हैं। यहां से फिर वो कानून मंत्री को जाते हैं, प्रधानमंत्री


को जाते हैं और राष्ट्रपति को जाते हैं। यानी कि हाई कोर्ट्स में भी जो नियुक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वह सुप्रीम कोर्ट की ही है। अगर डिफेक्टो देखा जाए तो तो फिर वो क्यों इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी तक नियुक्ति करने से बचते हुए नजर आ रहे हैं। इन सब बातों पर जनता को ध्यान देने की जरूरत है।जिस तरीके से तुषार मेहता साहब ने और कल भी जिस तरीके से तुषार मेहता और अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुराने गुनाहों को याद दिलाने की  कोशिश की है। उसके बाद ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने दो साथियों द्वारा लिए गए उन फैसलों पर सही तरीके से विचार करके राष्ट्रपति के सवालों का जवाब देना चाहिए।



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August 22, 2025 at 09:42AM
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August 22, 2025 at 10:13AM

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

 


राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सरकार की तरफ से पहले अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने अपनी दलीलें कल रखी थी और उसके बाद नंबर आया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जो कि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपनी दलीलें देते हुए नजर आ रहे हैं। 3 घंटे के करीब दलीलें दी थी अटर्नी जनरल ने और 5 घंटे के करीब दलीलें दे चुके हैं अटर्नी जनरल। अभी उनकी दलीलें समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जिस तरीके से इस पूरी सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आठ दिन की सुनवाई का समय निर्धारित किया है। उसमें चार दिन सरकार के और पक्ष में जो स्टेट बोलेंगे उनके लिए रखे हैं और चार दिन रखे हैं उन स्टेट्स के वकील्स के लिए वकीलों के लिए जो कि इसके विरोध में जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा गया है उसके विरोध में दलीलें रखेंगे। जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम क्योंकि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस है और स्टेट गवर्नमेंट जो राष्ट्रपति के फैसले के पक्ष में है, राज्यपाल के फैसले के पक्ष में है, उन्हें ज्यादा समय मिलना चाहिए था। लेकिन क्या कह सकते हैं? सीजीआई का निर्णय है। पांच जजों की बेंच इस पूरे केस की सुनवाई कर रही है। या फिर कहें कि राष्ट्रपति के 14 सवालों पर जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही है। लेकिन अभी तक जो दो दिन की कार्यवाही हुई है उसमें केवल चार जज ही पूछताछ करते हुए या प्रश्न पूछते हुए नजर आ रहे हैं। क्रॉस क्वेश्चन करते हुए नजर आ रहे हैं। पांचवें जो जज हैं अभी तक वो कुछ नहीं बोले हैं।

 सीजीआई बी आर गवई सवाल करते हैं, जस्टिस सूर्यकांत सवाल करते हैं, जस्टिस विक्रमनाथ सवाल करते हैं और जस्टिस पी एस नरसिम्हा सवाल करते हैं। लेकिन 4th जस्टिस अब तक कोई सवाल करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ किस तरीके से अटर्नी जनरल ने तमाम सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच के अधिकारों के ऊपर। उनका जो अधिकार क्षेत्र है उसके ऊपर उन्होंने जो कुछ अतिक्रमण किया उसके ऊपर और साथ ही साथ यह सवाल भी उन्होंने लंच के बाद उठाया था कि आर्टिकल 142 क्या पूरे संविधान के बाकी अनुच्छेदों को बाईपास करके सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा पावर दे सकता है या दे चुका है? उन्होंने बहुत तल्खी के साथ टिप्पणियां की थी जिसका संदेश साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को चला गया था और जब तुषार मेहता ने अपनी दलीलें शुरू की तो उन्होंने भी शुरुआत उसी अंदाज में की और उन्होंने कहा कि जिस तरीके की बातें की जा रही हैं जिस तरीके से आप लोगों के जेस्चर दिख रहे हैं लिप लिप रीडिंग हम अगर कर पा रहे हैं तो उसके बाद मैं इस मामले को हल्के-फुल्के अंदाज समय शुरू नहीं कर सकता।


 मेहता की मुख्य जो दलील है वो राज्यपाल को जो आर्टिकल 200 के तहत अधिकार मिले हुए हैं और उसके समर्थन में जो संविधान के तमाम अनुच्छेदों का उल्लेख उन्होंने किया है। उस पर उन्होंने बात की और इसी चर्चा में 5 घंटे का समय लग गया। बार-बार बेंच की तरफ से जिस तरीके से क्वेश्चंस हो रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि जो बेंच है जो दो जजों की बेंच ने फैसला लिया था उस फैसले को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रही है। इस सुनवाई के दौरान अंत में तुषार मेहता को यह भी कहना पड़ा कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि राज्यपाल के पास जो आर्टिकल 200 के तहत किसी भी विधेयक को रोकने की ताकत मिली हुई है वो अनावश्यक है। संविधान में गैर जरूरी जोड़ी गई है। यानी जिस तरीके के सवालात किए जा रहे थे, जिस अंदाज में सवालात किए जा रहे थे, उसके   बाद यह कहने के लिए सॉललीिसिटर जनरल को मजबूर होना पड़ा। कल जिस तरीके से अटर्नी जनरल ने ये कह दिया था कि सुप्रीम कोर्ट दोबारा से संविधान को लिखना चाहता है कि क्या लिख सकता है जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर है। आज चर्चा के दौरान जब सॉललीिसिटर जनरल ने यह कहा कि एक दिमाग में बात लोगों के यह बैठी हुई है कि जो राज्यपाल होते हैं वो अनइेड है। जबकि राष्ट्रपति इनडायरेक्टली इेड होते हैं। इसलिए लोगों के दिमाग में बहुत सी बातें आती हैं। इस पर सीजीआई ने जवाब दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राज्यपाल  राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत स्टेट के हेड होते हैं और हम भी तो राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत हैं। इससे पता चलता है कि इतना इन लोगों को याद तो है कि यह राष्ट्रपति के अंडर आते हैं लेकिन अभी उसको खुलकर मानते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

 यह एहसास क्यों नहीं हो पा रहा है कि उनके दो जजों ने राष्ट्रपति का जो अधिकार है उसको कम करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति को समय सीमा में जो बांधने की कोशिश की है। वो उनका अधिकार कैसे हो सकता है? जब वह हाई कोर्ट के जज को आदेश नहीं दे सकते तो वह राज्यपाल और राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकते हैं जो कि एक स्टेट में स्टेट हेड है और दूसरे राष्ट्र के नेशन के हेड हैं। संविधान के अनुसार भारत की जो तीनों ही शक्तियां होती है कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका उनके हेड राष्ट्रपति होते हैं। उसी तरीके से राज्यपाल, विधायिका के भी हेड होते हैं। विधायिका का गठन उनको शामिल करके ही माना जाता है। उसी तरीके से कार्यपालिका यानी कि मंत्रिमंडल भी राज्यपाल के समेत ही पूरा माना जाता है। और न्यायपालिका जो राज्यों में भी हाई कोर्ट होते हैं उसमें भी जब कॉलेजियम सिफारिश करता है जजों के नामों की तो वो पहले राज्यपाल की सहमति लेता है। यानी कि वो न्यायपालिका के हेड भी होते हैं स्टेट में। ऐसी स्थिति में फिर कैसे दो जजों की बेंच ने इतना बड़ा ब्लंडर कर दिया। यही सवाल है और इसी को बार-बार अब साबित करने के लिए संवैधानिक उपबंधों को लेने के लिए तुषार मेहता जी ने तमाम ऐसे विवरण दिए जिसमें 1919 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 का एक्ट, तमाम दूसरे एक्ट और दूसरे राज्यों को लेकर जो फैसले हुए थे उनकी भी चर्चा की। उसमें उन्होंने यह भी बताया कि यह जो दो जजों की बेंच थी इसने पांच और सात जजों की बेंच के फैसलों को भी नजरअंदाज कर दिया था। इस पर सीजीआई ने कहा कि वो दो जजों की बेंच ऐसा कैसे कर  सकती? इससे तो ऐसा लगता है कि यह जो बेंच बैठी हुई है यह पहले से कुछ मन बनाकर बैठी हुई है और इसी चीज को आज सुनवाई के दौरान जजों की तरफ से भी कहा गया कि यह ना समझा जाए कि हम इस मामले में राज्यपाल की शक्तियों पर जो सवाल उठा रहे हैं।

हम किसी प्रीजुडिस से यानी कि पहले से ही कुछ मन बनाकर बैठे हुए हैं। ये केवल हम पूरे मामले को सही तरीके से रखे जाने के लिए सवाल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरीके से टाइम अलॉट किया गया है, जिस तरीके से वकीलों की फौज बुलाई गई है अपने समर्थन के लिए और उनको बराबर का समय दिया गया है, उससे तो  भावनाएं साफ जाहिर होती है। हालांकि सुनवाई अभी दो ही दिन की हुई है। इसके अलावा छ दिन की सुनवाई और होनी है। जैसा शेड्यूल बताया गया है उसके हिसाब से अब 21 और 26 तारीख को जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस है उसके पक्ष में सुनवाई होगी और 28 2 39 सितंबर में यह जो सुनवाई होगी उसमें कपिल सिबल सिंह भी के के वेणुगोपाल पी बिल्सन जैसे जो वकील हैं जो एक तरीके से पारदी वाला और आर महादेवन के फैसले का बचाव करते हुए नजर आएंगे उनको समय अलॉट किया गया है। एक दिन का समय इन सब पर काउंटर के लिए 10 सितंबर का रखा गया है। सॉलिसिटर जनरल ने तमाम इसके रेफरेंस दिए। आजादी से पहले के भी रेफरेंस दिए। आजादी के बाद के भी रेफरेंस दिए और संविधान के तमाम अनुच्छेदों को बताने की कोशिश की। लेकिन जिस तरीके से क्रश क्वेश्चनिंग की गई उसकी वजह से आज केवल और केवल आर्टिकल 200 पर ही सवा चार घंटे चर्चा हो पाई जिसमें या तो सॉललीिसिटर जनरल बोले और थोड़ी देर के लिए नवीन किशन कॉल जो कि मध्य प्रदेश स्टेट की तरफ से हैं वो बोले और एक बार इस पूरे मामले में  घुसने की कोशिश की कपिल सिब्बल ने। उन्होंने यह कहने की कोशिश की कि अगर ऐसे किया गया तो फिर आर्टिकल वन का पूरा का पूरा मीनिंग बदल जाएगा। यानी ये जो वकील बैठे हैं वो कार्यवाही में सब कुछ नोट कर रहे हैं कि हमें किस तरीके से इस पूरे मामले को पलटना है।


 राष्ट्रपति ने जो सवाल पूछे हैं उसके बाद जो भी निर्णय आएगा वो देश के भविष्य को तय करेगा। इसलिए हमने कल भी कहा था कि यह जो फैसला है, इसकी जानकारी इसमें क्या-क्या हो रहा है, क्या-क्या मुद्दे रखे जा रहे हैं, क्या-क्या दलीलें दी जा रही है? और सुप्रीम कोर्ट की जो बेंच है, उसका  रिएक्शन क्या है, इसको देश के हर नागरिक को जानना ही चाहिए। इसीलिए हम इस पूरी बहस को आपको जिसज दिन बहस होगी, उसमें जितनी जरूरत पड़ेगी, उतना बड़ा वीडियो बनाकर आपको एक एक बारीकी, बड़े ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुद्दा महत्वपूर्ण इसलिए है कि अगर इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के सवालों का सही तरीके से जवाब ना दिया गया। जस्टिस पारदीवाला और आर महादेवन ने जो कुछ किया था उसको नहीं सुधारा गया तो आप समझ लीजिए कि देश के हालात बहुत ही दयनीय होने वाले हैं। फिर उसके बाद चाहे तमिलनाडु हो, केरल हो, कर्नाटक हो, जहांजहां केंद्र सरकार के  जो विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं वो सब के सब इस तरीके के विधेयक लेकर आएंगे और उन विधेयकों को डीम्ड एसेंट मान लिया जाएगा। सॉलिसिटीज ने आज यह सवाल भी उठाया कि जब लेजिस्लेचर की पूर्णता ही राज्यपाल को शामिल होने के बाद होती है तो फिर अगर राज्यपाल साइन नहीं करेगा तो वो विधेयक लेजिस्लेचर से पास कैसे मान लिया जाएगा क्योंकि लेजिस्लेचर का ही हिस्सा होते हैं राज्यपाल और संसद का हिस्सा होते हैं राष्ट्रपति इसलिए तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत होती है और आप कह रहे हैं कि उनके हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है वो बिना  राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही कानून बन जाएगा जो कि संविधान का जो मूल भावना है उसके खिलाफ है औरकि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपॉइंट किए जाते हैं राज्यपाल इसलिए उनकी जिम्मेदारी यह भी होती है कि कोई भी ऐसा कानून जो केंद्र सरकार ने बनाया है राज्य सरकार या राज्य की विधानसभा उसके विरोध में या उससे टकराव वाला कानून ना पास करे इसलिए तो यह जो विद करने की या फिर कहें कि अपने पास रोकने की ताकत राज्यपाल को मिली हुई है। आप उसको क्या यह कहना चाहते हैं कि यह बेकार है यह अनावश्यक है और क्या कोर्ट ये डिसाइड कर सकता है? क्या कोर्ट इस हद तक जा सकता है  कि उसकी जो फैसला है वो संवैधानिक अमेंडमेंट की शक्ल ले ले। इन सारी बहसों पर जो प्रतिक्रिया दी गई है जस्टिस बी आर गवई के द्वारा जस्टिस पी एस नरसिम्हा के द्वारा जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रमनाथ के द्वारा उससे आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। आपको याद होगा कि इन दोनों जजों की ही बेंच ने दो और फैसले दिए थे। एक में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को सजा दे दी थी और दूसरे फैसला दिया था जो गलियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर। लेकिन चीफ जस्टिस ने दोनों ही फैसलों को हस्तक्षेप करके बदलवा दिया या बदल दिया। पर यहां पूरे राष्ट्र


का मुद्दा है। देश के संवैधानिक प्रमुख के अधिकारों का मुद्दा है। यहां राज्य के हेड का मुद्दा है। उसके बावजूद बेंच का जो नजरिया है वो उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे वजह ये है कि पहले जो दो मुद्दे थे उनमें से इलाहाबाद हाईकोर्ट वाले केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने पत्र लिख दिया था सुप्रीम कोर्ट को और चीफ जस्टिस को कि इनकी बात को ना माना जाए। और दूसरे मुद्दे में पब्लिक सड़क पर आ गई थी। पब्लिक के विरोध के रिएक्शन को देखकर जो चीफ जस्टिस थे उन्होंने फैसला पलट दिया था। लेकिन यह जो मामला है इस पर कोई रिएक्शन देखने को नहीं


मिला है। पब्लिक को समझ में ही नहीं आ रहा है।


आने वाले भविष्य की उस रूपरेखा को नहीं देख पा रहे हैं जो इस फैसले के बाद देश के सामने पैदा हो सकती है। हम शुरुआत से बता रहे हैं कि अगर केजरीवाल जैसा कोई मुख्यमंत्री हो जिसके पास 70% से ज्यादा विधायक हो वो किसी भी तरीके का फैसला पारित कर सकता है और केजरीवाल ने ऐसे फैसले पारित करने की कोशिश भी की थी। केजरीवाल की पार्टी की पंजाब में सरकार है और इस मुद्दे को उठाया भी गया तुषार मेहता जी के द्वारा कि अगर  कोई बॉर्डरिंग स्टेट कुछ ऐसा फैसला ऐसा फैसला ले ले जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा हो या फिर कोई दूसरी स्टेट इंटरनेशनल ट्रेड की किसी ट्रीटी को नकारने का फैसला ले ले तो क्या यह राज्यपाल की बिना सहमति के कानून माना जाएगा तो उस स्थिति में क्या होगा? क्या देश के कूटनीतिक संबंधों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या देश की संप्रभुता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? सुरक्षा पर सवाल नहीं पड़ेगा? तो इस तरीके की चीजें जब इनवॉल्व है तो इसीलिए हम चाहते हैं कि देश की आम जनता भी इस मुद्दे को फॉलो करें। इसको सुने, इसको समझे  जो कुछ सुप्रीम कोर्ट पिछले 10 12 सालों में करने की कोशिश कर रहा है, आप देखेंगे कि कोई ऐसा डिपार्टमेंट नहीं है जिसमें सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। अभी राज्यपालों की नियुक्तियों में इनडायरेक्टली वो घुस चुके हैं। अभी उपराष्ट्रपति के चुनाव में एक पूर्व रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज को नॉमिनेट कर दिया गया है विपक्षी पार्टियों के द्वारा। तो इसमें कोई बड़ी आशंका नहीं है कि जब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होता हुआ विपक्ष को ना दिखे तो विपक्ष की तरफ से किसी सुप्रीम कोर्ट  के रिटायर्ड जज को ही प्रधानमंत्री कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ा दिया जाए और जिस तरीके से हमारे तमाम सुप्रीम कोर्ट के जज आजकल भाषण दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो भी इसकी तैयारी करते हुए नजर आ रहे हैं। कुछ रिटायर्ड जज भी अब खूब भाषण दे रहे हैं। चाहे एएस ओका हो, चाहे संजीव खन्ना हो, उनके भाषणों में भी उसी तरीके की सोच साफ नजर आ रही है जिसे वामपंथी और कांग्रेसी सोच कहा जाता है। ये सोच अगर राष्ट्र हित में होती तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन ये सोच प्रगतिशीलता के नाम पर राष्ट्र की सुरक्षा को, राष्ट्र  की संस्कृति को सब कुछ जाम लगाने पर राजी है। क्योंकि वो अपने आप को प्रगतिशील मानते हैं। एक तरफ सीजीआई कहते हैं कि कोई भी कानून देश की संस्कृति, देश की नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के खिलाफ नहीं हो सकता। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के तमाम जो फैसले हैं वो नैतिकता के भी खिलाफ है। भारतीय सामाजिक ताने-बाने के भी खिलाफ है। मैं किस-किस फैसले की बात करूं? चंचू साहब के मामले में तो बहुत सारे ऐसे फैसले आए थे जिसमें समलैंगिकों की शादी की बात हो या फिर दूसरे अवैध संबंधों को लेकर उनके जो फैसले थे क्या वो भारतीय सामाजिकता भारतीय  नैतिकता के अनुरूप थे अगर नहीं थे तो सुप्रीम कोर्ट ने उन सबको क्यों दिया यही प्रश्न देश की जनता को समझना है कि इनकी जो मनमानी चल रही है पेंडिंग केसेस पे ये कुछ नहीं करते वैकेंसी पड़ी हुई है 25% से ज्यादा ज्यादा डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट के लेवल पर जुडिशरी में वैकेंसी है। 30% की वैकेंसी है हाई कोर्ट्स के अंदर और अभी तक जैसा देखने को मिल रहा है कि सभी हाई कोर्ट में नियुक्तियां हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा वैकेंसी जहां इलाहाबाद हाई कोर्ट में है। 50% के करीब पद खाली हैं। 80 के करीब जजों के पद खाली है। अभी

तक वहां पिछले चार छ महीने या एक साल में 10 जजेस भी नियुक्त नहीं किए गए हैं। इसके पीछे क्या वजह है? क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट को आप अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते हैं? और ऐसा सीजीआई खुद बता चुके हैं कि सबसे पहले सीजीआई का जो कॉलेजियम है तीन जजों का तीन सीनियर मोस्ट जजेस का वो नामों की सिफारिश करता है। फिर हाई कोर्ट का जो कॉलेजियम होता है वो उन पर विचार करता है और उन नामों को राज्यपाल को भेजता है। फिर उसके बाद प्रक्रिया आती है कि फिर से वो नाम सुप्रीम कोर्ट आते हैं। यहां से फिर वो कानून मंत्री को जाते हैं, प्रधानमंत्री


को जाते हैं और राष्ट्रपति को जाते हैं। यानी कि हाई कोर्ट्स में भी जो नियुक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वह सुप्रीम कोर्ट की ही है। अगर डिफेक्टो देखा जाए तो तो फिर वो क्यों इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी तक नियुक्ति करने से बचते हुए नजर आ रहे हैं। इन सब बातों पर जनता को ध्यान देने की जरूरत है।जिस तरीके से तुषार मेहता साहब ने और कल भी जिस तरीके से तुषार मेहता और अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुराने गुनाहों को याद दिलाने की  कोशिश की है। उसके बाद ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने दो साथियों द्वारा लिए गए उन फैसलों पर सही तरीके से विचार करके राष्ट्रपति के सवालों का जवाब देना चाहिए।



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August 22, 2025 at 09:42AM

राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई

 


राष्ट्रपति के 14 सवालों पर सुप्रीम कोर्ट में सुनवाई हो रही है। सरकार की तरफ से पहले अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने अपनी दलीलें कल रखी थी और उसके बाद नंबर आया सॉलिसिटर जनरल तुषार मेहता का जो कि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपनी दलीलें देते हुए नजर आ रहे हैं। 3 घंटे के करीब दलीलें दी थी अटर्नी जनरल ने और 5 घंटे के करीब दलीलें दे चुके हैं अटर्नी जनरल। अभी उनकी दलीलें समाप्त नहीं हुई है। लेकिन जिस तरीके से इस पूरी सुनवाई के लिए सुप्रीम कोर्ट ने आठ दिन की सुनवाई का समय निर्धारित किया है। उसमें चार दिन सरकार के और पक्ष में जो स्टेट बोलेंगे उनके लिए रखे हैं और चार दिन रखे हैं उन स्टेट्स के वकील्स के लिए वकीलों के लिए जो कि इसके विरोध में जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस मांगा गया है उसके विरोध में दलीलें रखेंगे। जबकि होना यह चाहिए था कि कम से कम क्योंकि राष्ट्रपति का यह रेफरेंस है और स्टेट गवर्नमेंट जो राष्ट्रपति के फैसले के पक्ष में है, राज्यपाल के फैसले के पक्ष में है, उन्हें ज्यादा समय मिलना चाहिए था। लेकिन क्या कह सकते हैं? सीजीआई का निर्णय है। पांच जजों की बेंच इस पूरे केस की सुनवाई कर रही है। या फिर कहें कि राष्ट्रपति के 14 सवालों पर जवाब ढूंढने की कोशिश कर रही है। लेकिन अभी तक जो दो दिन की कार्यवाही हुई है उसमें केवल चार जज ही पूछताछ करते हुए या प्रश्न पूछते हुए नजर आ रहे हैं। क्रॉस क्वेश्चन करते हुए नजर आ रहे हैं। पांचवें जो जज हैं अभी तक वो कुछ नहीं बोले हैं।

 सीजीआई बी आर गवई सवाल करते हैं, जस्टिस सूर्यकांत सवाल करते हैं, जस्टिस विक्रमनाथ सवाल करते हैं और जस्टिस पी एस नरसिम्हा सवाल करते हैं। लेकिन 4th जस्टिस अब तक कोई सवाल करते हुए नजर नहीं आ रहे हैं। दूसरी तरफ किस तरीके से अटर्नी जनरल ने तमाम सवाल उठाए थे। सुप्रीम कोर्ट की उस बेंच के अधिकारों के ऊपर। उनका जो अधिकार क्षेत्र है उसके ऊपर उन्होंने जो कुछ अतिक्रमण किया उसके ऊपर और साथ ही साथ यह सवाल भी उन्होंने लंच के बाद उठाया था कि आर्टिकल 142 क्या पूरे संविधान के बाकी अनुच्छेदों को बाईपास करके सुप्रीम कोर्ट को सबसे ज्यादा पावर दे सकता है या दे चुका है? उन्होंने बहुत तल्खी के साथ टिप्पणियां की थी जिसका संदेश साफ तौर पर सुप्रीम कोर्ट की बेंच को चला गया था और जब तुषार मेहता ने अपनी दलीलें शुरू की तो उन्होंने भी शुरुआत उसी अंदाज में की और उन्होंने कहा कि जिस तरीके की बातें की जा रही हैं जिस तरीके से आप लोगों के जेस्चर दिख रहे हैं लिप लिप रीडिंग हम अगर कर पा रहे हैं तो उसके बाद मैं इस मामले को हल्के-फुल्के अंदाज समय शुरू नहीं कर सकता।


 मेहता की मुख्य जो दलील है वो राज्यपाल को जो आर्टिकल 200 के तहत अधिकार मिले हुए हैं और उसके समर्थन में जो संविधान के तमाम अनुच्छेदों का उल्लेख उन्होंने किया है। उस पर उन्होंने बात की और इसी चर्चा में 5 घंटे का समय लग गया। बार-बार बेंच की तरफ से जिस तरीके से क्वेश्चंस हो रहे थे उससे ऐसा लग रहा था कि जो बेंच है जो दो जजों की बेंच ने फैसला लिया था उस फैसले को जस्टिफाई करने की कोशिश कर रही है। इस सुनवाई के दौरान अंत में तुषार मेहता को यह भी कहना पड़ा कि क्या आप यह कहना चाहते हैं कि राज्यपाल के पास जो आर्टिकल 200 के तहत किसी भी विधेयक को रोकने की ताकत मिली हुई है वो अनावश्यक है। संविधान में गैर जरूरी जोड़ी गई है। यानी जिस तरीके के सवालात किए जा रहे थे, जिस अंदाज में सवालात किए जा रहे थे, उसके   बाद यह कहने के लिए सॉललीिसिटर जनरल को मजबूर होना पड़ा। कल जिस तरीके से अटर्नी जनरल ने ये कह दिया था कि सुप्रीम कोर्ट दोबारा से संविधान को लिखना चाहता है कि क्या लिख सकता है जो अधिकार सुप्रीम कोर्ट के दायरे से बाहर है। आज चर्चा के दौरान जब सॉललीिसिटर जनरल ने यह कहा कि एक दिमाग में बात लोगों के यह बैठी हुई है कि जो राज्यपाल होते हैं वो अनइेड है। जबकि राष्ट्रपति इनडायरेक्टली इेड होते हैं। इसलिए लोगों के दिमाग में बहुत सी बातें आती हैं। इस पर सीजीआई ने जवाब दिया कि इससे कोई फर्क नहीं पड़ता। राज्यपाल  राष्ट्रपति द्वारा मनोनीत स्टेट के हेड होते हैं और हम भी तो राष्ट्रपति के द्वारा मनोनीत हैं। इससे पता चलता है कि इतना इन लोगों को याद तो है कि यह राष्ट्रपति के अंडर आते हैं लेकिन अभी उसको खुलकर मानते हुए नजर नहीं आ रहे हैं।

 यह एहसास क्यों नहीं हो पा रहा है कि उनके दो जजों ने राष्ट्रपति का जो अधिकार है उसको कम करने की कोशिश की है। राष्ट्रपति को समय सीमा में जो बांधने की कोशिश की है। वो उनका अधिकार कैसे हो सकता है? जब वह हाई कोर्ट के जज को आदेश नहीं दे सकते तो वह राज्यपाल और राष्ट्रपति को आदेश कैसे दे सकते हैं जो कि एक स्टेट में स्टेट हेड है और दूसरे राष्ट्र के नेशन के हेड हैं। संविधान के अनुसार भारत की जो तीनों ही शक्तियां होती है कार्यपालिका, विधायिका या न्यायपालिका उनके हेड राष्ट्रपति होते हैं। उसी तरीके से राज्यपाल, विधायिका के भी हेड होते हैं। विधायिका का गठन उनको शामिल करके ही माना जाता है। उसी तरीके से कार्यपालिका यानी कि मंत्रिमंडल भी राज्यपाल के समेत ही पूरा माना जाता है। और न्यायपालिका जो राज्यों में भी हाई कोर्ट होते हैं उसमें भी जब कॉलेजियम सिफारिश करता है जजों के नामों की तो वो पहले राज्यपाल की सहमति लेता है। यानी कि वो न्यायपालिका के हेड भी होते हैं स्टेट में। ऐसी स्थिति में फिर कैसे दो जजों की बेंच ने इतना बड़ा ब्लंडर कर दिया। यही सवाल है और इसी को बार-बार अब साबित करने के लिए संवैधानिक उपबंधों को लेने के लिए तुषार मेहता जी ने तमाम ऐसे विवरण दिए जिसमें 1919 का गवर्नमेंट ऑफ इंडिया एक्ट, 1935 का एक्ट, तमाम दूसरे एक्ट और दूसरे राज्यों को लेकर जो फैसले हुए थे उनकी भी चर्चा की। उसमें उन्होंने यह भी बताया कि यह जो दो जजों की बेंच थी इसने पांच और सात जजों की बेंच के फैसलों को भी नजरअंदाज कर दिया था। इस पर सीजीआई ने कहा कि वो दो जजों की बेंच ऐसा कैसे कर  सकती? इससे तो ऐसा लगता है कि यह जो बेंच बैठी हुई है यह पहले से कुछ मन बनाकर बैठी हुई है और इसी चीज को आज सुनवाई के दौरान जजों की तरफ से भी कहा गया कि यह ना समझा जाए कि हम इस मामले में राज्यपाल की शक्तियों पर जो सवाल उठा रहे हैं।

हम किसी प्रीजुडिस से यानी कि पहले से ही कुछ मन बनाकर बैठे हुए हैं। ये केवल हम पूरे मामले को सही तरीके से रखे जाने के लिए सवाल कर रहे हैं। लेकिन जिस तरीके से टाइम अलॉट किया गया है, जिस तरीके से वकीलों की फौज बुलाई गई है अपने समर्थन के लिए और उनको बराबर का समय दिया गया है, उससे तो  भावनाएं साफ जाहिर होती है। हालांकि सुनवाई अभी दो ही दिन की हुई है। इसके अलावा छ दिन की सुनवाई और होनी है। जैसा शेड्यूल बताया गया है उसके हिसाब से अब 21 और 26 तारीख को जो प्रेसिडेंशियल रेफरेंस है उसके पक्ष में सुनवाई होगी और 28 2 39 सितंबर में यह जो सुनवाई होगी उसमें कपिल सिबल सिंह भी के के वेणुगोपाल पी बिल्सन जैसे जो वकील हैं जो एक तरीके से पारदी वाला और आर महादेवन के फैसले का बचाव करते हुए नजर आएंगे उनको समय अलॉट किया गया है। एक दिन का समय इन सब पर काउंटर के लिए 10 सितंबर का रखा गया है। सॉलिसिटर जनरल ने तमाम इसके रेफरेंस दिए। आजादी से पहले के भी रेफरेंस दिए। आजादी के बाद के भी रेफरेंस दिए और संविधान के तमाम अनुच्छेदों को बताने की कोशिश की। लेकिन जिस तरीके से क्रश क्वेश्चनिंग की गई उसकी वजह से आज केवल और केवल आर्टिकल 200 पर ही सवा चार घंटे चर्चा हो पाई जिसमें या तो सॉललीिसिटर जनरल बोले और थोड़ी देर के लिए नवीन किशन कॉल जो कि मध्य प्रदेश स्टेट की तरफ से हैं वो बोले और एक बार इस पूरे मामले में  घुसने की कोशिश की कपिल सिब्बल ने। उन्होंने यह कहने की कोशिश की कि अगर ऐसे किया गया तो फिर आर्टिकल वन का पूरा का पूरा मीनिंग बदल जाएगा। यानी ये जो वकील बैठे हैं वो कार्यवाही में सब कुछ नोट कर रहे हैं कि हमें किस तरीके से इस पूरे मामले को पलटना है।


 राष्ट्रपति ने जो सवाल पूछे हैं उसके बाद जो भी निर्णय आएगा वो देश के भविष्य को तय करेगा। इसलिए हमने कल भी कहा था कि यह जो फैसला है, इसकी जानकारी इसमें क्या-क्या हो रहा है, क्या-क्या मुद्दे रखे जा रहे हैं, क्या-क्या दलीलें दी जा रही है? और सुप्रीम कोर्ट की जो बेंच है, उसका  रिएक्शन क्या है, इसको देश के हर नागरिक को जानना ही चाहिए। इसीलिए हम इस पूरी बहस को आपको जिसज दिन बहस होगी, उसमें जितनी जरूरत पड़ेगी, उतना बड़ा वीडियो बनाकर आपको एक एक बारीकी, बड़े ही सरल शब्दों में समझाने की कोशिश कर रहे हैं। यह मुद्दा महत्वपूर्ण इसलिए है कि अगर इस मुद्दे पर राष्ट्रपति के सवालों का सही तरीके से जवाब ना दिया गया। जस्टिस पारदीवाला और आर महादेवन ने जो कुछ किया था उसको नहीं सुधारा गया तो आप समझ लीजिए कि देश के हालात बहुत ही दयनीय होने वाले हैं। फिर उसके बाद चाहे तमिलनाडु हो, केरल हो, कर्नाटक हो, जहांजहां केंद्र सरकार के  जो विरोधी पार्टियों की सरकारें हैं वो सब के सब इस तरीके के विधेयक लेकर आएंगे और उन विधेयकों को डीम्ड एसेंट मान लिया जाएगा। सॉलिसिटीज ने आज यह सवाल भी उठाया कि जब लेजिस्लेचर की पूर्णता ही राज्यपाल को शामिल होने के बाद होती है तो फिर अगर राज्यपाल साइन नहीं करेगा तो वो विधेयक लेजिस्लेचर से पास कैसे मान लिया जाएगा क्योंकि लेजिस्लेचर का ही हिस्सा होते हैं राज्यपाल और संसद का हिस्सा होते हैं राष्ट्रपति इसलिए तो उनके हस्ताक्षर की जरूरत होती है और आप कह रहे हैं कि उनके हस्ताक्षर की जरूरत नहीं है वो बिना  राज्यपाल के हस्ताक्षर के ही कानून बन जाएगा जो कि संविधान का जो मूल भावना है उसके खिलाफ है औरकि यूनियन गवर्नमेंट की तरफ से अपॉइंट किए जाते हैं राज्यपाल इसलिए उनकी जिम्मेदारी यह भी होती है कि कोई भी ऐसा कानून जो केंद्र सरकार ने बनाया है राज्य सरकार या राज्य की विधानसभा उसके विरोध में या उससे टकराव वाला कानून ना पास करे इसलिए तो यह जो विद करने की या फिर कहें कि अपने पास रोकने की ताकत राज्यपाल को मिली हुई है। आप उसको क्या यह कहना चाहते हैं कि यह बेकार है यह अनावश्यक है और क्या कोर्ट ये डिसाइड कर सकता है? क्या कोर्ट इस हद तक जा सकता है  कि उसकी जो फैसला है वो संवैधानिक अमेंडमेंट की शक्ल ले ले। इन सारी बहसों पर जो प्रतिक्रिया दी गई है जस्टिस बी आर गवई के द्वारा जस्टिस पी एस नरसिम्हा के द्वारा जस्टिस सूर्यकांत और जस्टिस विक्रमनाथ के द्वारा उससे आसार अच्छे नजर नहीं आ रहे हैं। आपको याद होगा कि इन दोनों जजों की ही बेंच ने दो और फैसले दिए थे। एक में इलाहाबाद हाई कोर्ट के जज को सजा दे दी थी और दूसरे फैसला दिया था जो गलियों में घूमने वाले आवारा कुत्तों को लेकर। लेकिन चीफ जस्टिस ने दोनों ही फैसलों को हस्तक्षेप करके बदलवा दिया या बदल दिया। पर यहां पूरे राष्ट्र


का मुद्दा है। देश के संवैधानिक प्रमुख के अधिकारों का मुद्दा है। यहां राज्य के हेड का मुद्दा है। उसके बावजूद बेंच का जो नजरिया है वो उतना गंभीर नजर नहीं आ रहा है। इसके पीछे वजह ये है कि पहले जो दो मुद्दे थे उनमें से इलाहाबाद हाईकोर्ट वाले केस में इलाहाबाद हाईकोर्ट के 13 जजों ने पत्र लिख दिया था सुप्रीम कोर्ट को और चीफ जस्टिस को कि इनकी बात को ना माना जाए। और दूसरे मुद्दे में पब्लिक सड़क पर आ गई थी। पब्लिक के विरोध के रिएक्शन को देखकर जो चीफ जस्टिस थे उन्होंने फैसला पलट दिया था। लेकिन यह जो मामला है इस पर कोई रिएक्शन देखने को नहीं


मिला है। पब्लिक को समझ में ही नहीं आ रहा है।


आने वाले भविष्य की उस रूपरेखा को नहीं देख पा रहे हैं जो इस फैसले के बाद देश के सामने पैदा हो सकती है। हम शुरुआत से बता रहे हैं कि अगर केजरीवाल जैसा कोई मुख्यमंत्री हो जिसके पास 70% से ज्यादा विधायक हो वो किसी भी तरीके का फैसला पारित कर सकता है और केजरीवाल ने ऐसे फैसले पारित करने की कोशिश भी की थी। केजरीवाल की पार्टी की पंजाब में सरकार है और इस मुद्दे को उठाया भी गया तुषार मेहता जी के द्वारा कि अगर  कोई बॉर्डरिंग स्टेट कुछ ऐसा फैसला ऐसा फैसला ले ले जिससे राष्ट्र की सुरक्षा को खतरा हो या फिर कोई दूसरी स्टेट इंटरनेशनल ट्रेड की किसी ट्रीटी को नकारने का फैसला ले ले तो क्या यह राज्यपाल की बिना सहमति के कानून माना जाएगा तो उस स्थिति में क्या होगा? क्या देश के कूटनीतिक संबंधों पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? क्या देश की संप्रभुता पर प्रभाव नहीं पड़ेगा? सुरक्षा पर सवाल नहीं पड़ेगा? तो इस तरीके की चीजें जब इनवॉल्व है तो इसीलिए हम चाहते हैं कि देश की आम जनता भी इस मुद्दे को फॉलो करें। इसको सुने, इसको समझे  जो कुछ सुप्रीम कोर्ट पिछले 10 12 सालों में करने की कोशिश कर रहा है, आप देखेंगे कि कोई ऐसा डिपार्टमेंट नहीं है जिसमें सुप्रीम कोर्ट हस्तक्षेप नहीं कर रहा है। अभी राज्यपालों की नियुक्तियों में इनडायरेक्टली वो घुस चुके हैं। अभी उपराष्ट्रपति के चुनाव में एक पूर्व रिटायर्ड सुप्रीम कोर्ट के जज को नॉमिनेट कर दिया गया है विपक्षी पार्टियों के द्वारा। तो इसमें कोई बड़ी आशंका नहीं है कि जब राहुल गांधी के प्रधानमंत्री बनने का सपना पूरा होता हुआ विपक्ष को ना दिखे तो विपक्ष की तरफ से किसी सुप्रीम कोर्ट  के रिटायर्ड जज को ही प्रधानमंत्री कैंडिडेट के तौर पर आगे बढ़ा दिया जाए और जिस तरीके से हमारे तमाम सुप्रीम कोर्ट के जज आजकल भाषण दे रहे हैं उससे ऐसा लगता है कि वो भी इसकी तैयारी करते हुए नजर आ रहे हैं। कुछ रिटायर्ड जज भी अब खूब भाषण दे रहे हैं। चाहे एएस ओका हो, चाहे संजीव खन्ना हो, उनके भाषणों में भी उसी तरीके की सोच साफ नजर आ रही है जिसे वामपंथी और कांग्रेसी सोच कहा जाता है। ये सोच अगर राष्ट्र हित में होती तो किसी को कोई दिक्कत नहीं थी। लेकिन ये सोच प्रगतिशीलता के नाम पर राष्ट्र की सुरक्षा को, राष्ट्र  की संस्कृति को सब कुछ जाम लगाने पर राजी है। क्योंकि वो अपने आप को प्रगतिशील मानते हैं। एक तरफ सीजीआई कहते हैं कि कोई भी कानून देश की संस्कृति, देश की नैतिकता और सामाजिक सुरक्षा के खिलाफ नहीं हो सकता। दूसरी तरफ सुप्रीम कोर्ट के तमाम जो फैसले हैं वो नैतिकता के भी खिलाफ है। भारतीय सामाजिक ताने-बाने के भी खिलाफ है। मैं किस-किस फैसले की बात करूं? चंचू साहब के मामले में तो बहुत सारे ऐसे फैसले आए थे जिसमें समलैंगिकों की शादी की बात हो या फिर दूसरे अवैध संबंधों को लेकर उनके जो फैसले थे क्या वो भारतीय सामाजिकता भारतीय  नैतिकता के अनुरूप थे अगर नहीं थे तो सुप्रीम कोर्ट ने उन सबको क्यों दिया यही प्रश्न देश की जनता को समझना है कि इनकी जो मनमानी चल रही है पेंडिंग केसेस पे ये कुछ नहीं करते वैकेंसी पड़ी हुई है 25% से ज्यादा ज्यादा डिस्ट्रिक्ट और सेशन कोर्ट के लेवल पर जुडिशरी में वैकेंसी है। 30% की वैकेंसी है हाई कोर्ट्स के अंदर और अभी तक जैसा देखने को मिल रहा है कि सभी हाई कोर्ट में नियुक्तियां हो रही है। लेकिन सबसे ज्यादा वैकेंसी जहां इलाहाबाद हाई कोर्ट में है। 50% के करीब पद खाली हैं। 80 के करीब जजों के पद खाली है। अभी

तक वहां पिछले चार छ महीने या एक साल में 10 जजेस भी नियुक्त नहीं किए गए हैं। इसके पीछे क्या वजह है? क्या इलाहाबाद हाई कोर्ट को आप अपनी जिम्मेदारी नहीं मानते हैं? और ऐसा सीजीआई खुद बता चुके हैं कि सबसे पहले सीजीआई का जो कॉलेजियम है तीन जजों का तीन सीनियर मोस्ट जजेस का वो नामों की सिफारिश करता है। फिर हाई कोर्ट का जो कॉलेजियम होता है वो उन पर विचार करता है और उन नामों को राज्यपाल को भेजता है। फिर उसके बाद प्रक्रिया आती है कि फिर से वो नाम सुप्रीम कोर्ट आते हैं। यहां से फिर वो कानून मंत्री को जाते हैं, प्रधानमंत्री


को जाते हैं और राष्ट्रपति को जाते हैं। यानी कि हाई कोर्ट्स में भी जो नियुक्ति की सबसे बड़ी जिम्मेदारी है वह सुप्रीम कोर्ट की ही है। अगर डिफेक्टो देखा जाए तो तो फिर वो क्यों इलाहाबाद हाई कोर्ट में अभी तक नियुक्ति करने से बचते हुए नजर आ रहे हैं। इन सब बातों पर जनता को ध्यान देने की जरूरत है।जिस तरीके से तुषार मेहता साहब ने और कल भी जिस तरीके से तुषार मेहता और अटर्नी जनरल आर वेंकट रमानी ने सुप्रीम कोर्ट के जजों के पुराने गुनाहों को याद दिलाने की  कोशिश की है। उसके बाद ऐसा लगता है कि सुप्रीम कोर्ट को अपने दो साथियों द्वारा लिए गए उन फैसलों पर सही तरीके से विचार करके राष्ट्रपति के सवालों का जवाब देना चाहिए।


Thursday, August 21, 2025

Supreme Court hearing on the 14 questions posed by the President of India

Supreme Court hearing on the 14 questions posed by the President of India
Supreme Court hearing on the 14 questions posed by the President of India

 


The ongoing Supreme Court hearing on the 14 questions posed by the President of India concerning the powers of state governors under Article 200 of the Constitution. The hearing, scheduled for eight days, is divided equally between arguments supporting the President’s reference and those opposing it. The government side, represented by Attorney General R. Venkataramani and Solicitor General Tushar Mehta, has presented extensive arguments defending the powers granted to governors, especially their authority to withhold assent to bills passed by state legislatures.

The case challenges the two-judge bench’s earlier decision that curtailed the governor’s power by imposing a time limit on their assent to bills. The Solicitor General and Attorney General argue that the governor is a constitutional head of the state, appointed by the President, and their powers cannot be diluted or bypassed by the courts. The Supreme Court bench, comprising five judges, is actively questioning the government’s counsel, with four judges participating vigorously, while one remains silent.

The discussion delves into constitutional provisions, historical legislations, and previous judgments related to the governor’s role. There is a focus on the judiciary’s increasing intervention in legislative and executive matters, raising concerns about the independence of state institutions and the balance of powers. The video also highlights the potential consequences of weakening the governor’s authority, such as states passing bills that could threaten national security or international treaties without proper oversight.

The video stresses the importance of public understanding of the case, as the Supreme Court’s decision will have far-reaching implications for federalism, state autonomy, and the constitutional framework. It critiques the judiciary’s recent trends and warns about the political and social ramifications if the governor’s role is undermined. The speaker calls for citizens to stay informed and participate in the discourse on this critical constitutional issue.

Highlights

  • ⚖️ Supreme Court hearing on President’s 14 constitutional questions about state governors’ powers underway.
  • 🏛️ Government’s Attorney General and Solicitor General defend governor’s authority under Article 200.
  • 🔎 Five-judge bench actively questioning, with significant focus on the governor’s role and constitutional provisions.
  • ⚠️ Concerns raised about judiciary’s encroachment into legislative and executive domains.
  • 🏛️ Earlier two-judge bench ruling limiting governor’s powers is under scrutiny.
  • 🌐 Potential national security and federalism implications if governor’s powers are weakened.
  • 📢 Public urged to understand and engage with this landmark constitutional debate.

Key Insights

  • ⚖️ Judicial Review and Federal Balance: The case underscores the tension between judicial review and federalism. The Supreme Court’s role in adjudicating the extent of governor’s powers reflects the delicate balance between state autonomy and central oversight. The judiciary’s increasing intervention raises questions about institutional boundaries and respect for constitutional roles.

  • 🏛️ Governor’s Constitutional Position: Governors are not mere figureheads; they are constitutional heads appointed by the President, playing a crucial role in legislative processes under Article 200. Diluting their powers risks destabilizing the constitutional framework, especially the checks and balances essential for state governance.

  • 🔍 Two-Judge Bench Decision Under Scrutiny: The initial two-judge bench ruling imposing a time limit on governor’s assent is controversial. It appears to contradict earlier judgments by larger benches and disregards historical and constitutional precedents, leading to a fundamental re-examination by the Supreme Court.

  • ⚠️ Political and Security Concerns: Weakening the governor’s powers could allow state governments, especially opposition-ruled ones, to pass contentious laws without adequate oversight. This poses risks to national security, international relations, and the unity of the federation, highlighting the governor’s role as a safeguard.

  • 🏛️ Judiciary’s Expanding Role: The video points to a worrying trend of the judiciary intervening in diverse areas—from state governor appointments to election processes—raising debates about judicial overreach and its impact on democratic governance and institutional balance.

  • 📊 Vacancies and Judicial Appointments: The backlog and vacancies in courts, particularly in the Allahabad High Court, as well as the appointment process involving the Supreme Court’s collegium, reveal systemic issues in judicial administration, which may affect the timely resolution of constitutional matters.

  • 📢 Public Awareness and Involvement: The video stresses the necessity for public engagement and awareness regarding the Supreme Court’s handling of such constitutional questions. Decisions here will shape India’s democratic and federal structure for years, making it imperative for citizens to understand and participate in the discourse.

This comprehensive examination of the ongoing Supreme Court hearing highlights the complex interplay of constitutional law, federalism, judicial authority, and political implications, urging a vigilant and informed citizenry.


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August 21, 2025 at 08:34AM
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August 21, 2025 at 09:13AM

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