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Sunday, May 31, 2026

भारत ने एआई की सबसे बड़ी कमजोरी का सटीक इलाज खोज करके ग्लोबल टेक इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया है

 नमस्कार दोस्तों, दोस्तों, अमेरिका और चीन आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस की रेस में खुद को दुनिया का बेताज बादशाह मान बैठे थे। सिलिकॉन वैली से लेकर के बीजिंग तक बड़ी-बड़ी टेक कंपनियां इस गुमान में थी कि एआई का पूरा रिमोट कंट्रोल उन्हीं के हाथ में आ चुका है। जब दुनिया चैट जीपीटी और बड़े आई मॉडल्स के नशे में चूर थी तब अमेरिका और चीन को लग रहा था कि इस रेस में उनके अलावा कोई नहीं है। लेकिन उन्हें इस बात का जरा भी इल्म नहीं था कि हिंदुस्तान एक अलग ही लेवल पर खेल रहा है। सॉफ्टवेयर और कोडिंग के शोरसरावे से दूर भारतीय इंजीनियर्स ने शांति से एक ऐसा मास्टर स्ट्रोक तैयार कर दिया है जिसने रातोंरात वाशिंगटन और बीजिंग की नींद उड़ा दी है। लेकिन दोस्तों आखिर भारत ने एआई से भी एक कदम आगे जाकर के ऐसा क्या बना डाला है जिसकी उम्मीद इन दोनों सुपर पावर देशों ने सपने में भी नहीं की थी। आखिर ऐसा कौन सा स्वदेशी आविष्कार है जिसके बिना दुनिया का कोई भी एडवांस एआई सिस्टम एक कदम भी आगे नहीं बढ़ पाएगा और कैसे भारत ने एआई की सबसे बड़ी कमजोरी का सटीक इलाज खोज करके ग्लोबल टेक इंडस्ट्री में तहलका मचा दिया है। दोस्तों जब भी आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस का नाम आता है तो सीधे ओपन एi Google या फिर Microsoft का चेहरा जाता है। हर कोई यही सोच रहा था कि भारत इस रेस में बहुत पीछे छूट गया है क्योंकि हमारे पास कोई अपना बड़ा एआई मॉडल नहीं था लेकिन सच्चाई कुछ और ही है। असल में भारत ने उस जगह पर चोट की है जहां इन बड़ी कंपनियों की जान बचती है। आप जब अपने मोबाइल या कंप्यूटर पर एi से कोई भी सवाल पूछते हैं तो आपको लगता है कि जवाब किसी जादू से आ रहा है। लेकिन बैकग्राउंड में हजारों किलोमीटर दूर रखे विशाल डाटा सेंटर्स और ग्राफिक प्रोसेसर यूनिट्स यानी जीपीयू अपनी पूरी ताकत लगा रहे होते हैं और यहीं पर एक बहुत बड़ी खामी छिपी हुई थी जिसे दुनिया नजरअंदाज कर रही थी। दोस्तों क्या आप जानते हैं कि वह खामी क्या है जो इन बड़ी टेक कंपनियों को घुटनों पर ला सकती है तो वो सबसे बड़ी खामी है बिजली और भयंकर गर्मी। पहले के समय में डाटा सेंटर्स को चलाने के लिए कुछ किलोवाट बिजली की आवश्यकता होती थी। लेकिन जब से यह भारीभरकम एi मॉडल्स आए हैं, बिजली की खपत आसमान छूने लगी है। अब सर्वर के एक-एक रैक को 100 किलो वाट से भी ज्यादा पावर चाहिए होती है। जब कोई मशीन इतनी भयानक बिजली खींचती है तो वह आग के गोले की तरह गर्म होने लगती है और इसी गर्मी की वजह से सिस्टम के क्रैश होने और करोड़ों का डाटा पल भर में खाख होने का खतरा मंडराता रहता है। पूरी दुनिया इस पावर मैनेजमेंट की समस्या से जूझ रही थी जिसका ग्लोबल मार्केट 1 लाख करोड़ से भी ज्यादा का है और इसी भारी डिमांड के बीच भारत ने वो कार्ड खेल दिया है जिसने पूरी इंडस्ट्री का रुख अपनी तरफ मोड़ लिया है। लेकिन दोस्तों आखिर वो कौन सी स्वदेशी तकनीक है जिसने विदेशी कंपनियों को भारत के चक्कर लगाने पर मजबूर कर दिया है? तो दोस्तों इस ग्लोबल क्राइसिस के बीच में एंट्री होती है एक भारतीय सेमीकंडक्टर स्टाफ कब की जिसका नाम है सी2 आई सेमीकंडक्टर्स। इस कंपनी ने वो कर दिखाया है जो अब तक नामुमकिन माना जा रहा था। भारतीय इंजीनियर्स की इस टीम ने पूरी तरह से देश के अंदर ही एक स्मार्ट पावर स्टेज चिप डिजाइन की है। यह चिप कोई साधारण ऊर्जा नहीं है बल्कि यह वो संजीवनी बूटी है जो एआई सर्वर्स को जलने और क्रैश होने से बचाती है। यह चिप बिजली की उस विशाल खपत को भी कंट्रोल करेगी और उसे सही तरीके से ऑप्टिमाइज करेगी। सीधे शब्दों में कहें तो अमेरिका और चीन का एआई जितना ज्यादा ताकतवर होता जाएगा उसे उतनी ही ज्यादा बिजली की जरूरत पड़ेगी और उसी बिजली को संभालने के लिए उन्हें हर हाल में इन भारतीय चिप्स की जरूरत पड़ेगी। यानी सॉफ्टवेयर उनका होगा लेकिन उसकी सांसे भारत की इस चिप से चलेंगी। लेकिन सवाल यह उठता है कि क्या सच में यह चिप बनकर तैयार हो गई है और इसका आगे का प्रोसीजर क्या है? तो दोस्तों, टेक दुनिया में एक बहुत भारी-भरकम शब्द इस्तेमाल होता है जिसे टेक आउट कहते हैं। आसान लैंग्वेज में इसका मतलब यह होता है कि किसी भी चिप का पूरा डिजाइन, उसका आर्किटेक्चर और उसकी टेस्टिंग का काम 100% पूरा हो चुका है और अब उसे फाइनल डिजाइन को फैक्ट्री के अंदर असल चिप बनाने के लिए भेज दिया गया है। सी 2आई सेमीकंडक्टर्स ने अपनी इस स्मार्ट चिप को टेप आउट के लिए भेजकर इतिहास रच दिया है। दोस्तों, अब तक हमारा देश केवल विदेशी कंपनियों के लिए डिजाइन सर्विस देने या फिर सॉफ्टवेयर बनाने तक ही सीमित था। हम दूसरों का काम करते थे, लेकिन यह पहली बार है जब ओरिजिनली चिप बन के पूरी तरह से भारत की मिट्टी पर कंसीव हुई है। यही डिजाइन की गई है और यहीं वेरीफाई भी हुई है। यह कामयाबी इतनी बड़ी क्यों है? इसका अंदाजा आप इस बात से लगा सकते हैं कि अब दुनिया के बड़े एi सर्वर्स भारत की इस चिप के बिना बिल्कुल डब्बे में तब्दील हो सकते हैं। लेकिन क्या इस स्टार्टअप ने यह सब अकेले कर लिया है या इसके पीछे भी कोई बड़ी ताकत खड़ी। दोस्तों कोई भी इतनी बड़ी तकनीकी छलांग बिना मजबूत इरादों और सपोर्ट के नहीं लगाई जा सकती। हमारे देश में सेमीकंडक्टर को लेकर के अब एक नई आक्रामकता आ चुकी है। इंडिया सेमीकंडक्टर मिशन और डिजाइन लिंक्ड इंसेंटिव यानी कि डीएलआई जैसी सरकारी योजनाओं ने इस बदलाव की मजबूत नींव रखी है। सरकार ने स्पष्ट कर दिया है कि वह सिर्फ असेंबलिंग तक सीमित नहीं रहना चाहती बल्कि कोर टेक्नोलॉजी पर राज करना चाहती है। खुद इलेक्ट्रॉनिक्स और आईटी मंत्रालय के अधिकारियों ने यह क्लियर कर दिया है कि भारतीय इनोवेशन अब पावर ग्रिड से लेकर के चिप लेवल तक दुनिया को अपनी धुन पर नचाने के लिए पूरी तरह से तैयार है। दोस्तों डीएलआई स्कीम के तहत देश की 100 से ज्यादा कंपनियों को जो वित्तीय ताकत मिली है उसी का नतीजा है कि आज हमारे इंजीनियर्स ग्लोबल मंच पर सीना तान करके खड़े हैं। लेकिन क्या विदेशी निवेशक भारतीय टैलेंट पर भरोसा कर रहे हैं या फिर वह भी शक की निगाह से देख रहे हैं? तो दोस्तों दुनिया बहुत तेजी के साथ में  बदल रही है और पैसा हमेशा उसी तरफ भागता है जहां भविष्य सुरक्षित होता है। भारत के इस जिप डिजाइन पर केवल हम गर्व नहीं कर रहे हैं बल्कि ग्लोबल मार्केट के दिग्गज भी अपना खजाना खोल करके बैठे हुए हैं। पीक एक्सवी पार्टनर्स याली कैपिटल और टीडी के वेंचर्स जैसे इंटरनेशनल इन्वेस्टर्स ने सीटूआई सेमीकंडक्टर्स में भारी इन्वेस्टमेंट किया है। बात यहीं खत्म नहीं होती। दुनिया की जानीमानी चिप्स मेकर कंपनी Intel की पूर्व सीईओ लिप बूटेन ने भी इस भारतीय कंपनी के साथ में इन्वेस्टर और एडवाइजर के रूप में अपनी कनेक्टिविटी दिखाई। जब Intel जैसी दिग्गज कंपनी का टॉप बॉस किसी भारतीय स्टार्टअप पर अपना दांव लगाता है तो इसका सीधा मैसेज ग्लोबल टेक में कम्युनिटी को जाता है। यह मैसेज साफ है कि अगला सेमीकंडक्टर हब कोई और नहीं बल्कि भारत बनने जा रहा है। पर आगे का रोड मैप क्या है और यह चिप मार्केट में कब तहलका मचाने वाला है। तो दोस्तों कंपनी ने सिर्फ कागजों का प्लान तैयार नहीं किया है बल्कि जमीन पर काम शुरू कर दिया है। शुरुआती टेप आउट के तहत करीब 21,000 चिप्स बनाने की तैयारी पूरी हो चुकी है। अगले 8 से 9 महीनों के अंदर इन चिप्स की बड़ी टेस्टिंग होगी और ग्लोबल ग्राहकों के सिस्टम में इसे डाल के चेक किया जाएगा। दोस्तों, यह कंपनी सिर्फ भारतीय बाजार तक सीमित नहीं रहना चाहती है। दोस्तों, इसकी नजर दुनिया के उन सबसे बड़े ब्रांड्स के ऊपर है जो सीपीयू, जीपीयू और टेलीकॉम सर्वर्स बनाते हैं। सोच कर देखें दोस्तों, जब दुनिया के सबसे महंगे और पावरफुल सर्वर्स के अंदर मेड इन इंडिया पावर मैनेजमेंट चिप लगी होगी, तो एi की ग्लोबल सप्लाई चेन का पूरा गेम ही पलट जाएगा। जो लोग कह रहे थे कि भारत केवल सॉफ्टवेयर की दुनिया में ही हाथ पैर मार सकता है। उन्हें अब अपने चश्मे का नंबर बदल लेना होगा। दोस्तों भारत और भारत के वैज्ञानिकों ने यह साबित कर दिया है कि एi की दुनिया का असली कंट्रोल मॉडल बनाने वालों के पास भी नहीं बल्कि उस मॉडल को जिंदा रखने वाली चिप बनाने वालों के पास होगा। क्या इस एक कदम से दुनिया की निर्भरता भारत पर आ जाएगी? तो दोस्तों दुनिया भर में आर्टिफिशियल इंटेलिजेंस को लेकर के एक साइलेंट वॉर चल रही है। अमेरिका लगातार कोशिश कर रहा है कि वो किसी भी तरह से चीन तक एडवांस चिप्स ना पहुंचने दे। दोनों देशों के बीच में अरबों डॉलर की रेस लगी हुई है कि कौन सबसे ज्यादा चालाक और तेज एi मॉडल्स बना लेगा। लेकिन दोस्तों इस अंधी दौड़ में वह यह भूल गए कि जब इंजन बहुत ज्यादा बड़ा हो जाता है तो उसे ठंडा रखने और पावर देने वाला सिस्टम ही उसकी सबसे बड़ी जरूरत बन सकता है। भारत ने इसी गैप को पहचाना और उसे फिल कर डाला है। हमने उनके मॉडल्स की कॉपी नहीं की है। बल्कि हमने वो तकनीक बना डाली है जिसे आप एi का ऑक्सीजन सिलेंडर कह सकते हैं। बिना ऑक्सीजन के जैसे शरीर काम नहीं करता है वैसे ही बिना इस स्मार्ट पावर चिप के दुनिया का कोई भी सुपर कंप्यूटर या एi सर्वर हांपने लग जाएगा। इस एक आविष्कार ने दोस्तों रातोंरात सिलिकॉन वैली के दिग्गजों को यह सोचने पर मजबूर कर दिया है कि भारतीय दिमाग आखिर किस डायरेक्शन के अंदर जा रहा है। लेकिन दोस्तों क्या हम सिर्फ एक पुरजा बना रहे हैं या फिर पूरी इंडस्ट्री पर राज करने की तैयारी है। तो इस पूरी कामयाबी के पीछे जिस चीज की सबसे ज्यादा चर्चा हो रही है वो है हमारे देश के इंजीनियर्स टीम का विज़न। सीटीआई के संस्थापक राम अनंत और उनकी टीम ने सालों तक एक ही टारगेट के ऊपर अपना फोकस रखा। उन्होंने देखा कि पूरी दुनिया ग्राफिक प्रोसेसिंग यूनिट्स को बेहतर बनाने में लगी हुई है। लेकिन किसी का ध्यान पावर सप्लाई पर नहीं है। जब डाटा सेंटर्स में हजारों सर्वर एक साथ काम करते हैं तो बिजली की छोटी सी भी फ्लक्चुएशंस या फिर उतार-चढ़ाव करोड़ों का नुकसान कर डालती है। भारतीय टीम ने जो आर्किटेक्चर तैयार किया है वो इतना ज्यादा सटीक और एडवांस है कि यह मिली सेकंड्स के अंदर पावर को एडजस्ट कर लेता है। यह बिल्कुल ठीक वैसा ही है जैसे किसी फार्मूला वन रेस कार के अंदर ऐसा इंजन लगा हो जो खुद तय करे कि उसे कब कितनी ऊर्जा चाहिए। यह सटीकता और सही परफेक्शन आज भारत को दुनिया के बाकी देशों से मीलों आगे ले जाकर के खड़ा कर रहा है। लेकिन क्या यह सफर इतना आसान था और इस रास्ते में क्या-क्या रुकावटें आई?जरा उनप हम देखते हैं। तो दोस्तों, दशकों से भारत की छवि दुनिया में एक आईटी सर्विस प्रोवाइडर की रही। विदेशी कंपनियां डिजाइन बनाती थी। आईडिया उनका होता था और हमारे इंजीनियर्स सिर्फ उन निर्देशों को कोडिंग किया करते थे या बैक एंड का काम संभालते थे। हमने दूसरों के लिए अनगिनत सॉफ्टवेयर्स और सिस्टम्स बनाए। लेकिन प्रोडक्ट पर ठप्पा हमेशा किसी विदेशी कंपनी का होता था। यह पहली बार है जब पूरी तरह से बाजी पलट गई है। अब दोस्तों आईडिया हमारा है, डिजाइन हमारा है, आर्किटेक्चर हमारा है और इंटेलेक्चुअल प्रॉपर्टी राइट्स भी हमारे पास में है। यह सिर्फ एक चिप की कामयाबी नहीं है। यह दोस्तों उस आत्मविश्वास की जीत है जो आज के युवा भारतीय उद्यमियों के अंदर कूट-कूट करके भरी हुई है। हम अब फॉलोअर्स नहीं बल्कि हम वो ट्रेंड सेटर बन गए हैं। जब हमारा अपना प्रोडक्ट ग्लोबल मार्केट के अंदर उतरेगा तो वह सिर्फ मुनाफा नहीं कमाएगा बल्कि दुनिया की सबसे बड़ी टेक कंपनियों को भारत के इकोसिस्टम पर निर्भर कर देगा। क्या दोस्तों यह निर्भरता भारत को एक ग्लोबल ताकत बना सकती है? तो आज के समय में डाटा ही सबसे बड़ा हथियार है और उस डाटा को प्रोसेस करने वाले सर्वर सबसे बड़ी फैक्ट्रीज हैं। अगर हम ग्लोबल सप्लाई चेन पर नजर डालें तो सेमीकंडक्टर के बिना आज एक सुई से लेकर के हवाई जहाज तक कुछ भी नहीं बन सकता है। एआई की इस क्रांति ने सेमीकंडक्टर की डिमांड को 100 गुना बढ़ा दिया है। ऐसे में जो देश चिप की सप्लाई को कंट्रोल करेगा वही भविष्य की अर्थव्यवस्था को कंट्रोल करेगा। भारत ने बहुत ही स्मार्ट तरीके से इस सप्लाई चेन के सबसे महत्वपूर्ण हिस्से को पकड़ लिया है। पावर मैनेजमेंट चिप्स की कमी की वजह से कई बार बड़ी कंपनियों के प्रोजेक्ट्स महीनों तक लटके रहते हैं। अब जब दोस्तों भारत खुद इस मैदान में उतर चुका है और वह भी एक स्वदेशी और हाईटेक डिजाइन के साथ में तो यह तय है कि अमेरिका और यूरोप की बड़ी कंपनियों को भारतीय सप्लायर्स की लाइन में लगना ही पड़ेगा। यह सिर्फ एक शुरुआत है क्योंकि जिस दिन यह चिप ग्लोबल मार्केट के अंदर पूरी तरह से रोल आउट होगा उस दिन भारत की टेक इंडस्ट्री का रेवेन्यू और रुतबा दोनों आसमान पर होंगे। लेकिन क्या दुनिया की वो कंपनियां जो खुद को टेक का भगवान मानती हैं इस बदलाव को आसानी से स्वीकार कर पाएंगी? तो दोस्तों सच तो यह है कि किसी भी देश या कंपनी के लिए अपनी बादशाहत छोड़ना आसान नहीं। कोई नया प्लेयर मार्केट के अंदर आता है तो पुराने खिलाड़ी उसे दबाने की पूरी कोशिश करते हैं। लेकिन यहां पर दोस्तों बात थोड़ी सी अलग है। भारत ने जो तकनीक विकसित की है वो कोई विकल्प नहीं है। बल्कि वो एक जरूरत बन चुकी है। आप एi के बड़े मॉडल्स को तब तक नहीं चला सकते जब तक आपके पास उसे पावर देने वाला सही सिस्टम ना हो। इसलिए चाहकर भी कोई देश या कंपनी भारत के इस इनोवेशन को इग्नोर नहीं कर सकती है। उन्हें हर हाल में भारतीय तकनीक के साथ में तालमेल बैठाना ही पड़ेगा। डीएलआई योजना के तहत अभी तक 105 कंपनियों को मदद मिल चुकी है। जरा सोचिए दोस्तों जब सीटi जैसी दर्जनों कंपनियां अपना स्वदेशी चिप्स के साथ ग्लोबल मार्केट के अंदर उतरेंगी तो माहौल क्या होगा? यह एक ऐसा चक्रव्यूह है जिसे भारतीय दिमाग ने मुना है और इसमें ग्लोबल टेक कंपनियों का फंसना तय है। क्या यही वो पल है जिसका इंतजार देश सालों से चल रहा था? अगर दोस्तों हम इस तकनीक की गहराई में जाएं तो एआई दो मुख्य हिस्सों में काम करता है। पहला होता है ट्रेनिंग जहां एi मॉडल्स को दुनिया भर का डाटा खिलाया जाता है। उसे सिखाया जाता है। इसमें सबसे ज्यादा ताकत लगती है। दूसरा हिस्सा होता है इंटरफेरेंस जब उस एआई से सवाल पूछते हैं और वो आपको जवाब देता है। आज के समय में करोड़ों लोग एक साथ चैट जीपीटी या फिर ऐसे ही दूसरे मॉडल्स का इस्तेमाल कर रहे हैं। इन करोड़ों सवालों का जवाब सेकंड्स में देने के लिए बैकग्राउंड में जो मशीनें लगे हैं, वह काम करती हैं। उन पर जो प्रेशर पड़ता है, उसकी हम आम जिंदगी में कल्पना भी नहीं कर सकते हैं। उस भयंकर प्रेशर को मैनेज करने के लिए ही भारत के इंजीनियर्स ने इस स्मार्ट चिप का जाल बिछाया है। यह चिप ना केवल सर्वर की उम्र बढ़ाएगी बल्कि बिजली की भारी बचत करके इन बड़ी कंपनियों के करोड़ों डॉलर्स भी बचाने वाली है। जब बात पैसे बचाने और परफॉर्मेंस बढ़ाने की आती है तो पूरी दुनिया नतमस्तक हो जाती है और यही वजह है कि आज भारत की इस तकनीक के सामने बड़ी-बड़ी टेक दिग्गजों ने अपने हथियार डाल दिए हैं। इस ऐतिहासिक टैप आउट के बाद सिर्फ टेक्नोलॉजी की दुनिया में ही तहलका नहीं मचा है बल्कि ग्लोबल इकॉनमी के धुरंधरों की भी नींद उड़ी हुई है। जब 21,000 चिप्स का पहला जत्था टेस्टिंग के लिए उतरेगा तो यह सिर्फ एक ट्रायल नहीं होगा। यह पूरी दुनिया के सामने भारत का असली शक्ति प्रदर्शन होगा। अगर यह टेस्टिंग सफल होती है जिसकी पूरी उम्मीद है तो ग्लोबल मार्केट के अंदर अरबों डॉलर की ऑर्डर्स सीधे भारत की तरफ मुड़ जाएंगे। दोस्तों इसका सीधा असर क्या होने वाला है? तो इसका असर यह होगा कि देश के अंदर मैन्युफैक्चरिंग डिजाइनिंग और रिसर्च का एक ऐसा तूफान आएगा जो लाखों युवाओं के लिए हाईटेक नौकरियां पैदा करेगा। जो भारतीय टैलेंट अब तक लाखों डॉलर के पैकेज के लालच में विदेशों की तरफ भागता था। अब वो अपने ही देश में बैठकर के दुनिया की सबसे एडवांस तकनीक पर काम कर

रही है। दोस्तों, यह सिर्फ ब्रेन ड्रेन को रोकने का तरीका नहीं है बल्कि यह दुनिया भर के ब्रेंस को भारत की तरफ खींचने का एक बहुत बड़ा मास्टर प्लान है। क्या आपको नहीं लगता कि यह सब किसी बॉलीवुड थ्रिलर फिल्म की तरह चल रहा है? जहां एक खामोश खिलाड़ी अचानक पूरी बाजी पलट देता है। दोस्तों, इस पूरी कहानी में सबसे दिलचस्प बात यह है कि भारत ने कोई शोरशराबा नहीं मचाया है। चीन की तरह हमने दुनिया को धमकियां नहीं दी है कि हम मार्केट पर कब्जा कर लेंगे। अमेरिका की तरह हमने मार्केटिंग पर करोड़ों डॉलर नहीं फूंके हैं। हमारे देश के मिशन और स्टार्टअप ने  एकदम शांत रह के अंडरग्राउंड तरीके से अपना काम किया और जब तक विदेशी कंपनियों को भनक लगती कि भारत क्या कर रहा है तब तक चिप डिजाइन होकर के फैक्ट्री तक पहुंच चुकी थी और इसे कहते हैं असली स्ट्रेटजी। सामने वाले को तब तक अंधेरे में रखो जब तक कि आपकी जीत की रोशनी उसकी आंखों को चौंधियां ना दे। एi डाटा सेंटर्स की यह पावर चिप उसी रोशनी का काम कर रही है। जिन विदेशी कंपनियों ने कभी हमारे टैलेंट को सिर्फ कोडिंग तक सीमित रखा था। आज वही कंपनियां इस चिप की डिलीवरी के लिए भारत के अधिकारियों के साथ में मीटिंग्स फिक्स करने में लगी हुई है। दोस्तों, वक्त का पहिया कैसे घुमा है? यह उसका सबसे सटीक उदाहरण है। क्या आने वाले वक्त में दुनिया की हर बड़ी टेक कंपनी को भारत से होकर के गुजरना पड़ेगा? तो इसका जवाब है एक वक्त था जब पूरी दुनिया सिर्फ ताइवान या सिलिकॉन वैली की तरफ देखती थी। जब भी चिप या सेमीकंडक्टर का जिक्र होता था, हर किसी को लगता था कि इस जटिल तकनीक को समझना और बनाना केवल गिने-चुने देशों की बस की बात है। लेकिन आज हालात पूरी तरह से बदल चुके हैं। भारत की धरती पर जो इकोसिस्टम डेवलप हो रहा है वो दुनिया भर के टैलेंट को अपनी तरफ खींच रहा है। जब Intel की पूर्व बॉस जैसी शख्सियतें भारतीय कंपनियों के साथ जुड़कर के काम करने में अपना फायदा देख रही हैं तो यह साफ संकेत है कि हवा का रुख किस तरफ है। भारत ने दुनिया को बता दिया है कि हम सिर्फ कंज्यूमर नहीं है जो केवल विदेशी गैजेट्स और सॉफ्टवेयर का इस्तेमाल करेंगे। हम अब क्रिएटर हैं जो तय करेंगे कि भविष्य की तकनीक कैसे काम करेगी। यह चिप भारत के उस संकल्प का जीता जागता सबूत है कि हम अब किसी के पीछे चलने वाले नहीं हैं बल्कि रास्ता दिखाने वाले हैं। लेकिन सबसे बड़ा सवाल तो अभी बाकी है जो आपको

सीधे दिमाग पर असर करने वाला है। अब वक्त आ गया है उस सबसे बड़े सवाल का जो हर हिंदुस्तानी के मन में उठना चाहिए। जब दोस्तों भारत के इंजीनियरों ने एआई की रीड यानी कि पावर मैनेजमेंट चिप बना के दुनिया को हैरान कर दिया है तो क्या वो दिन दूर है जब दुनिया का सबसे पावरफुल एआई मॉडल भी पूरी तरह से स्वदेशी होगा। अमेरिका और चीन की कंपनियों को जिस तकनीक ने हमारे दरवाजे पर लाकर के खड़ा कर दिया है। क्या वो हमारे लिए ग्लोबल डोमिनेंस का अगला कदम है? इस मामले में दोस्तों आपका क्या कुछ सोचना है? कमेंट करके मुझे जरूर बताइए कि आपको क्या लगता है? क्या भारत आने वाले 5 सालों में ताइवान और अमेरिका को पछाड़ के दुनिया का सबसे बड़ा सेमीकंडक्टर हब बन पाएगा या नहीं? अपनी राय जरूर दीजिए।

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