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Wednesday, June 17, 2026

G7 के मंच पर मोदी और ट्रंप की मुलाकात से ठीक पहले क्यों बवाल मच गया है?

 क्या अमेरिका ने दिखा दी है अपनी असली औकात? चाइना के लिए क्या भारत को हमेशा के लिए दूर कर चुके हैं ट्रंप? भारत की पीठ में खंजर घोंपने वाले दुनिया के सबसे पुराने लोकतंत्र पर अब पल भर का भी भरोसा क्यों नहीं किया जा सकता है? G7 के मंच पर मोदी और ट्रंप की मुलाकात से ठीक पहले क्यों बवाल मच गया है? क्यों इस मुलाकात पर पूरी दुनिया की नजरें टिक गई है? आखिर क्यों अमेरिका ने भारत का गलत नक्शा दिखा के करोड़ों भारतीयों के स्वाभिमान को सीधे तौर पर ललकार दिया है? क्या भारत को अब अमेरिका के बनाए क्वाड चक्रव्यूह से हमेशा के लिए बाहर आ जाना चाहिए। दोस्तों आज 17 जून 2026 है और आज ग्लोबल पॉलिटिक्स यानी कि वैश्विक राजनीति के अंदर एक ऐसा भूचाल आ चुका है जिसकी गूंज वाशिंगटन से लेकर के नई दिल्ली के सत्ता के गलियारों तक बहुत तेजी से सुनाई जा रही है। अमेरिका के रक्षा विभाग यानी पेंटागन ने एक ऐसा फैसला ले लिया है जिसने पूरी दुनिया के जिओपॉलिटिकल समीकरणों को पूरी तरीके से पलट करके रख दिया है। डोनाल्ड ट्रंप के प्रशासन ने दुनिया की सबसे अहम इंडोपेसिफिक कमांड के नाम से इंडो शब्द को हमेशा के लिए मिटा दिया है। जी हां, अब यह सिर्फ पेसिफिक कमांड रह गया है।

 यह कोई मामूली टाइपिंग मिस्टेक या फिर एक नाम का बदलाव नहीं है बल्कि यह अमेरिका की नई विदेश नीति और रक्षा नीति का वो खतरनाक एजेंडा है जो सीधे तौर पर भारत को रणनीतिक मंच से साइडलाइन करने की एक बहुत बड़ी साजिश है। दोस्तों मई 2026 के शंग्रीला डायलॉग के अंदर अमेरिकी युद्ध सचिव पीट हेग्सेथ ने जो एकतरफ़ा भाषण दिया था उसी दिन यह साफ हो गया था कि अमेरिका अब भारत के साथ में कंधे से कंधा मिलाकर के नहीं चलना चाहता है और आंकड़े और घटनाएं दोस्तों गवाह हैं कि अमेरिका के ओबामा प्रशासन से लेकर के ट्रंप के पहले कार्यकाल और फिर बाइडन प्रशासन के दौरान जिस इंडोपेसिफिक विज़न को दुनिया का भविष्य बताया जा रहा था उसे ट्रंप के दूसरे कार्यकाल ने एक ही झटके के अंदर किनारे कर दिया है। लेकिन दोस्तों इसके पीछे का असली खेल क्या है? आखिर दोस्तों अमेरिका ठीक उस वक्त ऐसा क्यों करने जा रहा है जब दुनिया को सबसे ज्यादा स्थिरता की जरूरत है। दोस्तों यह सवाल हर उस इंसान के दिमाग के अंदर है जो दुनिया की राजनीति को समझता है। लेकिन असली सस्पेंस तो अभी शुरू हुआ है। अब जरा इस फैसले की गहराई में चलते हैं। तो दोस्तों आपको बता दूं कि अमेरिका, भारत, ऑस्ट्रेलिया और जापान को मिलाकर के जो एक बहुत मजबूत गठबंधन यानी कि क्वाड बना है, उसका पूरा का पूरा आधार ही इंडोपेसिफिक रीजन की सुरक्षा और विकास है। ऐसे में दोस्तों, इंडो शब्द को ही जड़ से उखाड़ फेंकने के बाद सबसे बड़ा सवाल यह उठता है कि क्या भारत को अब इस क्वाड से बाहर निकल जाना चाहिए? तो दोस्तों इंडोपेसिफिक कमांड से भारत की पहचान को मिटाने का बहुत साफ और सीधा मतलब यह निकलता है कि अमेरिका अब पूरे हिंद प्रशांत क्षेत्र को एक साथ लेकर के चलने के आदर्शवाद से पीछे हट चुका है। अमेरिका अब सिर्फ और सिर्फ अपने मुख्य प्रशांत महासागरीय हितों यानी कि पेसिफिक ओशन की सिक्योरिटी के ऊपर ही अपना पूरा फोकस करना चाहता है।

अमेरिका यह गुरूर पाल करके बैठ गया है कि उसे अब चाइना को कंट्रोल करने के लिए या एशिया के अंदर अपना दबदबा बनाए रखने के लिए भारत की कोई जरूरत नहीं है। यह सीधे तौर पर अमेरिका और चाइना के बीच जी2 यानी कि ग्रेट टू की उस खतरनाक सोच को आगे बढ़ाता है जहां दुनिया की दो बड़ी ताकतें मिलकर के पूरी दुनिया को अपने हिसाब से चलाना चाहती हैं। लेकिन क्या भारत इस अमेरिकी गुरूर को चुपचाप सह लेगा? तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। आगे दोस्तों जो कुछ होने वाला है वो और भी  ज्यादा हैरान करने वाला है। दोस्तों जरा इतिहास के पन्नों को थोड़ा पीछे पलटें तो साल 2018 के अंदर जब डोन्ड ट्रंप का पहला कार्यकाल चल रहा था तब उन्होंने ही अमेरिकी सैन्य कमान का नाम यूएस पेसिफिक कमांड यानी कि यूएस पैकम से बदलकर के यूएस इंडोपेसिफिक कमांड यानी कि इंडोपैकम किया था। उस वक्त अमेरिका के तत्कालीन रक्षा मंत्री जेम्स मैटिस ने बहुत ही जोर शोर से कहा था कि यह बदलाव भारत की बदलती रणनीतिक ताकत और हिंद महासागर से लेकर के प्रशांत महासागर तक की जुड़ी हुई सुरक्षा जरूरतों को ध्यान में रखकर के किया गया है। जेम्स मैटिस ने तब बड़े ही गर्व के साथ कहा था कि यह कमांड बॉलीवुड से हॉलीवुड तक फैली हुई है।

 लेकिन आज यानी कि 2026 के अंदर पेंटागन ने अपना ही थूका हुआ चार्ट करके उसे फिर से पुराना नाम यानी कि पेसिफिक कमांड दे दिया है। दोस्तों अमेरिका इसके पीछे यह खोखला तर्क दे रहा है कि यह उनके ऐतिहासिक रूट और लेगसी को बहाल करने के लिए किया गया है। अमेरिका का कहना है कि कमांड का क्षेत्र या मिशन नहीं बदल रहा है। लेकिन दोस्तों जिओपॉलिटिक्स में सिर्फ वो नहीं होता है जो आंखों से दिखाई देता है। यहां बड़े-बड़े नेताओं के मुंह से निकले एक-एक शब्द और हटाए गए एक-एक अक्षर के बहुत गहरे मायने होते हैं। एक्सपर्ट साफ तौर पर आशंका जता रहे हैं कि एशिया पेसिफिक रीजन के अंदर अब अमेरिका की नजर में भारत का कोई जिओपॉलिटिकलेंस नहीं रह गया है। लेकिन दोस्तों क्या आपने कभी सोचा है कि यूनाइटेड स्टेट्स ऑफ अमेरिका से ज्यादा मनमानी करने वाला दुनिया के अंदर कोई दूसरा मुल्क नहीं है? दोस्तों इसके लिए जिओपॉलिटिकल एक्सपर्ट आर जगन्नाथन ने बिल्कुल सटीक बात कही है। उन्होंने साफ कहा है कि अमेरिका पर दुनिया का कोई भी अंतरराष्ट्रीय नियम या कानून लागू नहीं होता। अमेरिका जो नियम बनाता है वो पूरी दुनिया पर थोप देना चाहता है सिवाय उस स्थिति के जब सामने वाले देश के पास ना कहने की बहुत बड़ी ताकत हो और दोस्तों आज की डेट में सिर्फ चाइना और रशिया ही अमेरिका की आंखों के अंदर आंखें डालकर के ऐसी बात कह पा रहे हैं। अब दोस्तों भारत का सबसे पहला और सबसे अहम मकसद अब अपनी राष्ट्रीय आर्थिक और राजनीतिक ताकत के दम पर ऐसी बेजोड़ संप्रभुता हासिल करनी चाहिए कि अमेरिका भी हमें डिक्टेट ना कर सके।

भारत को अब अमेरिका पर अपनी निर्भरता को तुरंत प्रभाव से कम करना शुरू कर देना चाहिए। इसी निर्भरता का फायदा उठा के पिछले एक साल में डोनल्ड ट्रंप से लेकर के उनके कॉमर्स सेक्रेटरी हावर्ड लटनिक पीटर नवारो और अब अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो तक ने भारत के खिलाफ बहुत ही बेतुकी और अहंकार भरी बातें कही हैं। दोस्तों ऊपरी तौर पर देखने में लगता है कि सिर्फ एक सैन्य कमान का नाम ही तो बदला है। लेकिन जरा टाइमिंग पर गौर कीजिए। यह नाम ठीक उस वक्त बदला गया है जब आज ही फ्रांस की राजधानी पेरिस के अंदर प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी और अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप की आमने-सामने की बहुत ही हाई वोल्टेज मुलाकात होने वाली है। यह कोई संयोग नहीं  है। यह एक बहुत बड़ा रणनीतिक प्रयोग है और धमकी भरा संदेश है। दोस्तों जरा याद कर लीजिए पिछले साल फरवरी के अंदर मोदी से मिलने से पहले ट्रंप ने रेसिप्रोकल टेरिफ को लेकर के भारत के खिलाफ ट्वीट किया था और बाद में भारत के ऊपर 50% का भारी भरकम टेरिफ थोप दिया जिससे भारतीय अर्थव्यवस्था को भारी नुकसान पहुंचा| अब इंडो शब्द को हटाने का साफ मतलब है कि अमेरिका भारत को यह संदेश दे रहा है कि अगर भारत पूरी तरह से अमेरिका की शर्तों के ऊपर नहीं चलता है तो अमेरिका को कोई फर्क नहीं पड़ता है। ट्रंप प्रशासन यह संदेश दे रहे हैं, यह संकेत दे रहे हैं कि अमेरिका का मुख्य सैन्य फोकस अब सिर्फ ताइवान, जापान, फिलीपींस और चाइना से जुड़ी चुनौतियों के ऊपर है। भारत उनके लिए एक साझेदार जरूर हो सकता है। लेकिन अब भारत उनकी एशिया रणनीति का केंद्र बिंदु नहीं है। यह भारत के लिए एक बहुत बड़ा अलार्म है। लेकिन अमेरिका का अहंकार सिर्फ नाम बदलने तक सीमित नहीं रहा।

अमेरिका ने अपनी सारी हदें पार करते हुए भारत के खिलाफ एक और बड़ा ही भड़काऊ कदम उठाया है। दोस्तों, अमेरिकी रक्षा विभाग ने जो अपना नया रणनीतिक मैप यानी कि नक्शा जारी किया है, उसमें भारत की संप्रभुता के साथ में सीधे तौर पर छेड़छाड़ की गई है। यूएस कमांड ने भारत का एकदम गलत और भ्रामक नक्शा इस्तेमाल किया है। इस नए अमेरिकी नक्शे के अंदर पूरा जम्मू कश्मीर शामिल नहीं है। और सबसे हैरानी की बात तो यह है कि पाकिस्तान के कब्जे वाले कश्मीर को सीधे तौर पर पाकिस्तानी इलाका दिखाया गया है। इस नक्शे के अंदर भारत को हल्के हरे रंग से दिखाया गया है। लेकिन जम्मू कश्मीर के ऊपरी और पश्चिमी हिस्सों यानी पीओके और अक्साई चैन को भारत के मुख्य नक्शे से बिल्कुल अलग कर दिया गया है। दोस्तों भारत हमेशा से अपनी पूरी थलीय और समुद्री सीमा की सुरक्षा को अखंड मानता है। लेकिन अमेरिकी सैन्य कमान का यह नक्शा भारत और पाकिस्तान को दो अलग-अलग सैन्य कमानों यानी सेंट कॉम और यूएस पैकोकॉम में बांट करके देखता है। इसमें भारत के ठीक बीच से एक काली रेखा गुजर रही है।

डॉन्ड ट्रंप का प्रशासन लगातार भारत के खिलाफ एक्शन ले रहा है। मैप में साफ दिख रहा है कि पाकिस्तान को अमेरिका ने यूएस सेंट कॉम के अधीन दिखाया है और इसके चलते उसे भारत से अलग रंग में दिखाया गया है। यह ट्रंप प्रशासन का पाकिस्तान के प्रति अचानक उमड़ा हुआ प्रेम है जो भारत के लिए बहुत बड़े खतरे की घंटी है। लेकिन दोस्तों क्या भारत इस कूटनीतिक अपमान को बर्दाश्त करेगा तो ऐसा हरगिज़ नहीं है। दोस्तों देशों के बीच में तनाव तो चलते रहते हैं लेकिन जब बात हमारे देश के नागरिकों की जान पर आ जाए तो कोई भी भारतीय चुप नहीं बैठ सकता है। यह पूरा विवाद तब और ज्यादा गहरा और दर्दनाक हो गया जब हॉर्मोज स्टेट के अंदर एक कमर्शियल जहाज पर हुए अमेरिकी एक्शन के दौरान तीन निर्दोष भारतीय नाविकों को अपनी जान गवानी पड़ी। दोस्तों ये भारत के लिए एक बहुत बड़ा और गहरा सदमा है। अहंकार की हद तो देखिए कि इस भयंकर और दुखद घटना के बाद ही ट्रंप प्रशासन के शुरुआती बयानों में इन तीन भारतीयों की मौत का कोई जिक्र तक नहीं किया गया। अमेरिका ने सिर्फ इतनी सी बात कही कि उन्होंने एक ऐसे जहाज को टारगेट किया जो अमेरिकी प्रतिबंधों का उल्लंघन कर रहा था और जो उनकी सेना के साथ में सहयोग नहीं कर रहा था। दोस्तों अमेरिका ने अभी तक इन तीन भारतीय नागरिकों के दुखद अंत पर कोई माफी नहीं मांगी है। उल्टा अमेरिकी विदेश मंत्री मार्को रूबियो ने तो भारत को ही धमकाने वाले अंदाज के अंदर बयान दे दिया है। जब भारत सरकार ने कड़ा विरोध दर्ज कराया और अमेरिकी डिप्लोमेट्स को तलब किया तब भी अमेरिका का रवैया एकदम बेरुखा


रहा है। भारत के विदेश मंत्री एस जयशंकर ने मार्को रूबियो से सख्त लहजे के अंदर बातचीत की है। लेकिन अमेरिकी बयान में रत्ती भर भी पछतावा नहीं आया है। दोस्तों अमेरिका ने घमंड में कहा है कि उनकी नाकाबंदी का उल्लंघन किसी भी हाल में बर्दाश्त नहीं किया जाएगा। दोस्तों इस पूरी घटना ने भारत के अंदर भयंकर गुस्सा भर दिया है। जिन तीन भारतीय नाविकों ने अमेरिकी हमले के अंदर अपनी जान गवाई है, उनके परिवारों का रो-रो करके बुरा हाल है। जान गवाने वाले 23 साल के युवा नाविक आदित्य शर्मा के पिता राजेश शर्मा ने जो कहा है, वह किसी भी इंसान का दिल चीर देगा। उन्होंने रूंधे हुए गले से कहा है कि मेरी बस एक ही मांग है कि मेरे बेटे का शरीर मुझे वापस दिया जाए। मैं जानना चाहता हूं कि उसके आखिरी पलों में उसके साथ में क्या हुआ था।” था। क्या उसे बचाने के लिए कोई भी मदद दी गई थी? किन हालातों में हमारे देश के इन तीन होनहार युवाओं की जान चली गई? दोस्तों, अमेरिकी एक्सपर्ट डरक जे ग्रासमैन जो एशिया मामलों के अंदर बहुत बड़े जानकार हैं। उन्होंने भी खुद अपनी सरकार के ऊपर सवाल उठाए हैं। उन्होंने पूछा है कि आखिर अमेरिका भारत का दोस्त कैसा दोस्त है? रिपीट। दोस्तों, उन्होंने पूछा है कि आखिर अमेरिका भारत का कैसा दोस्त है? ग्रासमैन ने कहा कि रूबियों के शब्द एकदम बेतुके थे और ट्रंप का अमेरिका भारत के लिए कतई कोई अच्छा दोस्त नहीं हो सकता है। इस दुखद घटना ने भारत में अमेरिका विरोधी भावनाओं को चरम पर पहुंचा दिया है। अब पूरी दुनिया की नजरें फ्रांस में चल रहे G7 समिट के ऊपर टिकी हुई है।

 भारत के प्रधानमंत्री मोदी फ्रांस पहुंचे हुए हैं और आज शाम को ही उनकी डोनल्ड ट्रंप के साथ में मुलाकात होने वाली है। दोस्तों पूरे 16 महीने के बाद में इन दोनों नेताओं की आमने-सामने की मुलाकात होने वाली है और इन 16 महीनों के अंदर भारत और अमेरिका के रिश्ते 20 साल पीछे खिसक चुके हैं। लेकिन दोस्तों सवाल है कि क्या पीएम मोदी आज बंद कमरों में होने वाली इस मीटिंग में उन तीन भारतीय नाविकों का मुद्दा उठाएंगे। क्या ट्रंप की आंखों में आंखें डाल करके भारत अपना कड़ा विरोध दर्ज कराएगा? जी7 शिखर सम्मेलन के दौरान कुछ तस्वीरें सामने आई हैं। जहां पोडियम पर चढ़ते वक्त पीएम मोदी ने हाथ बढ़ाकर के डोन्ड ट्रंप को सहारा दिया और ट्रंप ने भी उनका हाथ पकड़ा। दोनों की कुर्सियां भी एक साथ लगाई गई थी। लेकिन दोस्तों, यह सिर्फ कैमरों के लिए की गई एक कूटनीतिक औपचारिकता है या इसके पीछे रिश्तों को सुधारने की कोई ठोस रणनीति है। दोस्तों, पीएम मोदी ने कल ही ट्रंप की मौजूदगी में G7 के मंच से एक बहुत ही कड़ा और स्पष्ट संदेश दिया। उन्होंने पूरी दुनिया के सामने दहाड़ते हुए कहा था कि समुद्री कर्मचारियों को बिना किसी डर के अपना काम करने की आजादी होनी चाहिए। यह सीधे तौर पर अमेरिका और उसके मनमाने नौसैनिक रवैया की तरफ एक बहुत ही कड़ा संदेश था, कड़ा इशारा था। आज भारत के पास में अमेरिका के पास शिकायत करने के लिए एक या दो नहीं बल्कि दर्जनों मुद्दे हैं। दोस्तों ट्रंप की नई वीजा और इमीग्रेशन पॉलिसी ने भारतीय छात्रों और कामगारों का भविष्य अधर के अंदर लटका दिया है। भारीभरकम टेरिफ ने भारतीय बाजार और अर्थव्यवस्था को तगड़ी चोट पहुंचाई है। यूएस इंडिया बिजनेस काउंसिल के प्रेसिडेंट अतुल केशव ने बिल्कुल सही चेतावनी दी है कि पिछले 25 सालों में दिल्ली और वाशिंगटन के बीच जो भी भरोसा डेवलप हुआ था वह अब बहुत तेजी के साथ में टूट चुका है और ऐसा लग रहा है कि दोनों देशों के रास्ते अब हमेशा के लिए अलग-अलग होने वाले हैं।

डोनाल्ड ट्रंप भले ही कैमरे के सामने कितनी भी बार पीएम मोदी को अपना अच्छा दोस्त बता लें लेकिन उनके प्रशासन ने बार-बार हमारे हिंदुस्तान के स्वाभिमान को ठेस पहुंचाई है। दोस्तों क्या भारत इस अपमान को इतनी आसानी से भूल जाएगा? तो ऐसा बिल्कुल नहीं है। यह 2026 का वो भारत है जो अपनी शर्तों पर दुनिया से बात करता है जो अपनी सुरक्षा और अपने नागरिकों के सम्मान के लिए किसी भी सुपर पावर से टकराने का माद्दा रखता है। दोस्तों अमेरिका की यह चालबाजियां और पाकिस्तान के प्रति उनका यह नया प्यार भारत के लिए एक बहुत बड़ा सबक है कि अंतरराष्ट्रीय राजनीति में कोई किसी का सगा नहीं होता। दोस्तों आज फ्रांस के उस बंद कमरे में जो भी बातचीत होगी वो आने वाले कई दशकों तक एशिया और पूरी दुनिया का भविष्य तय करने वाली है। दोस्तों आपको क्या लगता है? क्या पीएम मोदी को आज डोनल्ड ट्रंप को उसी की भाषा के अंदर करारा जवाब देना चाहिए? क्या भारत को अब क्वाड से किनारा कर लेना चाहिए? टाटा बाय-ब बोल देना चाहिए। और आप इस मामले में क्या सोचते हैं? कमेंट में अपनी राय जरूर लिखें। नमस्कार


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