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Wednesday, May 7, 2025

सुप्रीम कोर्ट के जजेस के एसेट डिक्लेरेशन

 क्या आपको पता है कि सुप्रीम कोर्ट के जजेस के एसेट डिक्लेरेशन ने एक बार फिर से कितने बड़े राज खोल दिए हैं? भारतीय सुप्रीम कोर्ट की सेंक्शन स्ट्रेंथ 34 जजेस की है और अप्रैल 2025 तक 31 जजेस हैं। उनमें से 21 जजेस ने अपने एसेट्स ओपनली डिक्लेअ किए हैं जो जुडिशरी की ट्रांसपेरेंसी और अकाउंटेबिलिटी की तरफ एक जबरदस्त कदम माना जा रहा है। लेकिन यह सिर्फ एक फॉर्मल एक्सरसाइज नहीं थी। जब इन डिक्लेरेशन का डिटेल में विश्लेषण किया गया तो कुछ ऐसे फैक्ट सामने आए हैं जो सचमुच में आंखें खोल देने वाले हैं।

किसी के पास पांच अलग-अलग शहरों में प्रॉपर्टीज हैं और फॉरेन इन्वेस्टमेंट्स भी तो कोई जज सिर्फ 3.5 लाख के मूवेबल एसेट के साथ अपना जीवन गुजार रहा है। कहीं किसी की टैक्स हिस्ट्री ₹91 करोड़ तक की पहुंच गई है तो कहीं सिर्फ एक Honda WRV गाड़ी और थोड़ी बहुत ज्वेलरी। यह तो सच में एक रात के अंधेरों में छुपा हुआ बॉम्ब शेल है। तो चलिए देखते हैं कि इस डाटा ने क्या कुछ रिवील किया है और कौन कितना अमीर है और किसके पास सबसे कम पैसा है। स्टे ट्यून विद दिस वीडियो टिल द एंड। सुप्रीम कोर्ट ने 5 मई 2025 को अपनी वेबसाइट पर 21 जजेस के एसेट्स पब्लिक किए। टोटल 33 जजेस में से और यह सब हुआ बिल्कुल चीफ जस्टिस ऑफ इंडिया संजीव खन्ना के रिटायरमेंट के ठीक पहले जो 13 मई को सुपरनोट हो रहे हैं। सबसे ज्यादा ध्यान देने वाली बात यह है कि सुप्रीम कोर्ट कॉलेजियम के पांचों जजेस जिनके हाथ में नए जजेस की अपॉइंटमेंट और ट्रांसफर की ताकत होती है, उन्होंने अपने एसेट्स डिस्क्लोज़ किए हैं। यानी कि सिस्टम के सबसे पावरफुल जजेस ने भी अपने फाइनेंशियल पोजीशन को जनता के सामने रख दिया है। यह इंडियन जुडिशरी के इतिहास में एक रेयर मोमेंट है। जहां इतनी सीनियर जुडिशरी ने वॉलंटरी अपने प्राइवेट फाइनेंसियल डिटेल्स को डिस्क्लोज़ किया है। सिमिलरली उन दो जजेस जस्टिस पीएस नरसिम्हा और जस्टिस केबी विश्वनाथन जो डायरेक्टली बाहर से सुप्रीम कोर्ट में आए थे उन्होंने भी अपने एसेट्स डिस्क्लोज़ कर दिए हैं।

इनके अलावा 12 जजेस जिन्होंने अभी तक अपना स्टेटमेंट नहीं दिया है वो हैं जस्टिस बीवी नागरत्ना, जस्टिस जे के महेश्वरी, जस्टिस दीपांकर दत्ता, जस्टिस एसानुद्दीन अमन उल्ला, जस्टिस मनोज मिश्रा, जस्टिस अरविंद कुमार, जस्टिस पीके मिश्रा, जस्टिस एस सी शर्मा, जस्टिस पीबी वरले, जस्टिस एन कोटीश्वर सिंह, जस्टिस आर महादेवन और जस्टिस जयमला बागची। जब हमने अभी तक के 18 जजेस के डिक्लेरेशन का कंपैरेटिव एनालिसिस किया तो हमें पता चला कि सबसे ज्यादा मटेरियलिस्टिक एसेट्स जस्टिस केवी विश्वनाथन के पास हैं। इन्होंने डिक्लेअर किया है कि उनके पास सरफतगंज इंक्लेव, गुलमोहर पार्क और कोयंबतूर जैसे प्रीमियम लोकेशनेशंस पर पांच प्रॉपर्टीज हैं। इंडिया में उन्होंने $20 करोड़ से ज्यादा की म्यूच्यूल फंड्स, इक्विटी और फिक्स्ड डिपॉजिट्स में से इन्वेस्ट किए हैं। साथ ही उन्होंने आरबीआई के लिबरलाइज्ड रेमिटेंस स्कीम के जरिए $1 मिलियन लगभग ₹8.4 करोड़ फॉरेन फंड्स को भी ट्रांसफर किए हैं जो उनके और उनके स्पाउस के नाम पर है। जस्टिस केवी विश्वनाथन के पास Toyota, कैमरी और एलटीएस जैसी गाड़ियां भी है। ज्वेलरी के रूप में उन्होंने लगभग 1.45 कि.ग्र. सोना चांदी डिक्लेअ किया है। सबसे खास बात यह है कि उनके ऊपर कोई भी टैक्स लायबिलिटी नहीं है। उन्होंने पिछले 15 सालों में 91.47 करोड़ का इनकम टैक्स दिया है। यह सब दिखाता है कि जज बनने से पहले उन्होंने टॉप सीनियर एडवोकेट के रूप में कितनी सफलता हासिल की थी।

अब अगर हम बात करें जमीन की तो जस्टिस सूर्यकांत सबसे आगे हैं। उन्होंने पंचकूला में 13.5 एकड़ की एग्रीकल्चर लैंड डिक्लेअर की है। हिसार में 1/3 शेयर के रूप में 12 एकड़ और चंडीगढ़, गुरुग्राम और न्यू दिल्ली जैसे शहरों में प्लॉट्स और हाउसेस हैं। उनके स्पाउस के पास इकोसिटी टू न्यू चंडीगढ़ में 500 स्क्वायर यार्ड का प्लॉट भी है। समाग्रा रूप में उनके पास 8 टू 10 प्रॉपर्टीज और लगभग 17 प्लस एकड़ की लैंड होल्डिंग्स हैं। साफ है कि लैंड के मामले में यह जस्ट किसी से कम नहीं है।

जहां तक लिक्विड वेल्थ का सवाल है, मतलब वो धन जो तुरंत कैश में बदला जा सकता है, इसमें भी जस्टिस केवी विश्वनाथन सबसे आगे हैं। उन्होंने 12.09 करोड़ सेल्फ के नाम पर, 6.43 करोड़ स्पाउस के नाम पर और 1.31 करोड़ चाइल्ड के नाम पर डिक्लेअ किए हैं। साथ ही 8.4 करोड़ का फॉरेन फंड्स भी है। मतलब लगभग 28 करोड़ का लिक्विड एसेट्स इन्होंने डिक्लेअ किया है जो किसी और जज के पास नहीं है। अब अगर बात करें सबसे ज्यादा टैक्स भरने वाले जज की तो उसमें भी जस्टिस विश्वनाथन सबसे आगे हैं। उन्होंने फाइनेंसियल ईयर 2010 से 20202 के बीच ₹91.47 करोड़ टैक्स पे किया था और केवल 2023 और 24 के एक साल में उन्होंने 17.48 करोड़ टैक्स पे किया है। यह रिकॉर्ड दिखाता है कि जज बनने से पहले उनका लीगल प्रैक्टिस कितना सफल था और वह इंडिया के टॉप टैक्स पेयर्स में शामिल रहे होंगे। ज्वेलरी के मामले में जस्टिस सूर्यकांत ने अपने पास 1.2 कि.ग्र. गोल्ड, सेल्फ और डॉटर्स के नाम पर और 6 कि.ग्र. सिल्वर डिक्लेअर किया है। इतना गोल्ड और सिल्वर किसी और जज के पास नहीं है। यह ज्वेलरी मोस्टली इनहेरिटेंट और गिफ्टेड कैटेगरी में डिक्लेअर की गई है।

आपको बता दूं कि कुछ डिक्लेरेशंस में कुछ कंट्रोवर्शियल या सरप्राइजिंग चीजें भी सामने आई है। जैसे जस्टिस बी आर गवई ने अपने एचयूएफ के नाम पर 1.07 करोड़ की लायबिलिटी डिक्लेअर की है जो इन्हहेरिटेंट प्रॉपर्टी या फैमिली सेटलमेंट से जुड़ी जिम्मेदारियां दिखाती है। जस्टिस केवी विश्वनाथन का 1 मिलियन का फॉरेन ट्रांसफर बिल्कुल लीगल है। लेकिन पब्लिक परसेप्शन के लिए सेंसिटिव माना जा सकता है। जस्टिस अगस्तिन जी मशीन ने 1.12 करोड़ का होम लोन डिक्लेअ किया है। जिसमें उन्होंने जीपीएफ इनहेरिटेंट प्रॉपर्टी की सेल और फैमिली से लोन का यूज किया है।


आपको बता दूं कि जस्टिस एसवी भट्टी ने सिर्फ LIC और सेविंग्स को ही डिक्लेअ किया है और उनके पास कोई भी इन्वेस्टमेंट नहीं दिखाई दी है। जिससे सवाल उठता है कि क्या यह अंडर रिपोर्टिंग है या बस एक मॉडस लिविंग का प्रमाण? तो इस पूरे अपलोडेड डाटा को एनालाइज करने के बाद यही सामने आया है कि अगर सबसे कम अमीर जज की बात करें तो वह जस्टिस एसवी भट्टी है। उन्होंने सिर्फ 3.5 लाख के मूवेबल एसेट्स डिक्लेअर किए हैं। उनके पास चार प्रॉपर्टीज हैं जो मोस्टली बेसिक और एनस्ट्रल है। उन्होंने म्यूच्यूल फंड्स या शेयर्स में कोई इन्वेस्टमेंट नहीं किया है और उनके पास 2017 से Honda Wआरवी गाड़ी है। यह डिक्लेरेशन दिखाता है कि शायद उन्होंने अपनी पूरी जिंदगी पब्लिक सर्विस में बिताई होगी। आखिर में इस एसेट डिक्लेरेशन से क्या सीख मिलती है?

यह साफ है कि जुडिशरी के अंदर भी इकोनमिक डिस्पैरिटी है। किसी के पास 50 करोड़ के एसेट्स हैं तो कोई जज सिर्फ 3 लाख के मूवेबल एसेट के साथ काम चला रहा है। जस्टिस विश्वनाथन क्लियरली सबसे वेल्थी और ग्लोबलाइज एसेट होल्डर है। जबकि जस्टिस सूर्यकांत के पास सबसे ज्यादा ट्रेडिशनल लैंड होल्डिंग्स हैं। ट्रांसपेरेंसी और पब्लिक अकाउंटेबिलिटी की दिशा में यह डिक्लेरेशन सिर्फ एक स्ट्रांग स्टेप है। लेकिन अब सवाल यह उठता है कि क्या जजेस के लिए भी वैसे ही एक यूनिफॉर्म एसेट डिक्लेरेशन फ्रेमवर्क होना चाहिए जैसे पॉलिटिशियंस के लिए होता है। जब हमने देखा कि कुछ डिक्लेरेशन में ट्रांसपेरेंसी हाई थी तो कुछ में काफी गैप्स भी थे। तो यह चर्चा अब और ज्यादा महत्वपूर्ण हो गई है।

Monday, May 5, 2025

वक्फ एक्ट पर सुनवाई शुरू करेगा सुप्रीम कोर्ट

 आज 5 तारीख जुडिशरी के लिए सुप्रीम कोर्ट के लिए बड़ा खास दिन है और एक बार फिर आप देखिएगा कि अगले कुछ दिनों तक सुप्रीम कोर्ट और व दोनों चर्चा में रहेंगे। आप सबको याद है कि वक्फ एक्ट पर तमाम दायर याचिकाओं पर सुप्रीम कोर्ट ने सुनवाई किया था और 5 तारीख यानी आज से फिर सुनवाई शुरू होगी। हालांकि सुप्रीम कोर्ट ने उसमें यह कर दिया है कि केवल अब वो पांच रिटों को सुनेंगे और जब सुप्रीम कोर्ट ने दो दिन की सुनवाई के बाद व वक्फ बाय यूजर के बारे में एक रिकमेंडेशन दिया या उसको आर्डर कह दीजिए जिसको कि स्टे कह के प्रचारित किया गया और दूसरा वर्क कमेटी में नए मेंबर्स के इंडक्शन जो कि नए वक्फ एक्ट के मुताबिक होना था उस पर कहा कि जब तक हम यह 5 तारीख यानी आज से जब हियरिंग करेंगे और इस पर फैसला नहीं ले लेते तब तक आप यह मत कीजिए। लेकिन सुप्रीम कोर्ट ने उसी में यह भी कहा कि वक्फ बाय यूजर में जो अनरजिस्टर्ड डीड है जो नोटिफाइड नहीं है उन पर कहीं कोई रोक नहीं है। आप जो चाहे एक्शन ले सकते हैं।

जब एक तरफ व फिर से एक बार वक्फ एक्ट पर सुनवाई शुरू करेगा सुप्रीम कोर्ट। वहीं पर दूसरी तरफ जो सो कॉल्ड जिसको स्टे कह के प्रचारित किया गया था आपको याद होगा कि उन दोनों सुनवाई को स्पष्ट तौर पर कहा था कि कहीं कोई सुप्रीम कोर्ट ने स्टे नहीं दिया है। केवल 9 तारीख तक स्टेटस को मेंटेन रखने के लिए कहा है। ऐसे रजिस्टर्ड डीड वाले नोटिफाइड जो वक्फ बाय यूजर प्रॉपर्टी हैं। यहां शिमला जो संजोली मस्जिद इस बात को प्रमाणित करता है कि मैंने जो बात आप सबको बताई थी वो सही साबित हुई।

आज जब वक्फ पर सुनवाई होगी तो आप सबको संजोली मस्जिद शिमला याद होगा।इस मस्जिद को ले बहुत सारे धरने बहुत सारा विरोध वह भी हुआ था शिमला में इस मस्जिद की दो ऊपरी इमारतें ये पांच मंजिली बना दी गई थी इसकी दो ऊपरी इमारतें यह अवैध पाई गई थी उसी समय जिसको कि गिरा भी लिया गया लेकिन जो बाकी तीन बची हुई हैं उसको भी गिराने का आदेश वहां की स्थानीय जो नगर मजिस्ट्रेट है उस कोर्ट से निकल के आया है जो नगरपालिका या नगर निकाय मजिस्ट्रेट का कोर्ट होता है। अब यहां पर यह सीधे-सीधे वक्फ बाय यूजर का मामला है। व वक्फ यूजर का मतलब एक मस्जिद के लिए इस्तेमाल की जा रही थी और दावा यह था कि यह वक्फ की प्रॉपर्टी है। लेकिन जब कोर्ट में सुनवाई हुई और नगर निगम या नगर पालिका ने वहां नगर निकाय ने जब तलब किया पेपर तो इनके पास ऐसा वक्फ का कोई पेपर नहीं था जबकि यह व बाय यूजर का ही मामला है। क्योंकि यह इनके पास ना पेपर था, ना यह रजिस्टर्ड थे, ना कोई रजिस्टर्ड डीड थी और ना ही यह नोटिफाइड थे। इसलिए पूरी तरह अवैध पाए गए और पूरी मस्जिद को डिमोलिश करने का आदेश पारित कर दिया गया। यह अलग बात है कि अभी ये आगे की कोर्टों पर जाएंगे, उसके ऊपर की कोर्टों पर जाएंगे। हम सबको याद है यह सारा एजिटेशन जो शिमला में चला था और जिस तरीके से हिंदुओं ने इस पूरे एजिटेशन को इस तरीके से चलाया था और कांग्रेस की सरकार जो कि हिमाचल प्रदेश में है सुखू साहब की अब उनके सामने एक ये इतना बड़ा सवाल खड़ा होता है कि साहब अब कोर्ट से आ गया है और यहां जिन लोगों को भी यह कंफ्यूजन था कि वक्फ बाय यूजर पर स्टे लगा दिया। आज से फिर सुनवाई हो रही है। जैसा मैंने आपको बताया पांच याचिकाएं फिर सुनी जाएंगी और उसके बाद फैसला आ भी जाएगा। लेकिन जो लोग भी यह कहते थे कि स्टे प्रभावी है। स्टे प्रभावी है और सुप्रीम कोर्ट ने रोक लगाई है। यह संजोली शिमला मस्जिद का मामला इस बात को प्रमाणित करता है कि ऐसा कुछ नहीं है।

अब सवाल खड़ा होता है कांग्रेस पर। सवाल खड़ा होता है सुखू पर हिमाचल की सरकार पर कि क्या वो कोर्ट के आदेश का पालन करेंगे? दूसरी पार्टी तो जाएगी आगे के कोर्ट में भी जाएगी। यह उसका खेल रहा है हमेशा से। लेकिन सवाल यह उठता है कि इस देश की जुडिशरी से इस तरह के फैसले कैसे आते हैं? आप सबके सामने नैनीताल का फैसला जहां 70 से ऊपर का एक दरिंदा बलात्कार करता है और जब प्रशासन उसका घर जो कि अवैध है उसको गिराने की कवायद करता है एक्शन लेता है तो हाई कोर्ट उसे स्टे ही नहीं देता बल्कि माफी मांगने को कहता है। छत्तीसगढ़ शराब घोटाले के मामले में किस तरीके से अभियुक्तों को बचाने का काम कर रही है। जांच ही नहीं होने दे रही है सुप्रीम कोर्ट की बेंच और आज जब 5 तारीख से एक बार फिर वक्फ एक्ट पर आप सुनवाई करेंगे तो एक बार फिर निगाहें इस देश की जुडिशरी पर रहेंगी|

जो इस तरह के फैसले निकल के आ रहे हैं और जो भी ऐसे लोग थे जिनको बड़ा गुमान था कि साहब कोई भी वक्फ की प्रॉपर्टी उसको छू नहीं सकता और सुप्रीम कोर्ट ने सारे मोदी के इरादों पर पानी फेर दिया है। तो संजोली आपके सामने उदाहरण है। जिसकी छटाई भी हुई, जिसकी कटाई भी हुई और जिसको पूरा गिराया भी जाने वाला है।यह सीधे हाई कोर्ट जाएंगे और हमें आश्चर्य नहीं हो अगर यह सीधे सुप्रीम कोर्ट पहुंच जाए।

पाकिस्तानी नागरिकों को बाहर करने के मामले में आप स्टे देते फिरते हैं। एक बलात्कारी से आप माफी मंगवाते हैं। इस तरह के फैसले और वो भी तब जब आप अपने घरों में आधा जला हुआ करोड़ों नोट बरामद करवाते हैं। फिर भी पूरी बेशर्मी के साथ आप कोई एक्शन नहीं लेते। उसी के साथ-साथ जब आपके ऊपर उपराष्ट्रपति इस देश का सवाल उठाता है साहब जब एक चुना हुआ सांसद आप पर सवाल उठाता है तो फिर यह देखना बनता है कि आपके फैसले किस तरफ जा रहे हैं। संजोली मस्जिद के मामले में भी आगे जरूर यह देश देखना चाहेगा कि आप किस तरह के फैसले देते हैं। हमें उम्मीद है कि अब वहां की पर तो निगाह रहेगी।

बचाइए अपनी इज्जत जज साहब क्योंकि इस देश के उपराष्ट्रपति से ले इस देश के सांसद से ले इस देश के आम जनमानस तक अब आप पर सवाल उठ रहे हैं क्योंकि आप होंगे सर्वा सर्वा आप लोकतंत्र के कथित चौथे खंभे लेकिन खंभे का मतलब यह नहीं कि अगर बाकी खंभों की ऊंचाई सर 10 फीट हो तो आप अपने खंभे की ऊंचाई 12 फीट नहीं कर लेंगे क्योंकि तब आप इस देश की छत को मूल आत्मा को लोकतंत्र को टेढ़ा कर देंगे और यह आपको अख्तियार नहीं है क्योंकि अंततः यह देश प्रधान है और लोकतांत्रिक देश में जनता प्रधान है।

Sunday, May 4, 2025

उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट
उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट
उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ है। और यह सब हो इसलिए रहा है कि आज देश की जनता सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ सवाल उठाने लगी है और सुप्रीम कोर्ट से न्याय करने के लिए उम्मीद जगाने के साथ-साथ उससे प्रश्न भी कर रही है। अब ये जो फैसला आया है यह बहुत ही क्रांतिकारी कहा जा सकता है। देश हित में कहा जा सकता है और जितने लोग अवैध कब्जे करके या अवैध तरीके से अनऑथराइज कंस्ट्रक्शन कर लेते हैं उनके लिए यह किसी वज्रपात से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरीके से बुलडोजर नीति को उत्तर प्रदेश में चलाया और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी शासित दूसरे राज्यों में भी यह चली। अभी तीन चार महीने पहले भी हमने एक वीडियो बनाया था और उसमें स्पष्ट कहा था कि जो सुप्रीम कोर्ट ने उस समय एक फैसला दिया था उसके बाद पूरे देश में बुलडोजर चलने का रास्ता साफ हो गया है। और जो अभी हालिया फैसला आया है 30 अप्रैल का जो फैसला है उसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अन ऑथराइज कंस्ट्रक्शन पर बुलडोजर तो चलना ही चाहिए। साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट्स को भी यानी हाई कोर्ट्स को भी यह आगाह कर दिया है कि वह किसी भी तरीके से ऐसे मामलों में जुडिशियल जो एक तरीके से रेगुलाइजेशन होता है यानी कि न्यायिक नियमतीकरण होता है या सरकारों के द्वारा कानून बनाकर ऐसी संपत्तियों को या ऐसे अवैध निर्माणों को इंपैक्ट मनी या कुछ जुर्माना लेकर वैध घोषित कर दिया जाता है वो भी अब संभव नहीं होगा। इस फैसले की प्रतियां सारे हाई कोर्ट्स में भेज देने के निर्देश दे दिए गए हैं।

यानी अब जो भी लोग सरकारी संपत्तियों पर, सड़कों पर, नदियों पर, तालाबों पर या दूसरी अन्य जो सरकारी संपत्तियां होती हैं उनमें अवैध तरीके से कंस्ट्रक्शन करेंगे तो अथॉरिटीज को यह अधिकार होगा कि वह उन्हें बुलडोजर चला के ध्वस्त कर सके। साथ ही साथ यहां पर इस फैसले के आने के बाद एक बड़ा जो ताकत है उन अथॉरिटी को मिलेगी कि अब ऐसे लोग जिन्होंने अवैध निर्माण किए हैं वो अपनी बिल्डिंग्स को या अपने निर्माणों को बचाने के लिए सिंगल सिबल या सिंघवी टाइप के वकीलों के माध्यम से भी कोई राहत नहीं पा सकेंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही फैसला कर चुका है।

अब आपको बताते हैं कि यह मामला क्या है। कोलकाता के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने एक बिल्डिंग को गिराने के लिए नोटिस दिया था और उस जिस बिल्डिंग को गिराया जाना था वो लोग पहुंच गए हाई कोर्ट में। हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में स्पष्ट तौर पर उस बिल्डिंग के गिराए जाने का जो आर्डर था उसको वैलिड करा दिया। तो ये लोग पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की डिवीजन बेंच ने ये वही डिवीजन बेंच है जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट की सबसे ज्यादा आलोचना इस समय हो रही है। जिसके एक फैसले की वजह से भारत के उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट में बदलाव के लिए लोगों को कह चुके हैं औरकि इस बेंच ने ऐसा फैसला दे दिया था जो इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का था। आप उसे असंवैधानिक भी कह सकते हैं। हालांकि बहुत से लोग हैं। सिबल सिंवी टाइप के लोग ये कह रहे हैं कि यह उनका अधिकार था। खैर वो उसे बाद में बताएंगे। पहले इस बेंच ने जो फैसला दिया है उसकी चर्चा की जाए क्योंकि वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह बेंच थी जस्टिस जमशेद पारदीवाला और आर महादेवन की। इस बेंच ने इस मामले में स्पष्ट तौर से कह दिया कि जो लोग अनथराइज रूप से सरकारी जमीनों पर या अथॉरिटी की जमीनों पर कब्जे करके गलत तरीके से कंस्ट्रक्शन करते हैं उन्हें किसी भी तरीके की राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। साथ ही साथ कोर्ट्स को भी ऐसे मामलों में जुडिशियल रेगुलराइजेशन को नहीं लागू करना चाहिए और किसी भी तरीके की ऐसे लोगों को राहत दिए जाने का हर तरफ से उन्होंने रास्ता बंद कर दिया है। साथ ही साथ उन्होंने सवाल उठा दिया है उन राज्य सरकारों के ऊपर भी जो अनअथराइज्ड कंस्ट्रक्शन को या उन लोगों के विक्टिम कार्ड खेले जाने के बाद में बहुत से लोगों द्वारा उनके तमाम सवाल उठाए जाने के बाद वो कहां रहेंगे, कहां जाएंगे? ऐसी सरकार की जमीन है या फिर डेवलपमेंट अथॉरिटी की जमीन है, जहां भी किसी ने भी कब्जे किए हैं, वो अथॉरिटी उन्हें नोटिस भेजेगी और नोटिस की अवधि के अंदर उन लोगों को यह साबित करना पड़ेगा कि उनके जो इमारतें हैं, उनके जो कंस्ट्रक्शन है, वो वैलिड तरीके से हैं। उनकी खरीदी हुई जमीन पर है और ऑथराइज तरीके से ही कंस्ट्रक्शन किया गया है। लेकिन अगर वह ऐसा साबित नहीं कर पाते हैं तो अल्टीमेटली रिजल्ट यह होगा कि अथॉरिटी बुलडोजर चला के उनके अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के लिए स्वतंत्र होगी और उस स्थिति में उनके पास हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाकर राहत प्राप्त करने की उम्मीद भी पहले ही खत्म हो जाएगी।

यानी यह बहुत बड़ा एक फैसला है जो देश के अंदर एक माफिया है। भूमाफिया के तरह से बिल्डिंग माफिया के तरीके से जो लोग काम करते हैं। सरकारी जमीनों पर बिल्डिंग बना देते हैं। कॉलोनियां खड़ी कर देते हैं। और कॉलोनी के लोग इस मुद्दे को लेकर कि वो रहेंगे कहां? उनका आशियाना है। उन्होंने पाईपाई जोड़कर इसको जमा किया है। वह भी इस मामले में अब राहत नहीं पा सकेंगे। क्योंकि जिन लोगों ने जमीनें खरीदी है, यह उनका कर्तव्य बनता है कि वह उस जमीन की पर चाहे वो सड़क की जमीन हो, नदी की जमीन हो, तालाब की जमीन हो, अगर किसी ने कब्जा करके ऐसे अवैध निर्माण कर रखे हैं तो आपका नागरिक कर्तव्य बनता है। यह राष्ट्र धर्म बनता है आपका कि आप उसकी शिकायत स्थानीय अथॉरिटी में करें और फिर बाद में उस अथॉरिटी को मजबूर करें कि वह ऐसे अवैध निर्माणों को गिराने के लिए आगे आए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में पूरी तरीके से रास्ता खोल दिया है। किसी भी कोर्ट से ऐसे लोगों को राहत नहीं मिलने वाली है। और अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ की जो नीति उत्तर प्रदेश में चल रही थी बुलडोजर नीति अब उसको पूरे देश में मान्यता दे दी गई है। हालांकि कुछ लोग इससे एतराज कर सकते हैं। वो कहेंगे योगी की नीति तो अपराधियों के खिलाफ थी। तो उस अपराधियों के खिलाफ की नीति में भी इस बात का ख्याल रखा जाता था कि उस अपराधी ने कहीं अवैध निर्माण तो नहीं कर रखा है। अवैध रूप से जो संपत्तियां हैं उनको तो नहीं कब्जा कर रखा है।

सीधे तौर पर ये उसी नीति को आगे बढ़ाने की दिशा में लिया गया एक बहुत अच्छा कदम है। और इसके पीछे जनता का दबाव है क्योंकि यह जो दो जजों की बेंच थी इसको लेकर पहले से बहुत सारे सवाल उठ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठने लगे थे। कॉलेजियम सिस्टम की सच्चाई लोगों के सामने आ रही थी और कोर्ट के ऊपर इतना बड़ा प्रेशर था। हो सकता है कि उन्होंने उस प्रेशर को कम करने के लिए जनहित में यह बड़ा फैसला लिया है। अन्यथा देखने में यह मिलता है कि सालों में कभी-कभी ही सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला ऐसा होता है जो व्यापक राष्ट्र और जनहित में होता है। अन्यथा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तो आजकल बेल कोर्ट बनकर रह गए हैं। बड़े-बड़े रसूखदार पैसे वाले अपराधी जो होते हैं, बड़े माफिया जो होते हैं, बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी जो होते हैं, उनको बचाने का ही काम करते हुए वो नजर आते हैं। अगर किसी लोअर कोर्ट से, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से, सेशन कोर्ट से ऐसे अपराधियों को या जो विशेष कोर्ट होते हैं सीबीआई वगैरह के, पीएमएलए वगैरह के अगर सजा हो भी जाती है तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट उन्हें जमानत देकर मुक्त होकर आराम से अपनी जिंदगी का एक बड़ा मौका देने का काम करते हैं। जो कि वह बड़े वकीलों के माध्यम से करते हैं। आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं होता कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के बड़े और रसूखदार, बजमदार वकीलों को वो हायर कर सके। यही वजह है कि आम आदमी कितना भी उसके ऊपर झूठा आरोप लगा हो चाहे वो अपराध में लिप्त हो या ना हो छोटी अदालत से अगर उसको सजा हो जाती है या उसका केस पेंडिंग पड़ा रहता है तब भी वो जेल में सड़ता रहता है क्योंकि वो इस देश के महंगे वकीलों को नहीं खरीद सकता है। इन वकीलों की फीस इतनी महंगी है कि जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को 1 महीने की सैलरी मिलती है। कपिल सिब्बल और सिंघवी जो एक अपीयरेंस की फीस लेते हैं वो उस सैलरी से 10 से 20 गुना तक ज्यादा हो जाती है|



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उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट
उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ है। और यह सब हो इसलिए रहा है कि आज देश की जनता सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ सवाल उठाने लगी है और सुप्रीम कोर्ट से न्याय करने के लिए उम्मीद जगाने के साथ-साथ उससे प्रश्न भी कर रही है। अब ये जो फैसला आया है यह बहुत ही क्रांतिकारी कहा जा सकता है। देश हित में कहा जा सकता है और जितने लोग अवैध कब्जे करके या अवैध तरीके से अनऑथराइज कंस्ट्रक्शन कर लेते हैं उनके लिए यह किसी वज्रपात से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरीके से बुलडोजर नीति को उत्तर प्रदेश में चलाया और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी शासित दूसरे राज्यों में भी यह चली। अभी तीन चार महीने पहले भी हमने एक वीडियो बनाया था और उसमें स्पष्ट कहा था कि जो सुप्रीम कोर्ट ने उस समय एक फैसला दिया था उसके बाद पूरे देश में बुलडोजर चलने का रास्ता साफ हो गया है। और जो अभी हालिया फैसला आया है 30 अप्रैल का जो फैसला है उसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अन ऑथराइज कंस्ट्रक्शन पर बुलडोजर तो चलना ही चाहिए। साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट्स को भी यानी हाई कोर्ट्स को भी यह आगाह कर दिया है कि वह किसी भी तरीके से ऐसे मामलों में जुडिशियल जो एक तरीके से रेगुलाइजेशन होता है यानी कि न्यायिक नियमतीकरण होता है या सरकारों के द्वारा कानून बनाकर ऐसी संपत्तियों को या ऐसे अवैध निर्माणों को इंपैक्ट मनी या कुछ जुर्माना लेकर वैध घोषित कर दिया जाता है वो भी अब संभव नहीं होगा। इस फैसले की प्रतियां सारे हाई कोर्ट्स में भेज देने के निर्देश दे दिए गए हैं।

यानी अब जो भी लोग सरकारी संपत्तियों पर, सड़कों पर, नदियों पर, तालाबों पर या दूसरी अन्य जो सरकारी संपत्तियां होती हैं उनमें अवैध तरीके से कंस्ट्रक्शन करेंगे तो अथॉरिटीज को यह अधिकार होगा कि वह उन्हें बुलडोजर चला के ध्वस्त कर सके। साथ ही साथ यहां पर इस फैसले के आने के बाद एक बड़ा जो ताकत है उन अथॉरिटी को मिलेगी कि अब ऐसे लोग जिन्होंने अवैध निर्माण किए हैं वो अपनी बिल्डिंग्स को या अपने निर्माणों को बचाने के लिए सिंगल सिबल या सिंघवी टाइप के वकीलों के माध्यम से भी कोई राहत नहीं पा सकेंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही फैसला कर चुका है।

अब आपको बताते हैं कि यह मामला क्या है। कोलकाता के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने एक बिल्डिंग को गिराने के लिए नोटिस दिया था और उस जिस बिल्डिंग को गिराया जाना था वो लोग पहुंच गए हाई कोर्ट में। हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में स्पष्ट तौर पर उस बिल्डिंग के गिराए जाने का जो आर्डर था उसको वैलिड करा दिया। तो ये लोग पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की डिवीजन बेंच ने ये वही डिवीजन बेंच है जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट की सबसे ज्यादा आलोचना इस समय हो रही है। जिसके एक फैसले की वजह से भारत के उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट में बदलाव के लिए लोगों को कह चुके हैं औरकि इस बेंच ने ऐसा फैसला दे दिया था जो इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का था। आप उसे असंवैधानिक भी कह सकते हैं। हालांकि बहुत से लोग हैं। सिबल सिंवी टाइप के लोग ये कह रहे हैं कि यह उनका अधिकार था। खैर वो उसे बाद में बताएंगे। पहले इस बेंच ने जो फैसला दिया है उसकी चर्चा की जाए क्योंकि वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह बेंच थी जस्टिस जमशेद पारदीवाला और आर महादेवन की। इस बेंच ने इस मामले में स्पष्ट तौर से कह दिया कि जो लोग अनथराइज रूप से सरकारी जमीनों पर या अथॉरिटी की जमीनों पर कब्जे करके गलत तरीके से कंस्ट्रक्शन करते हैं उन्हें किसी भी तरीके की राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। साथ ही साथ कोर्ट्स को भी ऐसे मामलों में जुडिशियल रेगुलराइजेशन को नहीं लागू करना चाहिए और किसी भी तरीके की ऐसे लोगों को राहत दिए जाने का हर तरफ से उन्होंने रास्ता बंद कर दिया है। साथ ही साथ उन्होंने सवाल उठा दिया है उन राज्य सरकारों के ऊपर भी जो अनअथराइज्ड कंस्ट्रक्शन को या उन लोगों के विक्टिम कार्ड खेले जाने के बाद में बहुत से लोगों द्वारा उनके तमाम सवाल उठाए जाने के बाद वो कहां रहेंगे, कहां जाएंगे? ऐसी सरकार की जमीन है या फिर डेवलपमेंट अथॉरिटी की जमीन है, जहां भी किसी ने भी कब्जे किए हैं, वो अथॉरिटी उन्हें नोटिस भेजेगी और नोटिस की अवधि के अंदर उन लोगों को यह साबित करना पड़ेगा कि उनके जो इमारतें हैं, उनके जो कंस्ट्रक्शन है, वो वैलिड तरीके से हैं। उनकी खरीदी हुई जमीन पर है और ऑथराइज तरीके से ही कंस्ट्रक्शन किया गया है। लेकिन अगर वह ऐसा साबित नहीं कर पाते हैं तो अल्टीमेटली रिजल्ट यह होगा कि अथॉरिटी बुलडोजर चला के उनके अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के लिए स्वतंत्र होगी और उस स्थिति में उनके पास हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाकर राहत प्राप्त करने की उम्मीद भी पहले ही खत्म हो जाएगी।

यानी यह बहुत बड़ा एक फैसला है जो देश के अंदर एक माफिया है। भूमाफिया के तरह से बिल्डिंग माफिया के तरीके से जो लोग काम करते हैं। सरकारी जमीनों पर बिल्डिंग बना देते हैं। कॉलोनियां खड़ी कर देते हैं। और कॉलोनी के लोग इस मुद्दे को लेकर कि वो रहेंगे कहां? उनका आशियाना है। उन्होंने पाईपाई जोड़कर इसको जमा किया है। वह भी इस मामले में अब राहत नहीं पा सकेंगे। क्योंकि जिन लोगों ने जमीनें खरीदी है, यह उनका कर्तव्य बनता है कि वह उस जमीन की पर चाहे वो सड़क की जमीन हो, नदी की जमीन हो, तालाब की जमीन हो, अगर किसी ने कब्जा करके ऐसे अवैध निर्माण कर रखे हैं तो आपका नागरिक कर्तव्य बनता है। यह राष्ट्र धर्म बनता है आपका कि आप उसकी शिकायत स्थानीय अथॉरिटी में करें और फिर बाद में उस अथॉरिटी को मजबूर करें कि वह ऐसे अवैध निर्माणों को गिराने के लिए आगे आए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में पूरी तरीके से रास्ता खोल दिया है। किसी भी कोर्ट से ऐसे लोगों को राहत नहीं मिलने वाली है। और अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ की जो नीति उत्तर प्रदेश में चल रही थी बुलडोजर नीति अब उसको पूरे देश में मान्यता दे दी गई है। हालांकि कुछ लोग इससे एतराज कर सकते हैं। वो कहेंगे योगी की नीति तो अपराधियों के खिलाफ थी। तो उस अपराधियों के खिलाफ की नीति में भी इस बात का ख्याल रखा जाता था कि उस अपराधी ने कहीं अवैध निर्माण तो नहीं कर रखा है। अवैध रूप से जो संपत्तियां हैं उनको तो नहीं कब्जा कर रखा है।

सीधे तौर पर ये उसी नीति को आगे बढ़ाने की दिशा में लिया गया एक बहुत अच्छा कदम है। और इसके पीछे जनता का दबाव है क्योंकि यह जो दो जजों की बेंच थी इसको लेकर पहले से बहुत सारे सवाल उठ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठने लगे थे। कॉलेजियम सिस्टम की सच्चाई लोगों के सामने आ रही थी और कोर्ट के ऊपर इतना बड़ा प्रेशर था। हो सकता है कि उन्होंने उस प्रेशर को कम करने के लिए जनहित में यह बड़ा फैसला लिया है। अन्यथा देखने में यह मिलता है कि सालों में कभी-कभी ही सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला ऐसा होता है जो व्यापक राष्ट्र और जनहित में होता है। अन्यथा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तो आजकल बेल कोर्ट बनकर रह गए हैं। बड़े-बड़े रसूखदार पैसे वाले अपराधी जो होते हैं, बड़े माफिया जो होते हैं, बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी जो होते हैं, उनको बचाने का ही काम करते हुए वो नजर आते हैं। अगर किसी लोअर कोर्ट से, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से, सेशन कोर्ट से ऐसे अपराधियों को या जो विशेष कोर्ट होते हैं सीबीआई वगैरह के, पीएमएलए वगैरह के अगर सजा हो भी जाती है तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट उन्हें जमानत देकर मुक्त होकर आराम से अपनी जिंदगी का एक बड़ा मौका देने का काम करते हैं। जो कि वह बड़े वकीलों के माध्यम से करते हैं। आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं होता कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के बड़े और रसूखदार, बजमदार वकीलों को वो हायर कर सके। यही वजह है कि आम आदमी कितना भी उसके ऊपर झूठा आरोप लगा हो चाहे वो अपराध में लिप्त हो या ना हो छोटी अदालत से अगर उसको सजा हो जाती है या उसका केस पेंडिंग पड़ा रहता है तब भी वो जेल में सड़ता रहता है क्योंकि वो इस देश के महंगे वकीलों को नहीं खरीद सकता है। इन वकीलों की फीस इतनी महंगी है कि जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को 1 महीने की सैलरी मिलती है। कपिल सिब्बल और सिंघवी जो एक अपीयरेंस की फीस लेते हैं वो उस सैलरी से 10 से 20 गुना तक ज्यादा हो जाती है|



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May 04, 2025 at 08:54PM
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May 04, 2025 at 09:13PM

उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ है। और यह सब हो इसलिए रहा है कि आज देश की जनता सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ सवाल उठाने लगी है और सुप्रीम कोर्ट से न्याय करने के लिए उम्मीद जगाने के साथ-साथ उससे प्रश्न भी कर रही है। अब ये जो फैसला आया है यह बहुत ही क्रांतिकारी कहा जा सकता है। देश हित में कहा जा सकता है और जितने लोग अवैध कब्जे करके या अवैध तरीके से अनऑथराइज कंस्ट्रक्शन कर लेते हैं उनके लिए यह किसी वज्रपात से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरीके से बुलडोजर नीति को उत्तर प्रदेश में चलाया और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी शासित दूसरे राज्यों में भी यह चली। अभी तीन चार महीने पहले भी हमने एक वीडियो बनाया था और उसमें स्पष्ट कहा था कि जो सुप्रीम कोर्ट ने उस समय एक फैसला दिया था उसके बाद पूरे देश में बुलडोजर चलने का रास्ता साफ हो गया है। और जो अभी हालिया फैसला आया है 30 अप्रैल का जो फैसला है उसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अन ऑथराइज कंस्ट्रक्शन पर बुलडोजर तो चलना ही चाहिए। साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट्स को भी यानी हाई कोर्ट्स को भी यह आगाह कर दिया है कि वह किसी भी तरीके से ऐसे मामलों में जुडिशियल जो एक तरीके से रेगुलाइजेशन होता है यानी कि न्यायिक नियमतीकरण होता है या सरकारों के द्वारा कानून बनाकर ऐसी संपत्तियों को या ऐसे अवैध निर्माणों को इंपैक्ट मनी या कुछ जुर्माना लेकर वैध घोषित कर दिया जाता है वो भी अब संभव नहीं होगा। इस फैसले की प्रतियां सारे हाई कोर्ट्स में भेज देने के निर्देश दे दिए गए हैं।

यानी अब जो भी लोग सरकारी संपत्तियों पर, सड़कों पर, नदियों पर, तालाबों पर या दूसरी अन्य जो सरकारी संपत्तियां होती हैं उनमें अवैध तरीके से कंस्ट्रक्शन करेंगे तो अथॉरिटीज को यह अधिकार होगा कि वह उन्हें बुलडोजर चला के ध्वस्त कर सके। साथ ही साथ यहां पर इस फैसले के आने के बाद एक बड़ा जो ताकत है उन अथॉरिटी को मिलेगी कि अब ऐसे लोग जिन्होंने अवैध निर्माण किए हैं वो अपनी बिल्डिंग्स को या अपने निर्माणों को बचाने के लिए सिंगल सिबल या सिंघवी टाइप के वकीलों के माध्यम से भी कोई राहत नहीं पा सकेंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही फैसला कर चुका है।

अब आपको बताते हैं कि यह मामला क्या है। कोलकाता के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने एक बिल्डिंग को गिराने के लिए नोटिस दिया था और उस जिस बिल्डिंग को गिराया जाना था वो लोग पहुंच गए हाई कोर्ट में। हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में स्पष्ट तौर पर उस बिल्डिंग के गिराए जाने का जो आर्डर था उसको वैलिड करा दिया। तो ये लोग पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की डिवीजन बेंच ने ये वही डिवीजन बेंच है जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट की सबसे ज्यादा आलोचना इस समय हो रही है। जिसके एक फैसले की वजह से भारत के उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट में बदलाव के लिए लोगों को कह चुके हैं औरकि इस बेंच ने ऐसा फैसला दे दिया था जो इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का था। आप उसे असंवैधानिक भी कह सकते हैं। हालांकि बहुत से लोग हैं। सिबल सिंवी टाइप के लोग ये कह रहे हैं कि यह उनका अधिकार था। खैर वो उसे बाद में बताएंगे। पहले इस बेंच ने जो फैसला दिया है उसकी चर्चा की जाए क्योंकि वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह बेंच थी जस्टिस जमशेद पारदीवाला और आर महादेवन की। इस बेंच ने इस मामले में स्पष्ट तौर से कह दिया कि जो लोग अनथराइज रूप से सरकारी जमीनों पर या अथॉरिटी की जमीनों पर कब्जे करके गलत तरीके से कंस्ट्रक्शन करते हैं उन्हें किसी भी तरीके की राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। साथ ही साथ कोर्ट्स को भी ऐसे मामलों में जुडिशियल रेगुलराइजेशन को नहीं लागू करना चाहिए और किसी भी तरीके की ऐसे लोगों को राहत दिए जाने का हर तरफ से उन्होंने रास्ता बंद कर दिया है। साथ ही साथ उन्होंने सवाल उठा दिया है उन राज्य सरकारों के ऊपर भी जो अनअथराइज्ड कंस्ट्रक्शन को या उन लोगों के विक्टिम कार्ड खेले जाने के बाद में बहुत से लोगों द्वारा उनके तमाम सवाल उठाए जाने के बाद वो कहां रहेंगे, कहां जाएंगे? ऐसी सरकार की जमीन है या फिर डेवलपमेंट अथॉरिटी की जमीन है, जहां भी किसी ने भी कब्जे किए हैं, वो अथॉरिटी उन्हें नोटिस भेजेगी और नोटिस की अवधि के अंदर उन लोगों को यह साबित करना पड़ेगा कि उनके जो इमारतें हैं, उनके जो कंस्ट्रक्शन है, वो वैलिड तरीके से हैं। उनकी खरीदी हुई जमीन पर है और ऑथराइज तरीके से ही कंस्ट्रक्शन किया गया है। लेकिन अगर वह ऐसा साबित नहीं कर पाते हैं तो अल्टीमेटली रिजल्ट यह होगा कि अथॉरिटी बुलडोजर चला के उनके अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के लिए स्वतंत्र होगी और उस स्थिति में उनके पास हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाकर राहत प्राप्त करने की उम्मीद भी पहले ही खत्म हो जाएगी।

यानी यह बहुत बड़ा एक फैसला है जो देश के अंदर एक माफिया है। भूमाफिया के तरह से बिल्डिंग माफिया के तरीके से जो लोग काम करते हैं। सरकारी जमीनों पर बिल्डिंग बना देते हैं। कॉलोनियां खड़ी कर देते हैं। और कॉलोनी के लोग इस मुद्दे को लेकर कि वो रहेंगे कहां? उनका आशियाना है। उन्होंने पाईपाई जोड़कर इसको जमा किया है। वह भी इस मामले में अब राहत नहीं पा सकेंगे। क्योंकि जिन लोगों ने जमीनें खरीदी है, यह उनका कर्तव्य बनता है कि वह उस जमीन की पर चाहे वो सड़क की जमीन हो, नदी की जमीन हो, तालाब की जमीन हो, अगर किसी ने कब्जा करके ऐसे अवैध निर्माण कर रखे हैं तो आपका नागरिक कर्तव्य बनता है। यह राष्ट्र धर्म बनता है आपका कि आप उसकी शिकायत स्थानीय अथॉरिटी में करें और फिर बाद में उस अथॉरिटी को मजबूर करें कि वह ऐसे अवैध निर्माणों को गिराने के लिए आगे आए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में पूरी तरीके से रास्ता खोल दिया है। किसी भी कोर्ट से ऐसे लोगों को राहत नहीं मिलने वाली है। और अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ की जो नीति उत्तर प्रदेश में चल रही थी बुलडोजर नीति अब उसको पूरे देश में मान्यता दे दी गई है। हालांकि कुछ लोग इससे एतराज कर सकते हैं। वो कहेंगे योगी की नीति तो अपराधियों के खिलाफ थी। तो उस अपराधियों के खिलाफ की नीति में भी इस बात का ख्याल रखा जाता था कि उस अपराधी ने कहीं अवैध निर्माण तो नहीं कर रखा है। अवैध रूप से जो संपत्तियां हैं उनको तो नहीं कब्जा कर रखा है।

सीधे तौर पर ये उसी नीति को आगे बढ़ाने की दिशा में लिया गया एक बहुत अच्छा कदम है। और इसके पीछे जनता का दबाव है क्योंकि यह जो दो जजों की बेंच थी इसको लेकर पहले से बहुत सारे सवाल उठ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठने लगे थे। कॉलेजियम सिस्टम की सच्चाई लोगों के सामने आ रही थी और कोर्ट के ऊपर इतना बड़ा प्रेशर था। हो सकता है कि उन्होंने उस प्रेशर को कम करने के लिए जनहित में यह बड़ा फैसला लिया है। अन्यथा देखने में यह मिलता है कि सालों में कभी-कभी ही सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला ऐसा होता है जो व्यापक राष्ट्र और जनहित में होता है। अन्यथा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तो आजकल बेल कोर्ट बनकर रह गए हैं। बड़े-बड़े रसूखदार पैसे वाले अपराधी जो होते हैं, बड़े माफिया जो होते हैं, बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी जो होते हैं, उनको बचाने का ही काम करते हुए वो नजर आते हैं। अगर किसी लोअर कोर्ट से, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से, सेशन कोर्ट से ऐसे अपराधियों को या जो विशेष कोर्ट होते हैं सीबीआई वगैरह के, पीएमएलए वगैरह के अगर सजा हो भी जाती है तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट उन्हें जमानत देकर मुक्त होकर आराम से अपनी जिंदगी का एक बड़ा मौका देने का काम करते हैं। जो कि वह बड़े वकीलों के माध्यम से करते हैं। आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं होता कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के बड़े और रसूखदार, बजमदार वकीलों को वो हायर कर सके। यही वजह है कि आम आदमी कितना भी उसके ऊपर झूठा आरोप लगा हो चाहे वो अपराध में लिप्त हो या ना हो छोटी अदालत से अगर उसको सजा हो जाती है या उसका केस पेंडिंग पड़ा रहता है तब भी वो जेल में सड़ता रहता है क्योंकि वो इस देश के महंगे वकीलों को नहीं खरीद सकता है। इन वकीलों की फीस इतनी महंगी है कि जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को 1 महीने की सैलरी मिलती है। कपिल सिब्बल और सिंघवी जो एक अपीयरेंस की फीस लेते हैं वो उस सैलरी से 10 से 20 गुना तक ज्यादा हो जाती है|



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May 04, 2025 at 08:54PM

उत्तर प्रदेश में चल रही बुलडोजर नीति उसको पूरे देश में मान्यता - सुप्रीम कोर्ट

बड़ा फैसला सुप्रीम कोर्ट में हुआ है। और यह सब हो इसलिए रहा है कि आज देश की जनता सुप्रीम कोर्ट के खिलाफ सवाल उठाने लगी है और सुप्रीम कोर्ट से न्याय करने के लिए उम्मीद जगाने के साथ-साथ उससे प्रश्न भी कर रही है। अब ये जो फैसला आया है यह बहुत ही क्रांतिकारी कहा जा सकता है। देश हित में कहा जा सकता है और जितने लोग अवैध कब्जे करके या अवैध तरीके से अनऑथराइज कंस्ट्रक्शन कर लेते हैं उनके लिए यह किसी वज्रपात से कम नहीं है। उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ ने जिस तरीके से बुलडोजर नीति को उत्तर प्रदेश में चलाया और उसके बाद भारतीय जनता पार्टी शासित दूसरे राज्यों में भी यह चली। अभी तीन चार महीने पहले भी हमने एक वीडियो बनाया था और उसमें स्पष्ट कहा था कि जो सुप्रीम कोर्ट ने उस समय एक फैसला दिया था उसके बाद पूरे देश में बुलडोजर चलने का रास्ता साफ हो गया है। और जो अभी हालिया फैसला आया है 30 अप्रैल का जो फैसला है उसमें सुप्रीम कोर्ट ने साफ कर दिया है कि अन ऑथराइज कंस्ट्रक्शन पर बुलडोजर तो चलना ही चाहिए। साथ ही साथ सुप्रीम कोर्ट ने कोर्ट्स को भी यानी हाई कोर्ट्स को भी यह आगाह कर दिया है कि वह किसी भी तरीके से ऐसे मामलों में जुडिशियल जो एक तरीके से रेगुलाइजेशन होता है यानी कि न्यायिक नियमतीकरण होता है या सरकारों के द्वारा कानून बनाकर ऐसी संपत्तियों को या ऐसे अवैध निर्माणों को इंपैक्ट मनी या कुछ जुर्माना लेकर वैध घोषित कर दिया जाता है वो भी अब संभव नहीं होगा। इस फैसले की प्रतियां सारे हाई कोर्ट्स में भेज देने के निर्देश दे दिए गए हैं।

यानी अब जो भी लोग सरकारी संपत्तियों पर, सड़कों पर, नदियों पर, तालाबों पर या दूसरी अन्य जो सरकारी संपत्तियां होती हैं उनमें अवैध तरीके से कंस्ट्रक्शन करेंगे तो अथॉरिटीज को यह अधिकार होगा कि वह उन्हें बुलडोजर चला के ध्वस्त कर सके। साथ ही साथ यहां पर इस फैसले के आने के बाद एक बड़ा जो ताकत है उन अथॉरिटी को मिलेगी कि अब ऐसे लोग जिन्होंने अवैध निर्माण किए हैं वो अपनी बिल्डिंग्स को या अपने निर्माणों को बचाने के लिए सिंगल सिबल या सिंघवी टाइप के वकीलों के माध्यम से भी कोई राहत नहीं पा सकेंगे क्योंकि सुप्रीम कोर्ट इस मामले में पहले ही फैसला कर चुका है।

अब आपको बताते हैं कि यह मामला क्या है। कोलकाता के म्युनिसिपल कॉरपोरेशन ने एक बिल्डिंग को गिराने के लिए नोटिस दिया था और उस जिस बिल्डिंग को गिराया जाना था वो लोग पहुंच गए हाई कोर्ट में। हाई कोर्ट ने इस पूरे मामले में स्पष्ट तौर पर उस बिल्डिंग के गिराए जाने का जो आर्डर था उसको वैलिड करा दिया। तो ये लोग पहुंच गए सुप्रीम कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में दो जजों की डिवीजन बेंच ने ये वही डिवीजन बेंच है जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट की सबसे ज्यादा आलोचना इस समय हो रही है। जिसके एक फैसले की वजह से भारत के उपराष्ट्रपति सुप्रीम कोर्ट में बदलाव के लिए लोगों को कह चुके हैं औरकि इस बेंच ने ऐसा फैसला दे दिया था जो इसके अधिकार क्षेत्र से बाहर का था। आप उसे असंवैधानिक भी कह सकते हैं। हालांकि बहुत से लोग हैं। सिबल सिंवी टाइप के लोग ये कह रहे हैं कि यह उनका अधिकार था। खैर वो उसे बाद में बताएंगे। पहले इस बेंच ने जो फैसला दिया है उसकी चर्चा की जाए क्योंकि वो ज्यादा महत्वपूर्ण है। यह बेंच थी जस्टिस जमशेद पारदीवाला और आर महादेवन की। इस बेंच ने इस मामले में स्पष्ट तौर से कह दिया कि जो लोग अनथराइज रूप से सरकारी जमीनों पर या अथॉरिटी की जमीनों पर कब्जे करके गलत तरीके से कंस्ट्रक्शन करते हैं उन्हें किसी भी तरीके की राहत की उम्मीद नहीं करनी चाहिए। साथ ही साथ कोर्ट्स को भी ऐसे मामलों में जुडिशियल रेगुलराइजेशन को नहीं लागू करना चाहिए और किसी भी तरीके की ऐसे लोगों को राहत दिए जाने का हर तरफ से उन्होंने रास्ता बंद कर दिया है। साथ ही साथ उन्होंने सवाल उठा दिया है उन राज्य सरकारों के ऊपर भी जो अनअथराइज्ड कंस्ट्रक्शन को या उन लोगों के विक्टिम कार्ड खेले जाने के बाद में बहुत से लोगों द्वारा उनके तमाम सवाल उठाए जाने के बाद वो कहां रहेंगे, कहां जाएंगे? ऐसी सरकार की जमीन है या फिर डेवलपमेंट अथॉरिटी की जमीन है, जहां भी किसी ने भी कब्जे किए हैं, वो अथॉरिटी उन्हें नोटिस भेजेगी और नोटिस की अवधि के अंदर उन लोगों को यह साबित करना पड़ेगा कि उनके जो इमारतें हैं, उनके जो कंस्ट्रक्शन है, वो वैलिड तरीके से हैं। उनकी खरीदी हुई जमीन पर है और ऑथराइज तरीके से ही कंस्ट्रक्शन किया गया है। लेकिन अगर वह ऐसा साबित नहीं कर पाते हैं तो अल्टीमेटली रिजल्ट यह होगा कि अथॉरिटी बुलडोजर चला के उनके अवैध निर्माणों को ध्वस्त करने के लिए स्वतंत्र होगी और उस स्थिति में उनके पास हाई कोर्ट या सुप्रीम कोर्ट जाकर राहत प्राप्त करने की उम्मीद भी पहले ही खत्म हो जाएगी।

यानी यह बहुत बड़ा एक फैसला है जो देश के अंदर एक माफिया है। भूमाफिया के तरह से बिल्डिंग माफिया के तरीके से जो लोग काम करते हैं। सरकारी जमीनों पर बिल्डिंग बना देते हैं। कॉलोनियां खड़ी कर देते हैं। और कॉलोनी के लोग इस मुद्दे को लेकर कि वो रहेंगे कहां? उनका आशियाना है। उन्होंने पाईपाई जोड़कर इसको जमा किया है। वह भी इस मामले में अब राहत नहीं पा सकेंगे। क्योंकि जिन लोगों ने जमीनें खरीदी है, यह उनका कर्तव्य बनता है कि वह उस जमीन की पर चाहे वो सड़क की जमीन हो, नदी की जमीन हो, तालाब की जमीन हो, अगर किसी ने कब्जा करके ऐसे अवैध निर्माण कर रखे हैं तो आपका नागरिक कर्तव्य बनता है। यह राष्ट्र धर्म बनता है आपका कि आप उसकी शिकायत स्थानीय अथॉरिटी में करें और फिर बाद में उस अथॉरिटी को मजबूर करें कि वह ऐसे अवैध निर्माणों को गिराने के लिए आगे आए क्योंकि सुप्रीम कोर्ट ने अब इस मामले में पूरी तरीके से रास्ता खोल दिया है। किसी भी कोर्ट से ऐसे लोगों को राहत नहीं मिलने वाली है। और अगर दूसरे शब्दों में कहें तो यह सीधे तौर पर योगी आदित्यनाथ की जो नीति उत्तर प्रदेश में चल रही थी बुलडोजर नीति अब उसको पूरे देश में मान्यता दे दी गई है। हालांकि कुछ लोग इससे एतराज कर सकते हैं। वो कहेंगे योगी की नीति तो अपराधियों के खिलाफ थी। तो उस अपराधियों के खिलाफ की नीति में भी इस बात का ख्याल रखा जाता था कि उस अपराधी ने कहीं अवैध निर्माण तो नहीं कर रखा है। अवैध रूप से जो संपत्तियां हैं उनको तो नहीं कब्जा कर रखा है।

सीधे तौर पर ये उसी नीति को आगे बढ़ाने की दिशा में लिया गया एक बहुत अच्छा कदम है। और इसके पीछे जनता का दबाव है क्योंकि यह जो दो जजों की बेंच थी इसको लेकर पहले से बहुत सारे सवाल उठ रहे थे। सुप्रीम कोर्ट पर सवाल उठने लगे थे। कॉलेजियम सिस्टम की सच्चाई लोगों के सामने आ रही थी और कोर्ट के ऊपर इतना बड़ा प्रेशर था। हो सकता है कि उन्होंने उस प्रेशर को कम करने के लिए जनहित में यह बड़ा फैसला लिया है। अन्यथा देखने में यह मिलता है कि सालों में कभी-कभी ही सुप्रीम कोर्ट का कोई फैसला ऐसा होता है जो व्यापक राष्ट्र और जनहित में होता है। अन्यथा सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट तो आजकल बेल कोर्ट बनकर रह गए हैं। बड़े-बड़े रसूखदार पैसे वाले अपराधी जो होते हैं, बड़े माफिया जो होते हैं, बड़े राजनीतिक भ्रष्टाचारी जो होते हैं, उनको बचाने का ही काम करते हुए वो नजर आते हैं। अगर किसी लोअर कोर्ट से, डिस्ट्रिक्ट कोर्ट से, सेशन कोर्ट से ऐसे अपराधियों को या जो विशेष कोर्ट होते हैं सीबीआई वगैरह के, पीएमएलए वगैरह के अगर सजा हो भी जाती है तो हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट उन्हें जमानत देकर मुक्त होकर आराम से अपनी जिंदगी का एक बड़ा मौका देने का काम करते हैं। जो कि वह बड़े वकीलों के माध्यम से करते हैं। आम आदमी के पास इतना पैसा नहीं होता कि हाई कोर्ट, सुप्रीम कोर्ट के बड़े और रसूखदार, बजमदार वकीलों को वो हायर कर सके। यही वजह है कि आम आदमी कितना भी उसके ऊपर झूठा आरोप लगा हो चाहे वो अपराध में लिप्त हो या ना हो छोटी अदालत से अगर उसको सजा हो जाती है या उसका केस पेंडिंग पड़ा रहता है तब भी वो जेल में सड़ता रहता है क्योंकि वो इस देश के महंगे वकीलों को नहीं खरीद सकता है। इन वकीलों की फीस इतनी महंगी है कि जो भारत के सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस को 1 महीने की सैलरी मिलती है। कपिल सिब्बल और सिंघवी जो एक अपीयरेंस की फीस लेते हैं वो उस सैलरी से 10 से 20 गुना तक ज्यादा हो जाती है|


छत्तीसगढ़ शराब घोटाला

 शराब घोटाले के बारे में अगर कुछ भी शुरुआत कह दी जाए तो सारे लोगों का ध्यान दिल्ली अरविंद केजरीवाल वाली पार्टी और उनके मुख्यमंत्री रहते हुए दिल्ली शराब घोटाला इसी का ध्यान आता है।सुप्रीम कोर्ट लेकर चलना है और यह अब क्या ही कहा जाए किस तरह का विषय है गर्व का है कि शर्म का है लेकिन सुप्रीम कोर्ट में एक्सट्रीम लीगल लतखोरी का मामला आया और कल जिस तरीके से इस देश में जुडिशरी पर चाहे वो उपराष्ट्रपति जी हो चाहे उसके बाद भारतीय जनता पार्टी के सांसद निशिकांत दुबे कई और लोग यहां तक कि जस्टिस वर्मा जो कि पटना हाई कोर्ट से उन्होंने रिट डाली और ऐसे कई सवाल गंभीरता से जब उठ रहे हैं अदालतों पर जुडिशरी सिस्टम पर और ये लोग बैकफुट पे हैं।

लेकिन इस केस में जो लतखोरी हो रही है, उसका ध्यान देना बड़ा जरूरी है। कि किस तरीके से छत्तीसगढ़ में हुए शराब घोटाले को देश जानता ही नहीं उसके बारे में कुछ। लेकिन मैं आपको बताऊं कि किस तरीके से मुख्यमंत्री कांग्रेस सरकार के भूपेंद्र बघेल साहब इनके मुख्यमंत्री रहते हुए एक पूरा सिंडिकेट छत्तीसगढ़ में जो कि1600 करोड़ से शुरू हुआ था और चार्जशीट तक पहुंचते पहुंचते ₹2,000 करोड़ का घोटाला हुआ। उस घोटाले का जो पूरा पोल खुला वो 2000- 22 में उस समय ये जो भूपेंद्र बघेल साहब हैं इनके बड़े निजी करीबी नौकरशाह वो नौकरी में अब रिटायर्ड हैं।अनिल टूटेजा इस का बेटा यश टूटेजा सीएम सचिवालय की तत्कालीन उप सचिव सौम्या चौरसिया के खिलाफ इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने पहला दिल्ली के 30 हजारी कोर्ट में एक मामला डाला। उसके बाद वहां पर कहा क्या गया कि छत्तीसगढ़ में रिश्वत, अवैध दलाली, बेहिसब पैसे का खेल इसमें नौकरियां और तमाम चीजें थी। उसी में से यह मामला पीएमएल कोर्ट में पहुंचा 18 नवंबर 2022 को जहां शुरुआती इसका 1600 करोड़ बाद में बढ़ के 2161 करोड़ और अब लगभग 22000 करोड़ से ऊपर मुकदमा हो गया तब तक छत्तीसगढ़ में सरकार कांग्रेस की जा चुकी थी और भारतीय जनता पार्टी की सरकार आ जाती है।

सरकार आने के बाद जब 22 में यह मुकदमा दर्ज हो जाता है तो यह जो अनिल टूटेजा जो कि बेहद करीबी भूपेंद्र बघेल का वो चला आता है सुप्रीम कोर्ट और आके कहता है कि साहब हमें हमारी जांच ही ना हो यह आर्डर कर दीजिए और वह सुप्रीम कोर्ट की दो जजों की बेंच ऑर्डर भी कर देती है साहब और उसी की कल हियरिंग हुई और उस हियरिंग में जो एक बड़ा सवाल निकल के आया है सुप्रीम कोर्ट में कि किस तरीके से सरकारी वकील और दो जजों की बेंच में उस तरह की बहस हुई है और उस तरह की झड़प हुई है। बस भौतिक द्वैत नहीं हुई है। उसके अलावा सब हुआ है। और ऐसा हुआ है कि सरकारी पक्ष यानी छत्तीसगढ़ सरकार के ऑफिशियल वकील उन्होंने कहा कि आप जो बर्ताव कर रहे हैं एक आरोपी को एक अभियुक्त को जिसकी की जांच अभी होनी है जिसको कि हमारे गिरफ्तारी में होना चाहिए आप उसको लगातार उसके मुकदमे को टाल रहे हैं ना सिर्फ आपने स्टे दिया है बल्कि आप किसी भी सुनवाई पर मुकदमा सुनते ही नहीं और यही हो रहा है इस केस में सुप्रीम कोर्ट में और यह सरकार के पक्ष के वकील ने कल सुप्रीम कोर्ट में इस मामले में दोनों जजों को खरीखोटी सुनाई है और जजों ने सुना है। लखोरी की हद ये देखिए सवाल ये उठता है कि आपको केस बताता हूं। ये जो अनिल टूटेजा ये सुप्रीम कोर्ट चला गया। इसके पीछे पीछे चार पांच और चले गए। बट नेचुरल है। एक चोर कहीं से राहत पाने के लिए जाता है। उसके साथ के जितने और भ्रष्टाचारी होते हैं वह भी जाते हैं। म टूटे जाके पीछे। अब वो जितने अधिकारी और जितने और लोग उनको अभियुक्त बनाया गया था वो सारे के सारे चले गए। ठीक-ठाक संख्या में। और सुप्रीम कोर्ट ने क्या किया? जमानत तो छोड़ दीए जिसको आज जेल में होना चाहिए। जिसके यहां सीबीआई का छापा पड़ चुका है। जिसके यहां से तमाम तथ्य दस्तावेज सरकार के पास, एजेंसियों के पास, ईडी के पास, सीबीआई के पास सबके पास है। वह सिर्फ इतना कह रहे हैं कि साहब हमको इन्वेस्टिगेट करना है और इसके लिए इसको हमारे कब्जे में होना चाहिए। और कोर्ट ने क्या आर्डर देके रखा है कि नहीं आप इसके मुकदमे की आप इसके खिलाफ जांच ही नहीं कर सकते। उस पर रोक लगाई हुई है और इस रोक को लगातार बढ़ा दे रहे हैं। कल वही सरकार के पक्ष के वकील ने कहा कि साहब देखिए यह हरकत आपकी ठीक नहीं है और आप सही नहीं कर रहे हैं। आप उस काम को नहीं कर रहे हैं जो आपको करना चाहिए। आप सोचिए आप कल्पना कीजिए। यह है वह अधिकारी जो मैं आपको अभी दिखाऊंगा और इसका जो रसूख है वह इतना बड़ा था कि यह अपनी तनख्वाह से वह वकील अफोर्ड नहीं कर सकता जो वकील सुप्रीम कोर्ट में इस अनिल टूटेजा के लिए जमानत और उसको जमानत तो छोड़ दीजिए साहब जांच ही शुरू नहीं हुई जेल सजा ये सारी चीजें लेकिन एक परिवर्तन हुआ है। मैं फिर वही कहूंगा कि यह सरकारी वकील ने जो सुनाया है कि स्थिति यह हो गई कि दोनों जजों ने कहा कि ऐसा है। सामान्यत ऐसा किसी केस में होता नहीं कि बेंच बदल दी जाए जो सुप्रीम कोर्ट में हो। इन लोगों ने कोलेजियम सिस्टम से अपने लिए 142 148 50 ऐसी लथखोरी की दवाइयां इकट्ठा कर लिया है जुडिशरी ने हमारे कि एक ये भ्रष्ट जिसको ₹2,000 करोड़ के छत्तीसगढ़ भूपेंद्र बघेल कांग्रेस की सरकार के उस शराब घोटाले का मुख्य आरोपी इसको बचा रही है सुप्रीम कोर्ट और कल उसी बात के लिए वहां पर रिकॉर्ड हुआ है कि क्या-क्या सुनाया है सरकार के वकील ने और उसके बाद बेंच ने कहा यह भी एक नैसर्गिक गुण है होता होगा कुछ लोगों में उन्होंने कहा ऐसा है रवायत तो नहीं है तरीका तो नहीं है क्योंकि हम तो कॉलेजियम के शहनशाह हैं कि बेंच बदल दिया जाए लेकिन हम आपको परमिशन देते हैं छत्तीसगढ़ सरकार को कि वो एप्लीकेशन डाले और आप कोई दूसरे बेंच से अपना मामला सुनवा लें। क्यों भाई? आप सीधे-सीधे एक ऐसा आरोपी जिसके खिलाफ एजेंसियां कह रही हैं कि आप भैया मुकदमे की सुनवाई या तो शुरू कीजिए। और जब मुकदमे की सुनवाई आप शुरू करेंगे तब ना हम बताएंगे कि भाई हमारे पास यह यह सबूत आ गए हैं। यह यह फैक्ट्स हमारे पास हैं। और इस बेसिस पर हमको इस व्यक्ति को रिमांड पर लेना है और हमसे हमको इन्वेस्टिगेट करना है। जब इन्वेस्टिगेशन पूरी हो जाएगी तभी तो आपके पास मेलाड पेश किया जाएगा और मेलाड क्या कर रहे हैं? वही वही दरवाजे पर आप कह सकते हैं कि अनिल टूटेजा शराब छत्तीसगढ़ घोटाले का मुख्य आरोपी और वो सुप्रीम कोर्ट के सो कॉल्ड बचाव के गेस्ट हाउस आप कल्पना कर लीजिए या होटल कह लीजिए उसके कमरे में आराम से सो रहा है एंजॉय कर रहा है और जुडिशरी के हमारे दो गुलाब लोग जो हैं मैं गुलाब कह रहा हूं। दो गुलाब लोग वो बाहर दरवाजे पर लेटे हुए पहरेदारी कर रहे हैं। यह वही स्थिति है और कल जो झड़प हुई है मुझे लगता है कि इस देश में दर्शकों जो जुडिशरी को लेकर अब सवाल उठ रहे हैं उन सवालों से चाहे वो उपराष्ट्रपति जी हो चाहे निशिकांत दुबे हो अलग-अलग लोग हो और उससे भी ज्यादा अब समाज में इस बात की और कई ऐसे मौके आए हैं जहां अब क्या ही कहा जाए इनके लिए शब्दों की अवमानना का हथियार लिए घूमते हैं। लेकिन यहां पर साफ तौर पर वह दिखाई दे रहा है कि यह जांच ही नहीं शुरू होने जाना चाहते और इसलिए लगातार आज कल डेट आई वहां उन्होंने सुना और कह दिया कि ठीक है एक महीने डेढ़ महीने की तारीख दे दे रहे हैं। तो कल जो पटका पटकी ही छोड़ के बाकी सब कुछ सुना डाला छत्तीसगढ़ सरकार के पक्ष के वकील ने के सिया जरूर होंगे लेकिन जो खरीखरी सुना है उन्होंने कहा कि साहब यह बेशर्मी है ऑफिशियली नहीं कहा बेशर्मी लेकिन ये लथखोरी नहीं है तो और क्या है आप क्यों बचा रहे हैं आपसे सवाल नहीं पूछा जाना चाहिए कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं क्योंकि सरकारों पर यह दबाव होता है कि अगर 2022 में मुकदमा दर्ज हो गया है। सीबीआई की जांच हो चुकी, ईडी की जांच हो चुकी और आप है साहब कि मुख्य अभियुक्त जो है उसको अंदर आराम करा के आप उसके रक्षा के लिए बैठ गए हैं। उसके खिलाफ आप तारीखों पर ये सुनने से मना कर देते हैं कि हम इस मामले को अभी सुनेंगे ही नहीं। आपने इस बात का स्टे दिया कि इसके खिलाफ कोई कारवाई हो ही नहीं। कारवाई का मतलब साहब जब उसको गिरफ्तार किया जाएगा ऐसे हंसता खेलता कोई बता देगा क्या जो पूरा मास्टरमाइंड है जिसमें भूपेंद्र बघेल के घर तक उसकी छाया है एक पूरा ऐसा सिंडिकेट है और मजे की बात यह है कि यहां भी वही अगर आप मूल में जाइएगा तो जैसे सारे ऐसे ग्रे ऐसे काले कारनामों का जो डीएनए है वह कहां से आता है तो इस केस में भी आप सोचिए कि रायपुर का महापौर शामिल था एजाज डेबर और उसका भाई अनवर डेबर। यह इस छत्तीसगढ़ शराब घोटाले के जड़ में यहां से यह सिंडिकेट शुरू होता है जो भूपेंद्र बघेल तक जाता है। उनके सचिवालय तक जाता है। उनके सबसे करीबी और उस समय सबसे पावरफुल अफसर और अब रिटायर्ड हो चुका अभियुक्त अनिल टूटेजा तक जाती है और तमाम और अधिकारियों तक जाती है। यहां तक कि भूपेंद्र बघेल के सचिवालय के अधिकारी तक जाती है और सिर्फ यही नहीं इसके खिलाफ सीधे-सीधे बिना किसी क्वालीाइंग परीक्षा और बिना किसी नियमों का पालन किए एसपी तक बनाया। डिप्टी एसपी डिप्टी कलेक्टर डिप्टी एसपी तक बनाया गया है। भूपेंद्र बघेल की सरकार में छत्तीसगढ़ में यह मामला जब खुला तो उसमें वो भी शामिल है जो 2020 में इनकम टैक्स डिपार्टमेंट ने दर्ज किया था। तो मुझे लगता है कि इस देश में जुडिशरी को जो सुनना पड़ रहा है और उन्होंने बड़ी लतखोरी से आराम से कह दिया कि ठीक है यानी हम तो सेट हैं कानून से या जो भी आप कहेंगे यही ना कहेंगे लेकिन समाज समझ नहीं रहा है कि आप ऐसा क्यों कर रहे हैं ऐसा खुला खुला क्यों कर रहे हैं ये सोचना पड़ेगा आपको और अब सवाल चाहे वो उपराष्ट्रपति हो चाहे इस देश का आम नागरिक हो दर्शक हो पूछ रहा है इन सवालों को पूछा जाना चाहिए लेकिन अफसोस स्थापित मीडिया खुद को कहने वाले सो कॉल्ड मेन स्ट्रीम मीडिया में इस तरह की खबरें कभी नहीं आती। दिल्ली शराब घोटाले की चर्चा तो तमाम होती है। कांग्रेस ही करती है। लेकिन कांग्रेस क्या भूपेंद्र बघेल के इस चोर महाभ्रष्ट अफसर और जनता के पैसों को लूट के खाने वाले अफसर पर कारवाई रुकी हुई है। यह कभी नाम सुना है आपने? कभी नहीं सुना होगा। लेकिन सुप्रीम कोर्ट को यह सोचना पड़ेगा इस देश की जुडिशरी को सोचना पड़ेगा कि आप ऐसे खेल खुलेआम करेंगे जिसे अब क्या कहूं मैं लतखोरी के अलावा बहुत कुछ कहा जा सकता है लेकिन ठीक है तो ये एक ऐसा घोटाला जिस पर सुप्रीम कोर्ट सीधे-सीधे मुजरिम को बचा रही है और ना सिर्फ बचा रही है बिल्कुल असहाय ऐसा लग रहा है कि न जाने क्या है कोई तकनीकी आधार नहीं कोई लीगल आधार के नहीं बस आपका मन आया आपने उसको स्टे दे दिया आप अगर उस पर भी रोक लगा देंगे आप मामले को सुनना ही नहीं शुरू कर रहे हैं स्टेप बाय स्टेप दिए चले जा रहे हैं तारीख पे तारीख तारीख पे तारीख इसे लतखोरी नहीं तो और क्या कहेंगे जो सुप्रीम कोर्ट के आंगन में हो रहा है।हमें उम्मीद है कि इस कथा की जानकारी जो कि सुप्रीम कोर्ट में चल रही है और जहां सीधे-सीधे दिखाई दे रहा है लेकिन सवाल भी उठ रहे हैं। यह आप तक पहुंची होगी।

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