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Sunday, November 2, 2025

कॉलेजियम को हटाने के लिए देश के आम नागरिकों को एकजुट होना पड़ेगा

 


पिछले 50 सालों में या फिर कहें कि 52 सालों में इस देश की जुडिशरी पर एक सोच विशेष के लोगों का कब्जा है और इन 52 सालों में भारत ने 40 सीजीआई देखे हैं। 40वें अब आने वाले हैं। उससे पहले 27 साल के दौरान भारत में जो टोटल सीजीआई हुए थे वह हुए थे 13 यानी भारत जब से आजाद हुआ तब से लेकर 1973 तक केवल 13 सीजीआई हुए।1973 से लेके 2025 तक भारत में 40 सीजीआई हो जाएंगे। लेकिन इन सब में एक चीज बड़ी कॉमन है कि ये सब के सब CONgy कंपनी से आते हैं। अब आप कहेंगे कि ये CON कंपनी क्या है? तो ये कंपनी है कांग्रेस या कम्युनिस्ट विचारधारा। यह जितने सीजीआई पिछले 52 सालों में देश ने देखे हैं यानी कि 40 के 40 CON कंपनी से ही ताल्लुक रखते हैं। इसकी शुरुआत की थी इंदिरा गांधी ने जब अजीतनाथ राय को चार सीनियर जजों को बाईपास करते हुए 4 साल के लिए सीजीआई बना दिया था। ना केवल अजीतनाथ राय, मिर्जा हिदायतुल्लाह बेग और चंद्रचूड़ के पिता विष्णु चंद्रचूड़ इन लोगों को इसलिए सीजीआई बनाया गया था क्योंकि उन्होंने कांग्रेस की जो अध्यक्षा थी या प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी उनके पक्ष में डिसेंट नोट दिया था जो फैसला उनके खिलाफ गया था इमरजेंसी वाला। इसलिए इन तीनों को इनाम दिया गया और 73 से लेकर 93 तक इन लोगों ने सुप्रीम कोर्ट और हाई कोर्ट में अपना दबदबा कायम कर लिया।

 यही वजह है कि जब 93 में कांग्रेस बहुत कमजोर हो गई थी और कांग्रेस को यह लगा कि अब सुप्रीम कोर्ट में उसका दबदबा कायम नहीं रह पाएगा क्योंकि दूसरी सरकारें आएंगी और दूसरी सरकारें अपने हिसाब से जजों की नियुक्ति करेंगी। तो फिर कांग्रेस के द्वारा जो घोटाले जो बेईमानियां जो भ्रष्टाचार किया गया है उसकी वजह से हो सकता है कांग्रेसी नेताओं को जेल जाना पड़ जाए। इसके लिए एक षड्यंत्र रचा गया। इसमें चार बड़े वकीलों की मदद ली गई और इस देश पर कॉलेजियम नाम का एक दूसरा कांग्रेसी सिस्टम थोप दिया गया। 1993 से लेकर अब तक यह कॉलेजियम सिस्टम चल रहा है। यानी पहले कांग्रेस डायरेक्टली अपनी सरकारों के माध्यम से जजों की नियुक्ति करती थी। अब कांग्रेस जो है वह कॉलेजियम के नाम से

जजों की नियुक्ति करती है। आप सोच कर देखिए कि 1973 से ले 1993 तक पूरी तरीके से कांग्रेस के ही जज जब हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में बैठे हुए थे और उन्हीं लोगों ने आगे चलकर उन्हीं के में से पांच लोगों ने आगे चलकर पहले तीन जजों का कॉलेजियम बनाया और बाद में पांच या फिर विशेष स्थिति में छह जजों के कॉलेजियम की बात उन्होंने कर दी। यह सब के सब कांग्रेस या कम्युनिस्ट विचारधारा से ही आने वाले थे।

इन 40 के 40 में से जस्टिस सूर्यकांत जो 24 नवंबर को 53व सीजीआई बनने वाले हैं। वो सब के सब किसी ना किसी तरह से कांग्रेस या कम्युनिस्ट विचारधारा से ही संबंध रखते हैं। कॉलेजियम का भाई भतीजावाद और चेलापंती तो सबको पता है लेकिन यह भाई भतीजावाद और चेलामपंथी व्यापक रूप से कांग्रेसी या कम्युनिस्ट विचारधारा से संबंधित व्यक्तियों के लिए ही है। जो व्यक्ति कांग्रेस की या कम्युनिस्ट विचारधारा को नहीं मानता या फिर दूसरे शब्दों में कहें कि इस देश की भारतीय सनातनी संस्कृति को मानने वाले व्यक्ति को भारत में सीजीआई बनने का मौका नहीं मिल पाता है।


व्यक्ति अनिवार्य रूप से नास्तिक होना चाहिए। खुली विचारधारा का होना चाहिए और कांग्रेस और कम्युनिस्टों की विचारधारा यही है। अगर वह क्रिश्चियन है तो भी वो बन सकता है।मजहबी मुस्लिम है तो भी बन सकता है। लेकिन अगर वो प्रैक्टिसिंग हिंदू है, सनातनी है तो फिर वो सीजीआई नहीं बन सकता। अब लोग सवाल करेंगे कि चंद्रचूड़ के बारे में आप क्या कहेंगे? चंद्रचूड़ प्रैक्टिसिंग हिंदू नहीं थे। उन्होंने जो कुछ राम मंदिर के फैसले को लेकर बातें की थी वो एक साइड में मानी जा सकती है। अन्यथा उनके पिता जैसा हमने बताया भारत के इतिहास में सबसे ज्यादा लंबे समय तक के लिए सीजीआई रहने वाले व्यक्ति थे जो 7 साल तक इस देश के सीजीआई बने रहे। 78 से लेकर 85 तक उनके बेटे होने की वजह से डीवाई चंद्रचूड़ को यह मौका मिला था। यानी जो व्यक्ति इस देश की संस्कृति के खिलाफ नहीं है उसको ना कम्युनिस्ट पसंद करते हैं ना कांग्रेस पसंद करती है। कांग्रेस हमेशा ऐसे लोगों को बढ़ावा देती है जो भारतीय संस्कृति, भारतीय सोच, भारतीय नैतिकता को ताव पर रखते हो। उसके खिलाफ बोलने का काम करते हो। उसके खिलाफ फैसले लेते हो। ताजा उदाहरण  जस्टिस सूर्यकांत को आप ले सकते हैं। इनकी जो टिप्पणियां हैं, इनके जो फैसले हैं, इनकी जो सोच है, वो किसी भी तरीके से भारतीय संस्कृति के अनुरूप नहीं है। ताजा इनका एक भाषण है जब वो जो परिवार विवाह की एक संस्था होती है उस पर टिप्पणी करते हुए नजर आते हैं और उन्होंने यह कहा कि हजारों साल से विवाह के द्वारा महिलाओं को गुलाम बनाने की एक प्रक्रिया चली आ रही है। यानी जिस पारिवारिक संस्था को दुनिया की सबसे बड़ी ही दार्शनिक तौर पर सोची समझी संस्था माना जाता है। उसी को सूर्यकांत ने महिलाओं को गुलाम बनाने की संस्था बताने की कोशिश की। क्योंकि परिवार का सबसे बड़ा आधार होता है विवाह। विवाह के द्वारा ही परिवार की संरचना आगे बढ़ती है। उसी विवाह को विदेशी सोच के आधार पर उन्होंने कह दिया कि ये तो महिलाओं को गुलाम बनाने की प्रथा है। यानी आप अगर देखें तो चमचूर के जो फैसले हैं जिसमें उन्होंने समलैंगिक विवाहों की वकालत की थी। जो व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर विदेशी कल्चर को इस देश में लागू करने के लिए बहुत ज्यादा अग्रसर दिखाई दिए थे। उसी तरीके से आप सीजीआई गवई को देख सकते हैं जो कोर्ट में साफ कह देते हैं कि जाओ अपने ईश्वर से जाकर कहो कि वो आपकी सहायता करें। यह सब वही सोच है जो कम्युनिस्टों और कांग्रेसियों की होती है। यानी कांग्रेस एक तरीके से सत्ता से तो बेदखल हो गई लेकिन सत्ता के जो तीन अंग कहे जाते हैं न्यायपालिका, कार्यपालिका और विधायिका। कार्यपालिका और विधायिका में कांग्रेस का एक तरीके से सूपड़ा साफ हो चुका है। लेकिन कांग्रेस अभी भी जो न्यायपालिका की सत्ता है उसमें कंट्रोल किए हुए हैं। देखने को तो ये जज होते हैं ये अलग-अलग क्षेत्रों से आते हुए दिखते हैं। लेकिन इनकी जो जड़े हैं वो कांग्रेसी नेताओं तक ही पहुंचती हुई नजर आती है। या तो ये डायरेक्टली कांग्रेसी नेताओं के भाई भतीजे बेटा बेटी होते हैं या फिर उनके चेले चपाटे होते हैं। आज अगर भारत के सुप्रीम कोर्ट के 34 जजों की कुंडली खंगाली जाए तो उनमें से 20 से ज्यादा ऐसे हैं जो सीधे तौर पर कांग्रेसी नेताओं के बेटा बेटी भाई भतीजे वगैरह हैं या फिर उनके द्वारा बनाए हुए जजों के भाई भतीजे वगैरह है या फिर उनके चेले चपाटे हैं। आने वाले जो छह सीजीआई हैं वो भी उसी फेयरिस्त में हैं। यानी 40 हो गए हैं। पांच छह और होने वाले हैं।


अगर इसको नहीं रोका गया, इसके खिलाफ जनता में जागृति नहीं आई। जनता ने इसका विरोध नहीं किया, तो आप यह मानकर चलिए कि आने वाले चार पांच सालों में इस देश के अस्तित्व पर ही खतरा उत्पन्न हो जाएगा। क्योंकि जिस तेजी के साथ अब सुप्रीम कोर्ट के जज भारतीय संस्कृति पर लगातार चोट कर रहे हैं। आपकी आस्था पर लगातार चोट कर रहे हैं। आपकी एकता अखंडता पर लगातार चोट कर रहे हैं। भाषा के नाम पर वो उन लोगों को संरक्षण दे रहे हैं। या फिर अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के नाम पर ऐसे लोगों को संरक्षण देते हुए नजर आ रहे हैं जो इस सनातन को मिटा देना चाहते हैं। इस सनातनी संस्कृति के तार-तार कर देना चाहते हैं। इसको कमजोर कर देना चाहते हैं। क्योंकि पूरी दुनिया यह किसी भी हालत में स्वीकार नहीं कर पा रही है कि ये जो भारतीय संस्कृति है ये 7000 सालों से लगातार चली आ रही है। दुनिया की जितनी भी दूसरी सभ्यताएं हैं कोई दो ढाई हज़ार साल पुरानी है, कोई 1500 साल पुरानी सोच है, कोई 500, कोई 1000 इस तरीके से वहां स्थितियां हैं। और वो जानते हैं कि भारतीय संस्कृति का जो सबसे बड़ा आधार है, सनातनी परंपरा का जो सबसे बड़ा आधार है, वो परिवार है और परिवार को तोड़ने के लिए आए दिन वो ऐसे फैसले देते रहते हैं। चाहे 498 ए वाले मामले हो या फिर समलैंगिकता के मामले हो, व्यक्तिगत स्वतंत्रता के नाम पर जो वो करने जा रहे हैं। रेप के मामलों में वो जिस तरीके की टिप्पणियां करते हैं। अपराधियों को छोड़ने के लिए वो व्यक्तिगत गरिमा और व्यक्तिगत स्वतंत्रता के जिस तरीके से हवाले देते हैं। जिस तरीके से विदेशी विचारकों के विचारों को देश में थोपने की कोशिश करते हैं। परिणाम यह होगा कि भारतीय अपराधी दुष्ट प्रवृत्ति के जो लोग हैं बेईमान चोर उचक्के आतंकवादी सब के सब जमानत पर रिहा हो जाएंगे और इसके साथ-साथ क्षेत्रवाद के भी कई सारी बुराइयां देखने को मिलती है। अभी जो जस्टिस सूर्यकांत भारत के सीजीआई बनने वाले हैं। इन्होंने अपने जिले से आने वाले एक अपराधी मुख्यमंत्री को जिस पर भ्रष्टाचार के बड़े आरोप थे उसको ईडी के मामले में जमानत दे दी थी। जी हां आप बिल्कुल सही समझे। मैं केजरीवाल की बात कर रहा हूं। केजरीवाल और सूर्यकांत शर्मा दोनों ही हिसार जिले से आते हैं। यहां सीधे तौर पर जिले का या क्षेत्रवाद का मामला दिखाई देता है। क्योंकि ईडी के मामलों में पहले जमानत नहीं दी जाती थी। लेकिन सूर्यकांत ने केजरीवाल को ईडी के मामले में भी जमानत देने का काम किया। यह सिर्फ और सिर्फ कांग्रेसी और कम्युनिस्ट विचारधारा को आगे बढ़ाने में ही अपना एकमात्र धेय मानकर चलते हैं और उसी को यह पूरा करने की कोशिश करते हुए नजर आते हैं।


 पिछले 40 जो सीजीआई हुए हैं उनके नामों में अंतर देखा जा सकता है। वो किस जिले से किस प्रदेश से आए हैं इसमें अंतर देखा जा सकता है। लेकिन उन सबकी कार्य करने की जो प्रणाली रही है, जो सोच रही है, जो कार्य करने के तरीके रहे हैं, वो लगभग एक जैसे हैं। यानी कि किसी भी हालत में कांग्रेसी कम्युनिस्ट विचारधारा या उसके संरक्षण में पलने वाली जो परिवारवादी पार्टियां हैं उनके किसी भी व्यक्ति का अहित नहीं होना चाहिए। उसको सजा नहीं होनी चाहिए। चाहे उसने कितना भी जघन्य अपराध क्यों ना किया हो। दूसरी तरफ इन्होंने जजों को तो इम्यूनिटी दे ही रखी है। लेकिन कोर्ट में यह जमानत के नाम पर नेताओं को भी इम्यूनिटी प्रदान कर देते हैं। उनको भी राहत देने का काम करते हैं। नया खेल और शुरू हुआ है कि अब भारत में वकीलों के खिलाफ भी बहुत ज्यादा कड़े एक्शन कोई एजेंसी नहीं ले पाएगी। इस तरीके के फैसले भी अब कोर्ट देने लगी है। यानी इस देश में अगर कोई वकील है, कोई जज है तो उसके खिलाफ कुछ हो नहीं सकता। और अगर वो जज वकील नहीं है, कांग्रेसी, कम्युनिस्ट या परिवारवादी पार्टियों से संबंध रखता है तो भी वो हर अपराध को करने के बाद बच जाएगा।


 यही इस देश की जो सी कंपनी इस देश की जुडिशरी को चला रही है उसका एकमात्र एजेंडा है और इसको अगर रोकना है तो देश की जनता को जागना पड़ेगा। कॉलेजियम को खत्म करना ही पड़ेगा। एनजेएसी को दोबारा लाने के लिए सरकार का साथ देना पड़ेगा और उसके लिए जनता अगर रेफरेंडम के द्वारा अपनी राय व्यक्त करती है तो यह सी कंपनी फिर उसका सामना नहीं कर पाएगी। सरकार का पूरा प्लान है कि वह एनजेसी के केस को दोबारा से सुप्रीम कोर्ट में रखें। लेकिन सुप्रीम कोर्ट पर जब तक जनता का दबाव नहीं बनेगा तब तक एनजेसी के मामले में यह सही फैसला नहीं करेंगे। एक और बड़ी बात पिछले 52 सालों में भारत के संविधान में सैकड़ों अमेंडमेंट्स किए गए हैं और उन अमेंडमेंट्स के द्वारा देश के संविधान को तोड़ने मरोड़ने और मनमाने ढंग से व्याख्या किया गया है। इस सब के लिए दो ही लोग जिम्मेदार हैं। या तो कांग्रेस की सरकारें या फिर कांग्रेस के द्वारा बनाए हुए कॉलेजियम के जज यानी सी कंपनी ने ही इस देश के संविधान को जो मूल रूप में था पूरी तरीके से बदल कर रख दिया है। आज जो कुछ संविधान के नाम पर ये हो हल्ला करते हैं। वास्तव में यही लोग जिम्मेदार हैं संविधान को सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाने के लिए। चाहे राहुल गांधी हो या फिर सीजीआई जैसे लोग हो क्योंकि कोर्ट ने सबसे ज्यादा नुकसान पहुंचाया है जो कि असंवैधानिक तौर पर और कांग्रेस ने संवैधानिक तौर पर के नाम पर जिस तरीके से पार्लियामेंट को हाईजैक करके पूरी तरीके से संविधान को बदल दिया था वही आगे बढ़ाया कॉलेजियम ने या फिर कॉलेजियम से आए हुए जजों ने। उस फहरिस्त में पारदीवाला, सूर्यकांत जैसे लोगों के नाम लिए जा सकते हैं। पारदीवाला ने किस तरीके से राष्ट्रपति को आदेश देने का काम किया था। जो अधिकार क्षेत्र में ही नहीं था सुप्रीम कोर्ट के उसी तरीके से कांग्रेस की जो प्रधानमंत्री थी इंदिरा गांधी उसने पूरा का पूरा संविधान बदल दिया था। तो इस सबको अगर रोकना है, देश को बचाना है, देश में न्याय के शासन की स्थापना करनी है, तो इस कॉलेजियम को हटाने के लिए देश के आम नागरिकों को एकजुट होना पड़ेगा। अपनी राय व्यक्त करनी पड़ेगी और यह जो सी कंपनी का एक अघोषित तानाशाही इस देश पर जुडिशरी के माध्यम से चल रही है, इसको तहसनहस करना ही पड़ेगा।

Jai Hind

Saturday, November 1, 2025

सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं
सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं
सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं
सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

हमारे सुप्रीम कोर्ट के नकली खुदा हैं यानी वकीलों के जो लॉर्ड हैं वो जनता के आक्रोश से इस कदर डरे हुए हैं कि कुछ चहेतों को चाहकर भी वो राहत नहीं दे पा रहे हैं। और इसमें सबसे बड़ा नाम है सोनम बांगचुक का। सोनम बांगचुक पिछले करीब डेढ़ दो महीने से जेल में है और सिबल जैसा वकील उसको राहत दिलाने की तमाम कोशिशें करता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी सोनम बांगचुक की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। दूसरी तरफ़ सिब्बल और सिंघवी दोनों के दोनों  इमाम और उमर  की वकालत करते हुए नज़र आ रहे हैं। लेकिन उन लोगों को भी यह राहत नहीं दिला पा रहे हैं और यह जो पूरा जो गिरोह है दिल्ली दंगों का जो दोषी है ये पिछले 5 साल से ज्यादा समय से जेल में है। अब इसके पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ इस देश की जनता ही है जो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रही है और वो राय पहुंच रही है भारत के नकली खुदाओं के पास। यही वजह है कि चाहे सोनम बांगचुक का केस हो या फिर इमाम और उमर के साथियों का जो केस हो इसकी सुनवाई ना तो CJI कर रहे हैं ना नेक्स्ट सीजीआई कर रहे हैं ना ही कॉलेजियम के या सीनियर बहुत ज्यादा सीनियर कोई दूसरे जज कर रहे हैं।

पहले यह देखने को मिलता था कि जब भी इस तरीके के केसेस आते थे और खासकर अगर सिबल और सिंघवी में से कोई उस केस को लेकर आया है तो निश्चित माना जाता था कि उस क्लाइंट को जल्दी से जल्दी राहत मिल जाएगी। लेकिन जब से यशवंत वर्मा का कैश कांड हुआ और उसके बाद तमाम ऐसे घटनाक्रम हुए जिसकी वजह से भारत की जुडिशरी  पर जनता की तरफ से तमाम तीखे सवाल उठे और उसके बाद एक जूता कांड भी हुआ क्योंकि उससे पहले भारत के CJI ने ऐसा काम कर दिया था जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। यानी कि उन्होंने सीधे तौर पर सनातनी आस्था पर सवाल उठा दिया था। बाद में उन्होंने सफाई भी दी। लेकिन उस सफाई से एक वकील सहमत नहीं हुआ और उस वकील ने भरी अदालत में CJI के ऊपर जूता फेंक दिया। जिसके बाद तमाम अवमानना के मामला भी आया। लेकिन उसको भी कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि CJI ने माफ कर दिया है। वास्तव में असली वजह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के सारे जज यह नहीं चाहते थे कि यह चर्चा ज्यादा दिन तक बनी रहे जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट के पुराने कारनामों पर सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो।

यही वजह है कि राकेश किशोर के मामले को दबा दिया गया और सोनम बाचुक का मामला भी सुनवाई के लिए ऐसे पीठ को दिया गया जिससे किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थी खासकर सिबल या सिंभी को और यह मामला गया था जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस अंजारिया की पीठ को और यह पीठ इस मामले को लगातार टाले जा रही है जिसकी वजह से सिब्बल परेशान घूम रहा है, हताश हो गया है। वो यह सोच रहा है कि मेरे इशारों पर मेरे यह लॉर्ड चला करते थे। अब यह नकली खुदा हमारी बात क्यों नहीं मान रहे हैं? यानी सुप्रीम कोर्ट के जो जज होते हैं अगर इन्हें नकली खुदा मान लिया जाए तो फिर सिबल सिंवी दातार दवे जैसे वकीलों को आप नकली पैगंबर मानकर चलिए। और यह पैगंबर जो कहते हैं खुदा भी वही करता है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि जनता के दबाव में ना तो नकली खुदा इन लोगों को राहत दे पा रहे हैं ना ही ये जो सिपल सिंवी टाइप के नकली पैगंबर हैं ये अपने क्लाइंट को बचा पाने में कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। शुरुआत में ऐसा लगा था कि बांगचुक को एक दो सुनवाई के बाद में राहत दे दी जाएगी। लेकिन अब बांगचुप का जो मामला है वो 24 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है।

यानी कि बीआर गवै अपने कार्यकाल में तो कम से कम बांगचुप को कोई राहत देते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह यह चाहते हैं कि अब जो 25 दिन उनके पास बचे हैं उन्हें वह शांति पूर्वक गुजार दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि उनका रिटायरमेंट के बाद में बहुत बड़ा प्लान है जिसके संकेत वो पहले दे चुके हैं और वो नहीं चाहते कि जम्मू कश्मीर लद्दाख के एक मामले को लेकर उनका महाराष्ट्र की राजनीति में जो भविष्य होने वाला है वो खतरे में पड़े। वही स्थिति सरजिल इमाम वाले केस में भी लग रही है। ऐसा लगता है कि शायद जो वर्तमान CJI हैं वो अपने कार्यकाल के दौरान तो इन दोनों मामलों को निपटते हुए देखना नहीं चाहते हैं। हालांकि शरजील इमाम उमर खालिद वाले केस की सुनवाई तो सोमवार तक के लिए टाली गई है। पर सोनम बांगचुक की सुनवाई जो टाली गई है वो 24 नवंबर तक टाली गई है।

यानी कि CJI के तौर पर आखिरी दिन के बाद ही इस पर सुनवाई होगी और अगले जो सीजीआई बनने वाले हैं उन्हीं के कार्यकाल में यह निपटारा हो सकता है 

अगर उस दिन कुछ हुआ तो अन्यथा जो अब तक देखने को मिला है उसके आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि मामला दिसंबर तक के लिए भी टाला जा सकता है क्योंकि जिस तरीके से जो जज हैं वो बात कर रहे हैं जो सवाल कर रहे हैं उससे कहीं भी नहीं लगता है कि सोनम बांगचुक जिसने कि जिसे कि आप लद्दाख हिंसा का दोषी मान सकते हैं उसको इतनी आसानी से राहत मिल जाएगी क्योंकि उसके खिलाफ तमाम वीडियो सबूत है कि वो किस तरीके से लोगों से यह कह रहा है कि इस बार अगर चीन भारत पर आक्रमण करेगा तो हम लद्दाखी लोग भारत सरकार की भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे बल्कि हम लोग चुप चुपचाप बैठकर देखेंगे। दूसरी तरफ एक वीडियो में वो लोगों को सलाह देता है कि आप लोग जब प्रदर्शन के लिए जाएं तो अपने चेहरे पर नकाब लगा लें। ऊपर कैप लगा लें जिससे कि आप पहचाने ना जा सकें। इस तरीके की बातें बांगचुक की सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया है कि उसका इरादा शांतिपूर्ण तो कतई नहीं था। उसके अलावा जिस तरीके से वो पाकिस्तान गया वहां यूनुस से मिला और बहुत सी ऐसी चीजें बाकजुक ने कही हैं उसके पहले राहुल गांधी का एक बयान कि भारत में Zen Z कुछ करने वाली है और राहुल गांधी के बयान से लिंक होना इस पूरे मामले का क्योंकि सोनम बांगचुक का जो पिता था वो कांग्रेस पार्टी की तरफ से मंत्री भी रह चुका था। सोनम बांगचुक की उमर अब्दुल्ला के साथ नजदीकियां यह सारी वो कड़ियां हैं जिसके आधार पर एनएसए उसके ऊपर लगाया गया और वो जोधपुर की जेल में पड़ा हुआ है।

तमाम कोशिशों के बावजूद तमाम कुतर्कों के बावजूद सिबल उसको जमानत नहीं दिला पा रहा है। वही स्थिति उमर खालिद और शरजील इमाम की है। इस केस में भी सिबल और सिंघवी ही वकील है। लेकिन इनकी यहां भी दाल गलती हुई नजर नहीं आ रही है और इस सब के लिए अगर कोई बधाई का पात्र है तो वह इस देश की जनता है क्योंकि जनता के दबाव की वजह से ही ऐसा हो पा रहा है। अन्यथा पिछले कई सालों में हमने देखा है कि रात के 12 12 एक बजे अदालतें खुलती है। तीस्ता शीतलवाद टाइप के जो अपराधी होते हैं उनको बड़ी आसानी से जमानत मिल जाती है। जुबैर टाइप के लोगों पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में छूट मांगी जाती है आसानी से दे दी जाती है। यानी ये जो अर्बन नक्सल गैंग के जो भी लोग होते हैं या फिर कहे कि कांग्रेसी वामपंथी विचारधारा के जो तथाकथित संविधान के नाम पर अनर्गल और कुत्सित टिप्पणियां करने वाले लोग हैं इनको राहत दे दी जाती है। अब ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि भारत में जुडिशरी के खिलाफ जनता का जो आक्रोश है वह अपने उच्चतम लेवल पर पहुंच चुका है और ये बरकरार रहना ही चाहिए क्योंकि अगर इस देश को जुडिशरी के आतंकवाद से जुडिशरी के जो एक जुडिशियल एक्टिविज्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेने सत्ता को अपने हाथ में लेकर नियंत्रित करने की एक जिद बन गई है। उसको अगर रोकना है तो देश की जनता को जागरूक होना ही पड़ेगा और तभी इस देश से कॉलेजियम रूपी यह जो बुराई है जिसके माध्यम से ये जज चुनकर आते हैं चाहे हाई कोर्ट के जज हो या सुप्रीम कोर्ट के जज हो इन सभी की नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती। वरिष्ठता के आधार पर नहीं होती। एफिशिएंसी के आधार पर नहीं होती बल्कि सिर्फ और सिर्फ भाई भतीजावाद और चेलापंती के आधार पर होती है। इन भाई भतीजों और चेलों को अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में जाने से रोकना है। अच्छे और योग्य जजों को सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में लाना है तो उसके लिए इस देश से कॉलेजियम को मिटाना पड़ेगा। इस देश में एनजेएसी जैसी कोई व्यवस्था लानी ही पड़ेगी।UPSC जैसा कोई एग्जाम भी होना चाहिए जिसके माध्यम से जो जज है वो एक एलिजिबिलिटी टेस्ट दें और फिर बाद में उनमें से जो सीनियर और एफिशिएंट जज हो उनको हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया जा सके। आज सुप्रीम कोर्ट की हालत यह है कि 34 में से 20 जज ऐसे हैं जो सीधे तौर पर भाई भतीजे हैं या फिर चेले चपाटे हैं। यानी केवल 101 जजों को ही आप कह सकते हैं कि वो इस में सीधे इन्वॉल्व नहीं है। लेकिन वास्तव में वो लोग भी इसलिए वहां पहुंच पाए कि उन्होंने इन्हीं लोगों के माध्यम से कुछ ना कुछ जुगाड़ लगाया होगा। तो इस जुगाड़ तंत्र को खत्म करना है। जनता को इसी तरीके से राष्ट्र हित में अपनी अभिव्यक्ति देते रहना पड़ेगा और उसका परिणाम हैं कि सोनम बांगचुक, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे अपराधियों को सिबल भी बचा नहीं पा रहे हैं। यही इस देश की जनता की बहुत बड़ी जीत है।

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सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं
सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं
सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

हमारे सुप्रीम कोर्ट के नकली खुदा हैं यानी वकीलों के जो लॉर्ड हैं वो जनता के आक्रोश से इस कदर डरे हुए हैं कि कुछ चहेतों को चाहकर भी वो राहत नहीं दे पा रहे हैं। और इसमें सबसे बड़ा नाम है सोनम बांगचुक का। सोनम बांगचुक पिछले करीब डेढ़ दो महीने से जेल में है और सिबल जैसा वकील उसको राहत दिलाने की तमाम कोशिशें करता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी सोनम बांगचुक की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। दूसरी तरफ़ सिब्बल और सिंघवी दोनों के दोनों  इमाम और उमर  की वकालत करते हुए नज़र आ रहे हैं। लेकिन उन लोगों को भी यह राहत नहीं दिला पा रहे हैं और यह जो पूरा जो गिरोह है दिल्ली दंगों का जो दोषी है ये पिछले 5 साल से ज्यादा समय से जेल में है। अब इसके पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ इस देश की जनता ही है जो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रही है और वो राय पहुंच रही है भारत के नकली खुदाओं के पास। यही वजह है कि चाहे सोनम बांगचुक का केस हो या फिर इमाम और उमर के साथियों का जो केस हो इसकी सुनवाई ना तो CJI कर रहे हैं ना नेक्स्ट सीजीआई कर रहे हैं ना ही कॉलेजियम के या सीनियर बहुत ज्यादा सीनियर कोई दूसरे जज कर रहे हैं।

पहले यह देखने को मिलता था कि जब भी इस तरीके के केसेस आते थे और खासकर अगर सिबल और सिंघवी में से कोई उस केस को लेकर आया है तो निश्चित माना जाता था कि उस क्लाइंट को जल्दी से जल्दी राहत मिल जाएगी। लेकिन जब से यशवंत वर्मा का कैश कांड हुआ और उसके बाद तमाम ऐसे घटनाक्रम हुए जिसकी वजह से भारत की जुडिशरी  पर जनता की तरफ से तमाम तीखे सवाल उठे और उसके बाद एक जूता कांड भी हुआ क्योंकि उससे पहले भारत के CJI ने ऐसा काम कर दिया था जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। यानी कि उन्होंने सीधे तौर पर सनातनी आस्था पर सवाल उठा दिया था। बाद में उन्होंने सफाई भी दी। लेकिन उस सफाई से एक वकील सहमत नहीं हुआ और उस वकील ने भरी अदालत में CJI के ऊपर जूता फेंक दिया। जिसके बाद तमाम अवमानना के मामला भी आया। लेकिन उसको भी कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि CJI ने माफ कर दिया है। वास्तव में असली वजह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के सारे जज यह नहीं चाहते थे कि यह चर्चा ज्यादा दिन तक बनी रहे जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट के पुराने कारनामों पर सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो।

यही वजह है कि राकेश किशोर के मामले को दबा दिया गया और सोनम बाचुक का मामला भी सुनवाई के लिए ऐसे पीठ को दिया गया जिससे किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थी खासकर सिबल या सिंभी को और यह मामला गया था जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस अंजारिया की पीठ को और यह पीठ इस मामले को लगातार टाले जा रही है जिसकी वजह से सिब्बल परेशान घूम रहा है, हताश हो गया है। वो यह सोच रहा है कि मेरे इशारों पर मेरे यह लॉर्ड चला करते थे। अब यह नकली खुदा हमारी बात क्यों नहीं मान रहे हैं? यानी सुप्रीम कोर्ट के जो जज होते हैं अगर इन्हें नकली खुदा मान लिया जाए तो फिर सिबल सिंवी दातार दवे जैसे वकीलों को आप नकली पैगंबर मानकर चलिए। और यह पैगंबर जो कहते हैं खुदा भी वही करता है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि जनता के दबाव में ना तो नकली खुदा इन लोगों को राहत दे पा रहे हैं ना ही ये जो सिपल सिंवी टाइप के नकली पैगंबर हैं ये अपने क्लाइंट को बचा पाने में कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। शुरुआत में ऐसा लगा था कि बांगचुक को एक दो सुनवाई के बाद में राहत दे दी जाएगी। लेकिन अब बांगचुप का जो मामला है वो 24 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है।

यानी कि बीआर गवै अपने कार्यकाल में तो कम से कम बांगचुप को कोई राहत देते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह यह चाहते हैं कि अब जो 25 दिन उनके पास बचे हैं उन्हें वह शांति पूर्वक गुजार दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि उनका रिटायरमेंट के बाद में बहुत बड़ा प्लान है जिसके संकेत वो पहले दे चुके हैं और वो नहीं चाहते कि जम्मू कश्मीर लद्दाख के एक मामले को लेकर उनका महाराष्ट्र की राजनीति में जो भविष्य होने वाला है वो खतरे में पड़े। वही स्थिति सरजिल इमाम वाले केस में भी लग रही है। ऐसा लगता है कि शायद जो वर्तमान CJI हैं वो अपने कार्यकाल के दौरान तो इन दोनों मामलों को निपटते हुए देखना नहीं चाहते हैं। हालांकि शरजील इमाम उमर खालिद वाले केस की सुनवाई तो सोमवार तक के लिए टाली गई है। पर सोनम बांगचुक की सुनवाई जो टाली गई है वो 24 नवंबर तक टाली गई है।

यानी कि CJI के तौर पर आखिरी दिन के बाद ही इस पर सुनवाई होगी और अगले जो सीजीआई बनने वाले हैं उन्हीं के कार्यकाल में यह निपटारा हो सकता है 

अगर उस दिन कुछ हुआ तो अन्यथा जो अब तक देखने को मिला है उसके आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि मामला दिसंबर तक के लिए भी टाला जा सकता है क्योंकि जिस तरीके से जो जज हैं वो बात कर रहे हैं जो सवाल कर रहे हैं उससे कहीं भी नहीं लगता है कि सोनम बांगचुक जिसने कि जिसे कि आप लद्दाख हिंसा का दोषी मान सकते हैं उसको इतनी आसानी से राहत मिल जाएगी क्योंकि उसके खिलाफ तमाम वीडियो सबूत है कि वो किस तरीके से लोगों से यह कह रहा है कि इस बार अगर चीन भारत पर आक्रमण करेगा तो हम लद्दाखी लोग भारत सरकार की भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे बल्कि हम लोग चुप चुपचाप बैठकर देखेंगे। दूसरी तरफ एक वीडियो में वो लोगों को सलाह देता है कि आप लोग जब प्रदर्शन के लिए जाएं तो अपने चेहरे पर नकाब लगा लें। ऊपर कैप लगा लें जिससे कि आप पहचाने ना जा सकें। इस तरीके की बातें बांगचुक की सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया है कि उसका इरादा शांतिपूर्ण तो कतई नहीं था। उसके अलावा जिस तरीके से वो पाकिस्तान गया वहां यूनुस से मिला और बहुत सी ऐसी चीजें बाकजुक ने कही हैं उसके पहले राहुल गांधी का एक बयान कि भारत में Zen Z कुछ करने वाली है और राहुल गांधी के बयान से लिंक होना इस पूरे मामले का क्योंकि सोनम बांगचुक का जो पिता था वो कांग्रेस पार्टी की तरफ से मंत्री भी रह चुका था। सोनम बांगचुक की उमर अब्दुल्ला के साथ नजदीकियां यह सारी वो कड़ियां हैं जिसके आधार पर एनएसए उसके ऊपर लगाया गया और वो जोधपुर की जेल में पड़ा हुआ है।

तमाम कोशिशों के बावजूद तमाम कुतर्कों के बावजूद सिबल उसको जमानत नहीं दिला पा रहा है। वही स्थिति उमर खालिद और शरजील इमाम की है। इस केस में भी सिबल और सिंघवी ही वकील है। लेकिन इनकी यहां भी दाल गलती हुई नजर नहीं आ रही है और इस सब के लिए अगर कोई बधाई का पात्र है तो वह इस देश की जनता है क्योंकि जनता के दबाव की वजह से ही ऐसा हो पा रहा है। अन्यथा पिछले कई सालों में हमने देखा है कि रात के 12 12 एक बजे अदालतें खुलती है। तीस्ता शीतलवाद टाइप के जो अपराधी होते हैं उनको बड़ी आसानी से जमानत मिल जाती है। जुबैर टाइप के लोगों पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में छूट मांगी जाती है आसानी से दे दी जाती है। यानी ये जो अर्बन नक्सल गैंग के जो भी लोग होते हैं या फिर कहे कि कांग्रेसी वामपंथी विचारधारा के जो तथाकथित संविधान के नाम पर अनर्गल और कुत्सित टिप्पणियां करने वाले लोग हैं इनको राहत दे दी जाती है। अब ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि भारत में जुडिशरी के खिलाफ जनता का जो आक्रोश है वह अपने उच्चतम लेवल पर पहुंच चुका है और ये बरकरार रहना ही चाहिए क्योंकि अगर इस देश को जुडिशरी के आतंकवाद से जुडिशरी के जो एक जुडिशियल एक्टिविज्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेने सत्ता को अपने हाथ में लेकर नियंत्रित करने की एक जिद बन गई है। उसको अगर रोकना है तो देश की जनता को जागरूक होना ही पड़ेगा और तभी इस देश से कॉलेजियम रूपी यह जो बुराई है जिसके माध्यम से ये जज चुनकर आते हैं चाहे हाई कोर्ट के जज हो या सुप्रीम कोर्ट के जज हो इन सभी की नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती। वरिष्ठता के आधार पर नहीं होती। एफिशिएंसी के आधार पर नहीं होती बल्कि सिर्फ और सिर्फ भाई भतीजावाद और चेलापंती के आधार पर होती है। इन भाई भतीजों और चेलों को अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में जाने से रोकना है। अच्छे और योग्य जजों को सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में लाना है तो उसके लिए इस देश से कॉलेजियम को मिटाना पड़ेगा। इस देश में एनजेएसी जैसी कोई व्यवस्था लानी ही पड़ेगी।UPSC जैसा कोई एग्जाम भी होना चाहिए जिसके माध्यम से जो जज है वो एक एलिजिबिलिटी टेस्ट दें और फिर बाद में उनमें से जो सीनियर और एफिशिएंट जज हो उनको हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया जा सके। आज सुप्रीम कोर्ट की हालत यह है कि 34 में से 20 जज ऐसे हैं जो सीधे तौर पर भाई भतीजे हैं या फिर चेले चपाटे हैं। यानी केवल 101 जजों को ही आप कह सकते हैं कि वो इस में सीधे इन्वॉल्व नहीं है। लेकिन वास्तव में वो लोग भी इसलिए वहां पहुंच पाए कि उन्होंने इन्हीं लोगों के माध्यम से कुछ ना कुछ जुगाड़ लगाया होगा। तो इस जुगाड़ तंत्र को खत्म करना है। जनता को इसी तरीके से राष्ट्र हित में अपनी अभिव्यक्ति देते रहना पड़ेगा और उसका परिणाम हैं कि सोनम बांगचुक, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे अपराधियों को सिबल भी बचा नहीं पा रहे हैं। यही इस देश की जनता की बहुत बड़ी जीत है।

Jai Hind



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सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं
सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

हमारे सुप्रीम कोर्ट के नकली खुदा हैं यानी वकीलों के जो लॉर्ड हैं वो जनता के आक्रोश से इस कदर डरे हुए हैं कि कुछ चहेतों को चाहकर भी वो राहत नहीं दे पा रहे हैं। और इसमें सबसे बड़ा नाम है सोनम बांगचुक का। सोनम बांगचुक पिछले करीब डेढ़ दो महीने से जेल में है और सिबल जैसा वकील उसको राहत दिलाने की तमाम कोशिशें करता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी सोनम बांगचुक की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। दूसरी तरफ़ सिब्बल और सिंघवी दोनों के दोनों  इमाम और उमर  की वकालत करते हुए नज़र आ रहे हैं। लेकिन उन लोगों को भी यह राहत नहीं दिला पा रहे हैं और यह जो पूरा जो गिरोह है दिल्ली दंगों का जो दोषी है ये पिछले 5 साल से ज्यादा समय से जेल में है। अब इसके पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ इस देश की जनता ही है जो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रही है और वो राय पहुंच रही है भारत के नकली खुदाओं के पास। यही वजह है कि चाहे सोनम बांगचुक का केस हो या फिर इमाम और उमर के साथियों का जो केस हो इसकी सुनवाई ना तो CJI कर रहे हैं ना नेक्स्ट सीजीआई कर रहे हैं ना ही कॉलेजियम के या सीनियर बहुत ज्यादा सीनियर कोई दूसरे जज कर रहे हैं।

पहले यह देखने को मिलता था कि जब भी इस तरीके के केसेस आते थे और खासकर अगर सिबल और सिंघवी में से कोई उस केस को लेकर आया है तो निश्चित माना जाता था कि उस क्लाइंट को जल्दी से जल्दी राहत मिल जाएगी। लेकिन जब से यशवंत वर्मा का कैश कांड हुआ और उसके बाद तमाम ऐसे घटनाक्रम हुए जिसकी वजह से भारत की जुडिशरी  पर जनता की तरफ से तमाम तीखे सवाल उठे और उसके बाद एक जूता कांड भी हुआ क्योंकि उससे पहले भारत के CJI ने ऐसा काम कर दिया था जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। यानी कि उन्होंने सीधे तौर पर सनातनी आस्था पर सवाल उठा दिया था। बाद में उन्होंने सफाई भी दी। लेकिन उस सफाई से एक वकील सहमत नहीं हुआ और उस वकील ने भरी अदालत में CJI के ऊपर जूता फेंक दिया। जिसके बाद तमाम अवमानना के मामला भी आया। लेकिन उसको भी कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि CJI ने माफ कर दिया है। वास्तव में असली वजह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के सारे जज यह नहीं चाहते थे कि यह चर्चा ज्यादा दिन तक बनी रहे जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट के पुराने कारनामों पर सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो।

यही वजह है कि राकेश किशोर के मामले को दबा दिया गया और सोनम बाचुक का मामला भी सुनवाई के लिए ऐसे पीठ को दिया गया जिससे किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थी खासकर सिबल या सिंभी को और यह मामला गया था जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस अंजारिया की पीठ को और यह पीठ इस मामले को लगातार टाले जा रही है जिसकी वजह से सिब्बल परेशान घूम रहा है, हताश हो गया है। वो यह सोच रहा है कि मेरे इशारों पर मेरे यह लॉर्ड चला करते थे। अब यह नकली खुदा हमारी बात क्यों नहीं मान रहे हैं? यानी सुप्रीम कोर्ट के जो जज होते हैं अगर इन्हें नकली खुदा मान लिया जाए तो फिर सिबल सिंवी दातार दवे जैसे वकीलों को आप नकली पैगंबर मानकर चलिए। और यह पैगंबर जो कहते हैं खुदा भी वही करता है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि जनता के दबाव में ना तो नकली खुदा इन लोगों को राहत दे पा रहे हैं ना ही ये जो सिपल सिंवी टाइप के नकली पैगंबर हैं ये अपने क्लाइंट को बचा पाने में कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। शुरुआत में ऐसा लगा था कि बांगचुक को एक दो सुनवाई के बाद में राहत दे दी जाएगी। लेकिन अब बांगचुप का जो मामला है वो 24 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है।

यानी कि बीआर गवै अपने कार्यकाल में तो कम से कम बांगचुप को कोई राहत देते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह यह चाहते हैं कि अब जो 25 दिन उनके पास बचे हैं उन्हें वह शांति पूर्वक गुजार दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि उनका रिटायरमेंट के बाद में बहुत बड़ा प्लान है जिसके संकेत वो पहले दे चुके हैं और वो नहीं चाहते कि जम्मू कश्मीर लद्दाख के एक मामले को लेकर उनका महाराष्ट्र की राजनीति में जो भविष्य होने वाला है वो खतरे में पड़े। वही स्थिति सरजिल इमाम वाले केस में भी लग रही है। ऐसा लगता है कि शायद जो वर्तमान CJI हैं वो अपने कार्यकाल के दौरान तो इन दोनों मामलों को निपटते हुए देखना नहीं चाहते हैं। हालांकि शरजील इमाम उमर खालिद वाले केस की सुनवाई तो सोमवार तक के लिए टाली गई है। पर सोनम बांगचुक की सुनवाई जो टाली गई है वो 24 नवंबर तक टाली गई है।

यानी कि CJI के तौर पर आखिरी दिन के बाद ही इस पर सुनवाई होगी और अगले जो सीजीआई बनने वाले हैं उन्हीं के कार्यकाल में यह निपटारा हो सकता है 

अगर उस दिन कुछ हुआ तो अन्यथा जो अब तक देखने को मिला है उसके आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि मामला दिसंबर तक के लिए भी टाला जा सकता है क्योंकि जिस तरीके से जो जज हैं वो बात कर रहे हैं जो सवाल कर रहे हैं उससे कहीं भी नहीं लगता है कि सोनम बांगचुक जिसने कि जिसे कि आप लद्दाख हिंसा का दोषी मान सकते हैं उसको इतनी आसानी से राहत मिल जाएगी क्योंकि उसके खिलाफ तमाम वीडियो सबूत है कि वो किस तरीके से लोगों से यह कह रहा है कि इस बार अगर चीन भारत पर आक्रमण करेगा तो हम लद्दाखी लोग भारत सरकार की भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे बल्कि हम लोग चुप चुपचाप बैठकर देखेंगे। दूसरी तरफ एक वीडियो में वो लोगों को सलाह देता है कि आप लोग जब प्रदर्शन के लिए जाएं तो अपने चेहरे पर नकाब लगा लें। ऊपर कैप लगा लें जिससे कि आप पहचाने ना जा सकें। इस तरीके की बातें बांगचुक की सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया है कि उसका इरादा शांतिपूर्ण तो कतई नहीं था। उसके अलावा जिस तरीके से वो पाकिस्तान गया वहां यूनुस से मिला और बहुत सी ऐसी चीजें बाकजुक ने कही हैं उसके पहले राहुल गांधी का एक बयान कि भारत में Zen Z कुछ करने वाली है और राहुल गांधी के बयान से लिंक होना इस पूरे मामले का क्योंकि सोनम बांगचुक का जो पिता था वो कांग्रेस पार्टी की तरफ से मंत्री भी रह चुका था। सोनम बांगचुक की उमर अब्दुल्ला के साथ नजदीकियां यह सारी वो कड़ियां हैं जिसके आधार पर एनएसए उसके ऊपर लगाया गया और वो जोधपुर की जेल में पड़ा हुआ है।

तमाम कोशिशों के बावजूद तमाम कुतर्कों के बावजूद सिबल उसको जमानत नहीं दिला पा रहा है। वही स्थिति उमर खालिद और शरजील इमाम की है। इस केस में भी सिबल और सिंघवी ही वकील है। लेकिन इनकी यहां भी दाल गलती हुई नजर नहीं आ रही है और इस सब के लिए अगर कोई बधाई का पात्र है तो वह इस देश की जनता है क्योंकि जनता के दबाव की वजह से ही ऐसा हो पा रहा है। अन्यथा पिछले कई सालों में हमने देखा है कि रात के 12 12 एक बजे अदालतें खुलती है। तीस्ता शीतलवाद टाइप के जो अपराधी होते हैं उनको बड़ी आसानी से जमानत मिल जाती है। जुबैर टाइप के लोगों पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में छूट मांगी जाती है आसानी से दे दी जाती है। यानी ये जो अर्बन नक्सल गैंग के जो भी लोग होते हैं या फिर कहे कि कांग्रेसी वामपंथी विचारधारा के जो तथाकथित संविधान के नाम पर अनर्गल और कुत्सित टिप्पणियां करने वाले लोग हैं इनको राहत दे दी जाती है। अब ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि भारत में जुडिशरी के खिलाफ जनता का जो आक्रोश है वह अपने उच्चतम लेवल पर पहुंच चुका है और ये बरकरार रहना ही चाहिए क्योंकि अगर इस देश को जुडिशरी के आतंकवाद से जुडिशरी के जो एक जुडिशियल एक्टिविज्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेने सत्ता को अपने हाथ में लेकर नियंत्रित करने की एक जिद बन गई है। उसको अगर रोकना है तो देश की जनता को जागरूक होना ही पड़ेगा और तभी इस देश से कॉलेजियम रूपी यह जो बुराई है जिसके माध्यम से ये जज चुनकर आते हैं चाहे हाई कोर्ट के जज हो या सुप्रीम कोर्ट के जज हो इन सभी की नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती। वरिष्ठता के आधार पर नहीं होती। एफिशिएंसी के आधार पर नहीं होती बल्कि सिर्फ और सिर्फ भाई भतीजावाद और चेलापंती के आधार पर होती है। इन भाई भतीजों और चेलों को अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में जाने से रोकना है। अच्छे और योग्य जजों को सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में लाना है तो उसके लिए इस देश से कॉलेजियम को मिटाना पड़ेगा। इस देश में एनजेएसी जैसी कोई व्यवस्था लानी ही पड़ेगी।UPSC जैसा कोई एग्जाम भी होना चाहिए जिसके माध्यम से जो जज है वो एक एलिजिबिलिटी टेस्ट दें और फिर बाद में उनमें से जो सीनियर और एफिशिएंट जज हो उनको हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया जा सके। आज सुप्रीम कोर्ट की हालत यह है कि 34 में से 20 जज ऐसे हैं जो सीधे तौर पर भाई भतीजे हैं या फिर चेले चपाटे हैं। यानी केवल 101 जजों को ही आप कह सकते हैं कि वो इस में सीधे इन्वॉल्व नहीं है। लेकिन वास्तव में वो लोग भी इसलिए वहां पहुंच पाए कि उन्होंने इन्हीं लोगों के माध्यम से कुछ ना कुछ जुगाड़ लगाया होगा। तो इस जुगाड़ तंत्र को खत्म करना है। जनता को इसी तरीके से राष्ट्र हित में अपनी अभिव्यक्ति देते रहना पड़ेगा और उसका परिणाम हैं कि सोनम बांगचुक, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे अपराधियों को सिबल भी बचा नहीं पा रहे हैं। यही इस देश की जनता की बहुत बड़ी जीत है।

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सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

हमारे सुप्रीम कोर्ट के नकली खुदा हैं यानी वकीलों के जो लॉर्ड हैं वो जनता के आक्रोश से इस कदर डरे हुए हैं कि कुछ चहेतों को चाहकर भी वो राहत नहीं दे पा रहे हैं। और इसमें सबसे बड़ा नाम है सोनम बांगचुक का। सोनम बांगचुक पिछले करीब डेढ़ दो महीने से जेल में है और सिबल जैसा वकील उसको राहत दिलाने की तमाम कोशिशें करता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी सोनम बांगचुक की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। दूसरी तरफ़ सिब्बल और सिंघवी दोनों के दोनों  इमाम और उमर  की वकालत करते हुए नज़र आ रहे हैं। लेकिन उन लोगों को भी यह राहत नहीं दिला पा रहे हैं और यह जो पूरा जो गिरोह है दिल्ली दंगों का जो दोषी है ये पिछले 5 साल से ज्यादा समय से जेल में है। अब इसके पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ इस देश की जनता ही है जो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रही है और वो राय पहुंच रही है भारत के नकली खुदाओं के पास। यही वजह है कि चाहे सोनम बांगचुक का केस हो या फिर इमाम और उमर के साथियों का जो केस हो इसकी सुनवाई ना तो CJI कर रहे हैं ना नेक्स्ट सीजीआई कर रहे हैं ना ही कॉलेजियम के या सीनियर बहुत ज्यादा सीनियर कोई दूसरे जज कर रहे हैं।

पहले यह देखने को मिलता था कि जब भी इस तरीके के केसेस आते थे और खासकर अगर सिबल और सिंघवी में से कोई उस केस को लेकर आया है तो निश्चित माना जाता था कि उस क्लाइंट को जल्दी से जल्दी राहत मिल जाएगी। लेकिन जब से यशवंत वर्मा का कैश कांड हुआ और उसके बाद तमाम ऐसे घटनाक्रम हुए जिसकी वजह से भारत की जुडिशरी  पर जनता की तरफ से तमाम तीखे सवाल उठे और उसके बाद एक जूता कांड भी हुआ क्योंकि उससे पहले भारत के CJI ने ऐसा काम कर दिया था जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। यानी कि उन्होंने सीधे तौर पर सनातनी आस्था पर सवाल उठा दिया था। बाद में उन्होंने सफाई भी दी। लेकिन उस सफाई से एक वकील सहमत नहीं हुआ और उस वकील ने भरी अदालत में CJI के ऊपर जूता फेंक दिया। जिसके बाद तमाम अवमानना के मामला भी आया। लेकिन उसको भी कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि CJI ने माफ कर दिया है। वास्तव में असली वजह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के सारे जज यह नहीं चाहते थे कि यह चर्चा ज्यादा दिन तक बनी रहे जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट के पुराने कारनामों पर सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो।

यही वजह है कि राकेश किशोर के मामले को दबा दिया गया और सोनम बाचुक का मामला भी सुनवाई के लिए ऐसे पीठ को दिया गया जिससे किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थी खासकर सिबल या सिंभी को और यह मामला गया था जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस अंजारिया की पीठ को और यह पीठ इस मामले को लगातार टाले जा रही है जिसकी वजह से सिब्बल परेशान घूम रहा है, हताश हो गया है। वो यह सोच रहा है कि मेरे इशारों पर मेरे यह लॉर्ड चला करते थे। अब यह नकली खुदा हमारी बात क्यों नहीं मान रहे हैं? यानी सुप्रीम कोर्ट के जो जज होते हैं अगर इन्हें नकली खुदा मान लिया जाए तो फिर सिबल सिंवी दातार दवे जैसे वकीलों को आप नकली पैगंबर मानकर चलिए। और यह पैगंबर जो कहते हैं खुदा भी वही करता है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि जनता के दबाव में ना तो नकली खुदा इन लोगों को राहत दे पा रहे हैं ना ही ये जो सिपल सिंवी टाइप के नकली पैगंबर हैं ये अपने क्लाइंट को बचा पाने में कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। शुरुआत में ऐसा लगा था कि बांगचुक को एक दो सुनवाई के बाद में राहत दे दी जाएगी। लेकिन अब बांगचुप का जो मामला है वो 24 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है।

यानी कि बीआर गवै अपने कार्यकाल में तो कम से कम बांगचुप को कोई राहत देते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह यह चाहते हैं कि अब जो 25 दिन उनके पास बचे हैं उन्हें वह शांति पूर्वक गुजार दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि उनका रिटायरमेंट के बाद में बहुत बड़ा प्लान है जिसके संकेत वो पहले दे चुके हैं और वो नहीं चाहते कि जम्मू कश्मीर लद्दाख के एक मामले को लेकर उनका महाराष्ट्र की राजनीति में जो भविष्य होने वाला है वो खतरे में पड़े। वही स्थिति सरजिल इमाम वाले केस में भी लग रही है। ऐसा लगता है कि शायद जो वर्तमान CJI हैं वो अपने कार्यकाल के दौरान तो इन दोनों मामलों को निपटते हुए देखना नहीं चाहते हैं। हालांकि शरजील इमाम उमर खालिद वाले केस की सुनवाई तो सोमवार तक के लिए टाली गई है। पर सोनम बांगचुक की सुनवाई जो टाली गई है वो 24 नवंबर तक टाली गई है।

यानी कि CJI के तौर पर आखिरी दिन के बाद ही इस पर सुनवाई होगी और अगले जो सीजीआई बनने वाले हैं उन्हीं के कार्यकाल में यह निपटारा हो सकता है 

अगर उस दिन कुछ हुआ तो अन्यथा जो अब तक देखने को मिला है उसके आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि मामला दिसंबर तक के लिए भी टाला जा सकता है क्योंकि जिस तरीके से जो जज हैं वो बात कर रहे हैं जो सवाल कर रहे हैं उससे कहीं भी नहीं लगता है कि सोनम बांगचुक जिसने कि जिसे कि आप लद्दाख हिंसा का दोषी मान सकते हैं उसको इतनी आसानी से राहत मिल जाएगी क्योंकि उसके खिलाफ तमाम वीडियो सबूत है कि वो किस तरीके से लोगों से यह कह रहा है कि इस बार अगर चीन भारत पर आक्रमण करेगा तो हम लद्दाखी लोग भारत सरकार की भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे बल्कि हम लोग चुप चुपचाप बैठकर देखेंगे। दूसरी तरफ एक वीडियो में वो लोगों को सलाह देता है कि आप लोग जब प्रदर्शन के लिए जाएं तो अपने चेहरे पर नकाब लगा लें। ऊपर कैप लगा लें जिससे कि आप पहचाने ना जा सकें। इस तरीके की बातें बांगचुक की सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया है कि उसका इरादा शांतिपूर्ण तो कतई नहीं था। उसके अलावा जिस तरीके से वो पाकिस्तान गया वहां यूनुस से मिला और बहुत सी ऐसी चीजें बाकजुक ने कही हैं उसके पहले राहुल गांधी का एक बयान कि भारत में Zen Z कुछ करने वाली है और राहुल गांधी के बयान से लिंक होना इस पूरे मामले का क्योंकि सोनम बांगचुक का जो पिता था वो कांग्रेस पार्टी की तरफ से मंत्री भी रह चुका था। सोनम बांगचुक की उमर अब्दुल्ला के साथ नजदीकियां यह सारी वो कड़ियां हैं जिसके आधार पर एनएसए उसके ऊपर लगाया गया और वो जोधपुर की जेल में पड़ा हुआ है।

तमाम कोशिशों के बावजूद तमाम कुतर्कों के बावजूद सिबल उसको जमानत नहीं दिला पा रहा है। वही स्थिति उमर खालिद और शरजील इमाम की है। इस केस में भी सिबल और सिंघवी ही वकील है। लेकिन इनकी यहां भी दाल गलती हुई नजर नहीं आ रही है और इस सब के लिए अगर कोई बधाई का पात्र है तो वह इस देश की जनता है क्योंकि जनता के दबाव की वजह से ही ऐसा हो पा रहा है। अन्यथा पिछले कई सालों में हमने देखा है कि रात के 12 12 एक बजे अदालतें खुलती है। तीस्ता शीतलवाद टाइप के जो अपराधी होते हैं उनको बड़ी आसानी से जमानत मिल जाती है। जुबैर टाइप के लोगों पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में छूट मांगी जाती है आसानी से दे दी जाती है। यानी ये जो अर्बन नक्सल गैंग के जो भी लोग होते हैं या फिर कहे कि कांग्रेसी वामपंथी विचारधारा के जो तथाकथित संविधान के नाम पर अनर्गल और कुत्सित टिप्पणियां करने वाले लोग हैं इनको राहत दे दी जाती है। अब ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि भारत में जुडिशरी के खिलाफ जनता का जो आक्रोश है वह अपने उच्चतम लेवल पर पहुंच चुका है और ये बरकरार रहना ही चाहिए क्योंकि अगर इस देश को जुडिशरी के आतंकवाद से जुडिशरी के जो एक जुडिशियल एक्टिविज्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेने सत्ता को अपने हाथ में लेकर नियंत्रित करने की एक जिद बन गई है। उसको अगर रोकना है तो देश की जनता को जागरूक होना ही पड़ेगा और तभी इस देश से कॉलेजियम रूपी यह जो बुराई है जिसके माध्यम से ये जज चुनकर आते हैं चाहे हाई कोर्ट के जज हो या सुप्रीम कोर्ट के जज हो इन सभी की नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती। वरिष्ठता के आधार पर नहीं होती। एफिशिएंसी के आधार पर नहीं होती बल्कि सिर्फ और सिर्फ भाई भतीजावाद और चेलापंती के आधार पर होती है। इन भाई भतीजों और चेलों को अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में जाने से रोकना है। अच्छे और योग्य जजों को सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में लाना है तो उसके लिए इस देश से कॉलेजियम को मिटाना पड़ेगा। इस देश में एनजेएसी जैसी कोई व्यवस्था लानी ही पड़ेगी।UPSC जैसा कोई एग्जाम भी होना चाहिए जिसके माध्यम से जो जज है वो एक एलिजिबिलिटी टेस्ट दें और फिर बाद में उनमें से जो सीनियर और एफिशिएंट जज हो उनको हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया जा सके। आज सुप्रीम कोर्ट की हालत यह है कि 34 में से 20 जज ऐसे हैं जो सीधे तौर पर भाई भतीजे हैं या फिर चेले चपाटे हैं। यानी केवल 101 जजों को ही आप कह सकते हैं कि वो इस में सीधे इन्वॉल्व नहीं है। लेकिन वास्तव में वो लोग भी इसलिए वहां पहुंच पाए कि उन्होंने इन्हीं लोगों के माध्यम से कुछ ना कुछ जुगाड़ लगाया होगा। तो इस जुगाड़ तंत्र को खत्म करना है। जनता को इसी तरीके से राष्ट्र हित में अपनी अभिव्यक्ति देते रहना पड़ेगा और उसका परिणाम हैं कि सोनम बांगचुक, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे अपराधियों को सिबल भी बचा नहीं पा रहे हैं। यही इस देश की जनता की बहुत बड़ी जीत है।

Jai Hind



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November 01, 2025 at 08:06PM

सिबल और सिंघवी की दाल नहीं गली हताश -उमर खालिद शरजील इमाम सोनम बांगचुक को SC से मौज नहीं

हमारे सुप्रीम कोर्ट के नकली खुदा हैं यानी वकीलों के जो लॉर्ड हैं वो जनता के आक्रोश से इस कदर डरे हुए हैं कि कुछ चहेतों को चाहकर भी वो राहत नहीं दे पा रहे हैं। और इसमें सबसे बड़ा नाम है सोनम बांगचुक का। सोनम बांगचुक पिछले करीब डेढ़ दो महीने से जेल में है और सिबल जैसा वकील उसको राहत दिलाने की तमाम कोशिशें करता हुआ नजर आ रहा है। लेकिन फिर भी सोनम बांगचुक की मुश्किलें खत्म होने का नाम नहीं ले रही है। दूसरी तरफ़ सिब्बल और सिंघवी दोनों के दोनों  इमाम और उमर  की वकालत करते हुए नज़र आ रहे हैं। लेकिन उन लोगों को भी यह राहत नहीं दिला पा रहे हैं और यह जो पूरा जो गिरोह है दिल्ली दंगों का जो दोषी है ये पिछले 5 साल से ज्यादा समय से जेल में है। अब इसके पीछे की वजह सिर्फ और सिर्फ इस देश की जनता ही है जो सोशल मीडिया के माध्यम से अपनी राय व्यक्त कर रही है और वो राय पहुंच रही है भारत के नकली खुदाओं के पास। यही वजह है कि चाहे सोनम बांगचुक का केस हो या फिर इमाम और उमर के साथियों का जो केस हो इसकी सुनवाई ना तो CJI कर रहे हैं ना नेक्स्ट सीजीआई कर रहे हैं ना ही कॉलेजियम के या सीनियर बहुत ज्यादा सीनियर कोई दूसरे जज कर रहे हैं।

पहले यह देखने को मिलता था कि जब भी इस तरीके के केसेस आते थे और खासकर अगर सिबल और सिंघवी में से कोई उस केस को लेकर आया है तो निश्चित माना जाता था कि उस क्लाइंट को जल्दी से जल्दी राहत मिल जाएगी। लेकिन जब से यशवंत वर्मा का कैश कांड हुआ और उसके बाद तमाम ऐसे घटनाक्रम हुए जिसकी वजह से भारत की जुडिशरी  पर जनता की तरफ से तमाम तीखे सवाल उठे और उसके बाद एक जूता कांड भी हुआ क्योंकि उससे पहले भारत के CJI ने ऐसा काम कर दिया था जिसके लिए कोई भी तैयार नहीं था। यानी कि उन्होंने सीधे तौर पर सनातनी आस्था पर सवाल उठा दिया था। बाद में उन्होंने सफाई भी दी। लेकिन उस सफाई से एक वकील सहमत नहीं हुआ और उस वकील ने भरी अदालत में CJI के ऊपर जूता फेंक दिया। जिसके बाद तमाम अवमानना के मामला भी आया। लेकिन उसको भी कोर्ट ने यह कहकर खारिज कर दिया कि CJI ने माफ कर दिया है। वास्तव में असली वजह यह थी कि सुप्रीम कोर्ट के सारे जज यह नहीं चाहते थे कि यह चर्चा ज्यादा दिन तक बनी रहे जिसकी वजह से सुप्रीम कोर्ट के पुराने कारनामों पर सोशल मीडिया पर ज्यादा से ज्यादा चर्चा हो।

यही वजह है कि राकेश किशोर के मामले को दबा दिया गया और सोनम बाचुक का मामला भी सुनवाई के लिए ऐसे पीठ को दिया गया जिससे किसी को बहुत ज्यादा उम्मीदें नहीं थी खासकर सिबल या सिंभी को और यह मामला गया था जस्टिस अरविंद कुमार और जस्टिस अंजारिया की पीठ को और यह पीठ इस मामले को लगातार टाले जा रही है जिसकी वजह से सिब्बल परेशान घूम रहा है, हताश हो गया है। वो यह सोच रहा है कि मेरे इशारों पर मेरे यह लॉर्ड चला करते थे। अब यह नकली खुदा हमारी बात क्यों नहीं मान रहे हैं? यानी सुप्रीम कोर्ट के जो जज होते हैं अगर इन्हें नकली खुदा मान लिया जाए तो फिर सिबल सिंवी दातार दवे जैसे वकीलों को आप नकली पैगंबर मानकर चलिए। और यह पैगंबर जो कहते हैं खुदा भी वही करता है। लेकिन ऐसा लग रहा है कि जनता के दबाव में ना तो नकली खुदा इन लोगों को राहत दे पा रहे हैं ना ही ये जो सिपल सिंवी टाइप के नकली पैगंबर हैं ये अपने क्लाइंट को बचा पाने में कामयाब होते हुए दिख रहे हैं। शुरुआत में ऐसा लगा था कि बांगचुक को एक दो सुनवाई के बाद में राहत दे दी जाएगी। लेकिन अब बांगचुप का जो मामला है वो 24 नवंबर तक के लिए टाल दिया गया है।

यानी कि बीआर गवै अपने कार्यकाल में तो कम से कम बांगचुप को कोई राहत देते हुए दिखाई नहीं दे रहे हैं। वह यह चाहते हैं कि अब जो 25 दिन उनके पास बचे हैं उन्हें वह शांति पूर्वक गुजार दें तो ज्यादा अच्छा रहेगा क्योंकि उनका रिटायरमेंट के बाद में बहुत बड़ा प्लान है जिसके संकेत वो पहले दे चुके हैं और वो नहीं चाहते कि जम्मू कश्मीर लद्दाख के एक मामले को लेकर उनका महाराष्ट्र की राजनीति में जो भविष्य होने वाला है वो खतरे में पड़े। वही स्थिति सरजिल इमाम वाले केस में भी लग रही है। ऐसा लगता है कि शायद जो वर्तमान CJI हैं वो अपने कार्यकाल के दौरान तो इन दोनों मामलों को निपटते हुए देखना नहीं चाहते हैं। हालांकि शरजील इमाम उमर खालिद वाले केस की सुनवाई तो सोमवार तक के लिए टाली गई है। पर सोनम बांगचुक की सुनवाई जो टाली गई है वो 24 नवंबर तक टाली गई है।

यानी कि CJI के तौर पर आखिरी दिन के बाद ही इस पर सुनवाई होगी और अगले जो सीजीआई बनने वाले हैं उन्हीं के कार्यकाल में यह निपटारा हो सकता है 

अगर उस दिन कुछ हुआ तो अन्यथा जो अब तक देखने को मिला है उसके आधार पर तो यह कहा जा सकता है कि मामला दिसंबर तक के लिए भी टाला जा सकता है क्योंकि जिस तरीके से जो जज हैं वो बात कर रहे हैं जो सवाल कर रहे हैं उससे कहीं भी नहीं लगता है कि सोनम बांगचुक जिसने कि जिसे कि आप लद्दाख हिंसा का दोषी मान सकते हैं उसको इतनी आसानी से राहत मिल जाएगी क्योंकि उसके खिलाफ तमाम वीडियो सबूत है कि वो किस तरीके से लोगों से यह कह रहा है कि इस बार अगर चीन भारत पर आक्रमण करेगा तो हम लद्दाखी लोग भारत सरकार की भारतीय सेना की मदद नहीं करेंगे बल्कि हम लोग चुप चुपचाप बैठकर देखेंगे। दूसरी तरफ एक वीडियो में वो लोगों को सलाह देता है कि आप लोग जब प्रदर्शन के लिए जाएं तो अपने चेहरे पर नकाब लगा लें। ऊपर कैप लगा लें जिससे कि आप पहचाने ना जा सकें। इस तरीके की बातें बांगचुक की सामने आने के बाद यह तो स्पष्ट हो गया है कि उसका इरादा शांतिपूर्ण तो कतई नहीं था। उसके अलावा जिस तरीके से वो पाकिस्तान गया वहां यूनुस से मिला और बहुत सी ऐसी चीजें बाकजुक ने कही हैं उसके पहले राहुल गांधी का एक बयान कि भारत में Zen Z कुछ करने वाली है और राहुल गांधी के बयान से लिंक होना इस पूरे मामले का क्योंकि सोनम बांगचुक का जो पिता था वो कांग्रेस पार्टी की तरफ से मंत्री भी रह चुका था। सोनम बांगचुक की उमर अब्दुल्ला के साथ नजदीकियां यह सारी वो कड़ियां हैं जिसके आधार पर एनएसए उसके ऊपर लगाया गया और वो जोधपुर की जेल में पड़ा हुआ है।

तमाम कोशिशों के बावजूद तमाम कुतर्कों के बावजूद सिबल उसको जमानत नहीं दिला पा रहा है। वही स्थिति उमर खालिद और शरजील इमाम की है। इस केस में भी सिबल और सिंघवी ही वकील है। लेकिन इनकी यहां भी दाल गलती हुई नजर नहीं आ रही है और इस सब के लिए अगर कोई बधाई का पात्र है तो वह इस देश की जनता है क्योंकि जनता के दबाव की वजह से ही ऐसा हो पा रहा है। अन्यथा पिछले कई सालों में हमने देखा है कि रात के 12 12 एक बजे अदालतें खुलती है। तीस्ता शीतलवाद टाइप के जो अपराधी होते हैं उनको बड़ी आसानी से जमानत मिल जाती है। जुबैर टाइप के लोगों पर जब अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता के मामले में छूट मांगी जाती है आसानी से दे दी जाती है। यानी ये जो अर्बन नक्सल गैंग के जो भी लोग होते हैं या फिर कहे कि कांग्रेसी वामपंथी विचारधारा के जो तथाकथित संविधान के नाम पर अनर्गल और कुत्सित टिप्पणियां करने वाले लोग हैं इनको राहत दे दी जाती है। अब ऐसा इसलिए नहीं हो पा रहा है कि भारत में जुडिशरी के खिलाफ जनता का जो आक्रोश है वह अपने उच्चतम लेवल पर पहुंच चुका है और ये बरकरार रहना ही चाहिए क्योंकि अगर इस देश को जुडिशरी के आतंकवाद से जुडिशरी के जो एक जुडिशियल एक्टिविज्म के नाम पर कानून को अपने हाथ में लेने सत्ता को अपने हाथ में लेकर नियंत्रित करने की एक जिद बन गई है। उसको अगर रोकना है तो देश की जनता को जागरूक होना ही पड़ेगा और तभी इस देश से कॉलेजियम रूपी यह जो बुराई है जिसके माध्यम से ये जज चुनकर आते हैं चाहे हाई कोर्ट के जज हो या सुप्रीम कोर्ट के जज हो इन सभी की नियुक्ति योग्यता के आधार पर नहीं होती। वरिष्ठता के आधार पर नहीं होती। एफिशिएंसी के आधार पर नहीं होती बल्कि सिर्फ और सिर्फ भाई भतीजावाद और चेलापंती के आधार पर होती है। इन भाई भतीजों और चेलों को अगर सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में जाने से रोकना है। अच्छे और योग्य जजों को सुप्रीम कोर्ट हाई कोर्ट में लाना है तो उसके लिए इस देश से कॉलेजियम को मिटाना पड़ेगा। इस देश में एनजेएसी जैसी कोई व्यवस्था लानी ही पड़ेगी।UPSC जैसा कोई एग्जाम भी होना चाहिए जिसके माध्यम से जो जज है वो एक एलिजिबिलिटी टेस्ट दें और फिर बाद में उनमें से जो सीनियर और एफिशिएंट जज हो उनको हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट में प्रमोट किया जा सके। आज सुप्रीम कोर्ट की हालत यह है कि 34 में से 20 जज ऐसे हैं जो सीधे तौर पर भाई भतीजे हैं या फिर चेले चपाटे हैं। यानी केवल 101 जजों को ही आप कह सकते हैं कि वो इस में सीधे इन्वॉल्व नहीं है। लेकिन वास्तव में वो लोग भी इसलिए वहां पहुंच पाए कि उन्होंने इन्हीं लोगों के माध्यम से कुछ ना कुछ जुगाड़ लगाया होगा। तो इस जुगाड़ तंत्र को खत्म करना है। जनता को इसी तरीके से राष्ट्र हित में अपनी अभिव्यक्ति देते रहना पड़ेगा और उसका परिणाम हैं कि सोनम बांगचुक, उमर खालिद और शरजील इमाम जैसे अपराधियों को सिबल भी बचा नहीं पा रहे हैं। यही इस देश की जनता की बहुत बड़ी जीत है।

Jai Hind


Friday, October 31, 2025

Conflict between the Supreme Court and High Courts (especially Allahabad High Court)

 

                            Jurisdictional Conflict

  • The core issue: Conflict between the Supreme Court, High Courts (especially Allahabad High Court), and District Courts in India regarding jurisdiction and interference in appointments and administrative matters.
  • The Allahabad High Court has issued a strong warning to the Supreme Court, stating: “Stay away from our domain; this is not your jurisdiction.”
  • The background involves Supreme Court’s repeated interventions in District Court appointments which traditionally fall under the High Courts’ jurisdiction.
  • The Supreme Court had previously interfered in:
  • Multiple High Courts including Punjab and Haryana, Kerala, and Allahabad have protested this interference, asserting their exclusive domain over District Court administration.
  • A five-judge bench including CJI B.R. Gavai (soon to retire) heard these issues.
  • It is highlighted that there is  a shift in the judiciary itself, where conflicts are now seen between different courts rather than between government and judiciary.
  • There is a noted criticism within the judiciary, with Supreme Court judges doubting the decision-writing quality of some High Court judges, raising questions about the collegium system’s elevation process.
  • Allahabad High Court’s Stand and the Concept of All India Judicial Service (AIJS)

    • Allahabad High Court emphasizes that District Courts fall under the High Courts’ jurisdiction and control, including appointments and service rules.
    • They argue that Supreme Court’s repeated interference disrupts this established domain.
    • Senior advocate Rakesh Dwivedi, representing Allahabad High Court, questions why High Courts are being deprived of their constitutional powers and duties.
    • High Courts are considered apex courts at the state level, parallel in status to the Supreme Court, albeit the Supreme Court is the final court of appeal.
    • The terminology “Supreme Court” is critiqued; suggestion that it should be called “National Court” to avoid hierarchical misconceptions.
    • The conflict arises from Supreme Court’s desire to standardize judicial services nationwide, but this clashes with the diverse legal, social, and administrative realities across Indian states.
    • Example: Land laws and cow slaughter laws vary widely state-to-state, which complicates uniform judicial service rules.
    • The AIJS concept is alive but stalled due to bureaucratic and judicial delays.
    • Supreme Court judges acknowledge AIJS might give them some role in uniform service rule-making, but the High Courts resist ceding control.
    • The delay in establishing AIJS is the long-delayed like development of complex technologies.
    • Judicial Service Rules and Appointment Ratios: The Core of the Dispute

      • The promotion of District Judges is done through three modes:
        • Seniority-based promotion
        • Direct recruitment through competitive exams
        • Internal departmental exams
      • The appointment ratio has been a subject of frequent changes by the Supreme Court:
        • In 2002: 50% seniority, 25% direct recruitment, 25% departmental exams.
        • In 2010: Changed to 65% seniority, 25% direct recruitment, 10% departmental exams.
        • Later reverted or altered again, causing confusion.
      • Frequent changes in rules create instability and difficulty for judicial officers and administrators.
      • Supreme Court’s changing stance reflects internal disagreements and lack of a stable policy.
      • This lack of uniformity and constant tinkering is seen as problematic and disruptive.
      • Earlier, different Chief Justices or CJs (including D.Y. Chandrachud and Khanna J.) have altered the rules, indicating inconsistency.
      • Views from Various High Courts and the Issue of Inter-Court Relations

        • Senior advocate Maninder Acharya from Punjab and Haryana High Court states that the existing system is working well in these states, and no new quotas or changes are necessary.
        • Advocates from Kerala, Bihar, and Delhi also oppose Supreme Court’s interference, stating the High Courts can solve their problems internally.
        • The video stresses that this is a conflict among courts only, with no government involvement.
        • The Supreme Court has started making controversial rulings influencing powers of the President and Governors, which are accepted by governments but cause prolonged litigation.
        • However, the High Courts and District Courts are not obligated to blindly follow Supreme Court directions, especially in administrative matters.
        • The Supreme Court cannot remove High Court judges arbitrarily; removal requires impeachment (a constitutional process).
        • Despite this, interference continues, causing resentment.
        • Impact of Social Media and Transparency in Judiciary

          • It is noted that judicial conflicts and comments are now publicly visible due to social media, recorded hearings, and increased transparency.
          • Earlier, such internal disagreements were less visible; now, they are widely discussed and criticized.
          • This has led to increased public scrutiny and commentary on judicial conduct and decisions.
          • The Supreme Court claims it is not stripping High Courts of power but aiming for uniformity.
          • High Courts have responded firmly that the Supreme Court’s approach is overreach.
          • The ongoing dispute is expected to intensify with no immediate resolution in sight.

Geopolitical and Domestic Challenges Facing India’s Government: The Need for Decisive Action

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