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Wednesday, December 31, 2025

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM
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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया
दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM
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December 31, 2025 at 11:13AM

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।


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December 31, 2025 at 10:41AM

दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया

 देश की जुडिशरी में पॉजिटिव बदलाव आते हुए दिखाई दे रहे हैं। जब भी कोई अच्छा फैसला होता है, समाज हित में होता है, राष्ट्र हित में होता है, उसको आपके सामने रखते हैं। एक ताजा मामला आया है दिल्ली हाई कोर्ट से। दिल्ली हाई कोर्ट में दो जजों की बेंच ने जस्टिस प्रतिभा एम सिंह और जस्टिस मनमीत पीएस अरोड़ा की बेंच ने एक बहुत बड़ा और बहुत अच्छा फैसला दिया है। हालांकि फैसले में बहुत सारी बातें हैं और मेन स्ट्रीम मीडिया में या जिन लोगों ने इसको रिपोर्ट किया है उन्होंने केवल इसका एक हिस्सा ही दिखाने की कोशिश की है। जिसमें कि दिल्ली मेट्रो को यमुना रिवर बेड के एरिया से अपने जो उनका कास्टिंग का काम है उसको हटाने उसकी डेबरी हटाने और जो भी कंस्ट्रक्शन उन्होंने कर रखा है उसको साफ करने का आदेश दिया है। ऐसा बताया गया है।

लेकिन इस फैसले का जो ज्यादा महत्वपूर्ण हिस्सा है उस पर ज्यादा चर्चा नहीं की गई है। हम वही चर्चा आपके साथ करना चाहते हैं क्योंकि ये जो फैसला है केवल डीडी मेट्रो दिल्ली मेट्रो के खिलाफ ही नहीं आया है। उनको ही नहीं कहा गया है बल्कि लैंड जिहाद के एक बहुत बड़े खेल को भी इस फैसले ने ध्वस्त कर दिया है। दरअसल जहां पर यह जमीन है वह इलाका है सिग्नेचर ब्रिज का और वजीराबाद का जो डैम है उसके कॉर्नर पे जहां पर नजफगढ़ नाला यमुना में गिरता है उस इलाके का यह पूरा मामला है। उसमें नजफगढ़ नाले के एक तरफ जिसे कि साहिब नदी भी कहा जाता है। लेकिन वास्तव में वो आज की डेट में नजफगढ़ नाला ही है। उसके एक तरफ़ मेट्रो का यह कास्टिंग का पूरा का पूरा साइट थी और उसी एरिया में जो वजीराबाद का ब्रिज है उसके और जो सूर घाट जिसे बोला जाता है उसके साइड में और ये जो नेगला है उसके बगल में दो खसों में करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन थी। इस जमीन में एक तो दरगाह बना दी गई। नौ गजा पीर के नाम से एक दरगाह वहां पर है और उस दरगाह के पास में एक बड़ा कब्रिस्तान के नाम पर जमीन को घेर लिया गया है। साथ ही साथ वहां दर्जनों मकान बनाकर बस्ती भी बसा दी गई। जिसके खिलाफ हमारे एसडी बिंदले साहब। उन्होंने हाई कोर्ट में याचिका डाली और उस याचिका के बाद में यह पूरा फैसला आया है।

 अब मीडिया का या जो रिपोर्ट करने वाले हैं उनकी भी दिमाग को देखिए या उनके नैरेटिव को देखिए कि वो मेट्रो को आदेश दिया है। इस बात को तो कह रहे हैं लेकिन कोर्ट ने उस कब्रिस्तान को लेकर भी बड़ा फैसला किया है। वहां जो बस्ती बस गई है, जो लोग रह रहे हैं, उनको लेकर भी बड़ा ही सख्त आदेश कोर्ट ने दिया है। हाई कोर्ट बेंच ने कहा है कि इस इलाके में जो कब्रिस्तान बनाया गया है उसकी फेंसिंग कर दी जाए और उसको एक्सटेंड करने से पूरी तरीके से रोक दिया जाए। साथ ही वहां पर जो भी केयरटेकर भी अगर रहता है चाहे वह दरगाह का केयरटेकर है या कब्रिस्तान का केयरटेकर है उसको भी उस इलाके में रहने या रुकने की इजाजत नहींहोगी। केवल वो दिन में वहां पर रुक सकता है। अन्यथा रेजिडेंशियल तौर पर उस पूरे के पूरे क्षेत्र को इस्तेमाल नहीं करने दिया जाएगा। जिन लोगों ने वहां पर मकान बना लिए हैं, उन लोगों के लिए कोर्ट ने साफ आदेश दे दिया है कि वह लोग अपने वहां से जो मकान बनाए हैं, जो सामान है, उस सबको हटा लें और उसके बाद उस एरिया को खाली कर दें। यह जो एरिया है उसकी जो नाप है दोनों खसरों के अंदर करीब 72 बीघा से ज्यादा जमीन यह है। बहुत बड़ी जमीन है। और आप सोचिए कि ये इलाका मुखर्जी नगर से पास में पड़ता है। यह जो नजबगढ़ नाला है जो साहिबी रिवर है वो एक तरफ उसके एक तरफ मुखर्जी नगर है और उसके दूसरी तरफ यह पूरा इलाका आता है। तो कितनी महत्वपूर्ण यह जगह है और उस जगह पर 72 बीघा से ज्यादा जमीन पर कब्जा किया हुआ था लोगों ने लैंड जिहाद के नाम पर।

आप सोचिए दिल्ली में यह तो एक नमूना है। पूरी दिल्ली में यही हालात बना रखे हैं। इस मामले में जो कब्रिस्तान और नौगजा पीर की तरफ से वकील ने ये कहने की कोशिश की कि यह जो कब्रिस्तान है यह हमें अलॉट हो गया है और अब यह वफ की संपत्ति है। आप सोचिए कि वफ़ के नाम पर कैसे-कैसे खेल हमारे देश में चलते रहे हैं और किस तरीके से सरकारी जमीनों को भी व्व घोषित ये लोग कर लेते हैं। लेकिन ये लोग भूल जाते हैं कि भारत जब आजाद हुआ, भारतपाकिस्तान का जिस दिन बंटवारा हुआ था, उस दिन जो भी जमीनें बख के नाम पर थी या फिर मुगल बादशाहों, सुल्तानों के द्वारा कब्जे की हुई जमीनें थी, उन सब का कब्जा भारत सरकार को मिल गया था। और 1947 से पहले की किसी भी जमीन पर कोई भी व्यक्ति वफ का दावा करता है तो वह झूठा है। लेकिन यहां तो मामला और ज्यादा उल्टा है। एसडी बिंदश ने कोर्ट को साफ तौर पर यह प्रमाणित करके दिखा दिया कि यह जो जमीनें हैं यह वक्फ की जमीनें नहीं है। यह यमुना रिवर की जमीनें हैं। क्योंकि जब इसका सर्वे किया गया इसकी जो रिपोर्ट मांगी गई तहसीलदार सिविल लाइन से तो उसमें भी साफ तौर पर खसरा नंबर 101 और खसरा नंबर 100 के तहत जो जमीनें थी उसके अंतर्गत जो जमीनें आ रही थी वो जमीन जमुनाबंदी के तहत ही थी यानी कि रिवर बेड की जमीनें थी जो साफ तौर पर गवर्नमेंट लैंड कही जाती है और आपको याद होगा बी आर गवई ने जब बुलडोजर के खिलाफ फैसला दिया था तब गाइडलाइन भी बनाई थी कि जो जमीनें जो नदियों की जमीनें हैं जो नालों की जमीनें हैं जो तालाब की जमीनें हैं ऐसी जमीनों पर या फॉरेस्ट की जमीन हैं सड़कों की जमीनें हैं  उन पर किसी भी तरीके का कोई कब्जा करता है तो उसे 24 या 48 घंटे का नोटिस देकर हटाया जा सकता है। 

यहां बड़ी चालाकी से वफ का भी मामला डाल दिया गया। लेकिन विद्वान वकील ने यह साबित कर दिया कि यह जो नौ गजा पीर नाम की जो मजार और फिर उसको दरगाह में कन्वर्ट किया गया है ये भी बम मुश्किल 10- 20 साल पहले किया गया है और उसी तरीके से यहां पर एक कब्रिस्तान भी बना दिया गया है। तो कब्रिस्तान को लेकर जो कोर्ट ने कहा उन्होंने साफ कर दिया कि जितने एरिया में कब्रें बनी हुई हैं उसके चारों तरफ तार लगा दिए जाए। फेंसिंग कर दी जाए। उसके अलावा जो जमीन है उस जमीन को रिवर बेड के लिए खाली कर दिया जाए। यह बहुत बड़ा फैसला है इस दृष्टि से भी कि यहां पर कोई बड़ा वकील नहीं पहुंच पाया था। अगर इस केस में भी सिंघवी या सिब्बल टाइप का कोई वकील खड़ा हो जाता तो शायद कोर्ट को यह फैसला लेने में दिक्कत होती। लेकिन क्योंकि यह मामला उतना हाईलाइट नहीं हुआ इसलिए इस मामले में जो वकील थे वो इस लेवल के नहीं थे लेकिन दाद तो इन दोनों जजों की देनी पड़ेगी जिन्होंने न्यायपूर्ण तरीके से इस पूरे मामले को निपटाने में अपनी बुद्धि का प्रयोग किया क्योंकि यहां

पर वक्फ का हवाला दिया गया था और वफ का हवाला देने से इतना आसान नहीं था इस जमीन को खाली करवाना कोर्ट ने डीडी जो दिल्ली मेट्रो है उसको भी आदेश दिया है कि वह 31 मार्च तक पूरे इलाके को खाली कर दें। वहां अगर उन्होंने कंस्ट्रक्शन किया है तो उसको हटा लें। उसकी ना डिलीवरी वहां पर रहनी चाहिए ना मलवा वहां पर रहना चाहिए। ना ही कोई मशीन या किसी भी तरीके का अवशेष वहां बचना चाहिए। क्योंकि यह जो जमीन है यह यमुना के रिवर बेड की जमीन है। रिवर बेड का मतलब यह होता है कि कोई भी नदी जो होती है जितने एरिया में वो बहती है उसके अलावा आसपास का वो इलाका जब उस नदी में कभी बाढ़ आती है। उसके जो नेचुरल पहुंच का इलाका होता है उसको उस नदी का रिवर बेड कहा जाता है और उसमें किसी भी तरीके के कंस्ट्रक्शन पर पूरी तरीके से पाबंदी है। हालांकि शीला दीक्षित की सरकार के जमाने में आपको याद होगा कि अक्षरधाम मंदिर भी जो बना था वो भी यमुना रिवर बेड में ही था और उसके अलावा जो कॉमनव्थ विलेज बनाया गया था वो भी उस इलाके में था और उस समय कोर्ट की ढिलाई की वजह से वो चीजें रुक नहीं पाई थी। आज वो अक्षरधाम मंदिर के पीछे पूरे फ्लैट वहां पर बने हुए हैं। करोड़ों रुपए की कीमत है। उनमें से ज्यादातर खाली भी पड़े हैं। लेकिन वास्तव में वो जमीन यमुना की है। और इस लिहाज से भी यह फैसला बहुत ज्यादा महत्वपूर्ण है।

इन दोनों जजों की तारीफ की जानी चाहिए कि जब ज्यादातर जज जो कुतर्की वकील होते हैं उनके झांसे में आकर समाज विरोधी और न्याय का मखौल उड़ाने वाले फैसले लेते हैं। उस स्थिति में इन दोनों महिला जजों ने एक बहुत ही महत्वपूर्ण फैसला दिया है और लैंड जिहाद के एक बड़े खेल को ध्वस्त कर दिया है। क्योंकि अगर वहां से जो कंस्ट्रक्शन लोगों ने जो अवैध बस्ती बना रखी है वो बस्ती हट जाएगी और जो मजार या दरगाह का जो सेवादार है उसको भी रहने की इजाजत नहीं दी जाएगी तो केवल वहां पर कब्रिस्तान रह जाएगा और कब्रिस्तान से कोई बहुत ज्यादा पर्यावरण को भी नुकसान नहीं हो सकता और उससे वो उतनी आसानी से उस जमीन पर कब्जा नहीं कर पाएंगे। दूसरे शब्दों में कहें तो यह जो 72 बीघा जमीन है यह कब्जे से लगभग मुक्त हो जाएगी। तो इसके लिए उन वकील साहब को भी हम बधाई देते हैं जिनकी मेहनत रंग लाई है और इन दोनों जजों को भी धन्यवाद देते हैं कि यह भी अब उन निष्ठावान जजों की श्रेणी में इन्होंने अपना नाम शामिल करा लिया है।


ध्यान रखिए कि यह जमीन करोड़ों की है क्योंकि सिग्नेचर ब्रिज जो बना हुआ है यह उसके बगल में है और अगर यह कोर्ट यह फैसला नहीं लेता तो कुछ दिनों बाद जैसे वहां पर बस्तियां बसी हैं। फिर वहां दूसरे अन्य इमारतें भी खड़ी हो सकती थी। जैसा कि तैमूर नगर वगैरह के इलाकों में हुआ है। वहां भी बड़े स्तर पर रिवर बेड की जमीन को कब्जा कर कर लिया गया है। वहां पर बस्तियां बसा दी गई हैं और उसको लेकर भी बहुत विवाद चल रहा है। जय हिंद।

Wednesday, December 24, 2025

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी
एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

 


उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

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उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

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उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

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उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।


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December 24, 2025 at 09:51AM

एक कमरे में फैसला, पूरी पार्टी पर असर: BJP में अब केवल मोदी वानी

 


उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल ते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।

पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।


2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।

यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब

अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था  आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं  आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे

अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।

Tuesday, December 23, 2025

Internal Crisis in BJP: Centralization of Power and Declining RSS Influence

  

 Internal Crisis in BJP: Centralization of Power and Declining      RSS Influence


- The biggest crisis within BJP today is internal turmoil, not opposition pressure.

- Over the last decade, Narendra Modi and Amit Shah have centralized party control almost entirely under themselves.

- This centralization has led to a decline in the traditional influence of the RSS (Rashtriya Swayamsevak Sangh) within BJP.

- Leaders emerging from the RSS are increasingly marginalized; decision-making power has shifted towards the Prime Minister's Office and Amit Shah’s political circle.

- Resultantly, organizational discord and dissatisfaction among senior BJP leaders are rising, who feel loyalty now outweighs ideological commitment.

- RSS traditionally viewed BJP as its political extension, but this relationship has reversed; RSS input in party decisions has become largely symbolic.

- In several states, RSS’s role in ticket distribution and organizational changes has become minimal.

- This evolving situation is a major concern for RSS chief Mohan Bhagwat and the organization's leadership.

- Modi-Shah duo, however, regard this as their independent political right, causing deep mistrust between the old guard and the new power structure.

- Such mistrust poses a  serious threat to party unity ahead of upcoming elections.

  

**Nitin Nabin’s Appointment as BJP National President: Indicator of Power Dynamics**


- The appointment of Nitin Nabin as BJP National President is seen as a clear sign of this internal conflict.

- Senior leaders consider this decision surprising and primarily influenced by Amit Shah’s power and Narendra Modi’s wishes, rather than solely merit.

- Many veteran leaders feel neglected and sidelined, sensing that their long-standing contributions and seniority are undervalued.

- The message conveyed is that only those aligned with Modi-Shah’s political path will advance.

- RSS-affiliated workers and propagandists view this appointment as a departure from BJP’s ideological roots, accusing the party of prioritizing electoral strategy  Pro Muslim,Super Secularism  over Nationalism and Hindutva.

- They argue that organizational experience and a history of struggle no longer carry weight in BJP’s leadership selection.

- This has led to disappointment and diminished enthusiasm among grassroots RSS cadres, risking further distancing between RSS and BJP.


**Amit Shah’s Political Strategy and Its Impact on Senior Leaders**


- A major source of senior leaders’ dissatisfaction is Amit Shah’s desire to be perceived as the sole strategist of the BJP organization.

- Shah aims to demonstrate complete control over BJP’s direction, sidelining senior figures such as Rajnath Singh and Nitin Gadkari.

- The shift in power balance within the party has caused discomfort and dissatisfaction among many veterans.

- For them, the issue is not just about holding positions but about respect and recognition.

- The selection of Nitin Nabin signals the future political succession path  within BJP, clearly favoring leaders who demonstrate loyalty and obedience over independent ideological voices.

- This approach has created a  divide between younger leaders, who remain silent due to proximity to power, and senior leaders, whose experience is increasingly seen as a liability.

 

**Clash Between RSS and BJP: Ideological and Power Struggles**


- The tension between RSS and BJP is not only ideological but also a matter of ego and control.

- RSS demands that its guidance be respected and followed, whereas Modi-Shah seek to establish BJP as Self-Reliant, free from any 'Guru' or external influence.

- This stance is unacceptable to RSS, which believes the organization’s roots, cadre base, and identity are indispensable to BJP as BJP was created by RSS and not the other way round.

- The conflict is expected to erupt openly eventually since both entities view themselves as complete without the other, creating an irreconcilable problem.

- This internal dissatisfaction, senior leaders’ resentment, and growing distance from RSS collectively challenge BJP’s future.

- Presently, this discontent is subdued, with no one openly voicing concerns.

- However, political history suggests that when such dissatisfaction bursts out, it can cause massive upheaval within the party and reverberate across corridors of power.

 

**Potential Consequences of Continued Modi-Shah Dominance**


- If Modi-Shah’s dominance continues unchecked, BJP could transform from an ideology-based party into a personality-driven party akin to Congress.

- This potential shift is the greatest threat to RSS, which prioritizes ideology over personality cults.

- RSS is aware of its diminishing influence over BJP but refuses to accept this reality.

- This stubbornness may intensify future conflicts, making them more severe and damaging.

- The critical question is no longer if a confrontation will happen, but when it will happen.

- The appointment of Nitin Gadkari, senior leaders' grievances, and RSS's discontent are clear signals of a looming major upheaval within BJP.

- If this turmoil is not managed timely, it could alter the entire political landscape and the power dynamics within the party.

 

Concuding Insights


- BJP’s current biggest challenge is not external opposition but internal conflict stemming from power centralization and ideological divergence.

- The diminishing role of RSS and the sidelining of senior leaders highlight a shift in BJP’s core functioning and identity.

- The appointment of Nitin Nabin epitomizes this shift and the consolidation of Modi-Shah’s control.

- The growing resentment among veterans and RSS cadres is a ticking time bomb, which if ignored, can cause significant political instability.

- The modi-shah leadership style , emphasizing loyalty and control over ideology and experience, risks changing BJP’s historical character.

- The struggle between RSS and BJP leadership over guidance, control, and identity—remains unresolved and critical.

- Political observers should watch for signs of this internal upheaval as it may redefine India’s political map in the near future.



Monday, December 22, 2025

भाजपा के भीतर आज सबसे बड़ा संकट विपक्ष का नहीं है बल्कि घर के अंदर का तूफान है

 


भाजपा के भीतर आज जो सबसे बड़ा संकट खड़ा है, वह विपक्ष का नहीं है बल्कि घर के अंदर का तूफान है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पिछले 10 वर्षों में पार्टी की कमान अपने हाथों में पूरी तरह केंद्रीकृत कर दी है। नतीजा यह है कि भाजपा में आरएसएस की पारंपरिक पकड़ लगातार कमजोर होती दिख रही है। संघ की शाखा से निकले नेता आज हाशिए पर हैं और निर्णय लेने की शक्ति अब प्रधानमंत्री कार्यालय और शाह के राजनीतिक सर्कल तक सिमट कर रह गई है। यही वजह है कि संगठन में मनमुटाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेता मौन लेकिन नाराज हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा में अब निष्ठा से ज्यादा वफादारी मायने रखती है और विचारधारा से ज्यादा सत्ता और यही तनाव धीरे-धीरे विस्फोट की शक्ल लेता जा रहा है। आरएसएस यह मानता था कि भाजपा उसका राजनीतिक विस्तारित हाथ है। लेकिन हाल के वर्षों में नजारा बिल्कुल उल्टा दिख रहा है। भाजपा के फैसलों में संघ की राय लेना अब औपचारिकता भर रह गया है। कई राज्यों में टिकट बंटवारे से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक आज संघ का हस्तक्षेप बेहद सीमित हो चुका है।

 यह स्थिति मोहन भागवत और शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। लेकिन दूसरी तरफ मोदी शाह की जोड़ी इसे अपना स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मानती है। इस खिंचाव ने पुरानी पीढ़ी और नई शक्ति संरचना के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा किया है और यह अविश्वास आने वाले चुनावों में पार्टी की एकता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना इस संघर्ष का सबसे बड़ा संकेत है। पार्टी में दिग्गज और वरिष्ठ नेता इस फैसले को चौंकाने वाला मानते हैं। उन्हें लगता है कि यह निर्णय केवल योग्यता पर नहीं बल्कि अमित शाह की शक्ति और नरेंद्र मोदी की इच्छा का परिणाम है। कई पुराने नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यह संदेश साफ है जो शाह और मोदी के राजनीतिक मार्ग पर चलेगा वही आगे बढ़ेगा। जिन्होंने सालों तक पार्टी खड़ी की उनके योगदान और उम्र को अब कोई विशेष महत्व नहीं दिया जा रहा और यह भावनात्मक असंतोष एक दिन खुलकर सामने आ सकता है।

आरएसएस से जुड़े कई कार्यकर्ता और प्रचारक इस फैसले को भाजपा की वैचारिक जड़ों से दूरी के रूप में देखते हैं। उनका आरोप है कि भाजपा का ध्यान अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर कम और सत्ता रणनीति और चुनाव जीतने पर ज्यादा है। वे यह भी कह रहे हैं कि नितिन नवीन का चयन एक संकेत है कि भाजपा में अब संगठनात्मक अनुभव और संघर्ष यात्रा की कोई कीमत नहीं। इस बात से संघ कैडर में निराशा है और यह निराशा जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और उत्साह घटा रही है। अगर यह स्थिति जारी रही तो संघ और भाजपा के बीच की दूरी और बढ़ेगी। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि अमित शाह खुद को संगठन का एकमात्र रणनीतिकार साबित करना चाहते हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि भाजपा की दिशा और कमान उनके हाथ में है और वे किसी भी वरिष्ठ को पीछे छोड़ सकते हैं। चाहे वह राजनाथ सिंह हो या नितिन गडकरी शाह की राजनीतिक शैली उनके प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करती दिख रही है। पार्टी में सत्ता का संतुलन जिस तरह बदला है, उससे कई पुराने नेता असहज और असंतुष्ट हैं। उनके लिए यह केवल पद का नहीं सम्मान का सवाल है। नितिन नवीन की नियुक्ति यह भी संकेत देती है कि भविष्य में सत्ता का उत्तराधिकार किस दिशा में जाएगा। यह स्पष्ट है कि शाह अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार कर रहे हैं। ऐसे नेता जो निष्ठा और आदेश का पालन करें, विचारधारा या स्वतंत्र आवाज ना उठाएं। इस रणनीति ने युवा और वरिष्ठ नेताओं के बीच दरार पैदा कर दी है। युवा नेता चुप हैं क्योंकि सत्ता उनके सामने है लेकिन वरिष्ठ नेता बोल नहीं रहे क्योंकि उनका अनुभव अब बोझ माना जा रहा है।


 आरएसएस और भाजपा के बीच यह टकराव केवल वैचारिक नहीं बल्कि अहंकार और नियंत्रण का भी है। संघ चाहता है कि उसका मार्गदर्शन स्वीकार किया जाए। जबकि मोदी शाह यह साबित करना चाहते हैं कि भाजपा अब आत्मनिर्भर है और उसे किसी गुरु की आवश्यकता नहीं। यह मानसिकता संघ को अस्वीकार्य है। वे मानते हैं कि भाजपा की जड़ों, कैडर और पहचान के लिए आरएसएस अनिवार्य है। यह संघर्ष एक दिन फूट कर सामने आएगा क्योंकि दोनों एक दूसरे के बिना खुद को पूर्ण समझते हैं और यही समस्या है। संगठन के भीतर असंतोष, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की बढ़ती दूरी यह सब मिलकर भाजपा के भविष्य को चुनौती दे रहा है। अभी तक यह नाराजगी दबे सुर में है। कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता। लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऐसा असंतोष जब फटता है तो विस्फोट बहुत बड़ा होता है और यह विस्फोट केवल पार्टी के भीतर नहीं सत्ता के गलियारे तक गूंज सकता है। अगर मोदी शाह का दबदबा इसी तरह बढ़ता रहा तो भाजपा का चरित्र बदल सकता है। एक विचारधारा आधारित पार्टी से व्यक्ति आधारित पार्टी और यही आरएसएस के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि संघ के लिए विचारधारा ही सबसे महत्वपूर्ण है ना कि व्यक्ति पूजा।


 संघ यह समझ चुका है कि भाजपा पर उसका प्रभाव घट रहा है। लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं करेगा और यह ज़िद ही आने वाले समय में संघर्ष को और भयानक बना सकती है। तो सवाल यह नहीं है कि संघर्ष होगा या नहीं। सवाल यह है कि कब होगा? नितिन नवीन की नियुक्ति, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की पीड़ा। यह सब संकेत हैं कि भाजपा के अंदर एक बड़ा भूचाल धीरे-धीरे तैयार हो रहा है और अगर इस भूचाल को समय रहते संभाला नहीं गया तो सत्ता का खेल बदल सकता है। भाजपा को एकता चाहिए लेकिन शक्ति पुजर नेतृत्व और रिश्ता हुआ संघ यह दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बन चुके हैं और जब दो शक्तियां टकराती हैं तो राजनीतिक नक्शा बदलता है। भाजपा के भीतर आज जो सबसे बड़ा संकट खड़ा है, वह विपक्ष का नहीं है बल्कि घर के अंदर का तूफान है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पिछले 10 वर्षों में पार्टी की कमान अपने हाथों में पूरी तरह केंद्रीकृत कर दी है। नतीजा यह है कि भाजपा में आरएसएस की पारंपरिक पकड़ लगातार कमजोर होती दिख रही है। संघ की शाखा से निकले नेता आज हाशिए पर हैं और निर्णय लेने की शक्ति अब प्रधानमंत्री कार्यालय और शाह के राजनीतिक सर्कल तक सिमट कर रह गई है। यही वजह है कि संगठन में मनमुटाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेता मौन लेकिन नाराज हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा में अब निष्ठा से ज्यादा वफादारी मायने रखती है और विचारधारा से ज्यादा सत्ता और यही तनाव धीरे-धीरे विस्फोट की शक्ल लेता जा रहा है। आरएसएस यह मानता था कि भाजपा उसका राजनीतिक विस्तारित हाथ है। लेकिन हाल के वर्षों में नजारा बिल्कुल उल्टा दिख रहा है। भाजपा के फैसलों में संघ की राय लेना अब औपचारिकता भर रह गया है। कई राज्यों में टिकट बंटवारे से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक आज संघ का हस्तक्षेप बेहद सीमित हो चुका है।

 यह स्थिति मोहन भागवत और शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। लेकिन दूसरी तरफ मोदी शाह की जोड़ी इसे अपना स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मानती है। इस खिंचाव ने पुरानी पीढ़ी और नई शक्ति संरचना के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा किया है और यह अविश्वास आने वाले चुनावों में पार्टी की एकता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना इस संघर्ष का सबसे बड़ा संकेत है। पार्टी में दिग्गज और वरिष्ठ नेता इस फैसले को चौंकाने वाला मानते हैं। उन्हें लगता है कि यह निर्णय केवल योग्यता पर नहीं बल्कि अमित शाह की शक्ति और नरेंद्र मोदी की इच्छा का परिणाम है। कई पुराने नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यह संदेश साफ है जो शाह और मोदी के राजनीतिक मार्ग पर चलेगा वही आगे बढ़ेगा। जिन्होंने सालों तक पार्टी खड़ी की उनके योगदान और उम्र को अब कोई विशेष महत्व नहीं दिया जा रहा और यह भावनात्मक असंतोष एक दिन खुलकर सामने आ सकता है। आरएसएस से जुड़े कई कार्यकर्ता और प्रचारक इस फैसले को भाजपा की वैचारिक जड़ों से दूरी के रूप में देखते हैं। उनका आरोप है कि भाजपा का ध्यान अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर कम और सत्ता रणनीति और चुनाव जीतने पर ज्यादा है। वे यह भी कह रहे हैं कि नितिन नवीन का चयन एक संकेत है कि भाजपा में अब संगठनात्मक अनुभव और संघर्ष यात्रा की कोई कीमत नहीं। इस बात से संघ कैडर में निराशा है और यह निराशा जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और उत्साह घटा रही है। अगर यह स्थिति जारी रही तो संघ और भाजपा के बीच की दूरी और बढ़ेगी। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि अमित शाह खुद को संगठन का एकमात्र रणनीतिकार साबित करना चाहते हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि भाजपा की दिशा और कमान उनके हाथ में है और वे किसी भी वरिष्ठ को पीछे छोड़ सकते हैं। चाहे वह राजनाथ सिंह हो या नितिन गडकरी शाह की राजनीतिक शैली उनके प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करती दिख रही है। पार्टी में सत्ता का संतुलन जिस तरह बदला है, उससे कई पुराने नेता असहज और असंतुष्ट हैं। उनके लिए यह केवल पद का नहीं सम्मान का सवाल है। नितिन नवीन की नियुक्ति यह भी संकेत देती है कि भविष्य में सत्ता का उत्तराधिकार किस दिशा में जाएगा। यह स्पष्ट है कि शाह अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार कर रहे हैं। ऐसे नेता जो निष्ठा और आदेश का पालन करें, विचारधारा या स्वतंत्र आवाज ना उठाएं। इस रणनीति ने युवा और वरिष्ठ नेताओं के बीच दरार पैदा कर दी है। युवा नेता चुप हैं क्योंकि सत्ता उनके सामने है लेकिन वरिष्ठ नेता बोल नहीं रहे क्योंकि उनका अनुभव अब बोझ माना जा रहा है। आरएसएस और भाजपा के बीच यह टकराव केवल वैचारिक नहीं बल्कि अहंकार और नियंत्रण का भी है। संघ चाहता है कि उसका मार्गदर्शन स्वीकार किया जाए। जबकि मोदी शाह यह साबित करना चाहते हैं कि भाजपा अब आत्मनिर्भर है और उसे किसी गुरु की आवश्यकता नहीं। यह मानसिकता संघ को अस्वीकार्य है। वे मानते हैं कि भाजपा की जड़ों, कैडर और पहचान के लिए आरएसएस अनिवार्य है। यह संघर्ष एक दिन फूट कर सामने आएगा क्योंकि दोनों एक दूसरे के बिना खुद को पूर्ण समझते हैं और यही समस्या है। संगठन के भीतर असंतोष, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की बढ़ती दूरी यह सब मिलकर भाजपा के भविष्य को चुनौती दे रहा है। अभी तक यह नाराजगी दबे सुर में है। कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता। लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऐसा असंतोष जब फटता है तो विस्फोट बहुत बड़ा होता है और यह विस्फोट केवल पार्टी के भीतर नहीं सत्ता के गलियारे तक गूंज सकता है। अगर मोदी शाह का दबदबा इसी तरह बढ़ता रहा तो भाजपा का चरित्र बदल सकता है। एक विचारधारा आधारित पार्टी से व्यक्ति आधारित पार्टी और यही आरएसएस के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि संघ के लिए विचारधारा ही सबसे महत्वपूर्ण है ना कि व्यक्ति पूजा। संघ यह समझ चुका है कि भाजपा पर उसका प्रभाव घट रहा है। लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं करेगा और यह ज़िद ही आने वाले समय में संघर्ष को और भयानक बना सकती है। तो सवाल यह नहीं है कि संघर्ष होगा या नहीं। सवाल यह है कि कब होगा? नितिन नवीन की नियुक्ति, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की पीड़ा।

 यह सब संकेत हैं कि भाजपा के अंदर एक बड़ा भूचाल धीरे-धीरे तैयार हो रहा है। और अगर इस भूचाल को समय रहते संभाला नहीं गया तो सत्ता का खेल बदल सकता है। भाजपा को एकता चाहिए। लेकिन शक्ति पुर्ज नेतृत्व और रिश्ता हुआ संघ यह दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बन चुके हैं। और जब दो शक्तियां टकराती हैं तो राजनीतिक नक्शा बदलता है।

मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं

मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं
मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं
मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं
मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं

 


आज की सबसे बड़ी और उभरती खबर यही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के सर संचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत वैसे भी हिंदू राष्ट्र है जैसे सूर्य पूर्व से उगता है और इसके लिए किसी लिखित अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। भागवत के इस बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर चर्चा की नई लहर जगा दी है। कारण यह बयान वह बात है जो अब भाजपा के बीच की रणनीति और आरएसएस बीजेपी के रिश्तों पर नए सवाल खड़ा कर रहा है।

दरअसल भाजपा ने पिछले कुछ समय में कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनमें आरएसएस की सलाह की जरूरत नहीं बताया जा रहा है और अब आरएसएस खुद सीधे सार्वजनिक मंच से अपनी विचारधारा को आगे रख रहा है यानी संघ के मुखिया ने यह साफ किया है कि भारत का हिंदू राष्ट्र होना संविधान में जोड़ने के लिए नहीं बल्कि सांस्कृतिक वास्तविकता के रूप में है और यही वह बिंदु है जहां भाजपा तथा आरएसएस की गतिशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। क्या भाजपा ने आरएसएस को कम महत्व देना शुरू कर दिया है? क्या आरएसएस फिर से जनता के बीच अपनी पहचान को मजबूत कर रहा है? आज हम इसी पर बात करेंगे।

मोहन भागवत ने कोलकाता में आरएसएस के 100वें वर्ष के अवसर पर दिए अपने संबोधन में कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान ही उसे हिंदू राष्ट्र बनाती है और यह संवैधानिक शब्दों या किसी लेख में लिखे जाने से नहीं बनती। उनके मुताबिक जब तक भारतीय संस्कृति का सम्मान रहेगा और भारत में कोई व्यक्ति अपने लिखे लगाएगा। पूर्वजों की महिमा को अपनाएगा तब तक भारत हिंदू राष्ट्र के रूप में रहेगा। चाहे संविधान में वही शब्द जोड़ा जाए या ना जोड़ा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यह विचारधारा आरएसएस की मूल विचारधारा का हिस्सा है। भारत और हिंदू एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। भागवत ने यह बात समझाने की कोशिश की कि धर्मनिरपेक्षता शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना का हिस्सा नहीं था बल्कि 1976 के 42वें संशोधन के दौरान जोड़ा गया था। संघ प्रमुख का कहना था कि देश की संस्कृति और उसकी ऐतिहासिक पहचान ही हिंदू राष्ट्र की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है बल्कि यह देश की सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकता है जिसे वर्षों से आरएसएस मानता आया है और इसी बयान ने आज पूरे राजनीतिक माहौल में हलचल पैदा कर दी है।

बीते कुछ समय में भाजपा ने कई राजनीतिक फैसले लिए हैं। जिनमें यह संदेश दिया गया है कि पार्टी अब चाहती है कि वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले बिना किसी बाहरी दबाव के। कई विश्लेषकों का मानना रहा है कि भाजपा ने आरएसएस को पार्टी की निर्णय प्रक्रिया से किनारे करना शुरू कर दिया है। खासकर चुनावी रणनीति और राजनीति की नई पहलों में। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि अब भाजपा को आरएसएस के नियमों या विचारधाराओं की जरूरत नहीं है और पार्टी अपने निर्णय खुद लेने में सक्षम है। लेकिन इस पूरे परिप्रेक्ष में आरएसएस का यह ताजा बयान एक बड़ा संकेत है कि संघ खुद को राजनीति से बिल्कुल अलग नहीं देख रहा है। मोहन भागवत का यह कहना कि आरएसएस का मकसद सत्ता प्राप्ति नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करना है। इस पर सवाल उठते हैं कि क्या यह बयान भाजपा की पुरानी सोच से अलग है? हाल ही में आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया है कि बीजेपी के नजरिए से संघ को समझना एक बहुत बड़ी गलती है। अब यही सवाल खड़ा होता है कि क्या आरएसएस खुद को बीजेपी से अलग साबित करना चाह रहा है? जब आरएसएस प्रमुख सार्वजनिक मंच से यह कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है तो इसका एक बड़ा राजनीतिक असर होता है क्योंकि वर्तमान संविधान धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। दूसरी बात यह कि यह बयान भारतीय मुस्लिम देशता में एक मुस्लिम गहरो में जिक्र करता है। लेकिन भाजपा का पक्ष यह रहा है कि कानून और संविधान में कोई बदलाव नहीं करना है। जबकि आरएसएस कह रहा है कि संविधान में शब्द जोड़ना जरूरी नहीं क्योंकि हिंदू राष्ट्र की पहचान पहले से मौजूद है। तीसरी बात यह है कि इसी बयान के साथ आरएसएस ने खुद की स्वतंत्र पहचान भी खुलकर सामने रख दी है। यह राजनीतिक संगठन नहीं है बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रीय संगठन है जैसा मोहन भागवत ने कहा। और इसी वजह से आज यह बयान राजनीति, मीडिया और आम जनता के लिए सबसे तेज चर्चाओं में से एक है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के करीब आते-आते ऐसे बयान और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्योंकि विचारधारा पर बहस जोर पकड़ती है। क्या भाजपा आरएसएस के इस स्वर को गंभीर लेगी? क्या यह बयान चुनावी रणनीति को भी प्रभावित करेगा? संविधान बनाम संस्कृति मोहन भागवत ने यह स्पष्ट किया कि संवैधानिक मंजूरी या संविधान में शब्द जोड़ना जरूरी नहीं है क्योंकि भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र रहा है। यह उसकी संस्कृति और इतिहास की वजह से है। उन्होंने पूछा कि जैसे सूर्य के पूर्व से उगने के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं, वैसे ही हिंदू राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान के लिए भी किसी लिखित शब्द की आवश्यकता नहीं है। भागवत के अनुसार भारतीय संस्कृति की मूल पहचान हिंदुत्व से जुड़ी है और यह दूसरे धर्मों के लोगों को भी शामिल करती है अगर वे भारतीय संस्कृति का सम्मान करते हैं। इस विचार में यह भी कहा गया कि यदि किसी भी धर्म के लोग भारत की संस्कृति को अपनाते हैं तो वे भी उस राष्ट्र की भावना में शामिल माने जाएंगे। यानी आरएसएस की व्याख्या में हिंदू शब्द केवल धार्मिक अर्थ नहीं रखता बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है। चुनौती यह है कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द आज भी मौजूद है और उसकी संवैधानिक वैधता बनी हुई है। इसलिए आज यह बहस केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि संविधान संबंधी भी हो चुकी है। क्या यह बयान संविधान की मूल भावना के विपरीत है या फिर यह संविधान के अंदर एक सांस्कृतिक व्याख्या का हिस्सा है?

बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से अपने निर्णय खुद लेने शुरू किए, वह साफ संकेत था कि पार्टी अब संगठनात्मक सलाह पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय और रणनीतिक टीम पर भरोसा कर रही है। चाहे वह पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति हो, मुख्यंत्रियों की कुर्सी पर बदलाव हो या चुनावी गठबंधन, आरएसएस की भूमिका सीमित दिखाई गई। आरएसएस की कोर कमेटी और भाजपा की रणनीतिक कमेटी के बीच पहले जितनी तालमेल थी वैसी स्थिति अब दिखाई नहीं देती। कई बार यह भी महसूस हुआ कि भाजपा ने सोचा हम अब इतने मजबूत हैं कि हमें आरएसएस के मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं। लेकिन अब आरएसएस का यह बयान भारत हिंदू राष्ट्र है। कोई साधारण जनसभा का भाषण नहीं बल्कि एक रणनीतिक और वैचारिक वापसी जैसा है। आरएसएस यह दिखा रहा है कि निर्णय भले भाजपा का हो लेकिन विचारधारा और पहचान अभी भी संघ के पास है और यही बयान भाजपा को वैचारिक रूप से वापस आरएसएस की ओर खींच सकता है क्योंकि विचारधारा और विजय दोनों के बिना चुनाव नहीं जीते जाते। आरएसएस यानी वह विचार शक्ति और बीजेपी यानी चुनावी मशीन। जब दोनों साथ हो तभी मिशन आगे बढ़ता है।


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