उस दिन दिल्ली में बीजेपी मुख्यालय की हवा कुछ अलग थी। कोई बड़ी मीटिंग का शोर नहीं, कोई नेताओं की भीड़ नहीं, कोई कैमरों की चमक नहीं। लेकिन एक ऐसा फैसला छुपा था जो पार्टी के भविष्य की तस्वीर बदलने वाला था। बीजेपी के राष्ट्रीय अध्यक्ष का नाम तय होना था। मगर तय पहले ही हो चुका था। फर्क बस इतना था कि इस बार प्रक्रिया दिखानी भी जरूरी नहीं समझी गई। यह वही पार्टी थी जो कभी घंटों चर्चा, बहस और संगठनात्मक बैठकों के लिए जानी जाती थी। ना नरेंद्र मोदी ने सवाल पूछा ना किसी से राय ली। कमरे में नरेंद्र मोदी बैठे थे। सामने कोई कागज नहीं, कोई फाइल नहीं, कोई एजेंडा नहीं। बस एक नजर चारों तरफ गई और फिर सीधा बीएएल संतोष की तरफ। कोई भूमिका नहीं, कोई भूमिका बांधने की कोशिश नहीं। सीधे शब्दों में निर्देश आप घोषणा कर दीजिए।बीएएल संतोष क्या सवाल करते?ना राय? यही वह पल था जब फैसला और घोषणा के बीच की दूरी खत्म हो गई। अमित शाह उसी कमरे में थे और वहीं समझ गए इस पूरी कहानी का सबसे दिलचस्प और सबसे चुभने वाला हिस्सा यही है कि अमित शाह उसी कमरे में मौजूद थे। कोई अलग बैठक नहीं, कोई बात की जानकारी नहीं। उन्होंने भी वही सुना जो बाकी लोगों ने सुना। वही पल था जब यह साफ हो गया कि अब फैसले की जानकारी भी पद से नहीं मौजूदगी से तय होगी। जो कमरे में है वही जानेगा। जो कमरे में नहीं वह बाद में तालियां ही बजाएगा।
पुरानी परंपरा कहां टूट गई? किसी को पता भी नहीं चला। बीजेपी में वर्षों से एक तरीका था। नरेंद्र मोदी सोचते थे। अमित शाह से चर्चा होती थी। संगठन के साथ बात होती थी। संघ से संकेत आते थे। फिर नाम तय होता था और आखिर में घोषणा। यह प्रक्रिया ही बीजेपी की ताकत मानी जाती थी। लेकिन उस दिन इस पूरी सीढ़ी को लिफ्ट ने बदल दिया। सीधा ऊपर से नीचे बिना रुके, बिना अटके। बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं रहे। उस दिन बीएल संतोष सिर्फ संगठन महामंत्री नहीं थे। वे वो मोदी के चापलुस दरबारी थे उनसे यह नहीं कहा गया कि तैयारी करिए। उनसे कहा गया घोषणा करिए। फर्क समझिए। तैयारी में सवाल होते हैं। घोषणा में सिर्फ आदेश होता है और आदेश में चर्चा की कोई जगह नहीं होती। यही वजह है कि उस कमरे में कोई सवाल नहीं उठा।
2024 के बाद बीजेपी बदल चुकी है। 2024 के बाद बीजेपी में एक खामोश बदलाव आया है। पहले फैसलों से पहले चर्चा होती थी। अब फैसलों के बाद तर्क दिए जाते हैं। पहले नेताओं से राय पूछी जाती थी। अब उनसे समर्थन जताने की उम्मीद की जाती है। यह बदलाव धीरे-धीरे आया इसलिए किसी ने विरोध नहीं किया। लेकिन उस कमरे में यह बदलाव पूरी तरह उजागर हो गया। चर्चा क्यों गायब हुई? क्योंकि अनिश्चितता खत्म हो गई। राजनीति में चर्चा तब होती है जब विकल्प होते हैं। लेकिन जब विकल्प खत्म हो जाए तब सिर्फ आदेश बचता है। बीजेपी में आज वही स्थिति है जो तय है वही सही है। सवाल पूछना मोदी के लिएअसहजता पैदा करता है और असहजता आज की राजनीति में सबसे बड़ा अपराध है। इसलिए नेता चुप रहते हैं, मुस्कुराते हैं और ट्वीट कर देते हैं।
यह सिर्फ एक नाम नहीं था। यह सत्ता का नक्शा था। बीजेपी अध्यक्ष का नाम उस दिन एक बहाना था। असली फैसला यह था कि सत्ता का केंद्र कहां है और कौन तय करता है। यह साफ कर दिया गया कि निर्णय का अधिकार सांझा नहीं है। यहां नंबर दो सिर्फ गिनती में होता है फैसलों में नहीं। और यह बात सिर्फ अमित शाह के लिए नहीं पूरी पार्टी के लिए थी। बाहर तारीफ, अंदर गणना बाहर प्रवक्ता बोले, मजबूत नेतृत्व की पहचान। टीवी स्टूडियो में इसे मास्टर स्ट्रोक बताया गया। लेकिन अंदर नेताओं ने अपने-अपने राजनीतिक भविष्य की गणना शुरू कर दी। क्योंकि जब चर्चा खत्म होती है तब
अनिश्चितता बढ़ती है और अनिश्चितता हर नेता को डराती है। चाहे वह कितना भी ताकतवर क्यों ना दिखे।अब नरेंद्र मोदी वही सब कुछ दिल्ली में कर रहे हैं जो गुजरात में किया था आरएसएस वालों का सफाया किया था हिरेन पंड्या दुनिया से उठ गए प्रवीण तोगड़िया के हाथ पर तुड़वा दिए वाघेला भगाए गए भगवान की कृपा से संजय जोशी जीवित हैं आरएसएस के लिए ये खतरे की आहट क्या अब आरएसएस वाले भी जेल जाएंगे
अब युग घोषणा का है। यह कहानी सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष की नहीं है। यह कहानी है उस दौर की जहां राजनीति में संवाद नहीं निर्देश होते हैं। जहां फैसले बनते नहीं गिरते हैं।नरेंद्र मोदी ने उस कमरे में यह साफ कर दिया कि अब प्रक्रिया मायने नहीं रखती।सिर्फ परिणाम रखता है।
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