मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं
मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं
मोहन भागवत ने खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं
आज की सबसे बड़ी और उभरती खबर यही है कि राष्ट्रीय स्वयंसेवक संघ आरएसएस के सर संचालक मोहन भागवत ने एक बार फिर खुलकर कहा है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है और इसके लिए किसी संवैधानिक मंजूरी या संविधान संशोधन की जरूरत नहीं है। उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा कि भारत वैसे भी हिंदू राष्ट्र है जैसे सूर्य पूर्व से उगता है और इसके लिए किसी लिखित अनुमति की आवश्यकता नहीं होती। भागवत के इस बयान ने भारतीय राजनीति में एक बार फिर चर्चा की नई लहर जगा दी है। कारण यह बयान वह बात है जो अब भाजपा के बीच की रणनीति और आरएसएस बीजेपी के रिश्तों पर नए सवाल खड़ा कर रहा है।
दरअसल भाजपा ने पिछले कुछ समय में कई ऐसे फैसले लिए हैं जिनमें आरएसएस की सलाह की जरूरत नहीं बताया जा रहा है और अब आरएसएस खुद सीधे सार्वजनिक मंच से अपनी विचारधारा को आगे रख रहा है यानी संघ के मुखिया ने यह साफ किया है कि भारत का हिंदू राष्ट्र होना संविधान में जोड़ने के लिए नहीं बल्कि सांस्कृतिक वास्तविकता के रूप में है और यही वह बिंदु है जहां भाजपा तथा आरएसएस की गतिशीलता पर सवाल उठ रहे हैं। क्या भाजपा ने आरएसएस को कम महत्व देना शुरू कर दिया है? क्या आरएसएस फिर से जनता के बीच अपनी पहचान को मजबूत कर रहा है? आज हम इसी पर बात करेंगे।
मोहन भागवत ने कोलकाता में आरएसएस के 100वें वर्ष के अवसर पर दिए अपने संबोधन में कहा कि भारत की सांस्कृतिक पहचान ही उसे हिंदू राष्ट्र बनाती है और यह संवैधानिक शब्दों या किसी लेख में लिखे जाने से नहीं बनती। उनके मुताबिक जब तक भारतीय संस्कृति का सम्मान रहेगा और भारत में कोई व्यक्ति अपने लिखे लगाएगा। पूर्वजों की महिमा को अपनाएगा तब तक भारत हिंदू राष्ट्र के रूप में रहेगा। चाहे संविधान में वही शब्द जोड़ा जाए या ना जोड़ा जाए। उन्होंने यह भी कहा कि यह विचारधारा आरएसएस की मूल विचारधारा का हिस्सा है। भारत और हिंदू एक दूसरे के पर्यायवाची हैं। भागवत ने यह बात समझाने की कोशिश की कि धर्मनिरपेक्षता शब्द संविधान की मूल प्रस्तावना का हिस्सा नहीं था बल्कि 1976 के 42वें संशोधन के दौरान जोड़ा गया था। संघ प्रमुख का कहना था कि देश की संस्कृति और उसकी ऐतिहासिक पहचान ही हिंदू राष्ट्र की असली पहचान है। उन्होंने कहा कि यह कोई नई बात नहीं है बल्कि यह देश की सामाजिक और सांस्कृतिक वास्तविकता है जिसे वर्षों से आरएसएस मानता आया है और इसी बयान ने आज पूरे राजनीतिक माहौल में हलचल पैदा कर दी है।
बीते कुछ समय में भाजपा ने कई राजनीतिक फैसले लिए हैं। जिनमें यह संदेश दिया गया है कि पार्टी अब चाहती है कि वह स्वतंत्र रूप से निर्णय ले बिना किसी बाहरी दबाव के। कई विश्लेषकों का मानना रहा है कि भाजपा ने आरएसएस को पार्टी की निर्णय प्रक्रिया से किनारे करना शुरू कर दिया है। खासकर चुनावी रणनीति और राजनीति की नई पहलों में। कुछ नेताओं ने यह भी कहा कि अब भाजपा को आरएसएस के नियमों या विचारधाराओं की जरूरत नहीं है और पार्टी अपने निर्णय खुद लेने में सक्षम है। लेकिन इस पूरे परिप्रेक्ष में आरएसएस का यह ताजा बयान एक बड़ा संकेत है कि संघ खुद को राजनीति से बिल्कुल अलग नहीं देख रहा है। मोहन भागवत का यह कहना कि आरएसएस का मकसद सत्ता प्राप्ति नहीं बल्कि भारत की सांस्कृतिक पहचान को स्थापित करना है। इस पर सवाल उठते हैं कि क्या यह बयान भाजपा की पुरानी सोच से अलग है? हाल ही में आरएसएस प्रमुख ने स्पष्ट किया है कि बीजेपी के नजरिए से संघ को समझना एक बहुत बड़ी गलती है। अब यही सवाल खड़ा होता है कि क्या आरएसएस खुद को बीजेपी से अलग साबित करना चाह रहा है? जब आरएसएस प्रमुख सार्वजनिक मंच से यह कहता है कि भारत एक हिंदू राष्ट्र है तो इसका एक बड़ा राजनीतिक असर होता है क्योंकि वर्तमान संविधान धर्मनिरपेक्षता पर आधारित है। दूसरी बात यह कि यह बयान भारतीय मुस्लिम देशता में एक मुस्लिम गहरो में जिक्र करता है। लेकिन भाजपा का पक्ष यह रहा है कि कानून और संविधान में कोई बदलाव नहीं करना है। जबकि आरएसएस कह रहा है कि संविधान में शब्द जोड़ना जरूरी नहीं क्योंकि हिंदू राष्ट्र की पहचान पहले से मौजूद है। तीसरी बात यह है कि इसी बयान के साथ आरएसएस ने खुद की स्वतंत्र पहचान भी खुलकर सामने रख दी है। यह राजनीतिक संगठन नहीं है बल्कि सांस्कृतिक राष्ट्रीय संगठन है जैसा मोहन भागवत ने कहा। और इसी वजह से आज यह बयान राजनीति, मीडिया और आम जनता के लिए सबसे तेज चर्चाओं में से एक है। लोकसभा और विधानसभा चुनावों के करीब आते-आते ऐसे बयान और भी महत्वपूर्ण हो जाते हैं। क्योंकि विचारधारा पर बहस जोर पकड़ती है। क्या भाजपा आरएसएस के इस स्वर को गंभीर लेगी? क्या यह बयान चुनावी रणनीति को भी प्रभावित करेगा? संविधान बनाम संस्कृति मोहन भागवत ने यह स्पष्ट किया कि संवैधानिक मंजूरी या संविधान में शब्द जोड़ना जरूरी नहीं है क्योंकि भारत पहले से ही हिंदू राष्ट्र रहा है। यह उसकी संस्कृति और इतिहास की वजह से है। उन्होंने पूछा कि जैसे सूर्य के पूर्व से उगने के लिए किसी कानून की आवश्यकता नहीं, वैसे ही हिंदू राष्ट्र के रूप में भारत की पहचान के लिए भी किसी लिखित शब्द की आवश्यकता नहीं है। भागवत के अनुसार भारतीय संस्कृति की मूल पहचान हिंदुत्व से जुड़ी है और यह दूसरे धर्मों के लोगों को भी शामिल करती है अगर वे भारतीय संस्कृति का सम्मान करते हैं। इस विचार में यह भी कहा गया कि यदि किसी भी धर्म के लोग भारत की संस्कृति को अपनाते हैं तो वे भी उस राष्ट्र की भावना में शामिल माने जाएंगे। यानी आरएसएस की व्याख्या में हिंदू शब्द केवल धार्मिक अर्थ नहीं रखता बल्कि एक सभ्यतागत पहचान है। चुनौती यह है कि संविधान में धर्मनिरपेक्षता शब्द आज भी मौजूद है और उसकी संवैधानिक वैधता बनी हुई है। इसलिए आज यह बहस केवल सांस्कृतिक नहीं बल्कि संविधान संबंधी भी हो चुकी है। क्या यह बयान संविधान की मूल भावना के विपरीत है या फिर यह संविधान के अंदर एक सांस्कृतिक व्याख्या का हिस्सा है?
बीजेपी ने पिछले कुछ वर्षों में जिस तेजी से अपने निर्णय खुद लेने शुरू किए, वह साफ संकेत था कि पार्टी अब संगठनात्मक सलाह पर नहीं बल्कि प्रधानमंत्री कार्यालय और रणनीतिक टीम पर भरोसा कर रही है। चाहे वह पार्टी अध्यक्ष की नियुक्ति हो, मुख्यंत्रियों की कुर्सी पर बदलाव हो या चुनावी गठबंधन, आरएसएस की भूमिका सीमित दिखाई गई। आरएसएस की कोर कमेटी और भाजपा की रणनीतिक कमेटी के बीच पहले जितनी तालमेल थी वैसी स्थिति अब दिखाई नहीं देती। कई बार यह भी महसूस हुआ कि भाजपा ने सोचा हम अब इतने मजबूत हैं कि हमें आरएसएस के मार्गदर्शन की आवश्यकता नहीं। लेकिन अब आरएसएस का यह बयान भारत हिंदू राष्ट्र है। कोई साधारण जनसभा का भाषण नहीं बल्कि एक रणनीतिक और वैचारिक वापसी जैसा है। आरएसएस यह दिखा रहा है कि निर्णय भले भाजपा का हो लेकिन विचारधारा और पहचान अभी भी संघ के पास है और यही बयान भाजपा को वैचारिक रूप से वापस आरएसएस की ओर खींच सकता है क्योंकि विचारधारा और विजय दोनों के बिना चुनाव नहीं जीते जाते। आरएसएस यानी वह विचार शक्ति और बीजेपी यानी चुनावी मशीन। जब दोनों साथ हो तभी मिशन आगे बढ़ता है।
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