भाजपा के भीतर आज जो सबसे बड़ा संकट खड़ा है, वह विपक्ष का नहीं है बल्कि घर के अंदर का तूफान है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पिछले 10 वर्षों में पार्टी की कमान अपने हाथों में पूरी तरह केंद्रीकृत कर दी है। नतीजा यह है कि भाजपा में आरएसएस की पारंपरिक पकड़ लगातार कमजोर होती दिख रही है। संघ की शाखा से निकले नेता आज हाशिए पर हैं और निर्णय लेने की शक्ति अब प्रधानमंत्री कार्यालय और शाह के राजनीतिक सर्कल तक सिमट कर रह गई है। यही वजह है कि संगठन में मनमुटाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेता मौन लेकिन नाराज हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा में अब निष्ठा से ज्यादा वफादारी मायने रखती है और विचारधारा से ज्यादा सत्ता और यही तनाव धीरे-धीरे विस्फोट की शक्ल लेता जा रहा है। आरएसएस यह मानता था कि भाजपा उसका राजनीतिक विस्तारित हाथ है। लेकिन हाल के वर्षों में नजारा बिल्कुल उल्टा दिख रहा है। भाजपा के फैसलों में संघ की राय लेना अब औपचारिकता भर रह गया है। कई राज्यों में टिकट बंटवारे से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक आज संघ का हस्तक्षेप बेहद सीमित हो चुका है।
यह स्थिति मोहन भागवत और शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। लेकिन दूसरी तरफ मोदी शाह की जोड़ी इसे अपना स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मानती है। इस खिंचाव ने पुरानी पीढ़ी और नई शक्ति संरचना के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा किया है और यह अविश्वास आने वाले चुनावों में पार्टी की एकता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना इस संघर्ष का सबसे बड़ा संकेत है। पार्टी में दिग्गज और वरिष्ठ नेता इस फैसले को चौंकाने वाला मानते हैं। उन्हें लगता है कि यह निर्णय केवल योग्यता पर नहीं बल्कि अमित शाह की शक्ति और नरेंद्र मोदी की इच्छा का परिणाम है। कई पुराने नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यह संदेश साफ है जो शाह और मोदी के राजनीतिक मार्ग पर चलेगा वही आगे बढ़ेगा। जिन्होंने सालों तक पार्टी खड़ी की उनके योगदान और उम्र को अब कोई विशेष महत्व नहीं दिया जा रहा और यह भावनात्मक असंतोष एक दिन खुलकर सामने आ सकता है।
आरएसएस से जुड़े कई कार्यकर्ता और प्रचारक इस फैसले को भाजपा की वैचारिक जड़ों से दूरी के रूप में देखते हैं। उनका आरोप है कि भाजपा का ध्यान अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर कम और सत्ता रणनीति और चुनाव जीतने पर ज्यादा है। वे यह भी कह रहे हैं कि नितिन नवीन का चयन एक संकेत है कि भाजपा में अब संगठनात्मक अनुभव और संघर्ष यात्रा की कोई कीमत नहीं। इस बात से संघ कैडर में निराशा है और यह निराशा जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और उत्साह घटा रही है। अगर यह स्थिति जारी रही तो संघ और भाजपा के बीच की दूरी और बढ़ेगी। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि अमित शाह खुद को संगठन का एकमात्र रणनीतिकार साबित करना चाहते हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि भाजपा की दिशा और कमान उनके हाथ में है और वे किसी भी वरिष्ठ को पीछे छोड़ सकते हैं। चाहे वह राजनाथ सिंह हो या नितिन गडकरी शाह की राजनीतिक शैली उनके प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करती दिख रही है। पार्टी में सत्ता का संतुलन जिस तरह बदला है, उससे कई पुराने नेता असहज और असंतुष्ट हैं। उनके लिए यह केवल पद का नहीं सम्मान का सवाल है। नितिन नवीन की नियुक्ति यह भी संकेत देती है कि भविष्य में सत्ता का उत्तराधिकार किस दिशा में जाएगा। यह स्पष्ट है कि शाह अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार कर रहे हैं। ऐसे नेता जो निष्ठा और आदेश का पालन करें, विचारधारा या स्वतंत्र आवाज ना उठाएं। इस रणनीति ने युवा और वरिष्ठ नेताओं के बीच दरार पैदा कर दी है। युवा नेता चुप हैं क्योंकि सत्ता उनके सामने है लेकिन वरिष्ठ नेता बोल नहीं रहे क्योंकि उनका अनुभव अब बोझ माना जा रहा है।
आरएसएस और भाजपा के बीच यह टकराव केवल वैचारिक नहीं बल्कि अहंकार और नियंत्रण का भी है। संघ चाहता है कि उसका मार्गदर्शन स्वीकार किया जाए। जबकि मोदी शाह यह साबित करना चाहते हैं कि भाजपा अब आत्मनिर्भर है और उसे किसी गुरु की आवश्यकता नहीं। यह मानसिकता संघ को अस्वीकार्य है। वे मानते हैं कि भाजपा की जड़ों, कैडर और पहचान के लिए आरएसएस अनिवार्य है। यह संघर्ष एक दिन फूट कर सामने आएगा क्योंकि दोनों एक दूसरे के बिना खुद को पूर्ण समझते हैं और यही समस्या है। संगठन के भीतर असंतोष, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की बढ़ती दूरी यह सब मिलकर भाजपा के भविष्य को चुनौती दे रहा है। अभी तक यह नाराजगी दबे सुर में है। कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता। लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऐसा असंतोष जब फटता है तो विस्फोट बहुत बड़ा होता है और यह विस्फोट केवल पार्टी के भीतर नहीं सत्ता के गलियारे तक गूंज सकता है। अगर मोदी शाह का दबदबा इसी तरह बढ़ता रहा तो भाजपा का चरित्र बदल सकता है। एक विचारधारा आधारित पार्टी से व्यक्ति आधारित पार्टी और यही आरएसएस के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि संघ के लिए विचारधारा ही सबसे महत्वपूर्ण है ना कि व्यक्ति पूजा।
संघ यह समझ चुका है कि भाजपा पर उसका प्रभाव घट रहा है। लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं करेगा और यह ज़िद ही आने वाले समय में संघर्ष को और भयानक बना सकती है। तो सवाल यह नहीं है कि संघर्ष होगा या नहीं। सवाल यह है कि कब होगा? नितिन नवीन की नियुक्ति, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की पीड़ा। यह सब संकेत हैं कि भाजपा के अंदर एक बड़ा भूचाल धीरे-धीरे तैयार हो रहा है और अगर इस भूचाल को समय रहते संभाला नहीं गया तो सत्ता का खेल बदल सकता है। भाजपा को एकता चाहिए लेकिन शक्ति पुजर नेतृत्व और रिश्ता हुआ संघ यह दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बन चुके हैं और जब दो शक्तियां टकराती हैं तो राजनीतिक नक्शा बदलता है। भाजपा के भीतर आज जो सबसे बड़ा संकट खड़ा है, वह विपक्ष का नहीं है बल्कि घर के अंदर का तूफान है। नरेंद्र मोदी और अमित शाह की जोड़ी ने पिछले 10 वर्षों में पार्टी की कमान अपने हाथों में पूरी तरह केंद्रीकृत कर दी है। नतीजा यह है कि भाजपा में आरएसएस की पारंपरिक पकड़ लगातार कमजोर होती दिख रही है। संघ की शाखा से निकले नेता आज हाशिए पर हैं और निर्णय लेने की शक्ति अब प्रधानमंत्री कार्यालय और शाह के राजनीतिक सर्कल तक सिमट कर रह गई है। यही वजह है कि संगठन में मनमुटाव बढ़ रहा है। वरिष्ठ नेता मौन लेकिन नाराज हैं। उन्हें लगता है कि भाजपा में अब निष्ठा से ज्यादा वफादारी मायने रखती है और विचारधारा से ज्यादा सत्ता और यही तनाव धीरे-धीरे विस्फोट की शक्ल लेता जा रहा है। आरएसएस यह मानता था कि भाजपा उसका राजनीतिक विस्तारित हाथ है। लेकिन हाल के वर्षों में नजारा बिल्कुल उल्टा दिख रहा है। भाजपा के फैसलों में संघ की राय लेना अब औपचारिकता भर रह गया है। कई राज्यों में टिकट बंटवारे से लेकर संगठनात्मक बदलाव तक आज संघ का हस्तक्षेप बेहद सीमित हो चुका है।
यह स्थिति मोहन भागवत और शीर्ष नेतृत्व के लिए चिंता का विषय है। लेकिन दूसरी तरफ मोदी शाह की जोड़ी इसे अपना स्वतंत्र राजनीतिक अधिकार मानती है। इस खिंचाव ने पुरानी पीढ़ी और नई शक्ति संरचना के बीच एक गहरा अविश्वास पैदा किया है और यह अविश्वास आने वाले चुनावों में पार्टी की एकता के लिए बड़ा खतरा बन सकता है। नितिन नवीन को भाजपा का राष्ट्रीय अध्यक्ष बनाया जाना इस संघर्ष का सबसे बड़ा संकेत है। पार्टी में दिग्गज और वरिष्ठ नेता इस फैसले को चौंकाने वाला मानते हैं। उन्हें लगता है कि यह निर्णय केवल योग्यता पर नहीं बल्कि अमित शाह की शक्ति और नरेंद्र मोदी की इच्छा का परिणाम है। कई पुराने नेता खुद को उपेक्षित महसूस कर रहे हैं। यह संदेश साफ है जो शाह और मोदी के राजनीतिक मार्ग पर चलेगा वही आगे बढ़ेगा। जिन्होंने सालों तक पार्टी खड़ी की उनके योगदान और उम्र को अब कोई विशेष महत्व नहीं दिया जा रहा और यह भावनात्मक असंतोष एक दिन खुलकर सामने आ सकता है। आरएसएस से जुड़े कई कार्यकर्ता और प्रचारक इस फैसले को भाजपा की वैचारिक जड़ों से दूरी के रूप में देखते हैं। उनका आरोप है कि भाजपा का ध्यान अब राष्ट्रवाद और हिंदुत्व पर कम और सत्ता रणनीति और चुनाव जीतने पर ज्यादा है। वे यह भी कह रहे हैं कि नितिन नवीन का चयन एक संकेत है कि भाजपा में अब संगठनात्मक अनुभव और संघर्ष यात्रा की कोई कीमत नहीं। इस बात से संघ कैडर में निराशा है और यह निराशा जमीनी कार्यकर्ताओं में ऊर्जा और उत्साह घटा रही है। अगर यह स्थिति जारी रही तो संघ और भाजपा के बीच की दूरी और बढ़ेगी। वरिष्ठ नेताओं की नाराजगी का एक बड़ा कारण यह भी है कि अमित शाह खुद को संगठन का एकमात्र रणनीतिकार साबित करना चाहते हैं। वे यह दिखाना चाहते हैं कि भाजपा की दिशा और कमान उनके हाथ में है और वे किसी भी वरिष्ठ को पीछे छोड़ सकते हैं। चाहे वह राजनाथ सिंह हो या नितिन गडकरी शाह की राजनीतिक शैली उनके प्रभाव को सीमित करने की कोशिश करती दिख रही है। पार्टी में सत्ता का संतुलन जिस तरह बदला है, उससे कई पुराने नेता असहज और असंतुष्ट हैं। उनके लिए यह केवल पद का नहीं सम्मान का सवाल है। नितिन नवीन की नियुक्ति यह भी संकेत देती है कि भविष्य में सत्ता का उत्तराधिकार किस दिशा में जाएगा। यह स्पष्ट है कि शाह अपने राजनीतिक उत्तराधिकारी तैयार कर रहे हैं। ऐसे नेता जो निष्ठा और आदेश का पालन करें, विचारधारा या स्वतंत्र आवाज ना उठाएं। इस रणनीति ने युवा और वरिष्ठ नेताओं के बीच दरार पैदा कर दी है। युवा नेता चुप हैं क्योंकि सत्ता उनके सामने है लेकिन वरिष्ठ नेता बोल नहीं रहे क्योंकि उनका अनुभव अब बोझ माना जा रहा है। आरएसएस और भाजपा के बीच यह टकराव केवल वैचारिक नहीं बल्कि अहंकार और नियंत्रण का भी है। संघ चाहता है कि उसका मार्गदर्शन स्वीकार किया जाए। जबकि मोदी शाह यह साबित करना चाहते हैं कि भाजपा अब आत्मनिर्भर है और उसे किसी गुरु की आवश्यकता नहीं। यह मानसिकता संघ को अस्वीकार्य है। वे मानते हैं कि भाजपा की जड़ों, कैडर और पहचान के लिए आरएसएस अनिवार्य है। यह संघर्ष एक दिन फूट कर सामने आएगा क्योंकि दोनों एक दूसरे के बिना खुद को पूर्ण समझते हैं और यही समस्या है। संगठन के भीतर असंतोष, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की बढ़ती दूरी यह सब मिलकर भाजपा के भविष्य को चुनौती दे रहा है। अभी तक यह नाराजगी दबे सुर में है। कोई खुलकर बोलना नहीं चाहता। लेकिन राजनीतिक इतिहास बताता है कि ऐसा असंतोष जब फटता है तो विस्फोट बहुत बड़ा होता है और यह विस्फोट केवल पार्टी के भीतर नहीं सत्ता के गलियारे तक गूंज सकता है। अगर मोदी शाह का दबदबा इसी तरह बढ़ता रहा तो भाजपा का चरित्र बदल सकता है। एक विचारधारा आधारित पार्टी से व्यक्ति आधारित पार्टी और यही आरएसएस के लिए सबसे बड़ा खतरा है क्योंकि संघ के लिए विचारधारा ही सबसे महत्वपूर्ण है ना कि व्यक्ति पूजा। संघ यह समझ चुका है कि भाजपा पर उसका प्रभाव घट रहा है। लेकिन वह इसे स्वीकार नहीं करेगा और यह ज़िद ही आने वाले समय में संघर्ष को और भयानक बना सकती है। तो सवाल यह नहीं है कि संघर्ष होगा या नहीं। सवाल यह है कि कब होगा? नितिन नवीन की नियुक्ति, वरिष्ठों की नाराजगी और संघ की पीड़ा।
यह सब संकेत हैं कि भाजपा के अंदर एक बड़ा भूचाल धीरे-धीरे तैयार हो रहा है। और अगर इस भूचाल को समय रहते संभाला नहीं गया तो सत्ता का खेल बदल सकता है। भाजपा को एकता चाहिए। लेकिन शक्ति पुर्ज नेतृत्व और रिश्ता हुआ संघ यह दोनों एक दूसरे के लिए खतरा बन चुके हैं। और जब दो शक्तियां टकराती हैं तो राजनीतिक नक्शा बदलता है।
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