संघ का संदेश बीजेपी तुरंत संजय जोशी का नाम अध्यक्ष के लिए घोषित करें बीजेपी नेतृत्व की फिर टालमटोल
संघ का संदेश बीजेपी तुरंत संजय जोशी का नाम अध्यक्ष के लिए घोषित करें बीजेपी नेतृत्व की फिर टालमटोल
संघ का संदेश बीजेपी तुरंत संजय जोशी का नाम अध्यक्ष के लिए घोषित करें बीजेपी नेतृत्व की फिर टालमटोल
नागपुर से एक औपचारिक संदेश दिल्ली भेजा गया। इतना सीधा, इतना साफ और इतना कठोर कि कई वरिष्ठ बीजेपी नेताओं ने पहले तो इसे अफवाह समझा। लेकिन यह अफवाह नहीं बल्कि आरएसएस की अंतिम समय सीमा थी। संदेश था बीजेपी तुरंत संजय जोशी का नाम अध्यक्ष के लिए घोषित करें। इस महीने के भीतर कोई देरी स्वीकार नहीं। इस संदेश का स्वर अनुरोध नहीं आदेश जैसा था। संघ ने कहा कि अब राजनीतिक गणित, लोकसभा सीटें, व्यक्तिगत रिश्ते कुछ भी इस निर्णय में बाधा नहीं बन सकता।और पहली बार नागपुर ने यह भी जोड़ दिया कि यदि बीजेपी नेतृत्व फिर भी टालमटोल करता है तो संगठन का अगला कदम अपनी स्वतंत्र दिशा तय करना होगा। जिसमें संजय जोशी को उच्चतम संघ नेतृत्व की जिम्मेदारी भी दी जा सकती है।
यानी 14 जनवरी 2026 संघ बीजेपी संबंधों का टर्निंग पॉइंट बन गया। बिहार चुनाव का शोर अब आखिरकार थम चुका था और दिल्ली के सत्ता गलियारों में एक नई तरह की खामोशी तैर रही थी। वही खामोशी जो किसी बड़े तूफान से पहले महसूस होती है। बीजेपी हेड क्वार्टर में जश्न का माहौल धीरे-धीरे खत्म हो रहा था। लेकिन नागपुर में आरएसएस के दफ्तर में माहौल बिल्कुल उल्टा। तनावपूर्ण, गंभीर और बेहद निर्णायक। संघ के बड़े पदाधिकारी साफ
बोल चुके थे कि अब बहाने नहीं चलेंगे। चुनाव खत्म जीत मिली। ठीक है। पर अब संगठन को दिशा देनी है और उसके लिए बीजेपी प्रेसिडेंट का नाम तुरंत घोषित किया जाना चाहिए। और यहीं से असली पेंच शुरू हुआ। क्योंकि इस बार संघ ने सिर्फ एक सुझाव नहीं दिया बल्कि एक स्पष्ट आदेश जैसा कुछ भेजा। किसी और का नहीं संजय जोशी का नाम। और यह नाम जब संघ ने सीधे पीएम मोदी और अमित शाह को भेजा तो पावर कॉरिडोर में हलचल दौड़ गई। संजय जोशी वह नाम जिसे बीजेपी का कार्यकर्ता आज भी सम्मान के साथ लेता है। लेकिन सत्ता के शीर्ष पर बैठे कई लोग जिसकी वापसी से घबराए रहते हैं। बिहार के नतीजों ने यह दिखा दिया था कि मोदी शाह की रणनीति अभी भी मजबूत है। लेकिन आरएसएस का मानना था कि जमीन पर संगठन की पकड़ पिछले कुछ वर्षों में कमजोर हुई है। और इसी कमजोरी को ठीक करने के लिए संघ चाहता था कि बीजेपी का मुखिया अब कोई ऐसा बने जो पूरी तरह से संघ शिक्षित संघ शैली वाला और संघ के प्रति 100% समर्पित हो। संघ अपना विश्वास जिस नाम पर रख रहा था वह केवल और केवल संजय जोशी थे। आरएसएस ने स्पष्ट कहा यदि बीजेपी नेतृत्व संजय जोशी को अध्यक्ष नहीं बनाता, तो संघ अपनी दिशा खुद तय करेगा। यहां तक कि अगले सरसघ चालक के रूप में भी वही नाम सोचा जा रहा है।
नरेंद्र मोदी को यह बात सबसे ज्यादा चुभ कि संघ ने पहली बार इतनी सख्त भाषा में चेतावनी दी। अमित शाह भी हैरान थे क्योंकि पिछले कई वर्षों की राजनीतिक चाले, संगठनात्मक फैसले और केंद्रीय नेतृत्व का नियंत्रण सब कुछ एक तरह से पीएमओ और गृह मंत्रालय की स्क्रिप्ट पर चलता रहा था। लेकिन इस बार मामला अलग था। संघ अपनी उस मूल भावना में लौट चुका था जिसके अनुसार संगठन सरकार से बड़ा है और उन्हीं गलियारों में चर्चा चल रही थी कि इस बार संघ सिर्फ दबाव नहीं डाल रहा बल्कि लिमिट सेट कर रहा है। एक रेखा कि मोदी शाह सरकार को पार नहीं करनी चाहिए और यदि वे फिर भी नहीं समझे तो संघ संजय जोशी को सिर्फ बीजेपी अध्यक्ष नहीं बल्कि आरएसएस चीफ के रूप में भी आगे बढ़ाने के लिए तैयार है। मोहन भागवत पिछले कई वर्षों से संतुलन साधने की कोशिश कर रहे थे। एक तरफ सरकार की ताकत दूसरी ओर संगठन की परंपरा लेकिन यह संतुलन अब टूटता हुआ दिख रहा था। भागवत जानते थे कि मोदी और शाह दोनों ही संजय जोशी की वापसी से असहज है। लेकिन वे यह भी समझते थे कि संगठन की जड़ों को मजबूत करने के लिए जोशी जैसा व्यक्ति ही सबसे उपयुक्त है। भागवत ने कई बार पीएम को संकेतों में बताया कि आरएसएस और बीजेपी के बीच दूरी बढ़ रही है। लेकिन उन संकेतों को सत्ता की चमक में शायद उतनी गंभीरता से नहीं लिया गया और अब संघ का धैर्य समाप्त हो चुका था। इसलिए भागवत ने पहली बार अपने ही लोगों से कहा, अब संतुलन का दूसरा तरीका अपनाना पड़ेगा। सत्ता को संगठन का महत्व समझाना होगा। दिल्ली में बैठे रणनीतिकारों का मानना था कि आरएसएस का यह दबाव साधारण नहीं है। क्योंकि बिहार जीत से उत्साहित बीजेपी चाहती थी कि वही कहानी देश भर में दोहराई जाए। जहां चुनावी रणनीति मोदी शाह केंद्रित हो और संगठन की भूमिका पीछे सरक जाए। लेकिन आर एस एस यह मॉडल अब स्वीकार करने के मूड में नहीं था। वे चाहते थे कि बीजेपी का अगला अध्यक्ष ऐसा हो जो पार्टी को फिर से केंद्र से बाहर चलाए यानी दिल्ली की सत्ता से स्वतंत्र। और यही विचार मोदी शाह के लिए सबसे कठिन था क्योंकि संजय जोशी के आने का मतलब था पार्टी का असल कंट्रोल फिर नागपुर की तरफ झुकना और यह दोनों नेताओं को मंजूर नहीं।
आरएसएस का अंतिम संदेश बेहद कठोर था। या तो बीजेपी अध्यक्ष संजय जोशी होंगे या फिर संघ अपना रास्ता अलग तय करेगा। यह बात सुनकर दिल्ली में कई वरिष्ठ नेता चुप हो गए क्योंकि यह केवल नाम का विवाद नहीं था। यह शक्ति संतुलन की लड़ाई थी। एक तरफ चुनी हुई सरकार की ताकत। दूसरी तरफ एक विचारधारा की दशकों पुरानी शाखाएं और इन शाखाओं में वही लोग काम करते हैं, जिन्हें आज भी लगता है कि पार्टी नेतृत्व ने संघ की सलाह को लगातार अनसुना किया है। संघ चाहता था कि 2026 के चुनावों से पहले पार्टी पूरी तरह से वैचारिक दिशा में लौटे और इसके लिए संजय जोशी से बेहतर कोई चेहरा नहीं। दिल्ली की बैठकों में कई विकल्प सामने आए। किसी नए चेहरे को लाना, किसी पुराने नेता को आगे करना या आरएसएस को मनाने के लिए कुछ और प्रस्ताव भेजना। लेकिन नागपुर की तरफ से एक ही उत्तर हर बार मिला। नाम सिर्फ संजय जोशी। यह एक तरह का सीधा संदेश था कि इस बार संघ समझौता करने वाला नहीं। मोदी शाह को यह बात चुभियन लग रही थी कि वही संजय जोशी जिनकी राजनीतिक वापसी को उन्होंने वर्षों तक रोक कर रखा। अब बीजेपी और आरएसएस दोनों का संभावित मुखिया बन सकते हैं और यही डर इस कहानी को और दिलचस्प बना रहा था।
कई वरिष्ठ कार्यकर्ताओं ने भी मन में यह बात स्वीकार कर ली थी कि जोशी यदि अध्यक्ष बनते हैं तो जमीनी स्तर पर कार्यकर्ताओं का मनोबल अचानक बढ़ जाएगा। क्योंकि जोशी की पहचान संगठन के आदमी वाली है जो बिना प्रचार के बिना कैमरे के रात-रात भर बूथ स्तर पर काम करते हैं। वहीं मोदी शाह का मॉडल है प्रचार नेतृत्व और चुनावी प्रबंधन। दोनों के काम करने के तरीकों में जमीन आसमान का अंतर है। आरएसएस चाहता था कि बीजेपी का पुनर्गठन खाली सत्ता के लिए नहीं बल्कि विचारधारा के लिए हो और जोशी इस काम के लिए आदर्श माने जाते थे। आरएसएस के अंदरूनी हलकों में यहां तक चर्चा शुरू हो गई कि संजय जोशी को सर संघचालक बनाने का प्रस्ताव तभी लागू होगा जब बीजेपी नेतृत्व उन्हें पार्टी अध्यक्ष बनाने से साफ इंकार कर दे। यानी एक तरह से यह संघ की बैकअप प्लान थी और यह धमकी नहीं बल्कि रणनीतिक संकेत था कि संघ अब पूरी तरह से तैयार है शक्ति संतुलन को बदलने के लिए। इस स्थिति ने मोदी शाह को ऐसी पोजीशन में ला दिया जहां उन्हें पहली बार महसूस हुआ कि बिहार की जीत के बाद सत्ता का नशा जितना तेज था उससे ज्यादा तेज संघ का दबाव उतर सकता है। अब पूरी कहानी एक ऐसे मोड़ पर आ गई जहां बीजेपी और आरएसएस की दशकों पुरानी साझेदारी की परीक्षा हो रही है। मोहन भागवत के प्रयास असफल होते दिख रहे हैं क्योंकि नरेंद्र मोदी और अमित शाह दोनों एक मजबूत राजनीतिक ढांचे के समर्थक हैं। जबकि संघ वैचारिक और संगठनात्मक ढांचे को प्राथमिकता देता है। अगर जोशी को अध्यक्ष बनाया जाता है तो सत्ता का केंद्र बदल जाएगा। अगर नहीं बनाया जाता तो संघ अपने सबसे अनुभवी अनुशासन प्रिय और वैचारिक रूप से कठोर कार्यकर्ता को अपनी सर्वोच्च कुर्सी पर बैठाकर बीजेपी को एक सीधा संदेश दे देगा। कहानी अब केवल नाम की नहीं आने वाले वर्षों में भारतीय राजनीति के शक्ति संतुलन की है और इस संघर्ष का सबसे बड़ा किरदार बन चुका है संजय जोशी।
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