दोस्तों कुछ लोगों की समस्या कभी खत्म ही नहीं होती। देश में जब भी संघ का नाम आता है तो उनका दिल ऐसे कांपने लगता है जैसे किसी ने उनकी पॉलिटिकल ऑक्सीजन सप्लाई ही काट दी हो। और इसका ताजा उदाहरण है वरिष्ठ सुप्रीम कोर्ट वकील इंदिरा जय सिंह। वही इंदिरा जय सिंह जो आतंकवादियों को बचाने आधी रात को सुप्रीम कोर्ट के दरवाजे खटखटाती हैं। उन्होंने आरएसएस की शताब्दी पर जारी ₹100 के स्मारक सिक्के को देखकर तुरंत सवाल उछाल दिया। इज दिस इवन अ लीगल टेंडर अंडर अ सेकुलर कॉन्स्टिट्यूशन? पहला सवाल, सेकुलर कॉन्स्टिट्यूशन किसकी जागीर है?
भारत का संविधान धर्मनिरपेक्ष है। इसका मतलब यह है कि राज्य सभी धर्मों के साथ समान व्यवहार करेगा? ना कि यह कि हिंदू संगठनों या परंपराओं का नाम तक ना लिया जाए। क्या संविधान ने कभी यह कहा है कि राष्ट्र स्वयंसेवक संघ का जिक्र करना गैरकानूनी है या कोई सिक्का केवल तभी मान्य होगा जब उस पर मुगलिया स्मारक या राजनीतिक डायनेस्टी की तस्वीर हो और यह ₹100 का स्मारक सिक्का भारतीय रिजर्व बैंक और सरकारी मिंट द्वारा जारी किया गया है जो आरएसएस के 100 वर्ष पूरे होने का प्रतीक है। यह कोई सर्कुलेटिंग नोट नहीं है बल्कि एक कमोडिटी या कलेक्टर्स आइटम है जो सीमित मात्रा में उपलब्ध है। बाकी ये लीगल टेंडर की बात कहां से आ गई? इंदिरा वकील हैं तो जानती ही होंगी कि स्मारक सिक्के कानूनी मुद्रा के रूप में इस्तेमाल नहीं होते। वे संग्रहणीय हैं और उनका मूल्य उनकी ऐतिहासिक महत्व से आता है। भारत सरकार ने पहले भी ऐसे सिक्के जारी किए हैं। जैसे 2019 में महात्मा गांधी के 150 वर्ष पूरे होने पर, 2022 में सुभाष चंद्र बोस के 125 वर्ष पूरे होने पर और 2023 में विवेकानंद के 160 वर्ष के लिए। इसके अलावा मौलाना अबुल कलाम आजाद के स्मारक सिक्के निकले हैं। मदर टेरेसा के आए हैं।
UPA (एंटोनियो माइनो अल्बिनो) के शासनकाल में तो सेंट अल्फोंसो तक के स्मारक सिक्के आए थे। सरदार पटेल, तात्या तोपे और यहां तक कि मुगल सम्राट और मुस्लिम समाज के कई प्रमुख नेताओं पर भी सिक्के निकाले गए हैं। बाकी 2012 में श्री माता वैष्णो देवी शाइन बोर्ड की सिल्वर जुबली पर भी एक ₹5 का स्मारक सिक्का इशू किया गया। तो इसको लेकर क्या लीगल टेंडर से सवाल पूछे आपने? क्या यह सभी धर्मनिरपेक्ष थे? हां, क्योंकि वे राष्ट्रीय गौरव को दर्शाते हैं। आरएसएस का सिक्का भी वही है 100 साल की सेवा का सम्मान। अब सेकुलर संविधान का रोना अनुच्छेद 25 से 28 तक धर्मनिरपेक्षता की बात है जो धार्मिक स्वतंत्रता देती है। लेकिन यह किसी संगठन को सम्मान देने से रोकती नहीं। आरएसएस हिंदू राष्ट्रवादी संगठन हो सकता है लेकिन यह संविधान का सम्मान करता है। स्वयंसेवक संविधान के प्रति शपथ लेते हैं। क्या आप कह रही हैं कि केवल वामपंथी या अल्पसंख्यक संगठनों को ही सम्मान मिलना चाहिए। यह तो संविधान की भावना के खिलाफ है।
भारत का संविधान सबको समान अवसर देता है। आरएसएस को क्यों नहीं? इंद्र जय सिंह आपकी यह टिप्पणी एक पैटर्न का हिस्सा लगती है। जहां हर हिंदू संगठन की सफलता को सांप्रदायिक ठहराया जाता है। अगर सिक्का जारी करना गैरकानूनी है तो अदालत जाएं लेकिन बिना तर्क के सोशल मीडिया पर चिल्लाना पत्रकारिता या कानूनी बहस नहीं बल्कि प्रोपोगेंडा लगता है। दोस्तों भारत एक लोकतांत्रिक देश है। जहां हर संगठन को अपना योगदान पहचान मिलना चाहिए। आरएसएस के 100 वर्ष का सिक्का राष्ट्रीय गौरव का प्रतीक है। इंदिरा जैसे लोग चाहे जितने सवाल उठाएं सच्चाई यही है। यही पूरी तरह वैध, संवैधानिक और गर्व की बात है।
इन लोगों की समस्या यह नहीं कि सिक्का कानूनी है या नहीं। समस्या ये है कि सत्ता के गलियारों में दशकों तक आरएसएस को गाली देकर जीविका चलाने वालों को भी यह हजम नहीं हो रहा कि वही संघ 100 साल पूरे करके इतिहास में अपनी जगह पक्की कर चुका है। तो इंदिरा जी ₹100 का सिक्का पूरी तरह से लीगल टेंडर है। पर यह सिक्का आपके विचारधारा वाले इको सिस्टम पर जरूर इललीगल स्ट्राइक जैसा लगता है क्योंकि कानून की नजर में यह वैध है लेकिन आपकी राजनीति के नजर में यह असहनीय है। भारत का संविधान सबका है। सिर्फ सेलेक्टिव सेकुलरिस्ट का पर्सनल प्रॉपर्टी नहीं। इसलिए ₹100 का सिक्का भी वैध है और आरएसएस के 100 साल भी वैध है।
जय हिंद
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