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Sunday, June 8, 2025

प्रप्रशांत भूषण ने भारतीय न्यायपालिका और मोदी सरकार के खिलाफ उगला जहर! अमेरिका में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के कार्यक्रम में

प्रप्रशांत भूषण ने भारतीय न्यायपालिका और मोदी सरकार के खिलाफ उगला जहर! अमेरिका में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के कार्यक्रम में
प्रप्रशांत भूषण ने भारतीय न्यायपालिका और मोदी सरकार के खिलाफ उगला जहर! अमेरिका में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के कार्यक्रम में

प्रशांत भूषण ने अमेरिका में मुस्लिम काउंसिल के कार्यक्रम में जो कुछ कहा, वह नीचे दिया गया है:- 


प्रशांत भूषण ने भारतीय न्यायपालिका और नरेंद्र मोदी और योगी आदित्यनाथ की सरकार के खिलाफ़ बोला है। उन्होंने अमेरिकी मुस्लिम से मोदी विरोधी, भाजपा विरोधी और न्यायपालिका विरोधी भावनाएँ भड़काने के लिए बात की

क्या भारत की न्यायपालिका को कोई और अपने इशारों पर नचा रहा है या फिर न्यायपालिका ही दो फाड़ हो चुकी है? क्या जजों में दो गुट बन चुके हैं? अगर नहीं तो क्या यह वही भारत है जिसके लिए संविधान ने हर व्यक्ति को समानता, न्याय और अभिव्यक्ति की आजादी का वादा किया था। क्या यह वही न्यायपालिका है जिसकी आंखों पर बंधी पट्टी इस बात का सबूत थी कि फैसले सत्ता और पार्टी देखकर नहीं होते और ना ही जज रंग देखता है ना विचारधारा देखता है ना धर्म और जाति देखता है मगर न्याय की देवी की आंखों से पट्टी हटने के बाद न्यायपालिका का हाल ऐसा है जैसे सत्ता के इशारे पर नाच रही हो डांस कर रही हो सवाल बेंगलुरु के च्ना स्वामी स्टेडियम में 11 लोगों की मौत का नहीं जहां तुरंत एफआईआर दर्ज हुई कमिश्नर सस्पेंड हुआ कई अधिकारी हटाए गए हाई कोर्ट ने स्वतः संज्ञान लिया

सवाल प्रयागराज राज महाकुंभ और दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ का भी नहीं है। जहां 70 से ज्यादा मौतों पर सन्नाटा छा गया। सवाल शर्मिष्ठा पनोली का है। जिसे एक सोशल मीडिया पोस्ट के लिए जेल में डाला गया। बावजूद इसके कि उसने माफी मांगी थी। सवाल कर्नल सोफिया कुरैशी का है जिन्हें आतंकवादियों की बहन कहकर अपमानित किया गया। सवाल प्रोफेसर अली खान महमूदाबाद का है। जिन्हें ऑपरेशन सिंदूर पर लिखने के लिए गिरफ्तार किया गया।

सरकार जजों की नियुक्ति के मामले में खुफिया एजेंसियों का इस्तेमाल डोजियर तैयार करने में कर रही है और उनके बच्चों को जेल भेजने की धमकी देकर न्यायपालिका को अपने कब्जे में ले रही है। यह हाल उस देश का है जहां सुप्रीम कोर्ट का चीफ जस्टिस उत्तर प्रदेश के मुख्यमंत्री योगी आदित्यनाथ को सबसे शक्तिशाली और मेहनती सीएम कहकर पब्लिकली तारीफ करता है और योगी आदित्यनाथ कहते हैं कि महाकुंभ इसलिए सफल हुआ क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक नहीं लगाई। कोई रोक नहीं लगाई।

तो सवाल उठता है कि कौन किसके लिए काम कर रहा है? क्योंकि यही न्यायपालिका बेंगलुरु में भगदड़ मचती है। 11 लोगों की मौत होती है तो तुरंत एक्शन में आ जाती है। लेकिन कुंभ और दिल्ली की भगदड़ पर चुप रहती है। क्या अब भी आपको भ्रम है कि न्यायपालिका का सरेंडर नहीं हुआ है। लोकतंत्र जिंदा है। जजों पर कोई दबाव नहीं है?

अमेरिका की न्यू जर्सी में इंडियन अमेरिकन मुस्लिम काउंसिल के एक कार्यक्रम में दिया गया वरिष्ठ अधिवक्ता प्रशांत भूषण ने कहा कि जजों की गर्दन कैसे मरोड़ी जा रही है। मगर अभी वाला जानने से पहले पुराना वाला याद दिला देता हूं।प्रशांत भूषण ने बताया कहा कि तीन तरीकों से वर्तमान सत्ता न्यायपालिका को अपने कब्जे में कर रही है। पहला तो यह कि जो जज अपने मन के लायक नहीं है उन्हें अपॉइंट ही नहीं किया जाता। उनका नाम ही आगे नहीं बढ़ाया जाता। दूसरा यह कि जजों को लालच दिया जाता है वर्तमान में और रिटायरमेंट के बाद मिलने वाले बड़े-बड़े पदों का और तीसरा जो कि सबसे खतरनाक है वो है जांच एजेंसियों का दुरुपयोग करके जजों के रिश्तेदारों का कोई भी माइनस पॉइंट पकड़ के उन्हें टॉर्चर करने का।

प्रशांत भूषण ने कहा है कि भारत की न्यायपालिका को व्यवस्थित ढंग से कमजोर किया जा रहा है। सत्ता के इशारे पर ईडी, सीबीआई, इनकम टैक्स और एनआईए के साथ पुलिस को काम पर लगा दिया गया है। इन एजेंसियों का काम जजों के खिलाफ खुफिया डोजियर तैयार करना है और सत्ता खासतौर पर उन जजों को निशाना बना रही है जो भविष्य में सुप्रीम कोर्ट के चीफ जस्टिस बन सकते हैं। प्रशांत भूषण ने दावा किया कि जजों को धमकियां दी जा रही हैं कि सत्ता की लाइन पर चलो वरना तुम्हें बेनकाब कर देंगे। तुम्हारे बच्चों को जेल में डाल देंगे।

सवाल यह है कि यह लोकतंत्र है या तानाशाही। लोकतंत्र है या ठोकत तंत्र बन चुका है? क्योंकि सुप्रीम कोर्ट के जजों को डराया जा रहा है। उनके बच्चों को जेल भेजने की धमकी दी जा रही है। तो क्या ये न्यायपालिका की स्वतंत्रता पर सीधा हमला नहीं है? उसे गुलाम बनाने की साजिश नहीं है और न्यायपालिका की गुलामी यानी देश की गुलामी।

प्रशांत भूषण ने कहा कि सत्ता ने कॉलेजियम सिस्टम को कमजोर कर दिया है। अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के स्वतंत्र जजों की नियुक्ति को रोका जा रहा है। ध्यान से सुनिए। प्रशांत भूषण का कहना है कि अल्पसंख्यक समुदाय यानी मुस्लिम, सिख और ईसाई समुदाय के स्वतंत्र जजों को नियुक्ति से रोका जा रहा है। बावजूद इसके कि कॉलेजियम उनकी नियुक्ति की सिफारिश करें। यानी कॉलेजियम उनकी नियुक्ति की सिफारिश करता है। फिर भी सत्ता अल्पसंख्यक समुदाय से आने वाले जजों को आगे नहीं कर रही है। उन्हें पीछे धकेलने का काम कर रही है। उनके अपॉइंटमेंट को रोका जा रहा है। प्रशांत भूषण ने कहा कि न्यायपालिका की हालत 1975 की इमरजेंसी जैसी है। जब सुप्रीम कोर्ट के जजों ने कहा था कि आपातकाल में जीवन का अधिकार भी निलंबित किया जा सकता है।आज वह मोदी सत्ता की तानाशाही के खिलाफ खुलकर बोल रहे हैं। मगर उनका खुलासा सिर्फ जजों तक सीमित नहीं है। सुप्रीम कोर्ट के सीनियर वकील ने यह भी दावा कर दिया कि चुनाव आयोग, सीएजी और मीडिया जैसी संवैधानिक संस्थाएं सत्ता की कठपुतली बन चुकी हैं। वो वही करती है जो सत्ता चाहती है और तब याद आता है सुप्रीम कोर्ट के जस्टिस एम आर शाह से लेकर चीफ जस्टिस बी आर गवई तक का बयान कि किस तरह जजों ने खुलकर मोदी और योगी की चाटुकारिता की है। पूर्व सीजीआई गोगोई और पूर्व जस्टिस नजीर को मत भूलिए जिन्होंने राज्यसभा और राज्यपाल के पद पर समझौता कर लिया।

2018 में पटना हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस ने मोदी को मॉडल और हीरो करार दिया था। तो सुप्रीम कोर्ट के जज अरुण मिश्रा और जस्टिस एम आर शाह ने भी मोदी की तारीफ में कोई कोर कसर नहीं छोड़ी। जस्टिस अरुण मिश्रा ने कहा था कि मोदी ग्लोबली सोचते हैं और लोकली एक्ट करते हैं। कितना ग्लोबली सोचते हैं। ऑपरेशन सिंदूर के बाद दिख गया। और 2025 की गर्मियों में जब सीजेआई गवाई ने योगी को सबसे शक्तिशाली और मेहनती सीएम कहा तो योगी ने भी खुलकर न्यायपालिका की तारीफ कर दी। कह दिया कि महाकुंभ इसलिए सफल हुआ क्योंकि इलाहाबाद हाईकोर्ट ने रोक नहीं लगाई। सवाल यह है कि ये कौन सी पार्टनरशिप है जो एक दूसरे की पीठ खुजा रही है, सहला रही है।

जनवरी 2025 में प्रयागराज के महाकुंभ में मौनी अमावस्या के दिन संगम नोज के पास भगदड़ मची। सरकार ने कहा कि 30 लोगों की मौत हुई। फिर खबरों में आया कि 70 से ज्यादा मौतें हुई। मगर गोदी मीडिया ने आंकड़ों के हेरफेर पर कोई सवाल नहीं किया। और तो और उससे संबंधित जो वीडियोस को YouTube से डिलीट करवा दिया गया। किसने करवाया? आप जानते हैं, बताने की जरूरत नहीं है। पूरा का पूरा सिस्टम मोदी सत्ता को, योगी सत्ता को डिफेंड करता रहा। सिर्फ एक शंकराचार्य ने योगी का इस्तीफा मांगा। किसी की हिम्मत तक नहीं हुई कि योगी सत्ता से इस्तीफे की मांग कर लें। और इस घटना के कुछ ही दिन बाद दिल्ली रेलवे स्टेशन पर भगदड़ मच गई। दर्जनों लोग मारे गए और पीड़ितों का मुंह बंद करने के लिए भोरेभोरे जगह के बोरे में भरभर के रुपया बांटा गया। यह काम सत्ता के इशारे पर हुआ। प्रशासन लीपापोती में जुटा रहा। मगर दिल्ली पुलिस की हिम्मत नहीं हुई कि स्वतः संज्ञान लेकर एफआईआर दर्ज कर ले। किसी का निलंबन नहीं हुआ। किसी की जवाबदेही तय नहीं हुई।

सुप्रीम कोर्ट ने भी महाकुंभ की भक्तड़ से जुड़ी जनहित याचिका पर सुनवाई से इंकार कर दिया। तत्कालीन चीफ जस्टिस संजीव खन्ना और जस्टिस संजय कुमार ने याचिकाकर्ता को कह दिया कि इलाहाबाद हाई कोर्ट चले जाइए और हाई कोर्ट के चीफ जस्टिस अरुण भंसाली और जस्टिस छितर शैलेंद्र ने यूपी सरकार से जवाब मांगा लेकिन सीबीआई जांच की मांग को खारिज कर दिया जबकि याचिकाकर्ता सौरव पांडे ने इलाहाबाद हाई कोर्ट में दावा किया था कि सरकार ने मौतों की संख्या कम करके दिखाया आंकड़ों में हेरफेर मृतकों के परिजनों को मृत्यु प्रमाण पत्र के लिए भटकना पड़ रहा है और बिना पोस्टमार्टम के 15,000 दे देकर मुंह बंद करा दिया गया। गांव भेज दिया गया। मीडिया यह सब देखता रहा। कोई सवाल नहीं हुआ। किसी को जिम्मेदार नहीं ठहराया गया। कोई इस्तीफा नहीं हुआ। कोई सस्पेंड नहीं हुआ। जबकि प्रयागराज की पुलिस ने सवाल पूछने वाले पत्रकारों को ऑन कैमरा धमकाया था। ऑन कैमरा। मगर कोई प्राइम टाइम डिबेट नहीं। गोदी मीडिया के किसी लपड़ झंडेश की जुबान से आवाज नहीं निकली। सवाल ये है कि क्या ये इसलिए हुआ कि यूपी और दिल्ली में बीजेपी का राज था और है। क्या ये इसलिए हुआ कि जजों को सत्ता से डर लगता है

और यह सवाल सिर्फ दिल्ली और यूपी का नहीं शर्मिष्ठा पनोली के केस ने कोलकाता हाईकोर्ट को भी बेपर्दा कर दिया है। शर्मिष्ठा को कोलकाता पुलिस ने 31 मई को गुरुग्राम से गिरफ्तार किया और उसका अपराध पैगंबर मोहम्मद के खिलाफ आपत्तिजनक शब्दों का इस्तेमाल था। पुलिस ने कई धाराओं में मामला दर्ज किया। यह केस अदालत पहुंचा तो जस्टिस पार्थ सारथी ने अंतरिम जमानत याचिका खारिज करते हुए कहा कि अभिव्यक्ति की आजादी सबको है। लेकिन इसका मतलब यह नहीं कि हम दूसरों की भावनाओं को आहत करते चले और चंद दिन बाद ही जस्टिस राजा चौधरी की वेकेशन बेंच ने जमानत देते हुए कह दिया कि शर्मिष्ठा की गिरफ्तारी संविधान के अनुच्छेद 22 एक का उल्लंघन थी। गिरफ्तारी का वारंट मैकेनिकल था और शिकायत में कोई संघीय अपराध का खुलासा नहीं हुआ। कोर्ट ने पुलिस को आदेश दिया कि वह शर्मिष्ठा की सुरक्षा सुनिश्चित करें। तो सवाल यह है कि क्या जस्टिस पार्थ सारथी ने संविधान नहीं पढ़ा है? क्या उन्हें संविधान का अनुच्छेद 22 एक पता नहीं था? यहां एक बात को अपने ध्यान में रखिएगा। जब जस्टिस पार्थ सारथी ने जमानत याचिका को खारिज कर दिया था तो आईटी सेल के गुर्गों का यानी नफरती चिंटुओं का एक वर्ग लगातार उन्हें जान से मारने की धमकी दे रहा था और धमकी के बाद दूसरे जज ने जमानत दे दी है। आखिर एक ही कोर्ट के दो जज अलग-अलग फैसले एक ही मामले में देते हैं। वो भी चंद दिनों के भीतर। मजेदार यह है कि दूसरा जज पहले का फैसला खारिज कर देता है और ऐसा भी नहीं है कि शर्मिष्ठा का केस संवैधानिक मामला था।

सवाल यह भी है कि अगर शर्मिष्ठा का पोस्ट इतना खतरनाक था तो उसके शिकायतकर्ता वजाहत खान कादरी के खिलाफ मामला क्यों दर्ज हुआ है? या न्यायपालिका अभिव्यक्ति की आजादी की सीमा तय कर रही है तो विजय शाह जैसे नेताओं के बयानों पर सुप्रीम कोर्ट की चुप्पी क्या कहती है? क्या कर्नल सोफिया कुरैशी को आतंकवादियों की बहन कहना सेना, देश और महिला शक्ति का अपमान नहीं था। एक धर्म के लोगों को टारगेट करना नहीं था। तो शर्मिष्ठा पनोली को जेल और विजय शाह की महमूदाबाद को अंतरिम जमानत दी लेकिन जांच पर रोक नहीं लगाई। कोर्ट ने हरियाणा डीजीपी को 24 घंटे में तीन आईपीएस अधिकारियों के एसआईटी बनाने का आदेश दे दिया और महमूदाबाद को ऑपरेशन सिंधु पर कमेंट करने से मना कर दिया। विजय शाह के मामले में हाई कोर्ट और सुप्रीम कोर्ट के रवैया को देखें तो महमूदाबाद पर सुप्रीम कोर्ट का फैसला चौंकाने वाला है।

कांग्रेस नेता पी चिदंबरम और मल्लिकार्जुन खड़े ने इसे अभिव्यक्ति की आजादी पर हमला करार दिया। मगर अभिव्यक्ति की आजादी की रक्षा करने की जिम्मेदारी तो कोर्ट की थी क्या कोर्ट फेल रहा? महमूदाबाद के केस में कानून के जानकारों ने भी सुप्रीम कोर्ट के फैसले पर सवाल उठाए। लेकिन न्यायपालिका को कोई फर्क नहीं पड़ता। कर्नल सोफिया कुरैशी, विजय शाह और महमूदाबाद के केस में जजों की सोच, फैसले और एक्शन में जो अंतर है वो साफ दिख रहा है। जनता जान चुकी है कि महमूदाबाद ने क्या लिखा था। उन्होंने युद्ध के खतरनाक अंजाम की बात की लेकिन शांति की वकालत की और इसके लिए उन्हें जेल जाना पड़ा। सुप्रीम कोर्ट ने अंतरिम जमानत दी लेकिन उनकी अभिव्यक्ति की आजादी का गला घोट दिया। न्यू जर्सी में दिया गया प्रशांत भूषण का बयान भारत का लोकतंत्र खतरे में है।


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